अपना दिल लाहौर में छोड़कर करीब 20 साल पहले लंदन जा बसीं मोनी मोहसिन और मुंबई की रहने वाली शोभा डे ने अपनी शिकायतों को साझा किया. उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान ने न सिर्फ इस समूचे उपमहाद्वीप को अपने-अपने मुल्कों में बांट लिया है, बल्कि सामूहिक सपनों का भी बंटवारा कर लिया है. जैसे ही उनका यह शिकायती संवाद खत्म हुआ, मोहसिन ने ताज पैलेस होटल में उस सुबह हेयरड्रेसर से अपनी मुलाकात की बातें बताईं.
मोहसिन ने हेयरड्रेसर से कहा, ''मेरे बाल सुखाकर सीधे कर दो.''
''मोहतरमा, किधर से बांटूं? बाएं या दाएं?'' हेयरड्रेसर ने मोनी के बालों को दो तरफ करने के बारे में पूछा.
इस पर दिल्ली के पंजाबी बहुल श्रोताओं में ठहाके गूंज उठे. सचाई भी यही है कि सीमा के दोनों तरफ के पंजाबी मोनी और डे की बातों में फंस गए, जिन्होंने बताया कि रैडक्लिफ लाइन के दोनों तरफ एक ही तरह के मोनी जज्बात हैं. बेशक, इन दो लेखिकाओं में बड़ा फर्क है. मोनी अपनी किताबों और अखबारों के स्तंभों में पाठकों के साथ, अपने सनकी पंजाबी पात्र जानू के जरिए हंसी-ठिठोली करती हैं, जबकि शोभा डे अपने संवेदनशील सवालों से पाठकों को झकझोर देती हैं.
डे कहती हैं, दिल्ली वाले पहला सवाल पूछते हैं, ''आप किस कलोनी (पंजाबियों की तरह कॉलोनी के उच्चारण की नकल) में रहते हो? '' और फिर कहती हैं कि इसके बदले कोई मुंबईकर यह देखता है कि उसका बैंक बैलेंस कितना मोटा है.
मंच पर कुछ दूर बैठी मोनी मजाक में कहती हैं, ''आपको कहना चाहिए, जॉर्ज क्लूनी?''
डे का लाहौर के माहौल का वृîत्तांत उस सत्र में छाया रहा. मगर सचाई यही है कि मोनी और डे जिस समाज का वर्णन करती हैं, उसका शिराजा अब बिखरता जा रहा है. खुशनुमा लाहौर और दिल्ली@मुंबई का माहौल अब बदलता जा रहा है. पाकिस्तान में तो ऐसी मजहबी कट्टरता हावी हो गई है, जिस पर अफसोस जताने के अलावा मोनी के पास और कोई चारा नहीं है.
जहां तक डे का सवाल है, उन्हें भी एहसास है कि उनका जमाना पुराना पड़ता जा रहा है. मोदी के दौर में सेंसेक्स सेक्स से ज्यादा दिलचस्प हो उठा है. जानू, ये हम किस दुनिया में पहुंचते जा रहे हैं!
प्रिय शोभा,
हलो जी! पिछली बार जब हम मिले थे, तब से मैंने तुमको बताने के लिए कितना कुछ संजोकर रखा है. मैं तुमसे मिलने पहले ही आ जाती, अगर्चे यह वीजा-शीजा का स्टुपिड बकवास नहीं होता. यकीनन, ये भी क्या मुसीबत है, यार? आप सैकड़ों खुशामदें किए बगैर सीमा भी पार नहीं कर सकते. गोरों से वीजा की भीख मांगना बड़ा बुरा लगता है, लेकिन देसी साहबों की खुशामद करना तो कतई अच्छा नहीं लगता. कम-से-कम हम खाते-पीते जैसों के लिए तो नहीं ही. गरीबों की तरह, जो हर चीज के लिए हर रोज भीख मांगा करते हैं. हम आदी नहीं हैं न इन सबके.
