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कहां गुम हो रहीं सरकारी फाइलें

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार की वजह से सरकारी विभागों से महत्वपूर्ण फाइलें लगातार हो रही हैं लापता. सरकार हैरान, अधिकारी परेशान.

अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2015
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 32 साल पहले राज्य के ग्राम्य विकास विभाग के लिए 48 इंजीनियरों का चयन किया था. इन्हें असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर तैनाती मिली. नौकरी के पहले 20 वर्ष तो बड़े आराम से कट गए. लेकिन 2001 में जब इन इंजीनियरों की वरिष्ठता सूची बनने की बारी आई तो इनमें से कइयों की जन्मतिथि में गड़बड़ी पाई गई. जांच के लिए जब मूल दस्तावेजों की तलाश की गई तो उनकी नियुक्ति संबंधी फाइलें ही गायब मिलीं. अधिकारी सकते  में आ गए. हर जगह फाइलों की खोज हुई, लेकिन नतीजा सिफर. विभाग ने फाइलें खोजने में चौदह साल लगाए. अंतत: 13 फरवरी को विभाग के विशेष सचिव छोटेलाल पासी ने लखनऊ के हजरतगंज थाने में गुम फाइलों के संबंध में अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

यहां इंजीनियरों की नियुक्ति से जुड़ी फाइलें गुम हुईं तो कानपुर नगर निगम में वे 400 फाइलें नहीं मिल रहीं जिनके आधार पर एक लाख रु. या उससे ज्यादा का हाउस टैक्स वसूला जाना था. अफसरों ने हाउस टैक्स में गोलमाल कर न केवल नगर निगम को राजस्व क्षति पहुंचाई बल्कि फाइलें भी छिपा दीं. इसका खुलासा तब हुआ जब नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह ने 21 जनवरी को एक आदेश जारी कर ऐसी सभी फाइलें तलब कीं, जिनमें एक लाख रु. से अधिक के हाउस टैक्स की डिमांड की गई थी.

नगर निगम अब पुलिस की शरण में जाने की तैयारी में है, लेकिन पुलिस की पेशानी पर बल तो किसी और वजह से पड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआइडीसी) के दागी चीफ इंजीनियर अरुण मिश्र की नियुक्ति संबंधी फाइल हाइसिक्योरिटी वाले सचिवालय से गायब हो गई है. हाइकोर्ट की सख्ती  के बाद पुलिस ने सचिवालय के सहायक समीक्षा अधिकारी हरेंद्र तिवारी को 28 दिसंबर को गिरफ्तार भी किया लेकिन फाइल अभी तक गायब है.

दरअसल, उत्तर प्रदेश का कोई भी सरकारी विभाग ऐसा नहीं है, जहां से कम-से-कम दर्जन  भर जरूरी फाइलें गायब न हुई हों. लगातार हाइटेक हो रहे प्रदेश में फाइलों का रखरखाव अब भी एक चुनौती बना हुआ है. शासन स्तर पर यूपी के सभी विभागों में हर दिन 100 से ज्यादा नई फाइलें बनती हैं, लेकिन पुरानी फाइलों की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है. इसीलिए सरकारी विभागों में फाइलें गायब करने का खेल चल रहा है.

डेढ़ दशक में बिगड़े हालात
वर्ष 1999 तक प्रदेश सचिवालय के सभी 369 अनुभागों में कम-से-कम एक संदर्भ दाता या रेफरेंस क्लर्क तैनात था. इनका काम संबंधित सेक्शन में जितनी भी फाइलें हैं, उनकी सूची बनाना, निगरानी करना और यदि कोई मामला आए तो उससे संबंधित फाइल अधिकारी को देना था. 1999 में सभी संदर्भ दाताओं को प्रमोशन देकर समीक्षा अधिकारी बना दिया गया. इसके बाद से फाइलों की निगरानी की व्यवस्था चरमरा गई. कृषि उत्पादन आयुक्त कार्यालय में तैनात एक उपसचिव बताते हैं, '' सचिवालय के दफ्तरों में फाइलों के रखरखाव की कोई दुरुस्त व्यवस्था नहीं है. कुछ जागरूक समीक्षा अधिकारी ही संदर्भ-दाता का काम कर रहे हैं.  पिछले महीने कृषि उत्पादन आयुक्त के साथ बैठक में अधिकारियों ने संदर्भदाता की व्यवस्था दोबारा बहाल करने का प्रस्ताव रखा है.''

