“ बाड़मेर से बोल रहा हूं. एमबीबीएस में एडमिशन कराना है. रेट बताइए.” फोन पर एक अभिभावक मेडिकल सीट के दलाल से पूछ रहा है. दलाल का जवाब, “कहां चाहिए. हर राज्य और कॉलेज के हिसाब से अलग रेट हैं. वैसे 35 लाख रु. और इसके अलावा 8 लाख रु. कॉलेज की फीस दीजिए तो प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा. अच्छा, ये बताइए आपके बच्चे ने एआइपीएमटी का फॉर्म भरा है क्या?” अभिभावक, “हां भरा है.” दलाल, “आमने-सामने बात करनी पड़ेगी. प्रीत विहार, लक्ष्मीनगर (पूर्वी दिल्ली) के पास पहुंचकर फोन कर लेना.”
यह करीब पांच मिनट की उस ऑडियो क्लिप का हिस्सा है, जिसमें एक अभिभावक एक दलाल से अपने बच्चे का एमबीबीएस में दाखिला कराने के लिए बात कर रहा है. यह सारी बात 3 मई, 2015 को ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (एआइपीएमटी) के आयोजित होने से तीन महीने पहले फरवरी में हुई. इस तरह के कुछ और ऑडियो क्लिप भी हैं, जिन्हें पुलिस दलालों के खिलाफ सबूत के तौर पर अदालत में पेश कर सकती है.
ऐसे ही बहुत से सबूत जब सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचे तो 15 जून को एआइपीएमटी 2015 का रिजल्ट रद्द कर दिया गया और देश की सबसे बड़ी अदालत को चार हफ्ते के भीतर दुबारा परीक्षा कराने का आदेश देना पड़ा. हालांकि अभी यह तय नहीं है कि सीबीएसई इस समय सीमा में परीक्षा करा भी पाएगी या नहीं. इससे पहले 2004 में भी यह परीक्षा इन्हीं वजहों से रद्द करनी पड़ी थी और 2012 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की प्रवेश परीक्षा भी रद्द की जा चुकी है. खास बात यह है कि 2015 में धांधली में पकड़े गए रवि अत्री और मोहित चौधरी इससे पहले भी एम्स प्रवेश परीक्षा 2012 में गड़बड़ी करने के आरोपी हैं. मेडिकल की इन दो परीक्षाओं में धांधली के अलावा चौधरी भारतीय स्टेट बैंक की प्रोबेशनरी ऑफिसर प्रवेश परीक्षा 2012 में भी धांधली का आरोपी है. यहां से शुरुआती संकेत मिलते हैं कि मामला सिर्फ मेडिकल सीटें बेचने का नहीं है, बल्कि पढ़ाई और नौकरी, दोनों को बेचने वाला एक बड़ा गिरोह देश में सक्रिय है, जो मोटी कीमत मिलने पर हर परीक्षा का सौदा करने को तैयार है. दिल्ली के एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाला रवि अत्री और इंदौर के मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाला मोहित चौधरी तो इस गैंग के बहुत मामूली प्यादे हैं.
पढ़ेंगे आप, पास कोई और होगा
एआइपीएमटी 2015 का भंडाफोड़ करने वाले हरियाणा के रोहतक के पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) श्रीकांत जाधव कहते हैं, “दलालों का जाल पूरे देश में फैला है. इस देश की हर प्रवेश परीक्षा बिकी हुई है, चाहे वह पढ़ाई के लिए हो या नौकरी के लिए.” उनकी साफगोई इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले साल रोहतक में ही एआइपीएमटी-2014 को लेकर ठीक इसी तरह की शिकायतें मिली थीं, लेकिन तब मामले को दबा दिया गया था. वैसे भी यह एक ऐसे राज्य के आइजी का बयान है जहां पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके सुपुत्र अजय चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद जेल काट रहे हैं. रोहतक पुलिस की अब तक की जांच में 40 से अधिक छात्रों को धांधली के जरिए पास कराने की बात सामने आ चुकी है. यह भी साबित हो चुका है कि यह गैंग दिल्ली, यूपी, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों तक फैला है. पुलिस की जांच और दलालों के दावे से साफ है कि मेडिकल की एक सीट 25 लाख से 50 लाख रु. के बीच बिक रही है.
