आप देश के किसी भी शहर के सरकारी आयोजन में चले जाएं, ब्लॉक स्तर से लेकर दिल्ली के विज्ञान भवन तक मंचासीन लोगों के सामने पीने का बोतलबंद पानी ही नजर आएगा, यहां तक कि उन कार्यक्रमों में भी जहां बड़ी पेयजल परियोजनाओं पर चर्चा या घोषणा होने वाली हो. साथ ही यह भी गौर करिए कि जिस भी शहर में यह संवाद हो रहा होता है, वहां सरकार पहले से ही यह दावा करती है कि पाइप लाइन से जो पानी की सप्लाई हो रही है, वह पूरी तरह सुरक्षित है. इसके लिए बाकायदा सर्टिफिकेट जारी होते हैं. अगर शहरों की पेयजल सप्लाई सुरक्षित है तो बोतलबंद पानी और घर-घर में वाटर फिल्टर या वाटर प्योरीफायर क्यों लग रहे हैं? ऐसे में जब मैगी के बहाने खाने की चीजों में मिले जहर पर चर्चा करके देश फुरसत में हुआ है, तब यह बहस करने में कोई हर्ज नहीं होगा कि हमारे शहरों को कितना पानी चाहिए और उनके पास कितने पानी का जुगाड़ है. साथ ही, यह भी कि जो पानी मिल रहा है वह कितना भरोसेमंद है.
डॉक्टरों की मानें तो एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन भर में आठ से 12 गिलास पानी पीना चाहिए. इस तरह पीने के लिए हर व्यक्ति को बमुश्किल ढाई लीटर और पूरे देश को पीने के लिए हर रोज 300 करोड़ लीटर पानी की जरूरत है. ऐसे में टिहरी बांध (क्षमता 4 घन किलोमीटर या 40,000 करोड़ लीटर) जैसे तीन बांधों का पूरा पानी पीने में इस्तेमाल किया जाए तो देश की 120 करोड़ आबादी के लिए साल भर का पेय जल उपलब्ध हो सकता है. और फिर हमारे देश में तो सैकड़ों बांध, हजारों नदियां और 6 लाख से अधिक तालाब मौजूद हैं, तो पानी की किल्लत क्यों? और क्यों इस देश में आज भी 70 फीसदी बीमारियों का ताल्लुक कहीं न कहीं अशुद्ध जल के सेवन से है.
पानी की किल्लत का राज
यह सारे सवाल इसलिए हैं क्योंकि देश में पानी का गणित उतना सीधा नहीं है, जितना ऊपर से नजर आता है. दरअसल भारत में पेयजल और घरेलू जरूरत के पानी की सप्लाई का अलग-अलग ढांचा नहीं है. ऐसे में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) ने हर व्यक्ति के लिए रोजाना पानी की जरूरत 150 लीटर से 200 लीटर तक आंकी है. उधर, बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटती जा रही है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आजादी के वक्त 1947 में जहां प्रति व्यक्ति सालाना 6,042 घन मीटर पानी उपलब्ध था, वहीं 2011 की जनगणना के बाद यह उपलब्धता महज 1,545 घन मीटर यानी एक चौथाई रह गई. इस जरूरत को पूरा करने में शहर नाकाम हैं.
शहरी विकास मंत्रालय की तरफ से लोकसभा में 35 प्रमुख शहरों में जल आपूर्ति के बारे में पेश आंकड़ों में साफ दिखता है कि 30 शहरों को उनकी जरूरत से कम पानी मिल रहा है. वहीं, 2021 में पानी की मांग के हिसाब से आपूर्ति के लिए किए जा रहे दावे हवाई हैं (देखेः 35 शहरों में पानी की मांग और आपूर्ति और भविष्य में पानी की मांग का नक्शा). 2021 में पानी की आपूर्ति को लेकर ज्यादातर शहरों ने कहा है कि उद्योग अपने लिए पानी की व्यवस्था खुद करेंगे. मेक इन इंडिया जैसे अभियान अगर सफल होने हैं तो उद्योग की इस चुनौती का कोई ठोस जवाब होना चाहिए. इसी सवाल को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता अनुपम मिश्र पूछते हैं, ''सरकार तो पहले ही शहरों के पानी की मांग को घटा कर दिखा रही है और यह घटी मांग भी पूरी नहीं हो पा रही. शहरों का बड़ा हिस्सा बोरिंग के जरिए भूजल का इस्तेमाल कर रहा है. इससे भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है.'' तत्कालीन योजना आयोग द्वारा 2012 से 2017 के लिए शहरी और औद्योगिक जल सप्लाई पर तैयार रिपोर्ट के मुताबिक ''एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 73 फीसदी लोगों को ही पीने के पानी की आपूर्ति हो पा रही है. जितने पानी की आपूर्ति का दावा किया जाता है उसका 40 से 50 फीसदी पानी 'गायब' हो जाता है.'' 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए जल आपूर्ति के लिए बने विशेषज्ञ समूह के मुताबिक पेयजल आपूर्ति में नीतिगत स्तर पर बड़ी खामियां हैं. रिपोर्ट में कहा गया- आज कोई शहर अपने जलाशयों को अपनी जलापूर्ति का हिस्सा नहीं बनाना चाहता. इसके बदले इन जलाशयों को कीमती जमीन की तरह देखा जाता है. जमीन का यह गड्ढा पहले कूड़े से भरा जाता है और उसके बाद इसे रियल एस्टेट के लिए ले लिया जाता है. जलाशय के कैचमेंट एरिया में शहर से बाहर फेंक दिए गए गरीब अतिक्रमण कर लेते हैं. और अंत में इस पर अमीरों का कब्जा हो जाता है, जो इसे घर बनाने से लेकर एयरपोर्ट बनाने तक किसी भी काम में इस्तेमाल करते हैं. नीतिगत रूप से इस परिस्थिति में बदलाव करने की जरूरत है.- यहीं मिश्र याद दिलाते हैं कि किस तरह दिल्ली एयरपोर्ट के निर्माण में 7 तालाब खत्म कर दिए गए, जो कहीं न कहीं पीने के पानी के स्रोत या भूजल रिचार्ज करने के काम आते.