वीजा की बात करें तो सुना है कि हमारे विदेश सचिव भी चुपचाप पिछवाड़े बातचीत चला रहे हैं. दो साल की कुट्टी के बाद सुल्ला (सुलह) करने की कोशिश कर रहे हैं. जानू कहता है कि उनकी बातचीत अटक गई है. वैसे वो तो होना ही था. मेरा मतलब यह कि अगर आप बार-बार कश्मीर और सियाचिंग (सियाचिन) और सर क्रीप (वैसे, ये सर क्रीप (क्रीक) है क्या बला?) जैसे बोर (बकवास) झगड़ों का हल्ला उठाते रहोगे तो नेचुरली बाबा, आप आगे नहीं बढ़ सकते. अगर इस्लू (इस्लामाबाद) और साउथ ब्लॉक के बाबुओं के बदले हमारी गवर्नमेंट्स (सरकारें) तुमको और मुझे बातचीत करने को भेजतीं, सब कुछ पलक झपकते हल हो जाता क्योंकि तुम जानती हो, तुम और मैं, कि कितना कुछ हमारे बीच कॉमन (साझा) है?
हमारे बीच क्रिकेट, हमारे सेलेब दोस्त, बॉलीवुड, सब एक जैसा है. पान, आम, शादियां, शल्लू, शोले सब का साझा है. और फिर हमारे सभी खान साझा हैं. भाई आमिर खान, सलमान खान, इरफान खान, फवाद खान, इमरान खान, रहमान खान और बेशक सबसे मशहूर हमारे खान मार्केट को भला कैसे भुलाया जा सकता है. शोभा जानती हो, मेरे लिए पहले हैरोड्स है, फिर दुबई मॉल-जहां शॉर्क का एम्पोरियम है-और फिर मेरे लिए खान मार्केट मायने रखता है. बस, खान मार्केट में भी कोई एक्वेरियम खुल जाए तो वह मेरे लिए दूसरे नंबर का हो जाएगा. फिलहाल तो मुझे माफ करना.
हां, याद आया, हमारे बीच टीवी ड्रामा भी एक जैसा है. मम्मी तो आपके वाले एक सीरियल चकोरी या ऐसा ही कुछ नाम है, उस पर एकदम लट्टू हैं. जब भी मैं बुलाती हूं, वे कहती है कि बाथरूम में हूं. मगर मैं जानती हूं कि वे चकोरी देख रही हैं. इसके अलावा उन्हें हमेशा दस्त लगी रहती है. वैसे, जरा सोचो, कोई अपनी बेटी से बात करने की जगह भला ड्रामा देखता है! अपनी मक्वमी के बारे में ऐसी बात नहीं करनी चाहिए मगर मम्मी भी ऐसी धोखेबाज हैं न.
मगर शोभा, मैं अपने बारे में बताऊं, मैं खुद तुर्की के सीरियलों की दीवानी हो चली हूं, जो इन दिनों हमारे पाकिस्तान में दिखते हैं. मैं बताऊं, वहां के मर्द कैसे लंबे, तगड़े और खूबसूरत हैं. मेरा सबसे पसंदीदा सीरियल मेरा सुल्तान है, जो सुल्तान सुलेमान अव्वल के बारे में है. मैं उससे इतना जुड़ गई हूं कि उसके बारे में क्या-क्या बताऊं. उसके खत्म होने के बाद मैंने अपनी आंटी पुसी से कहा, ''ऐ आंटी, मैं इतनी डिप्रेस (उदास) इतनी डिप्रेस हूं, आप मुझसे पूछोगी नहीं?'' उन्होंने कहा, ''मगर क्यों बेटा?'' मैंने कहा, ''क्योंकि मेरा टर्किश सोप (तुर्की सीरियल) खत्म हो गया.'' उन्होंने कहा, ''जानती हो बेटा, मैं तो डव ही लेती हूं. इससे चमड़ी मुलायम रहती है.''
