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पहाड़ों से पलायन के नए दौर के आगाज की दास्तान

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से पलायन का दूसरा दौर शुरू हो चुका है. इसके विपरीत मैदानी जिलों में आबादी बढ़ रही.

कर्णप्रयाग के पास आदिबद्री गांव में छोड़ दिए जाने के बाद खंडहर में तब्दील एक घर
कर्णप्रयाग के पास आदिबद्री गांव में छोड़ दिए जाने के बाद खंडहर में तब्दील एक घर
अपडेटेड 30 मार्च , 2015
पहाड़ों के बारे में एक कहावत मशहूर है कि पहाड़ का पानी और जवानी कभी वहां के काम नहीं आती. रोजगार के मौकों की कमी, शिक्षा की समुचित व्यवस्था का अभाव और खेती में आने वाली मुश्किलों ने हमेशा से यहां के लोगों को अपनी जड़ों को छोडऩे के लिए मजबूर किया है. उत्तराखंड में पलायन अब इस हद तक पहुंच गया है कि यहां के गांव तेजी से वीरान होते जा रहे हैं. विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने माना है कि पहाड़ों में गैर आबाद गांवों की संक्चया 1,059 पहुंच गई है. गैर आबाद गांवों का मतलब है ऐसे गांव जहां अब कोई भी नहीं बचा. हालांकि सरकार का कहना है कि इन गांवों को फिर बसाने की कोशिशें हो रही हैं.

ताजा पलायन की वजह 2013 में जून माह की आपदा को बताया जाता है, जिसने ग्रामीणों को घर छोडऩे के लिए विवश किया. देवप्रयाग के लिही गांव के अशोक कुमार का परिवार बद्रीनाथ में पंडागिरी और छुटपुट दुकानदारी करता रहा था लेकिन तबाही के बाद धंधा चौपट होने से भुखमरी की नौबत आ गई. उनके साथ लगभग 50 परिवार बद्रीनाथ छोड़कर रोजी रोटी की तलाश में ऋषिकेश के खदरी गांव में आश्रय ले चुके हैं. अशोक बताते हैं, ''लिही में 42 परिवार रहते थे. इनमें से 20 घरों में ताले लग गए. गांव में अब बूढ़े और महिलाएं ही बचे हैं.''

राज्य बना, पलायन बढ़ा
साल 2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद गांवों से पलायन में और तेजी आई है. 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के 75 प्रतिशत गांव पलायन की वजह से खाली होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. जनसंख्या के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2001 से 2011 के बीच उत्तराखंड की आबादी 19.17 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह वृद्धि सिर्फ 11.34 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्रों में 41.86 प्रतिशत रही.

इस बात की तस्दीक हल्द्वानी एमबीपीजी कालेज में भूगोल विभाग के प्रोफेसर डॉ. वी.आर. पंत भी करते हैं. पंत के मुताबिक, राज्य के 95 विकासखंडों में से 28 ऐेसे हैं जिनकी आबादी तेजी से घट रही है. टिहरी जिले के धौलाधार विकासखंड की आबादी में 21.7 प्रतिशत गिरावट आई है तो जहरीखाल की आबादी 16.1 प्रतिशत घटी है. पोखड़ा विकासखंड और ऐकेश्वर की आबादी 14 प्रतिशत से ज्यादा घटी है.

चौंकाने वाली बात है कि पहाड़ी विकासखंडों में आबादी घटी है जबकि मैदानी क्षेत्रों के विकासखंडों में आबादी आश्चर्यजनक रूप में बढ़ी है. 22 विकासखंड ऐेसे हैं जिनकी आबादी में 20 फीसदी से ज्यादा वृद्धि हुई है. हल्द्वानी विकासखंड में तो 103.4 ऌप्रतिशत तक आबादी में वृद्धि दर्ज हुई है. रुद्रपुर में 89.4 प्रतिशत, रायपुर में 86.6 प्रतिशत तो काशीपुर में आबादी 54.6 प्रतिशत बढ़ी है. पंत कहते हैं, ''यही स्थिति रही तो 2021 तक मैदानी विकासखंडों और शहरी क्षेत्रों की आबादी में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होगी और पहाड़ों के गांव लगभग खाली हो जाएंगे.''

वीरान गांव
बद्रीनाथ में सूखे मेवों के व्यापारी आशीष ध्यानी आपदा के बाद ऋषिकेश आ बसे. वे कहते हैं, ''जब तीर्थयात्री ही नहीं आएंगे तो सूखे मेवे कौन खरीदेगा.'' उत्तराखंड अर्थ और सांख्यिकी विभाग ने 2011-12 के बीच 390 गांवों और 65 जनगणना शहरों (सेंसस टाउन) में सर्वे करवाया था. इसमें पता चला था कि 1,000 में से 864 लोग ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन कर रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्रों से प्रति हजार पर 136.61 लोगों का पलायन हुआ है. 

