जमीन अधिग्रहण अध्यादेश पर चौतरफा घिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिपहसालार यह मानकर चल रहे थे कि लोकसभा में पेश विधेयक में नौ संशोधन करके वे विरोध की धार को कुंद कर देंगे और हो सकता है कि एक सूरत ऐसी बने कि विधेयक राज्यसभा से भी पारित हो जाए. लेकिन इन नौ बदलावों से सरकार को सिर्फ इतना हासिल हुआ कि विधेयक लोकसभा में विपक्ष के वाकआउट के बीच पारित हो गया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों ने सरे बाजार सरकार की निंदा के सुर मंद कर दिए. वहीं, विपक्ष पहले तो सिर्फ मुखर था, अब एकजुट और आक्रामक हो गया है. हद तो यह हो गई कि अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अज्ञातवास पर अचकचा गई कांग्रेस पार्टी सोनिया गांधी के नेतृत्व में अचानक पूरे विपक्ष की अगुआ जैसी दिखाई देने लगी.
सोनिया गांधी के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी, जनता दल (यू), वाम दल, आम आदमी पार्टी सहित 14 पार्टियों के सांसदों ने 17 मार्च को जब संसद से राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला तो ऐसा संदेश गया, जैसे मोदी सरकार के महज 10 महीने के कार्यकाल में ही देश की राजनैतिक फिजा पलट गई हो. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलने के बाद सोनिया ने कहा, "हम सरकार के किसान विरोधी अध्यादेश को किसी सूरत में पारित नहीं होने देंगे." देश के सियासी नक्शे पर सबसे ऊंची हैसियत रखने वाली रायसीना पहाड़ी पर सोनिया के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जेडी (यू) अध्यक्ष शरद यादव, सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, सपा महासचिव रामगोपाल यादव और एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल सहित 100 से अधिक सांसद खड़े थे. इस पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तल्खी से कहा, "इस मार्च का एकमात्र उद्देश्य विकास को रोकना है."
उधर, कभी यूपीए सरकार को उखाड़ फेंकने का माहौल बनाने वाले समाजसेवी अण्णा हजारे कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखकर, उनसे किसान विरोधी कानून को खत्म कराने के लिए सहयोग मांग रहे थे. सोनिया ने भी पूरे जोशो-खरोश से अण्णा हजारे को समर्थन देने का पत्र 17 मार्च को लिख भेजा. सियासत की उलटबांसी तब मुकाम पर पहुंच गई जब भूतल परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, "देश का विकास रोकना चाहने वाले एनजीओ और दूसरे संगठन अण्णा हजारे को अपना मुखौटा बना रहे हैं." अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब अण्णा बीजेपी के लिए भ्रष्टाचार मिटाने वाले मसीहा थे.
बहरहाल, मोदी सरकार ने विधेयक में जो नौ बदलाव किए हैं, उन पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं, "पहला और बुनियादी सवाल यह है कि क्या देश का अन्नदाता इस लायक भी नहीं समझा जाएगा कि उसकी जमीन लेने से पहले एक बार उसकी रजामंदी ले ली जाए. सरकार के नौ संशोधनों में इसका जवाब कहां है." वैसे सरकार ने एक अहम बदलाव यह जरूर किया है कि अधिग्रहण में नियमों का उल्लंघन करने वाले सरकारी अधिकारी पर अब मुकदमा चलाना आसान होगा. इससे किसानों को विरोध का कम-से-कम एक कानूनी रास्ता तो मिल ही गया है. जमीन अधिग्रहण से सीधे प्रभावित होने वाले परिवार के साथ ही, जमीन पर मजदूरी करने वाले भूमिहीन मजदूर के परिवार के एक व्यक्ति को भी नौकरी देने का प्रावधान कर सरकार ने गरीब तबके की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की है. सपा के राज्यसभा सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम इस पर सवाल करते हैं, "एक खेत में बहुत से परिवारों के मजदूर काम करते हैं, ऐसे में सरकार किस परिवार को नौकरी देगी. यह वादा हवाई नजर आता है." सरकार की तरफ से किए गए एक अन्य बदलाव में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि औद्योगिक कॉरिडोर में सड़क या रेल पटरी के दोनों तरफ अधिकतम एक-एक किलोमीटर जमीन अधिग्रहीत की जाएगी. इस हिसाब से एक किमी. औद्योगिक कॉरिडोर के निर्माण में सड़क में इस्तेमाल होने वाली जमीन के अलावा अधिकतम 500 एकड़ तक और जमीन अधिग्रहीत की जा सकेगी. देश में हजारों किमी की औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं पर चल रहे काम को देखते हुए, यह प्रावधान किसानों के साथ बड़े टकराव की नींव रख सकता है. क्योंकि आम तौर पर देखा गया है कि किसान सड़क के लिए तो जमीन दे देते हैं लेकिन सड़क के दोनों तरफ की परियोजनाओं के लिए जमीन देना उन्हें नागवार गुजरता है. दिल्ली से आगरा के बीच बने यमुना एक्सप्रेस-वे में भी किसान सड़क नहीं बल्कि इससे जुड़ी 5 टाउनशिप के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे. तब कांग्रेस और बीजेपी दोनों के शीर्ष नेतृत्व ने किसान आंदोलन को पूरा समर्थन दिया था.
और इस बार भी कांग्रेस समझ रही है कि मोदी सरकार के विकास के लंबे-चौड़े फलसफे किसानों की समझ से परे हैं, ऐसे में सीधे धरती माता का भावनात्मक मुद्दा उठाया जाए. इसीलिए अपने राजनैतिक स्टाइल में एकदम से बदलाव करते हुए सोनिया गांधी ने 20 अक्तूबर को अलवर में ओलों की मार से पीड़ित किसानों के पास जाने की घोषणा कर दी. भारतीय किसान यूनियन के अलग-अलग गुट देश के अलग-अलग इलाकों के किसानों के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने चले आ रहे हैं. इस मामले में मोदी सरकार अब तक यही कर पाई है कि अपने सांसदों को तीन पन्ने का एक पर्चा पकड़ा दिया, जिसमें भूमि अधिग्रहण बिल के फायदे गिनाए गए हैं. देखना यही है कि बजट सत्र के बीच होने वाली एक महीने की छुट्टी में माननीय सांसद गण क्या वाकई जनता के बीच जाकर इस पर्चे को बांच पाएंगे?

