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टॉलीवुड: जिंदगी पर भारी पड़ती चकाचौंध

पुरुष प्रधान तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री में हीरोइनें चाहे कितनी ही सुर्खियां और चमक-दमक क्यों न हासिल कर लें, निभाती हमेशा दोयम भूमिकाएं ही हैं.

चार्मी कौर की फिल्म ज्योति लक्ष्मी का पोस्टर
चार्मी कौर की फिल्म ज्योति लक्ष्मी का पोस्टर
अपडेटेड 29 जून , 2015

अपनी ताजातरीन फिल्म ज्योति लक्ष्मी की 12 जून को रिलीज के महज एक दिन पहले चार्मी कौर शेखी बघार रही थीं, ''बहुत ही चुनौतीपूर्ण रोल है. मैंने कड़ी मेहनत की है. इस दौरान मेरा वजन 11 किलोग्राम तक घट गया है. यह स्त्री-केंद्रित मजबूत फिल्म है. दर्शकों को पहली बार 'हीरोइन का जलवा' देखने को मिलेगा.'' लेकिन पुराने जमाने की आकर्षक भूमिकाएं निभाने वाली एक तेलुगु अभिनेत्री के नाम पर बनी यह फिल्म ऐसे आदमी के बारे में है जिसे किसी वेश्या से प्रेम हो जाता है और कैसे वह उसके प्रेम की खातिर खुद को बदलती है या उनके रिश्ते पर उसके अतीत का साया कैसे पड़ता है. ज्योति लक्ष्मी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम रही लेकिन अभिनेत्री और निर्माता के रूप में कौर की यह पहली फिल्म पुरुष केंद्रित तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री में 2002 से ही उनके टिके रहने का किस्सा भी कहती है. वे अब तक कुछ हिट फिल्मों के साथ 53 फिल्में कर चुकी हैं.

टॉलीवुड में अपने 13 साल के करियर में 28 वर्षीय चार्मी कौर आज भी शिखर पर पहुंचने की कोशिश में लगी हुई हैं लेकिन उनके साथ की बाकी हीरोइनें तो कब की किनारे लग चुकीं. कुछ का तो बुरा हाल हुआ. 6 जून को अभिनेत्री आरती अग्रवाल की लिपोसक्शन सर्जरी (पेट से चर्बी हटाने के लिए की गई सर्जरी) के बाद मौत हो गई. अमेरिका के न्यूजर्सी में जन्मीं और पली-बढ़ीं अग्रवाल फिल्मी दुनिया में वापसी की कोशिशों में लगी थीं. उन्होंने 2007 में अमेरिका में रह रहे एक आइटी प्रोफेशनल से शादी के बाद फिल्मी करियर को अलविदा कह दिया था. लेकिन वैवाहिक जिंदगी में जल्द ही अनबन शुरू हो गई और उन्हें 2009 में तलाक की अर्जी डालनी पड़ी. 2008 और 2015 के बीच उन्होंने चार फिल्मों में काम किया और लगातार न्यूजर्सी तथा हैदराबाद की दूरी नापती रहीं. ये चारों फिल्में दोयम दर्जे के अभिनेताओं के साथ थीं और कहानियों में भी कोई दम नहीं था. उन्होंने टीवी सीरियलों में भी हाथ आजमाया लेकिन वहां भी भाग्य ने साथ नहीं दिया और कामयाबी कोसों दूर रही.

इस त्रासद कहानी को अलग रख दें तो भी अग्रवाल की कहानी मिसाल है कि तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री में किसी अभिनेत्री के साथ क्या हो सकता है. किशोरावस्था में पागलपन नामक हिंदी फिल्म से करियर शुरू करने के बाद 2001 में वेंकटेश के साथ नुवु नाकु नाचव में अपने अभिनय से वे छा गई थीं. उसके बाद तो उन्हें चिरंजीवी, नागार्जुन, महेश बाबू, बालकृष्ण, तरुण, जूनियर एनटीआर और प्रभाष के साथ अहम भूमिकाओं में ऐक्टिंग के जौहर दिखाने का मौका मिला. लेकिन मार्च 2005 में तरुण से रोमांस की खबरें उडऩे पर उन्होंने खुदकुशी की कोशिश भी की. वे बच तो गईं लेकिन साल भर में ही उनका करियर तेजी से उतरने लगा. जिसके बाद कहा जाता है कि उन्होंने खुदकुशी की दूसरी कोशिश की. उसके बाद उनके पिता उन्हें न्यूजर्सी लेकर चले गए.

