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अपने-अपने शहर का खाना-खजाना

बनारस में चाची की दुकान की जलेबी या लखनऊ का रत्ती खस्ता —हर शहर के पारंपरिक खानपान के कुछ देसी ठिकाने जिनका लुत्फ आप वहां जाकर उठाना पसंद करेंगे.

अपडेटेड 30 अक्टूबर , 2015

तड़के गंगा में डुबकी, फिर बाबा विश्वनाथ के दर्शन और उसकेबाद योग-ध्यान. बनारस का मॉर्निंग वॉक यही है. इतना सब कुछ करने के बाद पेट में चूहे कूदना लाजिमी है. बनारस की सुबह हो तो किसी से भी स्वादिष्ट नाश्ते की बाबत पूछने पर बनारसवासियों की जुबान पर पहला नाम आता है, पूड़ी जलेबी और चने की सब्जी का और उंगली इशारा करती है लंका के पास वाली चाची की दुकान की ओर. वे इतना ही कहते हैं, ''जो मजा यहां की जलेबी-कचैड़ी का है, वह कहीं और कहां.''

बनारस में लंका से कैंट जाने की ओर थोड़ी दूर आगे बढ़ते ही रविदास गेट है. इसी चैराहे पर कैंट जाने के मुहाने पर एक पुरानी-सी दुकान पर लोगों का हुजूम देख आप चैंक उठेंगे. शाम का आलम ऐसा कि यहां ट्रैफिक के साथ-साथ ग्राहक धक्का-मुक्की करते जलेबियों का स्वाद लेते नजर आते हैं. इनमें अपनी स्कूटी बगल में खड़ी किए ब्रांडेड कपड़ों में सजी बीएचयू की मैनेजमेंट छात्रा 26 वर्षीया काव्या बग्गा मिल जाएंगी तो स्थानीय राजनीति में पगे अधेड़ प्रमोद कुमार भी. यही है चाची की दुकान. ऐसे में दुकान के मालिक रामजी यादव की इस बात में कोई शक नहीं कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जैसे दिग्गज नेता तक यहां की जलेबी का स्वाद ले चुके हैं तो मशहूर शास्त्रीय गायक राजन-साजन मिश्र इधर से गुजरते हैं तो इनका स्वाद लेना नहीं भूलते. बीएचयू के कला भवन में गैलरी अटेंडेंट के तौर पर काम कर चुके और दिवंगत चाची के छह बेटों में से तीसरे रामजी यादव बताते हैं, ''फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना ने भी एक बार विंध्याचल जाते हुए जलेबी का स्वाद लिया और चाची की गाली खाई थी.''

1908 में खुली चाची की दुकान के पास काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से लेकर करीब चार-पांच किलोमीटर दूर स्थित काशी विद्यापीठ समेत तमाम स्कूल-कॉलेजों के छात्रों का तो यह नियमित ठौर है. प्रमोद कुमार कहते हैं, ''शहर के 60 फीसदी लोगों के दिन की शुरुआत ही कचौड़ी-जलेबी से होती है. चाची की दुकान से शुरुआत हो तो सोने पर सुहागा. दरअसल, अन्य दुकानों में तो सिर्फ कचौड़ी-जलेबी मिलती थी, लेकिन चाची की दुकान पर इसके साथ चाची की खांटी बनारसी उक्तियां और गालियां जलेबी की मिठास बढ़ा देती थीं. सो यहां की आदत-सी लग गई.'' पार्वती उर्फ छन्नो देवी, जिन्हें लोग प्यार से चाची कहते थे, अब गुजर चुकी हैं. लेकिन अपने बेटों को अपना हुनर सौंप गई हैं. लिहाजा वह पुराना खास स्वाद और जलवा अब भी बरकरार है.

