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जहां से फिर गूंजेंगी दिग्गजों की दलीलें

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में दो दिन और दो रात उन विचारों और नवाचारों पर खुलकर बहस होगी, जिनकी बदौलत बदल रही है दुनिया.

अपडेटेड 10 मार्च , 2015

चर्चित 9/11 के हमलों के साए में शुरू हुआ 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव' अब किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गया है. यही वह मंच है, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार बतौर मुख्यमंत्री अपने सुशासन के नजरिए का खाका पेश किया था. यहीं इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने मंगल ग्रह मिशन के विश्वव्यापी असर का संकेत दिया था. अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पहली दफा दावेदारी करने के दो वर्ष पहले हिलेरी क्लिंटन ने यह बताने के लिए इसी मंच को चुना था कि हिंदुस्तान की क्या अहमियत है.
एक युगांतरकारी वर्ष के बाद कॉन्क्लेव अपने 13वें साल में फिर आयोजित हो रहा. इस बीच नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश के साथ दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए, जो किसी रोमांचक फिल्मी कथानक की तरह लगता है. आइएसआइएस ने अपनी बर्बर हिंसा से आतंक की हदें पार कर दी हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था अपनी अनिश्चितता से मुल्कों के होश फाख्ता कर रही है और अफगानिस्तान से नाटो फौज की वापसी लोकतंत्र में एक अप्रत्याशित प्रयोग का मंच मुहैया करा रही है.
वाकई दुनिया की शक्ल बदल रही है और पिछले 40 साल से देश और दुनिया की धड़कनों पर उंगली रखने वाली पत्रिका की तरह ही यह कॉन्क्लेव भी घरेलू और बाहरी मोर्चा पर जारी गतिविधियों का जायजा लेगा. विचारों और दलीलों के इस उत्सव में हर क्षेत्र की बेहतरीन और विलक्षण शख्सियतें अपनी बात रखेंगी. चाहे वह 'मेक इन इंडिया' अभियान हो या सहयोगी संघवाद या फिर कौशल निर्माण या बुनियादी संरचना निर्माण का क्षेत्र. चर्चित मुख्यमंत्री, नई लीक बनाने वाले कारोबारी और अपने काम के प्रति गंभीर मंत्री आने वाले कल की अपनी रूपरेखा से हमें परिचित कराएंगे. विदेशी युद्ध मोर्चा और हिंसक अभियानों की गूंज भी आइएसआइएस वाले सत्र में सुनाई देगी. उनके चंगुल से छूटकर आए लोगों के साथ आतंक के पुराने ठिकाने अफगानिस्तान के नए मुखिया अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी अपनी बात रखेंगे.
दुनिया की श्रेष्ठ प्रतिभाएं भी यहां आपसे रू-ब-रू होंगी. क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर मैदान की बारीकियों पर रोशनी डालेंगे. आध्यात्मिक गुरु दीपक चोपड़ा हमें दिमाग, देह और मन को काबू में रखने के गुर सिखाएंगे. शतरंज के जादूगर विश्वनाथन आनंद अपनी जबरदस्त सूझबूझ से परिचित कराएंगे. कॉन्क्लेव में इसकी पुरानी और गहरी परंपरा का भी बोध होगा. इंडिया टुडे पत्रिका इमरजेंसी के दौरान शुरू हुई थी. अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में पत्रिका की तरह ही कॉन्क्लेव का रुख भी कड़ा और खरा रहा है, चाहे दलाई लामा का मामला हो या फिर सलमान रुश्दी का. इस बार अपनी बोलने की आजादी के लिए आलोचना का शिकार हुई एआइबी टोली को भी विवाद भड़कने के बाद पहली बार अपनी बात रखने का मौका मिलेगा. कॉन्क्लेव नए विचारों के स्वागत का भी मंच है. इसलिए इसमें हिस्सा लेने वाले नई तकनीकी खोजों के इजहार के भी चश्मदीद हो पाएंगे, चाहे वह 3डी प्रिंटिंग हो या अत्याधुनिक कार इंजन. जाहिर है कि कॉन्क्लेव अपने स्थायी भाव को भी नहीं छोड़ सकता यानी पाकिस्तान के साथ अमन-चैन कायम करने से जुड़ा हुआ भी एक सत्र गंभीर बातचीत का होगा.
लाखों संभावनाओं से सराबोर हमारे देश में इन सब गंभीर विमर्शों के बीच थोड़ी-सी जगह मनोरंजन की भी तो है. सभी प्रतिभाओं को खिलने और खुलने का समान अवसर मुहैया कराने वाला बॉलीवुड हमेशा नए सितारों और नई कहानियों की ताजगी से रौशन रहता है. कटरीना कैफ से लेकर रणवीर सिंह और लीजा हेडन तक ने फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी नई ऊर्जा भर दी है कि हर शुक्रवार हमारे घर का नजदीकी सिनेमाघर हमारी जिंदगियों को नया अर्थ देता है.
बेशक 21वीं सदी की दो सबसे बड़ी चुनौतियां आतंक से जंग और गरीबी के खिलाफ लड़ाई हैं. इनसे हर रोज दुनिया का खाका बदल रहा है. दो दिन और दो रातों की गहमागहमी के साथ इंडिया टुडे कॉन्क्लेव हमारे सामने भविष्य के भारत की बेहतर रूपरेखा पेश कर पाएगा.

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