आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के घर में मौजूद पिंजरे में पहले एक अकेले देसी मुर्गे का राज था. अब इसमें सफेद परों वाली एक संकर मुर्गी भी आ चुकी है जिसे लालू को उनकी पार्टी के दो लोगों ने भेंट किया है. अपने पुराने सियासी सहयोगी अनवार अहमद के साथ पटना के 10, सर्कुलर रोड स्थित आवास पर आराम फरमा रहे लालू यह सोच कर परेशान हैं कि दोनों पक्षियों को एक ही पिंजरे में रखने से क्या हो सकता है. क्या वे ऐसे ही दोस्ताना बनाए रखेंगे या एक-दूसरे पर हमला भी कर सकते हैं? इससे भी बड़ी बात यह कि क्या दोनों के ङ्क्षजदा रहने के लिए जगह पर्याप्त है? दोनों पक्षियों के मेल से जुड़ी लालू की चिंता खुद उनके और नीतीश कुमार के बीच बनी साल भर पुरानी एकता से बहुत अलग नहीं है. अपनी दो दशक पुरानी दुश्मनी को दफना कर 2014 के आम चुनावों के परिणाम के मद्देनजर अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए जब से लालू-नीतीश साथ आए हैं, दोनों के बीच सियासी रास्ते को लेकर कोई भटकाव अब तक नहीं हुआ है.
लालू ने जहां जून 2014 के राज्यसभा चुनाव में नीतीश के उम्मीदवारों को जिताने में मदद कर के जेडी (यू) की सरकार को बचाया, वहीं उपचुनावों में उनके गठबंधन को 10 में से 6 सीटें हासिल हुईं. इसके बाद अविश्वास की चर्चाओं को विराम देते हुए लालू ने पिछले महीने जीतन राम मांझी को कुर्सी से हटाने के नीतीश के फैसले का समर्थन किया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई.
लालू-नीतीश ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के उभार को थामने के लिए हाथ मिलाया था जिसने मई 2014 के चुनावों में बिहार की 40 में से 31 सीटें झटक ली थीं. बीजेपी को सिर्फ 31 फीसदी वोट मिले थे जबकि आरजेडी के नेतृत्व वाले कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 29 फीसदी और जेडी (यू)-सीपीआइ गठबंधन को 16 फीसदी.
अब तक की इन कामयाबियों के बावजूद लालू और नीतीश अपनी दोस्ती को अगले चरण तक नहीं ले जा पाए हैं. ये दोनों अपनी पार्टियों के विलय की घोषित मंशा के बावजूद इसे साकार नहीं कर पाए हैं. लालू अपनी बेटी की शादी में व्यस्तता की बात करते हैं और समय सीमा की बात ये कहकर टाल देते हैं कि विलय पर अंतिम निर्णय का अधिकार और बात करने के लिए मुलायम सिंह यादव ही अधिकृत हैं.
नीतीश के रास्ते को आसान बनाने के लिए लालू हालांकि अतिरिञ्चत प्रयास करते दिखते रहे हैं समझा जाता है कि उनके मन में अब भी अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं तक नीतीश की सीधी पहुंच या नियंत्रण मुहैया कराने को लेकर शंकाएं हैं. लालू इस बात को स्वीकार करते हैं कि नीतीश ने उनसे कैबिनेट में शामिल होने के लिए अपने लोगों को नामित करने को कहा था लेकिन लालू ने संभल कर खेलते हुए सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया.
इससे पहले 14 जनवरी को भी लालू ने आरजेडी और जेडीयू के विलय से यह कहते हुए मना कर दिया था कि पांच दलों का विलय होना चाहिए. अब तक यह भी नहीं हो सका है. क्या लालू के मन में कुछ आशंकाएं हैं? लालू ऐसी किसी भी बात से इनकार करते हैं पर उनकी पार्टी के लोगों की मानें तो उन्हें डर है कि कहीं उनकी पार्टी की कमान किसी और के हाथ में न चली जाए क्योंकि 2013 में चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद वे अब चुनाव नहीं लड़ सकते. आरजेडी के एक बड़े नेता कहते हैं, ''इसे आप असुरक्षा या भीतरी सतर्कता कहें लेकिन लालू अगले विधानसभा चुनावों तक अपनी पार्टी का स्वतंत्र वजूद बनाए रखने के पक्ष में हैं. उनकी स्पष्ट इच्छा है कि टिकट बांटने के सारे अधिकार उनके पास बने रहें. यह तभी संभव होगा जब आरजेडी का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहे.''
बीजेपी के खिलाफ सत्ता विपक्ष खड़ा करने के मकसद से पार्टियों के विलय के लिए दिसंबर, 2014 में लालू, नीतीश और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव, जनता दल (सेकुलर) के एच.डी. देवेगौड़ा और इंडियन नेशनल लोक दल के अभय चौटाला की बैठक हुई थी. इनमें अकेले नीतीश का रिकॉर्ड अच्छे शासन का है. उन पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का कोई आरोप नहीं लगा है. तभी वे बाकी के मुकाबले कुछ ऊंचे पायदान पर रहते हैं.
आरजेडी के एक सांसद का कहना है, ''अगर लालू को चिंता है कि नीतीश अपनी अच्छी छवि के कारण पार्टी और सरकार दोनों को ले उड़ेंगे तो उनकी आशंका निराधार नहीं है.'' अपनी पार्टी के स्वतंत्र वजूद को लेकर लालू का आग्रह केंद्र सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति पर आरजेडी और जेडी(यू) की हालिया प्रतिक्रियाओं से साफ होता है. इसके खिलाफ नीतीश और जेडी(यू) के अन्य नेता जहां 14 मार्च को पटना स्थित पार्टी मुख्यालय में 24 घंटे के अनशन पर बैठे, वहीं लालू ने काले धन और भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन पर केंद्र की नीतियों के खिलाफ कार्यकर्ताओं के साथ 15 मार्च को राजभवन तक पदयात्रा की. जबकि दोनों के पास इस मसले पर एक साथ मिलकर विरोध करने का मौका था. दोनों एक-दूसरे के कार्यक्रमों में शामिल भी हो सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ.
तत्कालीन जनता परिवार के धड़े जहां विलय की राह पर हैं, लालू अपनी अलग पहचान का आग्रह बनाए हुए हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास वोटों की ज्यादा बड़ी गठरी है. खासकर इसलिए क्योंकि संख्याबल में यादव समुदाय ज्यादा बड़ा है जो उनके साथ है. अगर विधानसभा चुनावों के बाद किसी एक नेता के हाथ में कमान देने का खेल चलता है तो ऐसे में उनके पास सौदेबाजी की ताकत ज्यादा रहेगी और वे अपने वोटबल के सहारे नीतीश की ताकत को संतुलित कर सकेंगे. यह तथ्य इस सचाई को बताता है कि दोनों दलों में विलय के लिए आरजेडी से कहीं ज्यादा चिंता जेडी (यू) को क्यों है.''