रामजी यादव बताते हैं, ''जलेबी बनाने वाली मैदानी पर हम बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह मां ने हमें सिखा दिया था.'' वे बताते हैं कि थोड़ी-सी गलती होने पर ही वे पिल पड़ती थीं, ''एइसहीं चलइब दुकान त लुटिया डूब जाइ बचवा.'' रामजी चुनौती देने के अंदाज में कहते हैं, ''हमारे यहां की जलेबी को दो दिन तक रखकर भी खाइए, उसका कुरकुरापन और स्वाद बना रहता है. और कचैड़ी तो एकदम मुलायम रहती है.''

कचौड़ी-पूड़ी की ही बात करें तो बनारस से तकरीबन 750 किमी दूर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अग्रवाल पूड़ी भंडार का कुछ ऐसा ही जलवा है. पुराने शहर में 1947 से मौजूद इस दुकान ने धीरे-धीरे ऐसा मुकाम बना लिया है कि शहर का शायद ही कोई बाशिंदा हो जो यहां न आया हो. अग्रवाल पूड़ी भंडार के प्रदीप अग्रवाल कहते हैं, ''हम पूड़ी और आलू की सब्जी के साथ-साथ रायता और कद्दू का अचार भी परोसते हैं. लोग इसे खाने दूर-दूर से लोग आते हैं. दरअसल यहां का स्वादिष्ट मसाला इसे अन्य दुकानों से अलग बना देता है.''

इसी तरह उत्तराखंड के धार्मिक पर्यटन के केंद्र हरिद्वार की हरकी पौड़ी में मोहनजी पूरी वाले की दुकान अपनी स्वादिष्ट पूरियों की वजह से 70 साल से स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की पहली पसंद बनी हुई है. हरिद्वार में आने वाले श्रद्धालु एक और दुकान का पता पूछते नजर आते हैं. वह है मोती बाजार में ठंडा कुआं स्थित मथुरा वालों की पुरानी दुकान, जो तकरीबन 92 वर्षों से चंद्रकला और मलाई के समोसे के लिए मशहूर है. इसे मथुरा से आए पंडित मुरलीधर शर्मा ने शुरू किया था. अब इसे उनके नाती श्रीकृष्ण शर्मा चलाते हैं.
हर शहर के अपने पकवान और ठिकाने

शहर-दर-शहर: अपने-अपने पकवान और ठिकाने
पिछले 80 वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तो बहुत बदल गई है लेकिन यहां रत्ती के खस्तों का जायका अब भी बरकरार है. यहां का शायद ही कोई बाशिंदा हो, जो एक बार चारबाग रेलवे स्टेशन से दो किमी दूर उत्तर दिशा में हीवेट रोड पर रत्तीलाल खस्ते की दुकान खोजता न पहुंचा हो. खास विधि से तैयार मैदे की लोई के बीच उड़द की दाल की पिट्ठी को भरकर तैयार किए गए खस्ते के साथ खास किस्म के चटपटे मसाले में लिपटी आलू की सब्जी के दीवाने सुबह छह बजे से ही रत्तीलाल की दुकान पर जुटने लगते हैं. 200 वर्ग फुट में फैली यह दुकान 1937 में रत्तीलाल गुप्ता ने खोली थी. उन्होंने राजस्थान के पारंपरिक पकवानों में थोड़ा सुधार करके खस्ते को ईजाद किया था. इन खस्तों ने लखनऊ वालों को ऐसा मोहा कि इनका नाम ही रत्ती खस्ता पड़ गया. रत्तीलाल के देहांत के बाद इस परंपरा को उनके 50 वर्षीय बेटे राजकुमार गुप्ता ने कायम रखा है. वे बताते हैं, ''रत्ती खस्ते की खासियत यह है कि यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद है. इसे इस तरह से तैयार किया जाता है कि चिकनाई की मात्रा बेहद कम रहे.'' आलम ऐसा कि हर रोज कम-से-कम 500 ग्राहक यहां जरूर पहुंचते हैं. इन्हीं में से एक 75 वर्षीय भीमसेन सेठी कहते हैं, ''मैं पिछले 60 वर्षों से यहां का खस्ता खा रहा हूं, इसके स्वाद में वहीं जादू कायम है.'' यहीं नहीं, कोई ग्राहक दूसरे शहर में रहने वाले अपने परिचितों के लिए खस्ता लेने आता है तो गुप्ता उसकी पैकिंग खास तरीके से करते हैं जिससे कि दो हफ्तों तक खस्ता ताजा बना रहता है.