दलालों की इसी दबंगई का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश में इस समय सरकारी नौकरी से जुड़ी 23 परीक्षाओं के परिणाम धांधली के आरोपों के चलते रुके हैं. इनमें प्रशासक, शिक्षक, इंजीनियर, लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी, कांस्टेबल, दारोगा और तकरीबन हर तरह की सरकारी नौकरी शामिल है. इन परीक्षाओं के परिणाम लटकने से इनमें पास हुए डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के भविष्य पर सीधा खतरा है. यूपी में इस तरह का ताजा मामला इस साल मार्च में सामने आया जब यूपीपीसीएस-2015 की प्राथमिक परीक्षा में सामान्य अध्ययन का पर्चा लीक होने के कारण रद्द कर दिया गया. यूपी के इस पर्चा लीक मामले में कई राज्यों के लड़के गिरफ्तार हुए. यूपीपीएससी के खिलाफ परीक्षा में गड़बड़ी के सात मामलों में इलाहाबाद हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके इलाहाबाद की प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अवनीश पांडेय का आरोप है, “उत्तर प्रदेश सरकार की सीधी भर्ती वाली तो एक भी परीक्षा पारदर्शी नहीं है. ज्यादातर मामलों में हाइकोर्ट ने या तो परीक्षा के आयोजन पर ही रोक लगा दी या फिर परिणाम रोक दिए.”
मध्य प्रदेश में हालत और खराब है. यहां मेडिकल, इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाएं और कई सरकारी नौकरियों की भर्ती परीक्षा आयोजित कराने वाला व्यासायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) अब घोटाले का दूसरा नाम बन गया है. व्यापम के माध्यम से हुई 10 से अधिक तरह की नौकरियों की नियुक्तियां खारिज की जा चुकी हैं. 2,000 से ज्यादा मेडिकल एडमिशन रद्द कर दिए गए और 500 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हो चुके हैं. घोटाले के 30 से ज्यादा आरोपी और गवाहों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो चुकी है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पिछले कार्यकाल में शिक्षा मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा तक इन आरोपों में जेल में हैं. एक तरह से देखा जाए तो व्यापम घोटाला पिछले तीन साल से मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सियासी और सामाजिक मुद्दा बन गया है.
जब बाकी राज्यों का यह हाल है तो बिहार क्यों पीछे रहने लगा. पिछले महीने मई में बिहार संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद (बीसीईसीई) की मुख्य परीक्षा में 14 लड़के ब्लूटूथ डिवाइस का इस्तेमाल करते पकड़े गए. यानी बीसीईसीई की प्रवेश परीक्षा और एआइपीएमटी में फिक्सिंग के लिए एक ही तरह की तकनीक अपनाई जा रही थी. बिहार में पिछले साल भी पुलिस भर्ती के साक्षात्कार के दौरान 200 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. बीते 16 जून को गया के टनकुप्पा थानाक्षेत्र से मध्य प्रदेश पीएससी में पर्चा लीक करने के आरोपी अखिलेश पांडे की गिरफ्तारी हुई है. यानी परीक्षाएं फिक्स कराने का नेटवर्क पूरे देश में फैला है और ये लोग आपस में जुड़े हैं.
फिक्सिंग के चार अध्याय
वैसे, ये लोग ही नहीं जुड़े हैं, इनके काम करने के तरीके भी एक से हैं. मसलन, एआइपीएमटी में ब्लूटूथ डिवाइस का इस्तेमाल किया गया. इस तरीके में कुछ परीक्षार्थी परीक्षा कक्ष के भीतर ब्लूटूथ डिवाइस लेकर पहुंच जाते हैं और बाहर बैठे अपने आकाओं के लिए पर्चा लीक कर देते हैं. फिर किसी दूसरे शहर में बैठे एक्सपर्ट मिनटों में पूरा पर्चा हल कर उसे वॉइस मैसेज के रूप में रिकॉर्ड कर लेते हैं. इस हल प्रश्नपत्र को पूरे देश में परीक्षा शुरू होने के घंटे भर के भीतर भेज दिया जाता है. आइजी जाधव बताते हैं, “एआइपीएमटी परीक्षा शुरू होने के 15 मिनट के भीतर अलवर के बहरोड़ में बैठे 20 सॉल्वर के पास पर्चा पहुंच गया. उसी समय 72 सिम एक्टिवेट कर हल किया पर्चा 500 से ज्यादा मोबाइल फोन पर फॉरवर्ड कर दिया गया. यह जबरदस्त संगठित और हाइटेक गिरोह है.”
परीक्षा की सुरक्षा की धज्जियां उड़ाने का दूसरा तरीका है परीक्षार्थी की जगह दूसरे व्यक्ति को परीक्षा देने के लिए बैठा देना. तीसरा तरीका है परीक्षार्थी के साथ ही किसी सॉल्वर को भी परीक्षा में बैठाना और दोनों को अगल-बगल का रोल नंबर आवंटित करना. यानी सॉल्वर परीक्षा कक्ष में बैठकर ही नकल करा दे. चौथा तरीका है ओएमआर शीट खाली छोड़ देना. इस खाली ओएमआर शीट को बाद में भर दिया जाता है. पहला तरीका एआइपीएमटी में और बाकी तीन तरीके व्यापम में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुए हैं.
