नरेंद्र मोदी सरकार के संसद में पहले पूर्ण बजट सत्र के मध्यावकाश से ठीक पहले विपक्ष नई ऊर्जा के साथ उभरता दिखाई दे रहा है. 2014 में बीजेपी को मिले अविश्वसनीय जनादेश के बाद विपक्ष जिस हैरानी और सदमे की हालत में चला गया था, लगता है, अब वह उससे उबर रहा है. जिस तरह सोनिया गांधी ने टीवी कैमरों की खातिर राष्ट्रपति भवन तक पैदल कूच करते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक में बीजेपी के संशोधनों के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन की अगुआई की, ठीक उसी तरह इस साल के इंडिया टुडे कॉनक्लेव के कई सत्रों में असहमति की भावना पुरजोर गूंजती सुनाई दी. इसने एक बार फिर भारत के शानदार लोकतंत्र की ताकत और मजबूती को ही पुख्ता किया.
दिल्ली में ताज पैलेस होटल के बाहर और भीतर दो धुर राजनैतिक विरोधी तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ'ब्रायन और सीपीआइ (एम) के मुहम्मद सलीम कोयले के मुद्दे पर बीजेपी की खिंचाई करने के लिए एक साथ आ गए. ''द डिसेंटर्सः साइज डजंट मैटर' विषय पर सत्र में कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतने उदार थे कि यूपीए की हुकुमत के दौरान कैबिनेट बैठकों में असहमतियों और मतभेदों को काफी-कुछ खुलकर व्यञ्चड्ढत करने की छूट देते थे और हर मामले में खुलकर बहस हुआ करती थी. लेकिन जब उनसे पूछा गया कि दो दिन पहले कैबिनेट की बैठक में मंजूर, सजा पाए सांसदों-विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश को 27 सितंबर, 2013 को फाड़ देने वाले राहुल गांधी अव्वल दर्जे के विरोधी थे या पार्टी के पहले वारिस, तो सिंधिया इधर-उधर की बातें करते हुए बगलें झांकने लगे.
ङ्क्षसधिया को मजबूर होकर यह मानना पड़ा कि उनकी पार्टी देश के करोड़ों लोगों की उक्वमीदों पर खरी नहीं उतर सकी और लोगों का भरोसा जीतने के लिए राहुल को अगले कुछ महीनों में श्कुछ न कुछ करना्य पड़ेगा. लेकिन क्या करना पड़ेगा? इस सवाल पर काग्रेस नेता ङ्क्षसधिया बहुत करीने से कतराकर निकल गए.
तकरीबन सभी पार्टियों के सियासी नेताओं ने अपने हाजिर-जवाब कटाक्षों और विनोदप्रियता से न केवल कॉनक्लेव में आए लोगों का मन मोहा, बल्कि संसद में बहस-मुबाहिसे के पुराने दिनों की यादें ताजा कर दीं. मिसाल देखिए: 'मोहम्समद सलीम ने कहा, अगर डेरेक (ओ्यब्रायन) लोगों और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता (बनर्जी) दोनों को एक साथ साधना चाहते हैं, तो यह हो नहीं सकता.'
इसी तरह एक सत्र के संचालक ने बीजेपी के बलबीर पुंज से कहा कि अरविंद केजरीवाल को एक श्थैंक-यू्य नोट राहुल को भेजना चाहिए कि उन्होंने अपनी पार्टी को इस कदर बिखरने दिया कि हाल के दिल्ली चुनावों में उनका पूरा का पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी की ओर चला गया. तो पुंज ने चहकते हुए जवाब दिया, "यह तो खैर केजरीवाल के ऊपर है, लेकिन पहले उन्हें पता लगाना पड़ेगा कि राहुल गांधी फिलहाल हैं कहां. वरना कोरियर श्पाने वाले का अता-पता नहीं्य लिखकर लौटा दिया जाएगा."
बेशक, हंसी-मजाक के साथ-साथ बेहद संजीदा तर्क -वितर्क भी हुए. इनमें एक बहस अलहदा होने के अधिकार के बारे में थी, जिसमें एक या दूसरे किस्म की चीजें खाने या नहीं खाने के अधिकार का जिक्र किया गया. वाकई कई तरह के पकवानों वाले इस देश में बैल, बैलगाड़ी और गाय के बीच लकीर भला कोई कैसे खींचे? डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि महाराष्ट्र में-और हाल ही में हरियाणा में-गोमांस खाने पर जुर्माना यौन उत्पीड़न पर जुर्माने से ज्यादा है. अलबत्ता उन्होंने माना कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के कार्यकाल की शुरुआत में एक कार्टूनिस्ट को जेल भेजना दुर्भाग्यपूर्ण था और यह नहीं होना चाहिए था.
