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इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015: अब हर चीज पर हो सकती है बात

सामूहिक कॉमेडी ने भारत की हदों को आगे बढ़ाया है और ऑल इंडिया बकचोद (एआईबी) ने दिल खोलकर, जो मन में आया वह कहा.

इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015 में एआईबी टीम
इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015 में एआईबी टीम
अपडेटेड 23 मार्च , 2015
एआइबी (ऑल इंडिया बकचोद) ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव के दूसरे दिन मंच पर आकर ''फ्रीडम ऑफ स्पीच ऐंड राइट टू बी रोस्टेड'' के बारे में बात की. सीधे-सादे, शॉर्ट और सैंडल पहने गुरसिमरन खंबा, तन्मय भट्ट, रोहन जोशी और आशीष शाक्य ने गुस्से वाले शद्ब्रदों के साउंडट्रैक के साथ प्रवेश किया, जिससे शासन के सेंसर की तलवार के साथ उनकी हालिया मुठभेड़ की यादें ताजा हो गईं.

संचालक शिव अरूर के साथ उनकी मीठी नोक-झोंक हुई और श्रोताओं के साथ हल्की-फुल्की कहा-सुनी चलती रही. मंच के पीछे विश्वनाथन आनंद के साथ उनकी अपनी सेल्फी का भी मजाक बना कि वे कैसे उनकी नजर में बेमतलब मनोरंजन के प्रतीक, गोविंदा की फिल्म का रूप कैसे हो सकते हैं और उन्हें यह डर कैसे सता रहा था कि वे उनके दिमाग में कीड़ों की तरह कुलबुला सकते हैं. भट्ट ने कहा श्श्मानो वे खेलते हुए सोच रहे हों कि मोहरा यहां चलें या वहां चलें और अचानक उन्हें मेरी आवाज सुनाई दे श्आह, आह्य, मतलब मैंने उनका खेल बिगाड़ दिया.्य्य राजदीप सरदेसाई दर्शकों में बैठे दिखाई दिए तो तुरंत उनकी किताब के प्रचार का उपहास उड़ाया गया. कुल मिलाकर एआइबी की चैकड़ी को देख-सुनकर लगा कि ये समझदार और खुद्दार नौजवान हैं, कोई धमाकेदार शॉक आर्टिस्ट नहीं. उन्होंने दर्शकों को गुदगुदाया, गुस्सा भी दिलाया, कॉमेडी की परंपराओं को एकजुट करने और हास्य-व्यंग्य का स्कूल खोलने की बात भी कही.

बहरहाल, बहुत फूंक-फूंककर कदम रखना जरूरी है. बॉलीवुड के युवा सितारों के साथ एआइबी नॉकआउट रोस्ट के बाद वे पहली बार सार्वजनिक मंच पर थे. बॉलीवुड के सितारों की महफिल में वे ऐसे दर्शकों के सामने थे जिनमें से हरेक समझता था कि यह अपमानजनक है और हंसता जा रहा था. बाकी दुनिया के चेहरे पर हंसी नदारद थी. जल्द ही एआइबी पर कई एफआइआर ठोक दी गईं और बेतहाशा विरोध भी हुआ. मध्यवर्गीय परिवारों में पुलिस के डर के साथ बड़े हुए इन नौजवानों के लिए अचानक इस तरह विवादों के भंवर में फंस जाना डरावना अनुभव था. उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था और सब कुछ अवास्तविक लग रहा था. इसके फायदे भी थे. खंबा ने बताया, श्श्किसी ने हमें पालिका बाजार में 100 रु. में बिकती रोस्ट वीडियो की डीवीडी की तस्वीर भेजी.'' जोशी ने राहत की सांस लेते हुए कहा कि चलो अब उन्होंने ऐसा काम कर लिया है, जो किसी को पाइरेसी करने लायक लगा. यानी अब आराम से रिटायर हुआ जा सकता है. अखबारों में उनके जिक्र से परिजन भी रोमांचित थे, भले क्राइम वाले पन्ने पर जिक्र हुआ हो. अब उनकी टीशर्ट पर लिखा रहता है, ''देश का कलंक.'' उन्होंने यह भी बताया कि रोस्ट ने उन बातों पर संवाद शुरू किया जिनका जिक्रभी वर्जित था. खंबा बता रहे थे कि कैसे उनके 87 वर्षीय दादा ने करन जौहर के बारे में चुटकुलों को सुनकर पूरे परिवार को जमा किया और समलैंगिकता के बारे में बात की, जिस पर बहुत पहले चर्चा होनी चाहिए थी. इस पर भट्ट ने कहा, ''देखा शिव, ये रोस्ट एंटरटेनमेंट नहीं बल्कि इन्फोटेनमेंट था.''

उन चारों में जबरदस्त तालमेल था, वे एक-दूसरे की सोच से खेल रहे थे. इस संवाद का दायरा बहुत व्यापक रहा. उन्होंने बताया कि कॉमेडी के लिए कमजोरों को निशाना बनाने की बजाए ताकतवर पर प्रहार करना क्यों जरूरी है. कुल-मिलाकर सवाल एआइबी या उसकी कॉमेडी की क्वालिटी का नहीं है. भट्ट ने कहा, ''पिछले कुछ हफ्तों में बोलने की आजादी पर बहस हुई है और लोग इस पर बात कर रहे हैं. यह संवाद और बातचीत अपने आप में बहुत अच्छा संकेत है.'' इस पर कौन बहस कर सकता है?
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