शाम के साढ़े छह बज रहे हैं. नोएडा के मोबाइल वैल्यू एडेड कंपनी वन97 के ऑफिस के गेट पर नीले रंग की एक बीएमडब्ल्यू कार खड़ी है. कार की दूसरी ओर से कंपनी के चेयरमैन विजय शेखर शर्मा मुस्कराते हुए हाथ हिलाते हैं और उसमें बैठने का इशारा करते हैं. वे खुद ड्राइवर सीट पर बैठते हैं और दिल्ली के पांच सितारा होटल ताज मानसिंह की राह पर निकल पड़ते हैं. वहां वे पहली बार बिल गेट्स से मिलने जा रहे हैं. इस भेंट का उत्साह उनके चेहरे पर साफ झलकता है. आप खुद गाड़ी चला रहे हैं? साथ में कोई लाव-लश्कर भी नहीं! इस सवाल पर विजय हंसते हुए कहते हैं, ''एक समय मेरे पास मारुति 800 थी और मैं खुद चलाता था. आज बीएमडद्ब्रल्यू है तो उसे ड्राइवर क्यों चलाए? ’’काम को अपनी मस्ती, खुशी और जोश मानने वाले विजय को सामान्य जिंदगी जीने में मजा आता है. उन्होंने 2001 में मोबाइल वैल्यू एडेड कंपनी वन97 की शुरुआत तीन लाख रु. से की थी लेकिन 2010 में ऑनलाइन वॉलेट पेटीएम का आइडिया आया और आज उनकी कंपनी 15,000 करोड़ रु. की लागत की हो गई है.
विजय की पृष्ठभूमि कारोबारी नहीं रही है. वे अलीगढ़ के एक बायोलॉजी टीचर के बेटे हैं. छोटा शहर था तो पढ़ाई तो ठीक-ठाक थी लेकिन अंग्रेजी में हाथ तंग था. इंजीनियर बनने के लिए जब वे इंजीनियरिंग की परीक्षा देने दिल्ली आए तो उन्हें जोर का झटका लगा. पर्चा अंग्रेजी में था. लेकिन ऑब्जेक्टीव टाइप था इसलिए एग्जाम निकाल ले गए. उस समय तक यही लक्ष्य था कि कॉलेज हो जाए और अच्छी नौकरी मिल जाए. हर विचार का एक समय होता है, उसी तरह उनका नियति से साक्षात्कार दिल्ली के दरिया गंज में लगने वाली किताबों की संडे मार्केट से हुआ. संडे मार्केट में उन्होंने कुछ किताबें और पत्रिकाएं खरीदीं, दुनिया के बारे में पता चला. वे कहते हैं, ''तब जाना कि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी क्या होती है, एक अरब कितना होता है. धीरे-धीरे चाह पैदा हुई कि हम भी ऐसा कर सकते हैं.’’
कॉलेज में रहते हुए ही उन्होंने एक्सएस कॉर्प नाम की कंपनी बना ली थी. यह कंपनी इंटरनेट से जुड़ी सेवाएं देती थी. 1998 में उनकी पढ़ाई पूरी हुई तो उन्हें एक विदेशी कंपनी से एक्सएस कॉर्प को खरीदने का ऑफर मिला. उसके बाद दो साल तक वे विदेश और भारत में काम करते रहे. लेकिन 2001 में वन97 की स्थापना की. मुश्किलें तो अभी बाकी थीं. 2004-05 की सर्दियां थीं, और कैश क्रलो की कमी की वजह से कंपनी परेशानी में थी. वे दोस्तों के घर पर रहने लगे. कई बार ऐसा हुआ कि 12 रु. में रात गुजारनी पड़ी. कभी सिर्फ कोक पीकर और बॉरबन बिस्कुट खाकर. लेकिन वे अपने मंत्र ''लगे रहोÓÓ पर कायम रहे और 2010 तक उनकी कंपनी 100 करोड़ रु. की हो चुकी थी.
उनकी जिंदगी का अहम मोड़ अक्तूबर, 2014 में उस समय आया जब उनकी मुलाकात ढाई सौ अरब डॉलर की कंपनी अलीबाबा के संस्थापक-चेयरमैन जैक मा से हुई. विजय बताते हैं, ''हम पेटीएम बना चुके थे और उसके लिए फंड उगाह रहे थे. जब जैक मा से मिलने का मौका मिला तो यह किसी एग्जाम से कम नहीं था.‘‘आधे घंटे की यह मुलाकात ढाई घंटे तक चलती रही.’’ उनके लिए वह मौका हैरान कर देने वाला था, जब जैक उन्हें समझाने लगे कि उन्हें पैसा उनकी कंपनी से ही लेना चाहिए. अच्छे इन्वेस्टर हैं लेकिन मजेदार यह कि विजय को इस बात का यकीन ही नहीं हो रहा था, सो उन्होंने इस मौके की वॉयस रिकॉर्डिंग शुरू कर दी. वे कहते हैं, ''मैंने सोचा, पैसे मिलें या न मिलें, पर यह तो याद रहेगा कि जैक मा ने मुझसे यह बात कही थी.’’
जब अच्छा निवेश मिल गया तो उन्होंने कंपनी को भरोसेमंद और एस्पिरेशनल ब्रांड बनाने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने टीम इंडिया को स्पॉन्सर करने की योजना बनाई तो बात निकली की यह कम से कम 200 करोड़ रु. की होगी. उन्होंने 200 करोड़ रु. पर दांव खेलने का मन बना लिया. अब उनका लोगो खिलाडिय़ों की जर्सी पर नजर आने लगा है.
पेटीएम को बनाते समय उनका फंडा था: गो बिग और गो होम (या तो बड़े बन जाओ या बंद कर दो). वे बताते हैं कि ऑनलाइन वॉलेट सर्विस शुरू करते समय उनके पास दो ऑप्शन थे. या तो ग्राहकों को 100 रु. पर 30 रु. की छूट दें या फिर 100 रु. की खरीदारी करने पर 30 रु. उनके वॉलेट में वापस लौटा दें. विजय कहते हैं, ''मैंने दूसरे विचार पर काम किया. हालांकि सब इसके खिलाफ थे. लेकिन मैं यह दांव खेलना चाहता था.’’
इस तरह उन्होंने शॉपिंग को खेल बना दिया. आरबीआइ ने पिछले 15 साल में पेटीएम से पहले इस तरह के बिजनेस के लिए 30 लाइसेंस दिए थे. कोई भी कंपनी बड़ा नाम न बन सकी.
अब वे पेटीएम को बैंक में तब्दील करने की तैयारी में हैं. उनकी तैयारी देश के 50 करोड़ ऐसे लोगों तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाने की है जो इससे महरूम हैं. उनके बैंक को आरबीआइ से मंजूरी मिल गई है और 2016 में वे इसे लॉन्च कर देंगे. इस बैंक की कम शाखाएं होंगी और यह मोबाइल बैंक ज्यादा होगा. मैसेज करो और घर पर पैसे पाओ.
अपनी सीएसआर पहल के तहत वे नेशनल हॉलिडे के दौरान पेटीएम के प्रॉफिट को चैरिटेबल ऑर्गेनाइजेशंस में दान कर देते हैं. जैसे 26 जनवरी का फायदा उन्होंने आर्मी वाइफ वेलफेयर एसोसिएशन को दे दिया. उनके मां-पापा आज भी अलीगढ़ में रहते हैं और वे खुद ग्रेट कैलाश में किराए के मकान में पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ. वे कहते हैं, ''मैं नॉर्मल लाइफ जीना चाहता हूं और दिखावे के खिलाफ हूं.’’

