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वसुंधरा राजे: वजूद बचाने के लिए भारी जद्दोजहद

पुराने सहयोगी ललित मोदी के खुलासों और संवैधानिक पद के दुरुपयोग से भारी राजनैतिक विवाद के चलते राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का सियासी भविष्य अधर में. मोदी ने राजे के कंधों पर सवार होकर ही तकरीबन गुमनामी के धुंधलके से अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि तक ऊंची छलांग लगाई पर अब वे राजे के पैरों तले से जमीन खिसकाने पर आमादा हैं. जानें पूरी हकीकत.

वसुंधरा राजे (बाएं) और ललित मोदी
वसुंधरा राजे (बाएं) और ललित मोदी
अपडेटेड 6 जुलाई , 2015

जयपुर के सचिवालय में 23 जून को मानो इस खबर के पर लग गए कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 26 जून की लंदन की प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी है. राज्य में इस साल होने वाले रिसर्जेंट राजस्थान आयोजन को सफल बनाने के लिए राजे को वहां निवेशकों से मिलना था.
यात्रा रद्द करने के पीछे जयपुर में नीति आयोग की बैठक का बहाना बनाया गया, जो जल्दी ही पकड़ में आ गया. यह यात्रा लंदन में ललित मोदी की तेजाबी मौजूदगी की वजह से रद्द की गई थी.

राजे तभी से चौतरफा घिरी हुई हैं, जब से 2011 की वह चिट्ठी सामने आई है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को दिए गए इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) के पूर्व कमिशनर के आव्रजन आवेदन का अनुमोदन करते हुए दस्तखत किए थे. इस आवेदन का अनुमोदन करने के लिए राजे की “कठोर शर्त” यह थी कि उनकी इस सहायता के बारे में भारतीय अधिकारियों को पता न चले. उन्हें डर था कि उनके राजनैतिक विरोधी इस चिट्ठी का इस्तेमाल कर सकते हैं. चिट्ठी ठीक उसी तरह उनके गले की फांस की बनी, जैसी उन्हें आशंका थी. इसने धौलपुर की नामधारी महारानी को अलग-थलग और सियासी तौर पर कमजोर कर दिया है.

देश के बाहर यात्रा करने के लिए ललित मोदी का समर्थन करने के बारे में 7 जून को एक ब्रिटिश अखबार के खुलासे के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भले ही पहला निशाना रही हों. लेकिन तकरीबन हफ्ते भर में ही राजे विवाद की जद में आ गईं. इससे भी बदतर यह था कि स्वराज को बचाने के लिए आगे आए बीजेपी के तमाम दिग्गज&पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली&जब राजे को बचाने की बारी आई तो खामोश हो गए.

विवाद भड़कने के एक सप्ताह बाद 22 जून को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी जयपुर पहुंचे और राजे का बचाव किया. हालांकि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ के लिए भारत लौटने से इनकार करने वाले ललित मोदी को स्वराज और राजे की मदद को लेकर बीजेपी में भी विरोध खौलने लगा. पूर्व गृह सचिव, बीजेपी सांसद आर.के. सिंह ने ललित मोदी को “भगौड़ा” कहने से गुरेज नहीं किया.

राजे ने शुरुआत में दस्तावेज के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया, लेकिन कांग्रेस ने जब राजे के दस्तखतों के साथ उसकी प्रतिलिपि पेश कर दी और राजे से इस्तीफा मांगा, तो बीजेपी ने कहा कि वह इस दस्तावेज और हालात का अध्ययन करने के बाद ही बयान देगी.