सीमांत क्षेत्रों के गांवों से होने वाला पलायन गंभीर समस्या है, जिसकी वजह से ये गांव वीरान होते जा रहे हैं. इस मुद्दे की ओर ध्यान खींचते हुए पिछले साल 26 जनवरी को राज्य के तत्कालीन गवर्नर डॉ. अजीज कुरैशी ने कहा था कि अगर पलायन को नहीं रोका गया तो सीमांत क्षेत्रों पर चीन कभी भी कब्जा कर लेगा. पलायन को रोकने के लिए पूर्व आइएएस अधिकारी सुरेंद्र पांगती उपाय सुझाते हैं, ''पलायन रोजगार के अभाव में होता है और इसे पर्यटन, तीर्थाटन और जड़ी बूटी उत्पादन से दूर किया जा सकता है.'' 
पांगती कहते हैं कि सबसे बड़ी परेशानी यह है कि सरकारी कर्मचारी पहाड़ पर नहीं जाना चाहते है. ऐसे स्थानों पर नियुक्ति पनिशमेंट पोस्टिंग मानी जाती है. यही वजह है कि राज्य के वार्षिक प्लान तक का पैसा खर्च करना टेढ़ी खीर बन गया है. योजना आयोग के समक्ष 12वीं पंचवर्षीय योजना का वार्षिक प्लान 2012-13 रखते हुए खुद राज्य सरकार ने माना था कि 2011-12 में योजनाओं के लिए स्वीकृत 7,800 करोड़ रु. में से सिर्फ 5,165.83 करोड़ रु. ही खर्च हुए हैं.

मुश्किलों भरी राह
प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव इंदु कुमार पांडे के मुताबिक युवाओं का पलायन बढ़ जाने से राज्य के पहाड़ी जिलों का निर्भरता अनुपात 1:1.34 हो गया है. इसका अर्थ है कि गांवों में सौ युवाओं के मुकाबले 134 वृद्ध हैं. जो बच्चे गांव में रह गए हैं वे स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे हैं और ऐसे में वृद्धों की सेहत और बच्चों की पढ़ाई के लिए राज्य को वहां ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. आबादी कम होना और उसके भी दूर-दूर तक फैले होने की वजह से पहाड़ी इलाकों में सेवा पहुंचाना दुष्कर होता है. परिवहन, पेयजल, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा और सड़क यहां पहुंचाना मुश्किल काम है. यही वजह है कि आज भी 5,000 से ज्यादा गांवों के सड़कों से तार जुड़ नहीं पाए हैं.

उत्तराखंड क्रांति दल के नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं, ''राज्य के गठन के बाद से लगभग 20 लाख लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं. यह हालत तब थी जबकि 2013 की आपदा नहीं आई थी. आपदा के बाद तो पलायन और अधिक बढ़ा है.'' वहीं बीजेपी नेता मुन्ना सिंह चौहान कहते हैं, ''यूपी से अलग होने के डेढ़ दशक बाद भी हम अपने विकास का खाका ही नहीं खींच सके. ऐसे में युवा पलायन नहीं करेगा तो क्या करेगा? उसे न रोजगार मिल रहा है और न संसाधनों में हिस्सा. युवाओं की कोई जरूरत पूरी नहीं हो रही है.''

राजनैतिक प्रतिनिधित्व घटेगा
पलायन से पहाड़ का सिर्फ सामाजिक संतुलन ही नहीं, राजनैतिक संतुलन भी गड़बड़ा गया है. 2001 की जनगणना के आधार पर 2006 में हुए राज्य परिसीमन के तहत पहाड़ की 40 विधानसभा सीटों में से 6 सीटें जनसंख्या में कमी की वजह से कट गईं, ये 6 सीटें मैदानी क्षेत्र में बढ़ गईं. इस तरह अब पहाड़ में सिर्फ 34 सीटें रह गईं और मैदान में 36 सीटें हो चुकी हैं, जबकि 9 जिले पहाड़ में आते हैं और मैदान में चार ही जिले हैं.

पहाड़ों में पलायन की वजह से आबादी इसी तरह घटती रही तो 2026 के परिसीमन में और सीटें पहाड़ से कटकर मैदान में चली जाएंगी. ऐसे में स्वाभाविक है कि राज्य विधानसभा में पहाड़ों का प्रतिनिधित्व ही कम रह जाएगा और इसका  सीधा असर पहाड़ी क्षेत्रों, खासकर ग्रामीण इलाकों के विकास पर पर पड़ेगा.

जो मजबूर, वही रुके
पहाड़ों में गैर आबाद गावों की बढ़ती संख्या ने प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी चिंता में डाल दिया है. वे कहते हैं, ''राज्य सरकार ने मेरा गांव, मेरी सड़क योजना के जरिए पहाड़ों से पलायन को रोकने की कोशिश की है. गांवों में अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए नाली, सड़क पेयजल समेत अन्य योजनाओं के निर्माण के लिए कॉर्पस फंड बनाया है.'' मुख्यमंत्री के मुताबिक, उद्योगों को पहाड़ की ओर आकर्षित करने के लिए भी सरकार नीति बना रही है. रावत का दावा है कि आगामी चार साल के भीतर राज्य के गांवों से हो रहे पलायन को रोका जा सकेगा.

पहाड़ी गावों में वे ही लोग बचे हैं जो पलायन करने में सक्षम नहीं हैं. उत्तराखंड विधानसभा के पूर्व स्पीकर हरबंस कपूर कहते हैं, ''अब यहां के गांवों मे वहीं लोग बचे हैं जिनके पास अन्य जगहों पर जाने की सामर्थ्य ही नहीं है. अन्यथा हालत यह है कि जिन गांवों में सड़क पहुंची है, वहां से लोगों ने सड़क का इस्तेमाल गांव की खुशहाली के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार समेत उस गांव से बोरिया बिस्तर समेटने में किया है.''
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