छह फुट की बांस की लाठी ही 65 वर्षीय देवराज यादव का सहारा है. 40 साल पहले एक दुर्घटना में उन्हें अपना दायां पैर कटवाना पड़ा था. बड़े भाई 68 वर्षीय बलबीर तो बचपन में ही पोलियो के कारण अपंग हो गए थे. इस कठिन घड़ी में भी देवराज ने लाठी को अपने शरीर से बांध बड़ी कठिनाई से खेतों में हल चलाया और परिवार के लिए अन्न का इंतजाम किया. यह कहानी बांदा जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर एक गांव पतवन के उस किसान की है जिसने एक पैर और शरीर में बंधी लाठी से खेती कर पिछले 40 साल के दौरान बुंदेलखंड में पड़े डेढ़ दर्जन से ज्यादा सूखे का हिक्वमत के साथ मुकाबला किया.
इस दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में खेत साहूकार के पास गिरवी हो गया. बैंक के 35,000 रु. के कर्जदार हो गए. फिर अप्रैल में भारी बारिश के साथ पड़े ओलों ने खेत में खड़ी गेहूं की फसल तबाह कर दी तो देवराज ने आठ बीघा खेत में अरहर के साथ तिल की फसल बोई. यह सोचकर कि अगर मौसम ने साथ दिया तो फरवरी तक अरहर और तिल बेचकर नुक्सान की भरपाई कर देंगे. लेकिन वे मौसम की चाल न भांप सके. जून-जुलाई में फसल की बुआई के समय कुछ बारिश हुई, लेकिन इसके बाद आसमान से एक बूंद न टपकी. फसल सूखती रही और गांव में मौजूद सरकारी नलकूप, तालाब भी दगा दे गए.
भारी मन से देवराज ने खेत में खड़ी फसल काटकर जानवरों के लिए चारे का इंतजाम किया. लेकिन इस बार सूखे खेत में हल चलाने में उनकी हिम्मत जवाब दे गई. परिवार भुखमरी की कगार पर आ गया. वे भाग्यशाली थे कि उनकी कहानी सोशल मीडिया पर छा गई. मुक्चयमंत्री अखिलेश यादव ने 10 अक्तूबर को उन्हें 5 लाख रु. मदद की घोषणा कर दी.
लेकिन पतवन से 80 किमी दूर पचकौरी गांव के 68 वर्षीय बाबू सिंह देवराज की तरह भाग्यशाली नहीं थे. अप्रैल में फसल नष्ट होने के बाद उन्होंने भी देवराज की तरह अपने 20 बीघा खेत में अरहर और तिल की खेती की. फसल के लिए पानी की जरूरत थी, लेकिन बादल निष्ठुर बने रहे. गांव के इकलौते तालाब की तलहटी में दरारें आ गईं. खेत में सूखी फसल खड़ी थी. ऐसे में बैंक और साहूकार से लिए कर्ज की भरपाई करना असंभव हो गया. प्रशासन आंख-कान बंद किए बैठा रहा. जब कोई और रास्ता नहीं सूझा तो 7 अक्तूबर को उन्होंने जहर खाकर जान दे दी.
बाबू सिंह अकेले नहीं हैं. बांदा की पैलानी तहसील के चिल्ला गांव के निवासी किसान 50 वर्षीय गमेश और गोरखपुर के नगवां भगवान गांव के 45 वर्षीय दलित किसान भी सूखती फसल देख नहीं पाए. दोनों अपने खेत में गश खाकर गिर पड़े और फिर कभी नहीं उठे.
सूखे का सामना कर रहे प्रदेश के तकरीबन 25 लाख किसानों की यही दास्तान हैं. मार्च-अप्रैल में भारी बारिश से हुए नुक्सान से उबरने में लगे किसानों को अब जून से सितंबर के बीच हुई बेहद कम बारिश ने तोड़कर रख दिया है. सूबे के 16 जिलों में सामान्य से 40 फीसदी कम बारिश हुई है. कुल 31 जिले तो ऐसे हैं, जहां सामान्य का आधा पानी भी नहीं बरसा है. खेतों में पड़ी दरारों से सदमे में आए किसानों की मौत का सिलसिला फिर शुरू हो गया है.