राजस्थान कांग्रेस के प्रमुख सचिन पायलट कहते हैं, “उन्होंने न सिर्फ एक भगौड़े की मदद की, बल्कि इसे छिपाना भी चाहती थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि वे गलत कर रही हैं. संवैधानिक पद पर आसीन किसी व्यक्ति का यह व्यवहार आपत्तिजनक है.” शर्मिंदगी से घिरी सरकार ने ईडी से कहा है कि वह ललित मोदी को भारत लाने और उन पर आपराधिक मामला चलाने की कार्रवाई तेज करे (देखें बॉक्सः आखिर कसने लगा जांच का फंदा). राजे ने जब यह हलफनामा दिया, वे विपक्ष की नेता थीं.
इस बीच मुख्यमंत्री अपने रोजमर्रा के सरकारी कामकाज में लगी रहीं, सचिवालय भवन की दूसरी मंजिल पर अपने दफ्तर में उन्होंने लोगों से मुलाकातें कीं और जरा भी घबराहट नहीं झलकने दी. विवाद छिडऩे के बाद उन्होंने लंबे समय से टलता आ रहा नौकरशाहों और पुलिस अफसरों का फेरबदल किया. राजे यकीनन मन ही मन ताज्जुब करने से खुद को रोक नहीं पाती होंगी कि जिस शख्स ने उनके कंधों पर चढ़कर एक हद तक गुमनामी के धुंधलके से अंतरराष्ट्रीय ख्याति तक ऊंची छलांग लगाई, वही आज उन्हीं के पैरों से जमीन खिसकाने की धमकी दे रहा है.

अमित शाह ने राजे से उनके हलफनामे पर आधिकारिक सफाई मांगी थी. राजे ने पहले शाह से कहा कि वह ललित मोदी को जानती तो थीं, लेकिन उन्होंने किसी दस्तावेज पर दस्तखत नहीं किए थे. बीजेपी नेताओं का कहना है कि ताजा विवाद पर राजे के जवाब के बाद ही उनके भविष्य पर फैसला किया जाएगा. राजे ने हालांकि पद छोड़ने की संभावना से इनकार किया है. उन्होंने पार्टी के नेताओं से कहा है कि उन्होंने ललित मोदी की मदद निजी हैसियत से की थी, न कि राजस्थान की मुख्यमंत्री की तौर पर.

“पुराने पारिवारिक रिश्ते”
राजे ने ललित मोदी के बारे में सार्वजनिक तौर पर मुश्किल से ही कभी बात की है, लेकिन इतना मानती हैं कि उनके परिवार को वे लंबे समय से जानती हैं. राजवंश के वारिसों और व्यवसायी कुलीनों के बीच रिश्तों की गहराई ललित मोदी के उस बयान से भी पता चलती है, जो ब्रिटिश आव्रजन अधिकारियों के सामने दिया था. इसमें राजे को उन्होंने “पुराना पारिवारिक दोस्त” बताया. मोदी ने अपने बयान में लिखा, “वसुंधरा का परिवार और मेरा परिवार कई साल से नजदीकी रहा है. उनकी मां और मेरी दादी बहुत करीबी दोस्त थीं.” एक और कहानी यह बताई जाती है कि मोदी की पत्नी मीनल राजे की स्कूल की दोस्त थीं. लेकिन जयपुर के सियासी हलकों में मोदी का नाम 2004 में ही सुनाई दिया. उससे कुछ ही महीनों पहले, अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में जूनियर मंत्री रहीं राजे ने दिसंबर 2003 के विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी को जबरदस्त जीत दिलाई थी.

ग्वालियर के आखिरी महाराजा जॉर्ज जीवाजी राव सिंधिया और विजया राजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे राजस्थान की यथास्थितिवादी राजनीति में ताजा हवा के झोंके की तरह थीं. वे एक ऐसे नेता की तरह आईं, जो राज्य के पर्यटन उद्योग और खंडहर हो चुके स्मारकों को दुरुस्त करने, जर्जर बिजली उत्पादन को बढ़ाने और बेतरतीब नगर नियोजन को ठीक करने के लिए नए-नए विचारों से भरी थीं. लेकिन तभी जयपुर विकास प्राधिकरण के गलियारों में फुसफुसाहटों में एक और नाम लिया जाने लगा.
2004 में रियल एस्टेट कंपनियों ने अफसरों और नेताओं पर कृषि भूमि का औद्योगिकी उद्देश्यों के लिए भू-उपयोग बदलने की एवज में रिश्वत की रकम बढ़ाने का आरोप लगाया. फुसफुसाहटों में कहा जाने लगा कि मुंबई के कारोबारी ललित मोदी का नाम लेकर कहते हैं कि राजस्थान में काम करवाने के लिए यही सही आदमी है. ललित मोदी पहली बार 2005 में सुर्खियों में आए, जब राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) के अध्यक्ष चुने गए. उससे पहले तक आरसीए पर कांग्रेस से जुड़े जिस किशोर रूंगटा परिवार का दबदबा था, उसे हटाने और उसकी जगह लेने के लिए पूरी चुनाव प्रक्रिया को इतनी सफाई और गोपनीयता से अंजाम दिया गया कि सरकारी अफसर भी सकते में आ गए.