भगवान बुद्ध की ज्ञानभूमि और पितरों की मोक्षभूमि के तौर पर बिहार के गया की प्रसिद्धि तो प्राचीन काल से ही रही है. लेकिन एक और चीज है जो पिछले 150 साल से गया की पहचान बन चुकी है. वह है यहां का तिलकुट और तिल की बनी मिठाइयां. इसकी कहानी भी दिलचस्प है. कस्तूरी तिलकुट भंडार के मालिक लालजी प्रसाद का मानना है, ''करीब 150 साल पहले दिवंगत गोपी साव ने लखनऊ की प्रसिद्ध रबड़ी की निर्माण कला में सुधार करके तिलकुट का ईजाद किया था.'' हालांकि प्रसिद्ध श्रीराम तिलकुट भंडार के मालिक मनोहर प्रसाद केसरी तिलकुट की मौजूदगी सम्राट अशोक के शासन काल से बताते हैं. जो भी हो, नवंबर से मार्च तक खासकर मकर संक्रांति के दौरान इन दुकानों पर ऐसी भीड़ उमड़ती है कि लोगों को धक्का-मुक्की करके तिलकुट खरीदना पड़ता है. तिलकुट के प्रमुख दुकानदार मंडी रमना बाजार के बबलू मेहता बताते हैं, ''यहां के तिलकुट की दीवानगी ऐसी है कि अन्य शहरों के रिश्तेदार तो रिश्तेदार, नेता-अफसर और कर्मचारी भी बतौर रिश्वत तिलकुट ही पसंद करते हैं. '' बहरहाल तिलकुट एक अलहदा मिष्ठान्न है जो मुख्य तौर पर बिहार और खासकर गया में ही बनाया जाता है.

अगर आप उत्तरी बिहार के पूर्वी चंपारण के मोतिहारी शहर चले जाएं तो पपीते के  लड्डू चखना नहीं भूल सकते. यहां तरह-तरह के लड्डुओं के लिए मशहूर दुकान गेलॉर्ड का खास ब्रांड ही बन गया है पपीते का लड्डू. दुकानदार अशोक बताते हैं, ''करीब एक दशक पहले इस इलाके में पपीते की बिक्री कम थी, लिहाजा मेरे एक दोस्त के बगीचे के पपीते बर्बाद हो जाते थे. ऐसे में हमने पपीते के लड्डू बनाने की सोची और यह कामयाब भी रहा.'' अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल के वंशज राजेश नारायण सिन्हा बताते हैं, ''बेटी की शादी के बाद पिछले तीन साल में मैं करीब 40 किलो लड्डू उसके यहां गुजरात ले कर जा चुका हूं. स्वाद ऐसा कि उसके पड़ोसी भी डिमांड करते हैं.'' इसी तरह राजस्थान के जोधपुर में नई सड़क पर पोकरराम भाटी की दुकान का मिर्ची बड़ा और जयपुर में एमआइ रोड के पास पांच बत्ती चौराहे के पास किशनलाल अग्रवाल की लस्सी की दुकान का स्वाद भी अलहदा ही है. किशनलाल ने 1944 में लस्सी की दुकान शुरू की थी और उनकी चौथी पीढ़ी इसे संभाल रही है. नटवरलाल सोनी जैसे लोग अपने घर से 16 किलोमीटर दूर से इसका स्वाद लेने यहां आते हैं तो विदेशियों की भी भीड़ जुटी रहती है.

