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मौज-मस्ती और हसीन सपनों का सौदागर

पिता के ट्रांसपोर्ट कारोबार में दिल नहीं लगा तो परिवार के प्रिया थिएटर के जरिए सिनेमा कारोबार में किस्मत आजमाई. आज उनकी कंपनी पीवीआर दुनिया की टॉप टेन सिने कंपनियों में शामिल है.

अपडेटेड 14 दिसंबर , 2015

हरियाणा के गुडग़ांव में साइबर सिटी की एक भव्य इमारत की चौथी मंजिल पर पीवीआर सिनेमाज लिखा हुआ नुमायां होता है. उस शानदार दफ्तर में कुछ कदम आगे बढऩे पर कांच के एक विशाल कमरे में आरामदेह सोफे पर एक शख्स बड़े ही इत्मीनान से अपने साथियों के साथ भविष्य की योजनाएं बनाने में जुटा है. चेहरे पर मुस्कान है लेकिन दिमाग में तूफान है. वे भारत में 477 स्क्रीन्स के मालिक हैं और देश में थिएटर्स की अपार संभावनाओं को देखते हुए इस आंकड़े को चार नंबरों में लाने का इरादा रखते हैं. वर्तमान में पीवीआर दुनिया की टॉप 10 सिनेमा कंपनियों में शुमार है. उनकी कंपनी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सबसे तेजी से तरक्की करने वाली ग्लोबल कंपनीज में अपनी जगह बना चुकी है. मीटिंग खत्म होते ही उन्हें मुंबई के लिए निकलना है और इसी बीच फोटो शूट भी कराना है. कैमरे के फ्लैश के बीच वे जहां पोज देते हैं, वहीं यह पूछने पर कि आपके लक्ष्य क्या हैं, अजय बिजली मुस्कराते हुए कहते हैं, “मेरे लक्ष्य तो समय के साथ बदलते रहते हैं.”

हर कामयाब शख्स के पीछे एक लंबी और संघर्ष भरी कहानी होती है. अजय इस मामले में अपवाद नहीं हैं. उनके पिता कृष्ण मोहन बिजली की दिल्ली में ट्रांसपोर्ट कंपनी थी और प्रिया नाम का सिनेमाघर. जब अजय ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया तो उन्हें पता था कि अब उन्हें पिता के ट्रांसपोर्ट बिजनेस में हाथ बंटाना होगा. अमृतसर ट्रांसपोर्ट कंपनी का दफ्तर रिवोली सिनेमा के पास हुआ करता था. 1990 में अजय की शादी हुई तो वे अमेरिका गए और विश्वस्तरीय सिनेमाघर देख उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं. वे लौटे तो उन्होंने अपने पिता से एक मौका चाहा ताकि वे प्रिया को बदल सकें. पिता ने हां की तो खुद इंग्लिश फिल्मों के शौकीन रहे अजय ने हॉलीवुड फिल्मों के जरिए किस्मत आजमाने का फैसला किया. उन्होंने विदेशी स्टूडियो से फिल्मों के लिए बात की, और वे इस शर्त पर अपनी फिल्में देने के लिए राजी भी हो गए कि उन्हें प्रिया का नवीकरण करना होगा. उन्हें अपने इस ख्वाब को हकीकत में तब्दील करने में दो साल लगे. इस काम में उनकी पत्नी सेलेना का भरपूर साथ भी मिला.

लेकिन इसी बीच उनकी ट्रांसपोर्ट कंपनी में आग लग गई और 1992 में पिता का देहांत हो गया. उन्होंने अपनी मां से सिनेमा बिजनेस पर फोकस करने के लिए अनुमति मांगी तो उन्हें उनका आशीर्वाद मिला. अब उनका फोकस मल्टीप्लेक्स बिजनेस था, उस समय तक भारत इससे पूरी तरह अनजान था. उन्होंने अप्रैल, 1995 में प्रिया एग्जिबिटर्स प्राइवेट लिमिटेड और ऑस्ट्रेलिया की विलेज रोडशो लिमिटेड कंपनी के साथ ब्रांड पीवीआर (प्रिया विलेज रोडशो) खड़ा किया और दिल्ली के अनुपम थिएटर को देश के पहले मल्टीस्क्रीन सिनेमा में तब्दील कर दिया. इसके बाद से उन्हें पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा.

लेकिन मुश्किल घड़ी 2001 में अमेरिका में 11 सितंबर को हुए आतंकी हमले से आई. विलेज रोडशो ने इस घटना को देखते हुए कई देशों में अपने बिजनेस से हाथ खींच लिए. हालांकि वे पीवीआर नाम रखने में कामयाब रहे, लेकिन उन्हें उस समय इन्वेस्टर की दरकार थी, तब आइसीआइसीआइ बैंक ने उनकी ओर हाथ बढ़ाया. मजबूत साथ से उनके हौसले बुलंद हुए तो उन्होंने 2003 में बेंगलूरू में 11 स्क्रीन सिनेमा शुरू किया जो एशिया का सबसे बड़ा सिनेमाघर है. उन्होंने सिस्टम को पारदर्शी बनाने के लिए टिकटों की ऑनलाइन बुकिंग शुरू की. 2007 में उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन में भी हाथ आजमाया और तारे जमीं पर जैसी सुपरहिट फिल्म आमिर खान प्रोडक्शंस के साथ दी.

फिलहाल उन्होंने प्रोडक्शन से हाथ खींच लिया है. उनके पिता ने 25 साल पहले प्रिया के नवीकरण के लिए उन्हें 40 लाख रु. दिए थे और आज उसकी बदौलत वे लगभग 1,486 करोड़ रु. (2014-15) के टर्नओवर वाला साम्राज्य स्थापित कर चुके हैं. अजय कहते हैं, “भारत में स्क्रीन की बहुत कमी है और मैं हर उस जगह अपनी पहुंच बनाना चाहता हूं, जहां तक संभव है. हमने रेस्तरां से लेकर बाउलिंग बिजनेस तक में निवेश किया है.” आज वे सालाना 50-60 स्क्रीन्स का इजाफा कर रहे हैं. यही नहीं, वे समाज के हर तबके को अपने सिनेमाघर तक लाने में यकीन करते हैं. तभी तो अगर महंगी पीवीआर गोल्ड क्लास है तो छोटे शहरों के लिए पीवीआर टॉकीज का कॉन्सेप्ट लाया गया है, जहां अपेक्षाकृत टिकटें सस्ती हैं.

उनकी कंपनी का सिनेमा से जुड़े विज्ञापन बाजार पर 70 फीसदी कब्जा है. अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के जरिए पीवीआर सिनेमा एग्जिबिशन मंच को आधार बनाकर काम कर रहा है. वे शिक्षा को प्रोत्साहित करने के अलावा हेल्थकेयर, पोषण और बच्चों के पुनर्वास के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. पीवीआर को ब्रांड ट्रस्ट रिपोर्ट-2015 ने मनोरंजन और सिनेमा वर्ग में सबसे विश्वसनीय और आकर्षक ब्रांड माना है. उनके इस सफर में छोटे भाई संजीव कुमार बिजली का भरपूर साथ रहा है. देश में हॉलीवुड फिल्मों को लाने और क्षेत्रीय सिनेमा को प्रोत्साहित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. अजय बिजली ने पीवीआर और मल्टीप्लेक्स के जरिए देश में फिल्म देखने के अनुभव को मौज-मस्ती और मनोनरंजन का पर्याय बना दिया है.

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