ललित मोदी के प्रशासनिक हुनर ने राजे को मंत्रमुग्ध कर दिया. उन्होंने जयपुर के खस्ताहाल सवाई मानसिंह स्टेडियम को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के पसंदीदा स्थल में बदल दिया. 2008 में आइपीएल की कामयाब शुरुआत ने मोदी को एक झटके से ऊंची छलांग के साथ क्रिकेट के दिग्गजों की कतार में स्थापित कर दिया. जिन लोगों की अहमियत थी, उन्हें मोदी ने आइपीएल के मुफ्त पास देकर या उनके बच्चों को मोटी तनख्वाह की नौकरियां देकर साध लिया. बाकियों के लिए मुख्यमंत्री से उनकी नजदीकी थी, जिसका वे भरपूर दिखावा करते थे. वे अफसरों को धमकाने के लिए सेलफोन से खुलेआम “वसु” को कॉल करते और मामूली बातों पर आइएएस और आइपीएस अफसरों से उलझ पड़ते.

जैसे चढ़े, वैसे ही लुढ़के
जयपुर के रामबाग पैलेस होटल में मोदी के सुइट में हाथों में फाइल लिए उनसे मिलने जाने वाले राज्य के वरिष्ठ नौकरशाहों के बारे में अफवाहें फैलने लगीं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, “ललित मोदी वसुंधरा राजे के भ्रष्टाचार के प्रतीक हैं.”

शायद यह किसी जमाने में राजस्थान के सामंती राज्य होने का ही असर है कि लोग किसी भी सत्ता को जितनी आसानी से स्वीकार लेते हैं, उतनी आसानी से सत्ता के दुरुपयोग के बारे में कानाफूसी पर भरोसा नहीं करते. मोदी तब तक ताकतवर संविधानेतर सत्ता बन चुके थे, जिनकी अहमियत ने बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया था. स्थानीय बिचैलियों और रीयल एस्टेट के लिए लॉबीइंग करने वालों ने उन नई कंपनियों के हाथों अपना धंधा गंवाने के खिलाफ नाराजगी जाहिर की, जिन पर उन्होंने राजे-मोदी से अपने जुड़े होने का आरोप लगाया. दिसंबर, 2008 में राजे जब चुनाव में उतरीं, तब तक मोदी से उनकी नजदीकी के खिलाफ विरोध की अंतर्धारा मूसलाधार बारिश में बदल चुकी थी. आरएसएस और बीजेपी के कार्यकर्ता या तो उदासीन रहे या उन्होंने उनके खिलाफ काम किया. राजे चुनाव हार गईं. करीब-करीब यही वह वक्त था, जब मोदी ने राजे के बेटे दुष्यंत सिंह के साथ एक के बाद एक व्यावसायिक सौदों की शुरुआत की. मोदी की कंपनी आनंद हेरिटेज होटल्स प्राइवेट लिमिटेड ने दुष्यंत सिंह की कंपनी नियंत हेरिटेज होटल्स प्रा. लि. (एनएचएचपीएल) में निवेश किया (देखें बॉक्स). ये वे निवेश थे, जिन्हें कांग्रेस काले धन का लेन-देन बता रही है.