पहली तेलुगु फिल्म में अग्रवाल को मौका देने वाले निर्माता सुरेश बाबू याद करते हैं, ''आरती और उसके पिता को लगता था कि कामयाबी की राह इकतरफा होती है. उसके पास प्रतिभा थी लेकिन आज की हीरोइनें अपनी प्रतिभा की ताकत पर खुद को समय के साथ निखारती जाती हैं और आगे बढ़ती जाती हैं जबकि वे ठहर-सी गई थीं.''
एक और लोकप्रिय अभिनेत्री अंजलि 2013 में हैदराबाद के होटल से लापता हो गई. उसके कुछ ही घंटे पहले उसने अपनी सौतेली मां और तमिल फिल्मों के एक डायरेक्टर पर आर्थिक शोषण और उसे 'एटीएम की तरह इस्तेमाल' करने का आरोप लगाया था. संयोग से सौतेली मां उसकी सगी मां की छोटी बहन थी जिसकी कोई संतान नहीं थी. यह मामला उसके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने तक चला. तीन महीने बाद सब कुछ भुलाकर वह अपनी सौतेली मां के पास लौट आई.

इससे पहले 2012 की शुरुआत में मामूली भूमिकाओं में उतरने वाली अभिनेत्री तारा चौधरी और उसके कथित वेश्यावृत्ति के नेटवर्क की खबरें उड़ी थीं. उस दौरान नेताओं से लेकर अतिरिक्त डीजीपी समेत पुलिस अधिकारियों के साथ लड़कियों की सीडी भी बाहर आई थी. पुलिस एक लड़की की शिकायत पर हरकत में आई कि चौधरी ने लड़कियों को फिल्मों में रोल देने का लालच देकर वेश्यावृत्ति में झोंक दिया. चौधरी के टॉलीवुड में गहरे संबंध तो थे ही, नेताओं और अफसरों से भी ताल्लुकात थे और वह एक तेलुगु फिल्म का निर्माण शुरू करने ही वाली थी कि कानून के चंगुल में फंस गई.

कुछ दूसरी अभिनेत्रियों की कहानी इससे काफी अलग नहीं है, भले ही वे कथित तौर पर कास्टिंग काउच की शुरुआती अड़चनों को पार करके तेलुगु दर्शकों की लाडली बन गई हों. टॉलीवुड महिलाओं का शोषण करने वाले निर्माता-निर्देशकों के लिए बदनाम है लेकिन वहां प्रतिस्पर्धा भी तगड़ी है जिससे निकल कर आगे बढऩा होता है.
इसके अलावा निर्माताओं के साफ और गोरे रंग के प्रति पूर्वाग्रह से हर पांच में से एक ही तेलुगु हीरोइन कामयाब हो पाती है. उनका मानना है कि तेलुगु दर्शकों को स्थानीय लड़कियों के मुकाबले बाहरी लड़कियां ज्यादा पसंद आती हैं. हालांकि मोटे पैसे वाले निर्माताओं का मानना है कि ''स्थानीय तेलुगु लड़कियां डांस करने, बिकनी पहनने और चुंबन के दृश्य करने में नखरे करती हैं.'' तेलुगु हीरोइन अंजलि को पहली बार मौका देने वाले फिल्म डायरेक्टर नागेश्वर राव कहते हैं, ''ज्यादातर तेलुगु लड़कियां फिल्मी करियर की ख्वाहिश नहीं रखती हैं. जो कुछ आती भी हैं, उनमें होड़ में टिके रहने की आक्रामकता नहीं होती और उनमें दर्शकों की भी दिलचस्पी नहीं पैदा होती क्योंकि वे दूसरी फिल्मों में अपनी प्रतिस्पर्धियों की तरह खुलकर रोमांस या डांस करने में हिचक दिखाती हैं.''

निर्माता-निर्देशक तम्मा रेड्डी भारद्वाज बताते हैं, ''शहरी तेलुगु लड़कियों का रुझान और रवैया ज्यादातर मामलों में फिट नहीं बैठता है.'' वे अपनी तस्वीरें मेल करने या ऑडिशन के लिए आने से भी हिचकती हैं. वे कहते हैं, ''हर दूसरे दिन मेरे मेल पर मुंबई की लड़कियों के सीवी और तस्वीरें आ जाती हैं. हाल ही में एक थाई लड़की ने तेलुगु फिल्म में काम करने की इच्छा जाहिर करने वाला मेल भेजकर मुझे चैंका दिया.''