भ्रष्टाचार ने बिगाड़े हालात
सूखे से निबटने के इंतजाम किस कदर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए हैं, इसके लिए चित्रकूट और बांदा की सीमा पर स्थित चौधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना एक आदर्श उदाहरण है. तीन साल पहले 76 करोड़ रु. की लागत से तैयार हुए इस बांध की कुल लंबाई 2.6 किमी है. इससे कुल 22.80 किमी लंबी नहरें सिंचाई के लिए निकाली गई हैं, जिनसे बघेलाबाड़ी, संग्रामपुर, गुडऱामपुर, फतेहपुर समेत कई ग्राम पंचायतों में सिंचाई की व्यवस्था की गई थी. राज्य सरकार ने भले ही नहरों में टेल तक पानी पहुंचाने का आदेश दे रखा हो, लेकिन रसिन बांध पर पहुंचकर सारे सरकारी इंतजामों की पोल खुल जाती है.
बारिश न होने पर जिस बांध के पानी को नहरों के रास्ते खेतों में पहुंचकर किसानों को राहत देनी चाहिए थी, उसका बैराज एक बार भी ऊपर नहीं उठा. सिंचाई विभाग की इस परियोजना से निकलने वाली नहर की तलहटी में बड़ी-बड़ी झाडिय़ां उग आई हैं. उधर, चित्रकूट में सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता आर. के. वर्मा कहते हैं, “बांध से दो माइनर चालू की गई हैं. पांच करोड़ रु. की और जरूरत है. मिलते ही दूसरी माइनर भी शुरू हो जाएगी.”
बुंदेलखंड के सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआइ एक्टिविस्ट आशीष सागर दीक्षित बताते हैं, “सूखे से निबटने के लिए बनाए गए बांध भ्रष्टाचार के कारण बेमानी साबित हो रहे हैं.” बारिश न होने से इन बांधों में भी पानी का अकाल पड़ गया है. चित्रकूट मंडल के गंगऊ, बरियापुर, रनगंवा, ओहन, अर्जुन, चंद्रावल, मंझगावां जैसे बांध पानी की कमी से कराहने लगे हैं. बेतवा नदी पर बने सिर्फ दो बांधों के पास पानी तो है, लेकिन इतना भी नहीं कि रबी की फसल के लिए पानी की व्यवस्था कर सकें. बांध ही नहीं, सूखे की मार से निबटने के लिए लगाए गए करीब 1,400 नलकूप भी सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ गए हैं.
दलहन, तिलहन पर फिरा पानी
मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित बांदा की नरैनी तहसील की ग्राम पंचायत आनंदपुर सढ़ा में 19 जून, 2013 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विंध्याचल पर्वत की तराई की 50 एकड़ जमीन पर हरित पट्टी अभियान की शुरुआत की थी. पहाड़ी से बहकर आने वाले बारिश के पानी को रोकने के लिए वन विभाग ने एक पक्का चेकडैम भी बनाया था. दो साल से अधिक समय बीतने के बाद अब इस जगह रोपे गए पौधे गायब हो चुके हैं. उनकी जगह झाडिय़ों ने ले ली है. चेकडैम तो सलामत है, लेकिन पूरी तरह सूखा पड़ा है. दलहन और तिलहन की खेती के लिए जाना जाने वाला यह इलाका सूखे के साथ सरकारी उपेक्षा और लापरवाही का दंश झेल रहा है. भूगर्भ जल संरक्षण की कवायद दम तोड़ चुकी है और पानी न मिलने से आनंदपुरा सढ़ा गांव के सौ से अधिक किसानों ने खेतों में सूख रही अरहर और तिलहन की फसल को काटकर जानवरों का पेट भरना ज्यादा उचित समझा है.