इस बीच विश्व क्रिकेट के शहंशाह की तौर पर मोदी के उभार को उनके दुर्ग राजस्थान की पराजय ने ढंक लिया. राज्य पुलिस उनके पीछे पड़ गई, उनके सिर पर गिरफ्तारी की तलवार तन गई, अदालतों में कई सारे मुकदमे लाद दिए गए, माथुर आयोग के चक्कर लगाने की नौबत आ गई, जो नवगठित गहलोत सरकार ने राजे के शासनकाल के भ्रष्टाचार के मामले की जांच के लिए बनाया था. उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने आरसीए में दाखिल होने के लिए फर्जी दस्तखत किए थे? जयपुर के एक आइपीएल मैच में एक फिरंगी ने राष्ट्रीय झंडे पर शराब का गिलास क्यों रखा? कांग्रेस सरकार ने 2010 में मोदी की खरीदी दो जर्जर हवेलियों को जब्त कर लिया और राज्य के पुरातत्व विभाग को सौंप दिया, यह आरोप लगाते हुए कि पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक उनमें से एक हवेली के एक हिस्से की मालिक स्थानीय लोगों के अतिक्रमण के पहले सरकार ही थी.

मोदी 2009 में आरसीए का चुनाव हार गए, क्योंकि उनके सहयोगी ही अब कांग्रेस-समर्थित उम्मीदवारों के पाले में चले गए. सितंबर 2010 में उन्हें बीसीसीआइ से भी निकाल बाहर किया गया. इसके कुछ ही महीनों बाद भारत में उनके ऊपर कई सारे मामले दर्ज कर चुकी ईडी की हिरासत में लेकर पूछताछ करने की आशंका से डरकर वे लंदन भाग गए (देखें बॉक्स). ईडी की उनमें दिलचस्पी के पीछे शशि थरूर के खिलाफ किए गए उनके ट्वीट थे, जिनकी वजह से थरूर को राज्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. मोदी ने भारत लौटने से इनकार करते हुए मुंबई अंडरवर्ल्ड की धमकियों से अपनी जिंदगी को होने वाले खतरे का हवाला दिया था.
अलबत्ता राजे उनकी पारिवारिक दोस्त बनी रहीं. पहले उन्होंने उनके ब्रिटेन में रहने के पक्ष में हलफनामा देकर उनकी मदद की और फिर 2012 और 2013 में दो बार कैंसर के इलाज के लिए उनकी पत्नी मीनल के साथ लिस्बन गईं.

रिश्तों में खटास
2011 में ललित मोदी ने राजे से उनके ब्रिटेन में रहने का अनुमोदन करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से ब्रिटिश आव्रजन अधिकारियों के सामने उपस्थित होने के लिए कहा. बताया जाता है कि राजे ने इनकार कर दिया, क्योंकि 2013 के चुनाव के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नामजद कर दिया गया था. मोदी बीसीसीआइ में उनके कट्टर विरोधी अरुण जेटली के साथ राजे की नजदीकी को लेकर मन ही मन खौलने लगे. 2013 में जेटली बीसीसीआइ की  अनुशासन समिति के अध्यक्ष थे, जिसने मोदी को वित्तीय अनियमितताओं, बोली में फर्जीवाड़े और अनधिकृत ढंग से टीवी अधिकार बेचने का दोषी ठहराया था. राजे जेटली की एहसानमंद थीं, क्योंकि उन्होंने उनकी सीएम की उम्मीदवारी के लिए आरएसएस, बीजेपी और प्रधानमंत्री पद के लिए मनोनीत नरेंद्र मोदी का समर्थन दिलवाने में मदद की थी. कहते हैं कि उन्होंने ललित मोदी से दूर रहने की आरएसएस की सलाह मान ली थी.

मोदी मई 2014 में लंदन में रहते हुए आरसीए के अध्यक्ष चुने गए, लेकिन वे इन बदलते हुए समीकरणों से नावाकिफ थे. उन्हें उम्मीद थी कि राजस्थान में फिर उनका बोलबाला होगा, क्योंकि उनकी पुरानी दोस्त मुख्यमंत्री के पद पर लौट आई हैं. जयपुर में मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड की विशाल शानदार नकल बनाने का उनका सपना तब धूल में मिल गया, जब राजे ने आरसीए को जमीन का हस्तांतरण रोक दिया.

