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केजरीवाल भी चले औरों की राह

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के पर कतर केजरीवाल ने दिखा दिया है कि पार्टी में विरोधी सुरों के लिए जगह नहीं है.केजरीवाल का यह रूप राजनीति के पुराने यौद्धाओं से खूब मेल खा रहा है. किसी जमाने में इंदिरा गांधी ने भी पुराने दिग्गजों को किनारे लगाकर पार्टी पर कब्जा किया था.

अपडेटेड 9 मार्च , 2015

आम आदमी पार्टी से इस बार एक साथ दो विकेट गिरे. पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी की सर्वोच्च संस्था यानी राजनैतिक मामलों की कमेटी (पीएसी) से 4 मार्च को निकाल दिया गया. दोनों पर दो दिन पहले से ही आरोप लग रहे थे कि वे अरविंद केजरीवाल को संयोजक पद से हटाने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों ही नेता इस तरह के आरोपों को नकारते रहे. एक वक्त ऐसा भी आया जब लगा कि मामला सुलट गया है, लेकिन अंत में तय स्क्रिप्ट पर ही काम हुआ. और सबसे मजे की बात यह कि इस पूरी प्रक्रिया पर दुख जताने के बावजूद केजरीवाल बैठक में नहीं पहुंचे. क्या वे इन दोनों के पार्टी से निकाले जाने को लेकर उतने ही आश्वस्त थे, जितने वे दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के बारे में हुआ करते थे. अगर वाकई ऐसा है तो फिर आला अफसर से मामूली समाज सेवक की भूमिका में आया भारतीय मध्यम वर्ग का हीरो अब राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी बन गया है.
तो क्या वे शुरू से ही ऐसा कर रहे हैं? मार्च 2011 में इंडिया एगेन्स्ट करप्शन के बैनर तले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की सुगबुगाहट हुई थी. उसके बाद अप्रैल में अण्णा हजारे ने जंतर-मंतर पर आमरण अनशन किया तो उस समय टीम अण्णा में अरविंद के अलावा किरण बेदी, संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, शाजिया इल्मी जैसे बहुत से नामचीन चेहरे थे. इसके अलावा बाहर से समर्थन करने वालों में श्री श्री रविशंकर और बाबा रामदेव जैसे लोग भी थे. लेकिन महज दो साल में इनमें से ज्यादातर लोग केजरीवाल पर तानाशाही का आरोप लगाकर आंदोलन से हटते चले गए. लेकिन हर बार जनता में यही संदेश गया कि साथ छोड़ने वाले ज्यादातर नेता या तो महत्वाकांक्षी थे या फिर वे संघर्ष का माद्दा खो चुके थे.
लेकिन योगेंद्र यादव ऐसे शख्स हैं जो कोई दो दशक से राजनैतिक विश्लेषक के तौर पर टीवी पर दिखते रहे हैं. उन्हें सार्वजनिक जीवन में किसी ने कभी ऊंचा बोलते नहीं सुना. वे न सिर्फ पीएसी के सदस्य थे बल्कि पार्टी के मुख्य प्रवक्ता भी थे. उधर, प्रशांत भूषण उन लोगों में से हैं जो यादव से भी पहले से आंदोलन से जुड़े हैं. संसद की स्थायी समिति के सामने जब टीम अण्णा को लोकपाल बिल पर अपनी राय रखनी थी तो उस टीम में भूषण पिता-पुत्र को ही उनकी कानूनी सलाहियत के कारण रखा गया था. 26 नवंबर 2012 को जब आम आदमी पार्टी की स्थापना हुई तो 1 करोड़ रु. का पहला चंदा शांति भूषण ने ही दिया था. इसलिए अगर प्रशांत को हटाया गया तो इनके साथ केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं तौलने का भी समय आ गया है.