फास्ट फूड कल्चर में भी स्थानीय पकवानों का जलवा
जोधपुर में मिर्ची बड़े की शुरुआत पोकरराम ने 1962 में की थी और अब उनकी दुकान की जोधपुर में चार और जयपुर में एक ब्रांच खुल गई है. दरअसल यहां के लोग मिर्ची बड़े का इस्तेमाल रोटी के साथ भी करते हैं. खानपान के शौकीन गोल्डी बिस्सा कहते हैं, ''भले ही पिज्जा-बर्गर का जमाना आ गया हो, लेकिन यहां पहली पसंद मिर्ची बड़े ही हैं.'' वहीं बनारस की चाची की कचौड़ी-जलेबी के बारे में मेयर रामगोपाल कहते हैं, ''यह काशी के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में फिट बैठता है. युवा भले ही सड़क पर खड़े होकर इसे न खाएं लेकिन वह भी पैक कराकर जरूर ले जाते हैं.'' जाहिर है, इन शहरों की अपनी-अपनी सांस्कृतिक परंपरा और पहचान है कि वहां ऐसे खानपान फास्ट फूड कल्चर के जमाने में भी बनाए हैं. इसके अलावा इन पकवानों को परोसने वाले दुकानदारों ने अपने स्वाद, इनोवेशन और व्यवहार की बदौलत अपना जलवा बनाए रखा है. मसलन, मोतिहारी के गेलॉर्ड ने पपीते का लड्डू तैयार किया, जो स्वास्थ्यवर्धक भी है. सरकारी सेवा में कार्यरत रविप्रकाश बताते हैं, ''मेरे बच्चे भी इसे खूब पसंद करते हैं. स्वाद और स्वास्थ्य के नजरिए से यह बेस्ट है, सो हमें भी कोई दिक्कत नहीं.''

 इसी तरह लखनऊ के रत्ती खस्ते वाले राजकुमार खुद तो खस्ता तैयार करते ही हैं, दूसरे कारीगरों को भी खस्ता बनाने का प्रशिक्षण देते हैं. लखनऊ की दो दर्जन ज्यादा से जगहों पर उनसे प्रशिक्षण पाए कारीगर खस्ते के ठेले लगाकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. राजकुमार के 27 वर्षीय बेटे रवि गुप्ता ने बीटेक करने के बाद नौकरी करने की बजाए अपनी दादा की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए पिता का हाथ बंटाना उचित समझा. रवि ने अपनी पुरानी दुकान के सामने एक नई दुकान खोली है ताकि ग्राहक सड़क पर नहीं, बल्कि साफ-सुथरे माहौल में रत्ती खस्ता का आनंद ले सकें. इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए भी रत्ती खस्ता की जानकारियां दे रहे हैं. अब व्हाट्सऐप पर मैसेज करके भी रत्ती खस्ता की एडवांस बुकिंग कराई जा सकती है. रवि बताते हैं, ''खस्तों को ग्राहकों तक पहुंचाने के तौर-तरीके में समय के मुताबिक थोड़े बदलाव किए गए हैं, लेकिन स्वाद से बिल्कुल समझौता नहीं किया गया है.''  वहीं हरिद्वार की मथुरा वाली दुकान के मालिक श्रीकृष्ण शर्मा कहते हैं, ''मेरे नाना ने जिस हालत में दुकान शुरू की थी, यह करीब उसी हाल में है. इसका कोई मॉर्डनाइजेशन नहीं किया गया है और न कोई साज-सज्जा. फिर भी लोग इसका नाम पूछते-पूछते यहां आते हैं.'' भोपाल के अग्रवाल पूड़ी भंडार के अशोक अग्रवाल कहते हैं, विदेशी खाने का स्वाद कितना भी बढ़ जाए, पारंपरिक खाना आज भी उतना ही आकर्षित करता है.'' शायद यह देशज सांस्कृतिक-सामाजिक तानाबाना, पांरपरिक स्वाद और इन विशिष्ट पकवानों को परोसने वाले दुकानों का हुनर और स्वाद ही है कि ग्राहक तंग गलियों से गुजरते हुए भी इन तक पहुंच जाता है.

(साथ में आशीष मिश्र, राहुल यादव, विजय महर्षि, कुणाल प्रताप सिंह, जितेंद्र पुष्प, शुरैह नियाजी और अखिलेश पांडे)

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