व्यापम घोटाले के व्हिसल ब्लोवर डॉ आनंद राय सवाल करते हैं, “लेकिन एक परीक्षा की जांच कर रही एजेंसी को दूसरी परीक्षा की धांधली से मतलब नहीं रहता. जैसे इस समय रोहतक पुलिस ब्लूटूथ पर ही फोकस कर रही है और व्यापम में कैसे घोटाले हो रहे हैं, इसकी बारीकियां पुलिस को पता नहीं है.” इन चार तरीकों के अलावा उत्तर प्रदेश पीसीएस में इंटरव्यू में ज्यादा नंबर देने के रैकेट को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं.
अब तक अलग-अलग राज्यों की प्रांतीय सिविल सेवा परीक्षाओं की 28 मुख्य परीक्षाओं और पांच इंटरव्यू में बैठने के बावजूद हर बार चूक जाने वाले इलाहाबाद के अमरनाथ दुबे कहते हैं, “मुझे समझ ही नहीं आता कि इंटरव्यू पैनल हमसे चाहता क्या है? और क्यों हमारे वे दोस्त कामयाब हो जाते हैं, जो इंटरव्यू से पहले 13 लाख रु. किसी को दे आने का दावा करते हैं.”
डॉक्टर से दलाल बनने की सच्ची कहानी
यहां सवाल यह भी उठता है कि ईमानदार छात्रों तक सिर्फ चर्चाएं पहुंचती हैं, जबकि चालू छात्र फटाफट दलालों से लेन-देन कर मामला फिक्स कर लेते हैं. आखिर वे दलालों पर भरोसा कैसे करते हैं. नाम न छापने की शर्त पर कोटा की एक कोचिंग में 10 साल से जीवविज्ञान पढ़ा रहे शिक्षक ने एक सच्ची कहानी सुनाई. कहानी का सार है&राजस्थान का एक मामूली हैसियत का किसान अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था. उसने घर-जमीन बेची और मोटा कर्ज भी लिया. इस तरह 50 लाख रु. जुटाए और एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में बेटे का सरकारी सीट पर दाखिला कराने में कामयाब रहा. लड़का जब कॉलेज पहुंचा तो उसके सीनियर्स ने उससे कहा कि वह एडमिशन के लिए नए लड़के फांसे तो उसे 20 फीसदी कमीशन मिलेगा. लड़के ने ऐसा ही किया और दो साल के अंदर अपने बाप का कर्ज उतार दिया. इस तरह मेडिकल के ये छात्र किसी ऊपर वाले को पैसा दे-देकर सीटों की नीलामी के कारोबार से जुड़ जाते हैं. एक बार सीट बेचने के धंधे में आ गए तो उसके बाद मेडिकल, पीसीएस या बैंक किसी में फर्क नहीं रहता.
बदलनी होगी सोच
यह कहानी सुनने के बाद यह भी सोचना होगा कि आखिर क्यों कोई सीधा-सादा लड़का मुन्नाभाई बन रहा है? एआइपीएमटी को ही लें तो इसमें 6 लाख से ऊपर छात्र परीक्षा में बैठते हैं, जबकि पास हो सकते हैं बमुश्किल 3,000 विद्यार्थी. यानी सिर्फ आधा फीसदी बच्चे ही कामयाब हो सकते हैं. इसी तरह यूपीपीसीएस में 2 लाख से ज्यादा लोग इम्तिहान देते हैं जबकि सीटें 600 से 800 के बीच ही होती हैं, यानी यहां सिर्फ 0.3 फीसदी अभ्यर्थी ही पास हो सकते हैं. मांग और आपूर्ति के इसी भारी अंतर से ही परीक्षाएं बेचने वाले गिरोह पनपते हैं.
व्यापम में यह साफ हो चुका है कि इस गिरोह के सरगना व्यापम के वही अधिकारी थे, जो परीक्षाएं आयोजित कराते थे. इनके ऊपर सत्ता के ऊंचे केंद्रों का हाथ था. उत्तर प्रदेश में राज्य कृषि सेवा अधिकारी की भर्ती के मामले में तो इलाहाबाद हाइकोर्ट ने यूपीपीएससी से साफ कहा, “आयोग को बैकडोर से भर्ती करने की आदत छोड़ देनी चाहिए.” उधर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई से पूछा, “इतने लोगों तक पर्चा लीक होने के बाद आप कैसे कह रहे हैं कि यह नकल मामूली प्रयास है.” क्या इस सबके बाद भी हम प्रतियोगी परीक्षाओं के मौजूदा स्वरूप को इसी तरह ढोते रहेंगे?
(साथ में आशीष मिश्र और अशोक कुमार प्रियदर्शी)
प्रतियोगी परीक्षाएं या फिक्सिंग के अखिल भारतीय आयोजन
सुप्रीम कोर्ट ने एआइपीएमटी-2015 रद्द तो कर दी लेकिन इससे शिक्षा और नौकरी बेचने के धंधे पर असर पड़ता नहीं दिखता.

अपडेटेड 22 जून , 2015
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