दरअसल, यादव खांटी समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हैं और समाजवादी जन परिषद में उनका लंबा राजनैतिक तजुर्बा रहा है. वे पार्टी में संवाद की प्रक्रिया बनाए रखने और स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचार रखने के हामी रहे. पार्टी ने उन्हें हरियाणा का चुनाव प्रभारी भी बनाया हुआ था. लेकिन लोकसभा चुनाव में हरियाणा में पार्टी कुछ नहीं कर सकी. इसके बाद अरविंद ने हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव न लड़ने का फैसला किया. यादव इससे असहमत थे. लेकिन उत्साही युवा कार्यकर्ताओं की फौज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छीजते ग्लैमर के बीच आप दिल्ली फतह की तैयारी में थी. पार्टी बहुत तेजी से रिएक्ट करने और रोज नई व्यावहारिक रणनीति बनाने में व्यस्त थी. इस गैर सैद्धांतिक वातावरण में समाजवादी यादव की भूमिका सीमित हो गई. पीएसी का सदस्य होने के बावजूद लोकसभा चुनाव की ही तरह विधानसभा चुनाव में भी यादव और भूषण की कोई सुनवाई नहीं हुई. चुनाव के बीच में ही छन-छनकर ये बातें सामने आने लगी थीं कि आप अब व्यावहारिक राजनीति के लिए कमर कस चुकी है और विचारधारा वाला समाजवादी कुनबा हाशिये पर जा रहा है. आप की बंपर जीत के जश्न में ये बातें बिसर गईं. लेकिन केजरीवाल के शपथ ग्रहण के एक पखवाड़े के भीतर ही आरोप लग गए कि यादव और भूषण मिलकर षड्यंत्र रच रहे हैं. 2 मार्च को पहली बार एक अंग्रेजी अखबार ने इन अटकलों को खबर का मूर्त रूप दे दिया. बताया जाता है कि यह खबर पत्रकार से आप के नेता बने एक व्यक्तिने मीडिया को दी. फिर क्या था, पार्टी की तरफ से युवा नेता आशीष खेतान और संजय सिंह ने यादव और भूषण के खिलाफ सख्त बयानबाजी की. अगले दिन जवाब में शांति भूषण ने भी केजरीवाल पर पदलोलुपता का आरोप लगा दिया.
लेकिन 3 मार्च की शाम तक दोनों पक्षों के सुर मंद पड़ने लगे. खेतान ने शांतिभूषण से माफी मांग ली और भूषण ने केजरीवाल का पार्टी संयोजक बना रहना जनता के हित में बता दिया. अगले दिन कार्यकारिणी की बैठक से पहले यादव ने भी कहा कि शाम तक अच्छी खबर आएगी. सूत्रों की मानें तो घटनाक्रम में यह तेज बदलाव केजरीवाल की रणनीति का हिस्सा था. बताते हैं कि केजरीवाल ने शांति भूषण को फोन कर उन्हें मनाया और बाद में यादव से भी बात की. इससे दोनों नेता आश्वस्त हो गए थे. मामला ठंडा करने के बाद केजरीवाल ने अपना ट्रंप कार्ड चलते हुए पार्टी के संयोजक पद से इस्तीफा भी दे दिया और खुद को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से अलग कर लिया. दरअसल केजरीवाल दिखा रहे थे कि जिस कार्यकारिणी को यादव और भूषण के भविष्य का फैसला करना है, वही उनके इस्तीफे का भी फैसला करेगी. लेकिन कमेटी ने तय स्क्रिप्ट के मुताबिक यादव और भूषण को चलता कर दिया और केजरीवाल का इस्तीफा नामंजूर कर दिया.
सबको पता है कि इन दोनों नेताओं के पास वैसा जनाधार नहीं है, जैसा केजरीवाल के साथ खड़ा है. केजरीवाल का यह रूप राजनीति के पुराने योद्धाओं से खूब मेल खा रहा है. किसी जमाने में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के पुराने दिग्गजों को किनारे लगाकर पार्टी पर कब्जा किया था. नाटकीय घटनाक्रम में सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. और हाल ही में नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों को मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया. इनमें और केजरीवाल के मामले में फर्क यही है कि बाकी पार्टियां बहुत पुरानी हैं और डंप करने के बावजूद जमीनी नेताओं की खेप हमेशा पार्टियों के पास बची रहती है. ऐसे में अरविंद को सोचना पड़ेगा कि महत्वाकांक्षाएं पार्टी को न ले डूबें.

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