पानी की बरबादी
एक तरफ शहर अपने जल स्रोतों को नष्ट कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मीलों दूर से शहर तक पानी लाने वाली व्यवस्था में रास्ते में ही पानी की बंदरबांट हो जाती है. जरा महाराष्ट्र के नागपुर शहर के बारे में प्लानिंग कमीशन की इसी रिपोर्ट का अंश देखिए- नागपुर के लिए 765 एमएलडी पानी शहर से 40 किमी. दूर 'पेंच वन एवं टाइगर रिजर्व' से आता है. इसमें से 140 एमएलडी पानी तो नहर में ही खर्च हो जाता है. 125 एमएलडी पानी कच्चे पानी के ट्रीटमेंट के बाद बेकार हो जाता है. पाइप लाइन से सप्लाई के दौरान और पानी की चोरी के कारण 235 एमएलडी पानी गायब हो जाता है. इसके अलावा 45 एमएलडी पानी के बिल की वसूली नहीं हो पाती. इस तरह शहर सिर्फ 200 एमएलडी पानी का बिल वसूल कर पाता है. प्लानिंग कमीशन स्पष्ट करता है कि जो हाल नागपुर का है, कमोबेश यही हाल देश के सभी शहरों में पेयजल सप्लाई का है. इसीलिए बड़े शहरों के उपनगरीय इलाके पाइपलाइन से वंचित रह जाते हैं और वहां नगर निगम के पानी के टैंकरों के सामने लंबी कंतारें दिखने लगती हैं. जहां पानी पहुंचता भी है, वहां इसके स्वच्छ होने को लेकर हजार तरह के अंदेशे घुले रहते हैं.
बीमारियों को न्योता
पानी की यह चोरी और बरबादी दो तरह से बीमारियों को न्योता देती है. पाइप लाइन लीक कर रही हो या इससे पानी चोरी किया जाए तो उसमें बैक्टीरिया आने का अंदेशा बना रहता है. ऐसे भी मामले सामने आते रहे हैं, जब इस तरह की वजहों से सीवर का पानी पीने के पानी में मिल जाता है. भले ही ये मामले इने-गिने हों, लेकिन इनसे लोगों के मन में डर तो समा ही जाता है. दूसरे, जिन इलाकों में पानी नहीं पहुंचता, वहां के लोग भूजल का बेतरतीब दोहन करते हैं. एनसीआर में गुडग़ांव, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद में इसी कारण तेजी से भूजल खत्म हो रहा है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के मुताबिक भूजल के बेतहाशा दोहन से देश के बड़े इलाके में भूजल में आर्सेनिक, क्रलोराइड और अन्य तरह की अशुद्धियां आ गई हैं. (देखें नक्शा) इनके कारण बोरिंग या हैंडपंप का पानी बहुत सुरक्षित नहीं रह जाता. यही सारे कारण जलजनित बीमारियों का खतरा पैदा करते हैं. इस पर पलटवार करते हुए दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) में क्वालिटी कंट्रोल से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी सवाल करते हैं, ''जल बोर्ड विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों से बेहतर पानी सप्लाई कर रहा है और हर रोज पानी की शुद्धता के 100 से अधिक नमूने लिए जाते हैं. लेकिन हमारे पास निजी कंपनियों जैसा प्रचार तंत्र नहीं है और न ही कोई हेमा मालिनी हमारे प्रोडक्ट की गारंटी ले रही हैं.'' उनका दावा है कि कुछ अप्रिय घटनाओं को आधार बनाकर पानी माफिया जलापूर्ति करने वाली सरकारी संस्थाओं को बदनाम करता है और अपना कारोबार फैलाता है.