सचिवालय से गायब हो रही फाइलों पर निगरानी रखने के लिए सरकार ने सिंचाई विभाग के अनुभागों में फाइलों की बार कोडिंग शुरू की है. बार कोड स्कैनर से कोड को स्कैन करने पर पूरी फाइल की सॉफ्ट कॉपी कंप्यूटर के सामने आ जाती है. सचिवालय प्रशासन के सचिव प्रभात मित्तल कहते हैं, ''शासन के सभी अनुभागों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है, जिससे फाइलों की निगरानी की व्यवस्था बेहतर हुई है.''

डुप्लीकेट फाइल का खेल
लोकायुक्त और सतर्कता विभाग ने शासन को कार्रवाई के लिए कई फाइलें भेजी थीं, लेकिन ये संबंधित विभाग से गायब मिलीं. सख्ती हुई तो विभागों ने डुप्लीकेट फाइल बनाकर पल्ला झाड़ लिया, पर मुख्य सचिव आलोक रंजन ने जांच का आदेश देकर इनके मंसूबों को परवान चढ़ने से रोक दिया. बीएसपी शासनकाल के दौरान सचिवालय में तैनात एक सचिव स्तर के अधिकारी के पास एक ऐसी फाइल आई जो प्रतिकूल टिप्पणियों से रंगी पड़ी थी. इस पर कोई फैसला लेने से बचने के लिए अधिकारी ने मूल फाइल अलमारी में बंद करवा दी और डुप्लीकेट पर मनमाफिक टिप्पणी लिखकर फैसला कर दिया. वास्तव में किसी भी गायब फाइल की केवल 50 से 60 फीसदी ही डुप्लीकेट (रीकांस्टीट्यूट) फाइल बनाई जा सकती है. इस गोरखधंधे के सामने आने पर मुख्य सचिव कार्यालय ने सभी सरकारी कार्यालयों में डुप्लीकेट फाइल यानी 'टैंपररी कवर' (टीसी) खोलने पर रोक लगा दी है.

मॉनिटरिंग सिस्टम की शुरुआत
लगातार गुम होती फाइलों और उनकी देखरेख में होेने वाली लापरवाही के बीच एक राहत की खबर भी है. पिछले वर्ष मुख्यमंत्री कार्यालय में 'फाइल मॉनिटरिंग सिस्टम' लागू करने के कुछ बेहतर नतीजे सामने आने लगे हैं. मुख्यमंत्री के सचिव आमोद कुमार ने अपनी निगरानी में ऐसा खास किस्म का सॉफ्टवेयर विकसित किया है, जिसमें मुख्यमंत्री कार्यालय आने जाने वाली हर फाइल के 'मूवमेंट' पर नजर रखी जाती है. इससे फाइल निबटारे की गति में भी इजाफा हुआ है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री कार्यालय की दहलीज से बाहर आने वाली फाइलें एक बार फिर अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगती हैं. जरूरत है एक संवेदनशील और पारदर्शी सिस्टम की, जिसमें कोई भी फाइल भ्रष्टाचार का शिकार न हो सके.

इन 4 तरीकों से गुम की जाती हैं फाइलें
1. महत्वपूर्ण फाइल को दूसरी गैर महत्वपूर्ण फाइल के भीतर छिपाकर गायब कर दिया जाता है. ऐसे में महत्वपूर्ण फाइल को ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है.
2. कई बार निर्धारित समयावधि पूरी न करने वाली फाइल को गलत ढंग से निष्प्रयोज्य दिखाकर ठिकाने लगा दिया जाता है.
3. किसी महत्वपूर्ण फाइल को गायब करने के लिए उसे संबंधित विभाग से दूसरे ऐसे विभाग में भेज दिया जाता है, जहां इससे कोई वास्ता न हो. भेजने के बाद फाइल लंबे समय तक वापस नहीं मंगाई जाती.
4. अभिलेख कक्ष में रखी महत्वपूर्ण फाइलों को अन्य फाइलों के साथ एक साथ इस तरह से जलाया जाता है जिससे देखने में यह शॉर्ट सर्किट से लगी आग लगे.
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