राजे और मोदी के बीच की खाई अक्तूबर, 2014 में तब और चौड़ी हो गई, जब कोटा के एक स्थानीय बीजेपी नेता और लंबे समय से मोदी के सहयोगी अमीन पठान ने चुनाव में अपने उस्ताद की जगह हथिया ली. पठान का कहना था कि मोदी के अध्यक्ष बने रहने की वजह से बीसीसीआइ आरसीए के साथ अछूत की तरह बर्ताव कर रही है. मोदी ने एक के बाद एक कई ट्वीट करके राजे के सहयोगियों पर अपने खिलाफ तख्तापलट का आरोप लगाया. राजे ने यह कहकर खुद को अलग कर लिया कि वे खेल संस्थाओं में दखल नहीं देतीं. इस साल मार्च में पठान ने मोदी की काबिज होने की दूसरी कोशिश को भी नाकाम कर दिया. यह आखिरी कील साबित हुआ. मोदी समझ गए कि वे अब और राजे पर भरोसा नहीं कर सकते. जब विवाद सामने आया, तब मोदी के मुंबई स्थित वकील महमूद आब्दी ने, जिन्हें खुद भी आरसीए के उपाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था, मोदी का समर्थन करने वाला हलफनामा जारी किया. ध्यान स्वराज से हटकर राजे पर आ गया.

बेहद मुश्किल चढ़ाई
मौजूदा संकट के बीच राजे ने मीडिया को अपने से बालिश्त भर की दूरी पर रखा, लेकिन पार्टीजनों को वे अपने करीब ले आईं. 24 जून को बीजेपी के संयुक्त सचिव (संगठन) सौदान सिंह और पार्टी के नए महासचिव अरुण सिंह ने राजे के साथ बंद कमरे में बातचीत की और उन्हें आरएसएस तथा बीजेपी का समर्थन दिया. पार्टी के भीतर चर्चा यह है कि फिलहाल राजे सुरक्षित हैं. हालांकि विवाद ने नेतृत्व को दोफाड़ कर दिया है. गडकरी और राजनाथ सिंह उनके मुख्यमंत्री बने रहने के हक में हैं.
बीजेपी नेताओं के एक-दूसरे वर्ग को लग रहा है कि इससे पार्टी की छवि को धक्का लगा है और कदाचार के इस मामले में निर्णायक कदम नहीं उठाया गया तो पीएम नरेंद्र मोदी की साख पर आंच आएगी. क्या राजे भारतीय अदालतों और कानून से बच रहे शख्स की सहायता करने के लिए जवाबदेह ठहराई जाएंगी? जयपुर के एक वकील आर.ए. कट्टा कहते हैं, “विपक्ष की नेता के तौर पर आव्रजन के मुद्दे पर राजे की बात का कोई खास वजन नहीं हो सकता था.” वे कहते हैं कि मॉरिशस स्थित कंपनी से मोदी की आनंद हेरिटेज होटल्स प्राइवेट लिमिटेड में धन का स्थानांतरण राजे के पद से हटने के बाद हुआ था. उनके या दुष्यंत के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आपराधिक कृत्य की नीयत साबित करना आसान नहीं होगा.

इस बीच उनके सहयोगियों ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव के ऊपर जवाबी हमला बोल दिया है. वैभव पर भी अपनी ट्रैवल कंपनी के शेयर बेहिसाब बढ़ाए गए दाम पर एक निवेशक को बेचने का आरोप लगा है, जिसने मॉरिशस के रास्ते लाए धन का इस्तेमाल किया.

राजे के समर्थक बताते हैं कि किस तरह ज्यादातर विधायक लगातार उनके पीछे खड़े हैं. वे घुमा-फिराकर इस संभावना की तरफ इशारा करते हैं कि अगर राजे को पद छोडऩे के लिए मजबूर किया गया, तो वे अपनी अलग पार्टी बना सकती हैं. फिर भी, यह हकीकत छिप नहीं सकती कि मौजूदा संकट ने राजे को बेहद कमजोर कर दिया है. राजे के लिए खोई जमीन दोबारा हासिल करना दुर्गम चढ़ाई की तरह होगा.

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