scorecardresearch

दक्षिण की ओर पहला कदम

जेटली ने शायद आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद पेश किया देश का पहला दक्षिणपंथी बजट. पिछली जुलाई में अपने पहले अंतरिम बजट में जेटली ने सबको खुश करने की कोशिश की थी लेकिन अपने पहले पूर्ण बजट में उन्होंने थोड़े समय के लिए लोगों को खुश करने के लालच से बचने की कोशिश की है.

अपडेटेड 9 मार्च , 2015

सरकारी कामकाज और अर्थव्यवस्था के तौर-तरीके बदलने के अपने इरादों के लिए चर्चित नरेंद्र मोदी की नजर में सरकार की आदर्श भूमिका, बिलाशक, अपने पूर्ववर्तियों से एकदम अलग है. उनका मानना है कि सरकार का आकार-प्रकार की उतनी अहमियत नहीं. वे कहते हैं कि उसका दायरा, जितना संभव हो, संक्षिप्त होना चाहिए.
प्रधानमंत्री दो जुमलों का तभी से अक्सर इस्तेमाल करते हैं, जबसे उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करनी शुरू की. ये जुमले हैं ''न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन'' और ''कारोबार करना सरकार का काम नहीं है.'' उनके आलोचक मानते हैं कि ये जुमले अर्थव्यवस्था और प्रशासन के मामले में बहुत हद तक उनकी सोच के प्रतिबिंब हैं. जिस देश में अब तक कभी भी राजनीति और राजनैतिक व्यवस्था में स्पष्ट रूप से दक्षिणपंथी बाजार समर्थक रुझान नहीं दिखा है, वहां ये दो जुमले स्पष्ट रूप से मोदी युग के आगमन के प्रतीक हैं. यह युग आजाद भारत में पहली दफा दक्षिणपंथ की ओर झुकी किसी सरकार का है.
केंद्रीय मंत्रिमंडल में मोदी के दाएं हाथ कहलाने वाले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 28 फरवरी को इस मोदी आर्थिकी के लिए लाल कालीन बिछा दिया. हालांकि अभी पूरी तरह से नहीं बिछाया है. बजट में सरकार का दायरा नहीं फैलाया लेकिन कुछ मामलों में सरकारी भूमिकाएं घटाने से भी रुक गए. अपने 11,500 से अधिक शब्दों के बजट भाषण में उन्होंने जो कुछ कहा, उसे मोदी सरकार का उपयुक्त, नपा-तुला दक्षिणपंथ की ओर झुका बजट कहा जा सकता है. यह बजट पूरी तरह बाजार समर्थक भले न हो, फिर भी बड़े और छोटे, दोनों तरह के कारोबारियों और देसी-विदेशी कंपनियों को ललचाने के लिए काफी है, जो 'मेक इन इंडिया' में साझीदार होने को तैयार हैं.
जेटली ने पिछली जुलाई में अपने पहले अंतरिम बजट में सबको खुश करने की कोशिश की थी, लेकिन अपने पहले पूर्ण बजट में उन्होंने थोड़े समय के लिए लोगों को खुश करने के लालच से बचने की कोशिश की है. इसमें न तो सामाजिक क्षेत्र के लोकलुभावन उपायों से आम जनता को और न ही बड़े-बड़े सुधारों की घोषणा से कॉर्पोरेट जगत को लुभाने की कोई कोशिश की गई है. निश्चय ही जेटली ने कांग्रेस के नेतृत्व में पिछली यूपीए सरकार के साथ लोकप्रियता की जंग के अखाड़े में उतरने से इनकार किया है.
यूपीए ने जिस तरह से 2006 के बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत पहले 200 जिलों के लिए 11,000 करोड़ रु. का आवंटन किया था और 2009 में बढ़ाकर 40,000 करोड़ रु. कर दिया था, उस तरह के भारी-भरकम आवंटन के अनुपस्थिति ने राजकोषीय नियंत्रण के समर्थकों और निवेशकों को अवश्य राहत दी होगी. फिर भी जेटली ने फिलहाल कारोबार और उद्योग जगत की धमाकेदार सुधार घोषणाओं की अपेक्षाओं पर थोड़ा-बहुत पानी फेरा है. उन्होंने इसकी बजाए कारोबार के लिए स्थिर और नियम आधारित माहौल बनाने की खातिर अधिक नियामक और विधायी प्रस्ताव लाने का वादा किया है. इन वादों में दिवालिएपन के लिए व्यापक संहिता बनाना, ऐसे कानून का मसौदा तैयार करना जिससे कई तरह की पूर्व अनुमतियों की जगह पहले से नियामक तंत्र स्थापित कर दिया जाए, सार्वजनिक करारों में विवादों के निबटान के लिए सार्वजनिक करार (विवाद निपटान) विधेयक लाना, वाणिज्यिक विवादों के जल्द समाधान के लिए एक और विधेयक लाना, वायदा बाजार आयोग का भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) में विलय करना और कम-से-कम 500 करोड़ रु. की परिसंपत्ति वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को 'वित्तीय संस्थाओं' की श्रेणी में लाना शामिल है.
यह बेशक कारोबार के लिए अनुकूल माहौल बनाने की कोशिश है, जो वर्षों से मनमाने और विवेकाधीन व्यवस्था के हाथों प्रताडि़त होता रहा है. जेटली ने कर प्रस्तावों में थोड़ा फेरबदल कर अपनी गंभीरता का संकेत दे दिया है. इनमें सर्विस टैक्स बढ़ाना, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की ओर बढ़ना और प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) से छेड़छाड़ न करना शामिल है.