जहां तक संसद के बजट सत्र में राहुल की गैर-मौजूदगी पर तंज कसने की बात है, तो यह एक तरह से स्वाभाविक ही था. लेकिन इससे एक बात पूरी तरह साफ हो गईः मोदी के हाथों कांग्रेस धराशायी क्या हुई कि अब इस 129 साल पुरानी पार्टी को बिल्कुल जमीनी स्तर से लोकतांत्रिक बनाने की राहुल की योजनाओं पर हंसना हिंदुस्तानियों के लिए आसान हो गया है. इन दिनों वे संसद से महीने भर लंबी छुट्टी पर चले गए हैं. तो, क्या वे भी पार्टी को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की योजनाओं का खाका तैयार करने में ही मशगूल हैं?
कॉनक्लेव में लगभग सभी ने इस बात की आलोचना की कि मोदी के रंग-रूप में ढल चुकी पार्टी में बोलने और अभिव्यक्त करने की आजादी ऐसे गुम हो गई जैसे कोई अपनी पुरानी बुरी आदतों को भुलाने की कोशिश करता है. पुंज भला यह क्यों मानने वाले थे. यहां तक कि जब कहा गया कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सरीखे वरिष्ठ नेताओं को थोक के भाव मार्गदर्शक मंडल नाम की ऊपरी मंजिल के खाने में डाल देना क्या इसी की पुष्टि करने वाला उदाहरण नहीं है... पुंज ने कहा, यह पुष्टि करने वाला उदाहरण नहीं, बल्कि अनुशासन है, जो पार्टी के हर किसी व्यक्ति पर लागू होता है.
इसके बाद पुंज सीधे राष्ट्रवाद-देशभक्ति-अंधराष्ट्रवाद की पेचीदा बहस में कूद पड़े और उन्होंने दलील दी कि जनवरी में ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को ठीक उस वक्त जब वे ब्रिटिश सांसदों को संबोधित करने के लिए लंदन की उड़ान लेने जा रही थीं, दिल्ली हवाई अड्डे पर हवाई जहाज से उतारकर सही किया गया था और सरकार को ऐसे कदम उठाने ही चाहिए.
पुंज ने कहा, ''अगर आदिवासियों की सच्ची समस्याएं आपके पास हैं, तो हमें बताइए, ब्रिटिश सांसदों के पास जाने और उन्हें समझाने से भला क्या हासिल होगा?''
बेशक उसी दिन बाद में मुख्यमंत्रियों के सत्र में यह देखना दिलचस्प था कि एक भी मुख्यमंत्री, यहां तक कि बीजेपी की हुकुमत वाले राज्यों के मुख्यमंत्री भी, इस हद तक जाने के लिए तैयार नहीं थे. देवेंद्र फड़नवीस, रमन सिंह और मनोहरलाल खट्टर सभी ने यह तो माना कि मोदी उनके एकमात्र सर्वोपरि नेता हैं और इस नाते टीम इंडिया की अगुआई करने के स्वाभाविक दावेदार हैं. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश को समग्र तौर पर दिशानिर्देश देना दिल्ली का अधिकार है, मगर अपने-अपने राज्य का नेता होने के नाते अपनी जरूरत के हिसाब से नीतियां बनाना उनका विशेषाधिकार है और यह अधिकार उनके पास हर हाल में रहना चाहिए.
कोई भी ताज्जुब करेगा कि इसके पीछे कहीं सदियों पुरानी कहावत ''हनूज दिल्ली दूर अस्त'' (दिल्ली अब भी दूर है) तो काम नहीं कर रही है. लगता है, बीजेपी के तमाम मुख्यमंत्री, चाहे वे आरएसएस के कट्टर सदस्य ही क्यों न हों, सत्ता की राजधानी से जितने ज्यादा दूर हैं, उतनी ही ज्यादा आजादी से काम कर पा रहे हैं.
मिसाल के तौर पर, रमन सिंह ने तथ्यों और आंकड़ों की झड़ी लगा दी और उनके जरिए बताया कि छत्तीसगढ़ देश के नक्शे पर एक प्रमुख राज्य बनकर उभरा है और लगातार प्रगति कर रहा है. इशारों-इशारों में वे कह रहे थे कि जरूरी नहीं, गुजरात ही नंबर एक राज्य हो. उन्होंने यह उस सवाल के जवाब में कहा, जो हेडलाइंस टुडे के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने सभी मुख्यमंत्रियों से बार-बार पूछा था. रमन सिंह शायद अपने श्रोताओं को आहिस्ते से याद दिला रहे थे कि नरेंद्र मोदी की तरह वे भी तीन बार अपने राज्य के मुख्यमंत्री चुने जा चुके हैं, और मातृ तथा शिशु मृत्यु दर सहित कई मोर्चों पर छत्तीसगढ़ की उपलब्धियां गुजरात से बिलाशक बेहतर हैं. यानी उनकी उपलब्धियां कम तो कतई नहीं बताई जा सकती हैं.
हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फड़नवीस रमन सिंह की तरह चतुर सुजान नहीं थे. फड़नवीस असल में एक बार शिवाजी की प्रतिमा के फंदे में क्या फंसे कि फिर उससे निकल ही नहीं पाए. खासकर जब महान मराठा योद्धाओं के स्मरण चिह्न न सिर्फ मुंबई बल्कि पूरे राज्य में बिखरे पड़े हैं; और खासकर जब एक टिकाऊ या उदार आर्थिक नीति के अभाव में विदर्भ के किसानों की खुदकुशी का सिलसिला जारी है, ऐसे में यह बात मौजूद लोगों में किसी को भी रत्ती भर रास नहीं आई कि नया महाराष्ट्र शिवाजी की प्रतिमा पर करोड़ों रुपए महज इसलिए खर्च करे कि एक दिन वह अरब महासागर के बीच से उभरती दिखाई देगी. अलबत्ता इस मौके पर किसी ने सरदार पटेल की उस प्रतिमा की याद नहीं दिलाई, जो एक दिन गुजरात में उभरकर आएगी और जिसकी कल्पना खुद मोदी ने की है.
जहां तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की बात है, उन्होंने इस पुरानी कहावत की तरफ इशारा किया कि जरूरी नहीं कि अच्छा गणित अच्छी सिसायत भी होः इसमें कोई शक नहीं कि राज्यों को पहले की तुलना में करों का ज्यादा हिस्सा 32 फीसदी से बढ़कर 42 फीसदी-मिल रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं को खत्म कर देने से राज्यों को घाटा हुआ है, क्योंकि पुराने अच्छे दिनों में इन योजनाओं का मतलब होता था अच्छी-खासी रकम. इतना ही नहीं, इस योजना को या दूसरी योजनाओं को लागू करने से पहले न तो मोदी ने और न ही केंद्र की तरफ से किसी और ने राज्यों से कोई सलाह-मशविरा किया.
रावत के यह बात कहते ही बेचैनी भरी खामोशी छा गई. लगा कि सचमुच कुछ-न-कुछ चूक तो हुई है. अलबत्ता रावत की शक्चिसयत में एक किस्म का इत्मीनान दिखाई देता है, मानो उनके मन में यह बात घर कर गई है कि उनके राज्य उत्तराखंड में बीजेपी के प्रति लगाव और समर्थन बढ़ रहा है.
मनीष सिसोदिया ने खुद को कैसे बरी और रिहा करवाया? लगता है, दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी की लगातार जारी अंतर्कलह की तरफ से आंख मूंदकर पार्टी का लंबे समय से बजता आ रहा भ्रष्टाचार के खात्मे का रिकॉर्ड रट लिया है और उसी जज्बे से हर सवाल के जवाब में यही कहा कि वे भ्रष्टाचार खत्म करेंगे. लेकिन जैसे ही उन्हें केंद्र सरकार पर हमला बोलने की थोड़ी-सी गुंजाइश मिली, उन्होंने उसे छोड़ना कतई गवारा नहीं किया. कॉनक्लेव में केजरीवाल के प्रतिनिधि के नाते उन्होंने कहा, ''दिल्ली में केंद्र का हुक्म चलता है. इसलिए दिल्ली (राज्य सरकार) दिल्ली (केंद्र) की गुलाम है.''
कुल मिलाकर कॉनक्लेव के संवाद अपने समय के तकाजों और जज्बे को ही जाहिर कर रहे थे. और वक्त का तकाजा यह है कि अगर बीजेपी भारत पर हुकुमत करना चाहती है और यहां तक कि भविष्य की चादर पर अपनी विरासत की छाप छोडऩा चाहती है, तो उसे यह बात माननी ही होगी कि भारत विविधताओं का देश है. उसे यह भी मानना होगा कि असहमति एक और या कई सारे नजरियों का ही दूसरा नाम है, जिसे न केवल बर्दाश्त करना होगा, बल्कि जगह भी देनी होगी.
प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी यह बात समझते हैं या नहीं, कोई नहीं जानता. खासकर फरवरी के मध्य में दिल्ली के सायरो-मलाबार चर्च में प्रधानमंत्री के ''विविधता में एकता'' के बारे में गरजदार ऐलान करने के मुश्किल से एक महीने बाद हरियाणा के हिसार में जिस तरह चर्च को गिरा दिया गया, उसके बाद तो इस प्रश्न का मौन और भी घना हो गया है.
अलबत्ता आखिरी पते की बात डेरेक ओ'ब्रायन ने कही. प्रतिरोध के अधिकार का जोरदार बचाव करने के बाद आखिर में उन्होंने रहस्यमय अंदाज में कहा कि अगर बीजेपी ने देश के मिजाज को नहीं समझा, तो बाकी देश बीजेपी के खिलाफ गोलबंद हो जाएगा.
हाल ही में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बीजेपी के सफाए की तरफ इशारा करते हुए ओ'ब्रायन ने कहा, ''67-3, मेरी बात लिख लें. अगला नंबर बिहार का है.''