इसलिए प्रतिभासंपन्न तेलुगु अभिनेत्रियां स्वाति, मधु शालिनी और बिंदु माधवी वगैरह तमिल और मलयालम फिल्मों की पेशकश पर ही ज्यादा भरोसा करती हैं. लेकिन अधिक लोकप्रिय अभिनेत्रियां वे हैं जो तेलुगु नहीं जानतीं और जिनका दबदबा चलता है. वे पुरुष अभिनेताओं के साथ कदम मिलाने के लिए बहुत जल्दी से डायलॉग डिलीवरी सीखती हैं जिनके इर्द-गिर्द कहानी घूमती है.

दिग्गज निर्माता-निर्देशक-अभिनेता दासरी नारायण राव की शिकायत है, ''कई युवा हीरोइनों को लगता है कि अपनी सुंदरता के दम पर ही वे तेलुगु सिनेमा में कुछ वर्ष निकाल देंगी.''

अभिनेत्रियों के लिए तेलुगु सिनेमा दूसरे दक्षिण भारतीय फिल्म बाजारों—तमिल, मलयालम और कन्नड़—से ज्यादा आकर्षक है क्योंकि इसका भारत और अमेरिका में बड़ा बाजार है जिससे हीरोइनों की कमाई ज्यादा हो जाती है और कई मामलों में तो उन्हें हिंदी फिल्मों से भी ज्यादा पैसे मिल जाते हैं. तेलुगु इंडस्ट्री हफ्ते में कम से कम दो फिल्में तैयार करने की कोशिश करती है, जो जरूरी नहीं कि रिलीज ही हों, इस पैमाने से वह कई बार बॉलीवुड को भी पीछे छोड़ देती है. कई बड़े बजट की फिल्में भी निकलती हैं, उनमें कुछ बहुभाषी भी हैं जैसे 10 जुलाई को रिलीज होने वाली बाहुबली 135 करोड़ रु. की निर्माण लागत से बनी सबसे महंगी फिल्म हो सकती है. यह हिंदी, तमिल और मलयालम में भी रिलीज हो रही है. हालांकि सभी स्थापित निर्माता दूसरे कारोबार में भी पैसा लगाने का जुआ खेलते हैं. ज्यादातर रियल एस्टेट, सूचना प्रौद्योगिकी और यहां तक कि खेती-किसानी में भी पैसा लगाकर तेलुगु सिनेमा को बहुआयामी उद्योग बना देते हैं. निर्माता के.एल. दामोदर प्रसाद बताते हैं ''नए निर्माता हर पांच में से कम से कम दो तेलुगु फिल्में बनाते हैं जो इस फिल्म इंडस्ट्री की बारीकियों को समझने की कोशिश तक नहीं करते.'' 

पैसे के मामले में सितारे हमेशा फायदे में रहते हैं. अनुष्का रेड्डी, सामंता रुथ प्रभु, काजल अग्रवाल, तमन्ना भाटिया और नयनतारा जैसी सफल अभिनेत्रियों को निर्माता एक फिल्म के लिए 1 करोड़ रु. से ज्यादा अदा करते हैं. वहीं, राकुल प्रीत सिंह, अंजलि, नित्या मेनन और रेगिना कसांड्रा जैसी हीरोइनें भी हैं जो 50-80 लाख रु. तक कमाती हैं.

अमूमन अभिनेत्रियां छोटा करियर देखकर ज्यादा पैसे मांगती हैं क्योंकि कई हीरो दो-तीन फिल्मों से ज्यादा में उनके साथ नहीं उतरना चाहते. हाल के दौर में दशक भर से ज्यादा कामयाब करियर वाली कन्नड़ मूल की सौंदर्या जैसी कुछ ही हीरोइनें थीं. सौंदर्या 2004 के चुनाव प्रचार में हेलिकॉप्टर हादसे में मारी गई थीं. उनके अलावा तमिल मूल की रम्या कृष्णा, पंजाबी सिमरन और इधर कुछ समय से तृषा ही सफल हैं. तृषा भी तमिल हैं और तमिल फिल्में भी करती हैं. इसलिए टॉलीवुड में अभिनेत्रियों का एक ही मंत्र है, जब तक चमक है, जितना हो सके, बटोर लो.

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