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इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015: अंतरराष्ट्रीय संतुलन साधने का अफगानिस्तान का नाजुक खेल

अफगानिस्तान सरकार तालिबान से संवाद कायम करने के लिए पाकिस्तान और उसकी सेना की ओर कदम बढ़ा रही है, पर उसे भारत की नाराजगी का खतरा भी है.

अपडेटेड 23 मार्च , 2015
न्यू अफगानिस्तानः एंडलेस वार ऑर फ्रेश स्टार्ट' विषय पर इंडिया टुडे कॉनक्लेव में बोलने के लिए रवाना होने से कुछ घंटे पहले अब्दुल्ला अब्दुल्ला को अपने देश के हिंसक इतिहास का सामना करना पड़ा. अफगानिस्तान के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) काबुल में तालिबान के खिलाफ जंग के प्रमुख नेता अब्दुल अली मजारी की हत्या के 20 साल होने पर आयोजित एक प्रार्थना सभा में शामिल हुए.  हजारा समुदाय के मजारी की 1995 में गजनी में तालिबान ने हत्या कर दी थी और उनके शरीर को हेलिकॉप्टर से फेंक दिया गया था. 
उसके 20 साल बाद अब्दुल्ला को ऐसे भविष्य का सामना करना है जहां तालिबान बड़े खतरे के तौर पर दिखाई पड़ रहा है. राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ सत्ता बंटवारे के समझौते के नतीजतन बना उनका असमान्य पद भी अफगानिस्तान में ताजी शुरुआत का संकेत है,

क्योंकि यह सियासी और सुरक्षा के बेहद करीबी मुकाबले के दौर से गुजरने के बाद हासिल हुआ है. पिछले सितंबर में इस सियासी बदलाव का सफलतापूर्वक रास्ता निकाला गया. चुनाव आयोग ने बहुसंख्यक पख्तून समुदाय के नेता को अप्रैल में हुए राष्ट्रपति चुनाव का विजेता घोषित किया. अल्पसंख्यक और देश के दूसरे बड़े ताजिक समुदाय के अब्दुल्ला सीईओ बनाए गए. 
अब, अफगानिस्तान सुरक्षा संबंधी बदलाव के लिए तैयार है. अगले साल 10,000 नाटो सैनिकों के हटने के बाद उसे अपने बूते तालिबान पर काबू पाना होगा. 2011 में वहां विदेशी सैनिकों की संख्या 1,00,000 तक पहुंच गई थी, मगर वह तालिबान को शिकस्त देने में नाकाम रही. लेकिन ञ्चया अफगानिस्तान नेशनल आर्मी कामयाब हो पाएगी? इस मसले ने अफगानिस्तान की नई सरकार को अपनी नीति में सुधार करने को मजबूर कर दिया है. कम-से-कम सार्वजनिक तौर पर कि वह भारत से दूरी बनाए. भारत अफगानिस्तान का पांचवां सबसे बड़ा कर्जदाता है. उसने 2001 से ही अफगानिस्तान के पुनर्निमाण में करीब 2 अरब डॉलर खर्च किए हैं. दोनों देशों ने 2011 में रणनीतिक गठबंधन पर हस्ताक्षर किए थे और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति लगातर नई दिल्ली आते रहे थे. लेकिन छह माह में ही हालात पूरी तरह उलटे नजर आ रहे हैं. छह माह पहले कार्यभार संभालने के बाद से गनी का नई दिल्ली दौरा अभी बाकी है जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने वे इस्लामाबाद और सेना प्रमुख राहील शरीफ से मिलने रावलपिंडी जा चुके हैं. उन्होंने सैन्य साजोसामान और ट्रेनिंग के भारत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और अफगानी अफसरों की टुकड़ी को पाकिस्तान की सैनिक अकादमियों में ट्रेनिंग के लिए भेज रहे हैं. इसका मकसद पाकिस्तानी सेना के करीब जाकर क्वेटा से संचालित अफगानी तालिबान के साथ बातचीत के लिए उसे मध्यस्थ बनाना है. गनी ने इस कदम से उन अफगानी नेताओं को नाराज कर दिया है जो तालिबान के पीछे पाकिस्तान का हाथ मानते हैं. अफगानिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री रंगीन दादफर स्पंता ने हाल ही में कहा, ''और कुछ नहीं, बल्कि उन्होंने अफगानिस्तान को और ज्यादा अपमानित कर दिया है.'' करजई ने चेतावनी दी है कि गनी देश को ''पाकिस्तान का ताबेदार'' बना रहे हैं. 

हालांकि अब्दुल्ला ने भारत के डर को कम करने की कोशिश की और उसके साथ अपने देश के मजबूत संबंधों पर जोर दिया. उन्होंने कहा, ''पहले हमें पाकिस्तान के साथ परेशानी थी. अफगानिस्तान के लिए जरूरी है कि वह आतंकवाद और कट्टरपंथ के आम डर से निबटने के लिए रिश्तों में सुधार की कोशिश करे.'' अब्दुल्ला ने कहा कि पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी राष्ट्र हित को देखते हुए है. उन्होंने कहा, ''कुछ नहीं हुआ है, अफगानिस्तान के राष्ट्रीय हित से अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है.'' उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती की कोशिश उसका परस्पर आदान-प्रदान है. उन्होंने कहा, ''इसका यह मतलब नहीं कि पड़ोसी देश के साथ रिश्ते के लिए हम भारत के साथ अपनी दोस्ती कुर्बान कर देंगे.''
काबुल में जनरल शरीफ के बयान ''अफगानिस्तान का दुश्मन पाकिस्तान का दुश्मन है'', का हवाला देते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि उनकी सरकार पाकिस्तान को लेकर आशावादी है. ''अफगानी तालिबान के साथ बातचीत कब होगी, कैसे होगी और किन परिस्थितियों में होगी, सब कुछ देखा जाना चाहिए.'' पूरी दुनिया भी इसे देख रही होगी.
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