केंद्र के राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी दस प्रतिशत बढ़ाने के चौदहवें वित्त आयोग के फैसले का सभी पार्टियों ने स्वागत किया था. जेटली ने इस मामले में कोई हिचक नहीं दिखाई, उनका यह कदम भले ही कंपनियों के हित में दिखता हो पर उसका मकसद दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से टक्कर लेना है, जो अपनी स्पर्धा क्षमता के दम पर विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा ले जाने में सफल रही हैं. जेटली ने इस दिशा में दोहरी चाल चली है: एक तो 2019 तक कंपनी कर को मौजूदा 30 प्रतिशत से घटाकर धीरे-धीरे 25 प्रतिशत करने का वायदा कर दिया और पूंजी आकर्षित करने के लिए कर ढांचे में भी फेरबदल किया. जेटली ने ऐलान किया, ''मौजूदा कर ढांचा फंड प्रबंधकों को विदेशों से कामकाज चलाने के लिए प्रोत्साहित करता है. विदेशी ठिकानों से काम करने वाले ऐसे फंड प्रबंधकों को भारत आने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते मैं स्थायी प्रतिष्ठान (पीई) नियमों में इस आशय के संशोधन का प्रस्ताव करता हूं की फंड प्रबंधक की सिर्फ भारत में उपस्थिति का अर्थ विदेशी फंडों का पीई नहीं माना जाएगा, जिसके कारण उन पर कर का बोझ पड़ता था.''
इससे पता चलता है कि उनका अंतिम लक्ष्य क्या है-सिंगापुर और मलेशिया से काम करने वाले फंड प्रबंधकों को भारत में ठिकाना बनाने के लिए प्रोत्साहित करना.
इसके अलावा उन्होंने श्रेणी-क और श्रेणी-ख, दोनों वैकल्पिक निवेश निधियों को 'टैक्स पास थ्रू' की अनुमति दे दी है ताकि कर की देनदारी इन निधियों में निवेश करने वालों पर हो, प्रतिनिधियों पर नहीं. बजट में कहा गया है कि इसका उद्देश्य देश में नए उद्यमों में निवेश के लिए 'अधिक संसाधन जुटाने की इन निधियों की क्षमता' बढ़ाना है.
पहले की वामपंथ की ओर झुकी अर्थनीति से एक कदम और दूर हटाते हुए जेटली ने बाजार संचालित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की तरफ भी कुछ छोटे-छोटे कदमों का संकेत दिया है, जिससे खाद्य गारंटी या रोजगार गारंटी योजना की तरह सारी जिम्मेदारी सरकार पर न आए बल्कि लाभार्थी भी उसके कुछ हिस्से का वहन करें. चाहे 12 रु. वार्षिक प्रीमियम पर 2 लाख रु. की दुर्घटना बीमा योजना हो या 330 रु. वार्षिक भुगतान पर 2 लाख रु. की प्राकृतिक मृत्यु बीमा योजना या फिर निर्धारित अंशदान वाली पेंशन योजना जिसमें प्रति वर्ष प्रीमियम की आधी राशि, अधिकतम एक हजार रु. तक सरकार देगी. इन योजनाओं में कोई भी हिस्सा ले सकता है, लेकिन अधिकतर इन्हें समाज के सबसे निचले सिरे पर बैठे लोग ही अपनाएंगे.
नियमित वेतन पाने वाले संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को बजट ने अपने सामाजिक सुरक्षा साधन और उसके आकार को चुनने का विकल्प दिया है. अब कर्मचारी ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) या एनपीएस (नई पेंशन योजना) में से कोई विकल्प चुन सकते हैं. मासिक वेतन के निर्धारित स्तर से कम आय वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफ में अंशदान वैकल्पिक कर दिया गया है, लेकिन नियोक्ता के अंशदान पर इसका न कोई असर पड़ेगा, न उसमें कोई कमी आएगी.
भारत जैसे विशाल, विविध, घनी जनसंख्या और अक्सर बाजार से कम संचालित देश में सिर्फ बाजार को बढ़ावा देने से काम नहीं चल सकता. आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और उसके राष्ट्रीय सह-संयोजक एस. गुरुमूर्ति के दबाव में बजट में कुटीर इकाई विकास पुनर्वित्त एजेंसी (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट रिफाइनेंस एजेंसी, मुद्रा) बैंक की स्थापना का प्रस्ताव है. 20,000 करोड़ की मूल निधि और 3,000 करोड़ रु. की ऋण गारंटी निधि से स्थापित यह बैंक छोटे व्यापारियों और उद्यमियों की मदद करेगा. जेटली ने आम भारतीयों में सोने के प्रति मोह को देखते हुए स्वर्ण मुद्राकरण योजना शुरू करने का भी ऐलान किया. इसके अलावा 'काले धन पर अंकुश लगाने के लिए नया कानून' बनाने और विदेशी बैंकों में अवैध ढंग से जमा काला धन निकालने की कोशिश में बेनामी लेनदेन निषेध विधेयक लाने का भी प्रस्ताव है.
बजट के बाद गुरुमूर्ति ने कहा, ''बजट में हालात बदलने वाले तीन बिंदु हैं. 5.8 लाख पूंजी से वंचित कुटीर और लघु कारोबारों के लिए मुद्रा बैंक, काले धन को रोकने का कानून और सोने का आंशिक मुद्राकरण.'' मुक्तबाजार के समर्थक भले ही भगवा संगठनों से संबद्ध स्वदेशी अर्थनीति को 'गोरक्षा के साथ साम्यवाद' कहकर खिल्ली उड़ाएं पर जेटली ने पक्का कर दिया है कि उनके बजट को 'गोरक्षा के साथ पूंजीवाद' कहा जाए.

Advertisement
Advertisement