इन्हीं किसानों में से 65 वर्षीय राम आधार के खेत में फसल ही नहीं, पेड़ तक सूख चुके हैं. पिछले साल 10,000 रु. की अरहर और तिल बेचने वाले राम आधार इस बार खाली हाथ हैं. इसी तरह दाल की पैदावार के सरताज बुंदेलखंड की झोली भी इस बार खाली है.
दलहन और तिलहन मिलाकर कुल 30 लाख मीट्रिक टन फसल पैदा करने का लक्ष्य बमुश्किल 30 फीसदी ही पूरा हो पाया है. समस्या केवल दलहनी फसलों के साथ नहीं है. सूखे की मार धान की फसल पर भी पड़ी है. आंबेडकरनगर प्रदेश का सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त जिला है, जहां सामान्य की जगह 13.2 फीसदी बारिश ही हुई है. यहां की 120 नहरों में एक बार के बाद दूसरी बार पानी पहुंचा ही नहीं है. इस भीषण सूखे जैसे हालात में सिंचाई न होने से धान की आधी फसल नष्ट होने के कगार पर पहुंच गई है.
राहत के नाम पर खेल
बांदा के जसपुरा द्ब्रलॉक की पड़ेरी ग्राम पंचायत के किसान जगनायक सिंह के 16 बीघा खेत में खड़ी गेहूं की फसल इस साल अप्रैल में भारी बारिश और ओलों की भेंट चढ़ गई थी. पिछले साल उन्हें मुआवजे के रूप में केवल 2,700 रु. ही मिले, जबकि इसी गांव में रहने वाले रामकरन वर्मा के दो बीघा खेत में खड़ी फसल का मुआवजा 4,100 रु. था.
आपदा में खराब हुई फसल के लिए मुआवजा निर्धारण के खेल ने भी बुंदेलखंड के बड़े किसानों की कमर तोड़कर रख दी है. यही कारण है कि भीषण सूखे की चपेट में आने वाले पचकौरी गांव के बाबू सिंह जैसे बड़े किसानों ने भी आत्महत्या का रास्ता चुनना शुरू कर दिया है. सूखे में चित्रकूट के उन सवा दो लाख किसानों की स्थिति तो और भी विकट हो गई है, जिन्हें बारिश और ओलावृष्टि से फसल बर्बाद होने के छह महीने बीतने के बाद भी राहत राशि नहीं मिली है. शासन ने अब तक किसानों के लिए जरूरी 1,023 करोड़ रु. में से करीब आधी ही राशि जारी की है. राहत राशि से वंचित किसानों में सबसे ज्यादा महोबा जिले के हैं. इसी तरह झांसी के आपदा पीड़ित किसानों को 141 करोड़ रु. की जरूरत है, लेकिन सरकार ने अब तक केवल 12 करोड़ रु. ही दिए हैं. बीजेपी के किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजयपाल सिंह तोमर कहते हैं, “किसानों को राहत राशि बांटने में हो रही देरी से उनका धैर्य जवाब दे रहा है. आने वाले दिनों में यह प्रदेश में भीषण कृषि संकट पैदा कर सकता है.”
सरकार भी सूखे से किसानों को राहत देने के लिए अब कुछ हरकत में आई है. जिलाधिकारियों से सर्वे रिपोर्ट मांगी गई है. सूखा पीड़ित जिलों में 12 घंटे से अधिक बिजली देने का आदेश हुआ है. लेकिन पंचायत चुनाव के इस शोर में सूखे से मरणासन्न किसान की आवाज दब-सी गई है. यह स्थिति घातक है किसान के लिए और खेती के लिए भी.
(साथ में संतोष पाठक)
उत्तर प्रदेश: फिर आ पहुंचा सूखे का बेताल
पंचायत चुनावों के शोर में डूबी सरकार उत्तर प्रदेश में सूखे से मर रहे किसानों को लेकर क्यूं इस कदर बेरुखी बरत रही है.

अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2015
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