हां, शोभा, याद आया, हमारे बीच एक और चीज एक जैसी हैः बंदिशें! सो, हमारे लिए वसंत पर बंदिश है. गवमेंट्स (सरकारें) कहती हैं कि यह हमारी भलाई के लिए है क्योंकि काफी लड़के पतंग उड़ाते छतों से गिर जाते हैं. मगर मेरे दिमाग में क्या चल रहा है कि अगर गवमेंट को हमारी हिफाजत की इतनी ही फिक्र है तो कलाशनिकक्रस (क्लाशिनकोव राइफलें और पिस्तौल) पर बंदिश क्यों नहीं लगा देती, हां? वो तो आप बाजार में चपातियों की तरह आसानी से खरीद सकते हैं. और हां, हमारे यहां यूट्यूब पर भी बंदिश है. आखिर यूट्यूब पर आप कुछ ऐसा देख-सुन सकते हैं, जिससे हमारे जैसे मासूम, दीनदार लोगों को जोर का झटका लग सकता है या गलती से देख लें तो सीधे दोजख में चले जाएं.
मेरा अंदाजा है कि ऐसी ही किसी वजह से बॉक्वबे वालों के लिए बीफ पर भी बंदिश है. अरे सुनो, बॉम्बे कहूं या उस पर भी बंदिश है? किसी के जज्बात को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती न, इकलौते इंट्री वीजा पर मेहमान जो हूं, और वह भी बड़ी खुशामद के बाद मिला है.... फिर मैंने सुना है कि बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी पर भी तुम लोगों के लिए बंदिश है? क्या पता उसे देखकर तुम्हें झटका लग जाए. यकीनन, ऐसी गवमेंट्स का जवाब नहीं, जो हमारे मॉरल वेलफेयर (नैतिक कल्याण) का हर घड़ी इतना ज्यादा क्चयाल रखती है, है न?
वैसे, शोभा, ये विदेशी ऐसे शो क्यों करते हैं या ऐसी बातें क्यों करते हैं, जो हमें इस कदर झकझोर देती हैं? और हमें दुनिया भर में इस कदर बदनाम कर देते हैं? मेरा मतलब कि वे हमारे बारे में सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें क्यों नहीं कर सकते? तुम्हारे, मेरे और इस चारदीवारी के बीच, मेरे क्चयाल से हमें नीचा दिखाने की साजिश है. यह तो बस एक कहने की बात है. वरना तो शोभा, हम उन्नत प्राचीन सभ्यता के लोग हैं, नहीं? मेरा मतलब, पुराने दौर के हड़प्पा और मोएनजोदाड़ो जैसे शहर, भाई अपनी सिंधु घाटी सभ्यता नहीं थी? उसमें उन लोगों ने ईंट की बनी नालियां और ड्रेन वगैरह खोजा था.
जरा सोचो! चार हजार साल पहले, जब लंदन और न्यूयॉर्क वाले भालू के चमड़े से देह ढंकते थे और कीड़े-मकोड़े खाते थे, हम क्यूराविट के क्रलश वाले टॉयलेट्स में बैठा करते थे. जी हां! और पिछले हक्रते यूनाइटेड नेशंस की किसी ब्रांच का कोई आया और हमसे कहने लगा कि 4 करोड़ पाकिस्तानी बाहर बाथरूम करते हैं और यह अच्छा नहीं है. मैं उससे कहना चाहती थी कि भाई, माफ करना, गरीब लोग टॉयलेट्स में बैठना भूल गए और बाहर बाथरूम कर रहे हैं तो यह कोई हमारी गलती थोड़े ही है कि उनकी याददाश्त चली गई है?
और बस, शोभा, आखिर में अपने काम पर लौट जाया जाए, पार्टियां, खाना, जीटीज, ओ बाबा, गेट टुगेदर (मेलजोल), शादियां वगैरह. हर कोई जो बुलाता है, न जाओ तो बुरा मान जाता है, न. तो, शोभा हमारे जैसे मेहनत करने वालों को फुर्सत कहां. ओके डायलिंग, अब एक किटी पार्टी के लिए भागना है.
ढेरों चुंबन मेरी लक्तेजिगर!
मोनी