पानी का कारोबार
लेकिन ये आशंकाएं अंततः पानी के कारोबार को जन्म देती हैं. उद्योगों के लिए रिसर्च करने वाली निजी संस्था वेल्यूनोट्स की रिपोर्ट 'होमवाटर प्यूरीफायर इंडस्ट्री 2014-19' के मुताबिक यह कारोबार 22 फीसदी की वृद्धि दर दर्ज कर रहा है. 2014 में होम वाटर प्यूरीफायर उद्योग का आकार 3,400 करोड़ रु. का था और 2019 तक यह 9,000 करोड़ रु. का आंकड़ा पार कर जाएगा. रिपोर्ट कई दिलचस्प तथ्यों की ओर इशारा करती है, जैसे वाटर प्यूरीफायर की सबसे ज्यादा बिक्री जून के अंत और जुलाई की शुरुआत यानी मानसून की आमद के समय होती है. दरअसल यही वह समय भी होता है, जब जलजनित बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं और नदियों में बाढ़ के कारण सप्लाई जल का गंदलापन बढ़ जाता है. रिपोर्ट एक और दिलचस्प तथ्य की ओर इशारा करती है कि रायपुर में पिछले साल वाटर प्यूरीफायर की बिक्री में 40 फीसदी का उछाल तब आया, जब शहर में पीलिया का प्रकोप था. रिपोर्ट तैयार करने वाली रिसर्च एनालिस्ट प्रियाली शाह ने इंडिया टुडे को बताया, ''इस तरह का स्पष्ट ट्रेन्ड दिखाता है कि जिन इलाकों ने जलजनित बीमारियों का प्रकोप झेला है, वहां वाटर प्यूरीफायर की बिक्री में तेज इजाफा हुआ है.''
पानी के कारोबार का दूसरा हिस्सा है बोतलबंद पानी. औद्योगिक संस्था एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में देश में बोतलबंद पानी का कारोबार 7,000 करोड़ रु. का था और 2018 में यह 16,000 करोड़ रु. का होगा. इस बाजार में बिसलेरी, पेप्सीको, कोका कोला, धारीवाल और पारले की हिस्सेदारी 67 फीसदी है. ब्रांडेड बोतलबंद पानी के अलावा भी बड़े पैमाने पर पानी की बोतलों की घरेलू सप्लाई और पानी पाउच का कारोबार भी चल रहा है. लेकिन इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है.
कैसे मिलेगा सबको साफ पानी
केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता राज्यमंत्री राम कृपाल यादव कहते हैं, ''पेयजल आपूर्ति राज्य का विषय है. शहरों में जल आपूर्ति का काम नगर निकाय और गांवों में जल आपूर्ति का ग्राम पंचायत की निगरानी में होती है. केंद्र सरकार अलग-अलग योजनाओं के लिए राज्यों को धन आवंटित करती है. प्रबंधन में केंद्र का बहुत हस्तक्षेप नहीं है.'' वैसे जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत अगस्त 2014 तक केंद्र सरकार ने 22,493 करोड़ रु. की लागत वाली 186 योजनाओं को मंजूरी दी है. ड्रेनेज और सीवरेज की परियोजनाओं को भी जोड़ लें तो यह रकम 46,623 करोड़ रु. हो जाती है. इसी अवधि में जेएनएनयूआरएम में कुल 64,882 करोड़ की मंजूर योजनाओं का यह 71 फीसदी है.
पिछले दो दशक की तुलना में 2005-2015 के दशक में पानी से जुड़ी योजनाओं पर सरकारी निवेश नौ गुना बढ़ाया गया है. फिर भी शहर प्यासे हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह रकम भी ऊंट के मुंह में जीरा है. योजना आयोग के मुताबिक अगले 20 साल में शहरों में पानी और सीवेज पर 7.5 लाख करोड़ रु. न्यूनतम निवेश की आवश्यकता है. यह रकम भारत सरकार के वर्तमान बजट की 42 फीसदी है. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) सुष्मिता सेनगुप्ता कहती हैं, ''शहर में पेयजल तभी मिलेगा जब भूजल, सप्लाई वाटर और सीवेज तीनों एक साथ दुरुस्त किए जाएं. क्योंकि एक भी पिछड़ा तो बाकी दो भी भटक जाएंगे.'' जाहिर है, इतनी बड़ी रकम के लिए बड़े निवेश की जरूरत पड़ेगी. क्या सरकार की स्मार्ट सिटी योजना इसके लिए तैयार है?
जानें किस तरह देश में है पानी संकट
सरकार ने देश में 100 आदर्श शहर बनाने की घोषणा तो कर दी, लेकिन क्या इन शहरों के पास पीने का साफ पानी भी होगा? क्योंकि मौजूदा व्यवस्था पानी बचाने वाली नहीं, पानी की हत्या करने वाली है.

अपडेटेड 29 जून , 2015
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