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संसाधनों की कमी से सेना की जंग

आधुनिकीकरण के लिए बेहद मामूली बजट रखे जाने की वजह से सेना नई इकाइयां खड़ी करने के लिए युद्धकाल का अपना सुरक्षित कोष इस्तेमाल कर रही है.

अपडेटेड 27 जनवरी , 2015

भारतीय सेना को संसाधनों की किल्लत हमेशा ही परेशान करती है लेकिन यह तंगी ऐसे समय सामने आए जब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना अपना अब तक का सबसे बड़ा विस्तार कर रही हो और पड़ोसी देश मुसीबतें खड़ी कर रहा हो तो मामला गंभीर मोड़ ले सकता है. सेना की हालत बहुत पतली है-युद्धकालीन सुरक्षित कोष बेहद निचले स्तर पर है और राजस्व कम जुटने के चलते सरकार ने कुल खर्च में कमी की है, जिस वजह से सेना का आधुनिकीकरण का बजट जो पहले ही मामूली था, उसमें भी इस साल और कटौती कर दी गई.

हालांकि हालात नए नहीं हैं-साल-दर-साल, खास तौर पर यूपीए 2 के दौरान माना जा रहा था कि वायु सेना को बढ़ावा देने की कीमत पर थल सेना को नजरअंदाज किया जा रहा है. हालांकि मौजूदा स्थिति बेहद नाजुक है और थल सेना बजट आवंटन में उपयुक्त बढ़ोतरी के बगैर ही चीन से लगती सीमा पर अपने सुरक्षा मोर्चे को और भी मजबूत करने के इरादे से माउंटेन स्ट्राइक कोर खड़ी कर रही है. इसके लिए वह धीमे-धीमे 88,000 नई भर्तियां कर रही है.

अब खतरा यह है कि सेना के लिए यह मुश्किल वक्त रहेगा-उसका संख्या बल तो बढ़ जाएगा पर आधुनिकीकरण की योजनाएं ठप होने से नया बल उस तरह से लैस नहीं होगा. इसके मूल में वह तरीका है, जिस तरह से पिछले कुछ साल में नई इकाइयां खड़ी की गई हैं. समय सीमा पर खरे उतरने की कोशिश में, नई माउंटेन स्ट्राइक कोर की सारी नई तैनातियां मौजूदा इकाइयों में से कांट-छांट करके की गई हैं. हथियार, गोला-बारूद और वाहन और बुलेट-प्रूफ जैकेट सरीखी वे सहायक सामग्रियां भी इस्तेमाल कर ली गईं जो आम तौर पर युद्ध के समय के लिए सुरक्षित रखी जाती हैं. तकनीकी शब्दों में कहा जाए तो सेना ने पिछले चार साल में चीन सीमा पर अपनी नई बटालियनों को लैस करने के लिए अपने वार वेस्टेज रिजर्व (डब्ल्यूडब्ल्यूआर) में से इस्तेमाल कर डाला है.

वैसे तो अपने आप में यह परिपाटी कोई नई नहीं. पारंपरिक रूप से नई बटालियनें इसी तरीके से खड़ी की जाती रही हैं. समस्या यह है कि सेना को उसकी भरपाई करने का मौका नहीं मिला और उसका बजट आवंटन लगभग जस-का-तस रहा है और बमुश्किल ही वह मुद्रास्फीति को भी पाट पाया है. तकनीकी रूप से 88,000 जवानों की भर्ती हथियारों, गोला-बारूद या ढांचे में बगैर किसी समानुपातिक बढ़ोतरी के हो रही है.

नई बटालियनों की खातिर जरूरी कोष के लिए पिछली सरकार के सामने बार-बार गुहार लगाकर हताश हुए सेना का मुख्यालय एक नया रोडमैप तैयार करके नई जरूरतों की ओर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है. उसकी शिकायत बड़ी सीधी-सी है. यूपीए सरकार ने नई कोर खड़ी करने के मकसद से 5,000 करोड़ रु. का आवंटन तो कर दिया लेकिन यह सारी राशि सेना के मौजूदा बजट में से ही समायोजित कर दी गई. सेना मुख्यालय ने अब उसकी भरपाई करने के लिए एकमुश्त विशेष आवंटन (5,000 करोड़ रु. का) करने का अनुरोध किया है, जिस पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार विचार कर रही है. आधुनिकीकरण के लिए थल सेना ने प्राथमिकता के आधार पर सात क्षेत्रों की सूची भी बनाई है. इन प्राथमिकताओं में नई तोपों की खरीद (पिछले लगभग तीन दशकों से एक भी नई तोप नहीं खरीदी गई है), उड्डयन कोर के लिए हल्के हेलीकॉप्टर शामिल करना, टैंकों और बख्तरबंद गाडिय़ों में नाइट विजन उपकरण लगाकर उन्हें अपग्रेड करना और सैनिकों के लिए नई असॉल्ट राइफलें खरीदना शामिल है. सेना की आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से जुड़े एक शीर्ष लेफ्टिनेंट जनरल बताते हैं, ‘‘हमने विशेष आवंटन के बारे में अपना नजरिया सामने रख दिया है और लगता है कि उसे स्वीकार कर लिया जाएगा.’’

वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) गुरमीत कंवल का कहना है कि युद्ध के लिए रखे संचित कोष का कम हो जाना हमारी रक्षा तैयारियों पर प्रतिकूल असर डालेगा. उनके शब्दों में, ‘‘आदर्श स्थिति तो यही है कि नई बटालियनें खड़ी करने के लिए हथियारों की नई खरीद होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होने से युद्ध की स्थिति के लिए रखा गया रिजर्व कम हो गया है. जाहिर है, इससे बल की जंगी क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.’’

हालांकि ऐसे समय में जब चीन और अमेरिका समेत सभी प्रमुख ताकतें अपने सैन्य बल का आकार घटा रही हैं, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना के विस्तार को लेकर थोड़ी बहस हो रही है, लेकिन सेना मुख्यालय का मानना है कि नई माउंटेन स्ट्राइक कोर पूर्वी सीमा पर सुरक्षा के लिए निहायत जरूरी है.

रक्षा मामलों पर संसदीय स्थायी समिति के सदस्यों के साथ पिछले साल सितंबर में हुए एक सत्र में थल सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फिलिप कांपोज ने सेना के स्तर में सुधार की जरूरत को काफी मुखर रूप से सामने रखा था. कैंपोज के शब्दों में, ‘‘15 साल के बाद के खतरे का हमारा मूल्यांकन जिस संभावना पर आधारित था, उसमें इस बात को ध्यान में रखा गया था कि चीन कैसे आक्रामक तरीके से पड़ोसियों के साथ अपने विवादों को सुलझा रहा है, खास तौर पर दक्षिण चीन समुद्र में अपने जलीय विवादों को. हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे कि कहीं अगर चीन ने किसी समय माहौल गरम करके आक्रामक होने की कोशिश की तो हम उस खतरे से निबटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.’’ हालांकि उसी सत्र में वाइस चीफ ने माना कि त्वरित समय-सीमा पर खरा उतरने की कोशिश में सेना ने अपने कुछ आरक्षित भंडार का इस्तेमाल कर लिया है.

संसाधनों पर इस अतिरिक्त ‘‘बोझ’’ से सेना के वित्तीय नियोजन पर करारा झटका लगा है, खास तौर पर यह देखते हुए कि उसका राजस्व-पूंजी बजट अनुपात पहले ही काफी असंतुलित है. संसाधनों के अपने सालाना आवंटन में से इस साल सेना को पूंजी खर्च के लिए-अपने जवानों के लिए नए हथियार और उपकरण खरीदने के लिए, बमुश्किल 22 फीसदी मिला. सरकार अपना खर्च कम करने के लिए इस कदर जूझ रही थी कि इस साल के लिए 20,900 करोड़ रु. के आवंटन को भी और काट-छांटकर 4,500 करोड़ रु. (20 फीसदी से थोड़ा ज्यादा) कर दिया गया.

राजस्व मद में जाने वाले 78 फीसदी धन में से भी ज्यादा तो अफसरों तथा जवानों की तनख्वाह और भत्तों में खर्च हो जाता है. जाहिर है कि ऐसे में अगर आवंटन पर्याप्त न हो तो सारी कटौती केवल गोला-बारूद के मद में से ही करने की गुंजाइश बची रह जाती है.
रक्षा अध्ययन तथा विश्लेषण संस्थान के लिए एक पेपर में रक्षा मंत्रालय के पूर्व वित्तीय सलाहकार अमित कौशिश ने लिखा था, ‘‘सेना के राजस्व आवंटन का 60 फीसदी से ज्यादा तनख्वाहों और भत्तों में खर्च हो जाता है. बची हुई राशि अन्य बजट मदों, जैसे कि कपड़ों, राशन तथा ईंधन के खर्च की जरूरतों  को पूरा करने के लिए अपर्याप्त रहता है. नतीजतन अपर्याप्त आवंटन का बोझ उन क्षेत्रों पर डाल दिया जाता है जहां संसाधनों की कमी से तत्काल कोई संकट खड़ा होने वाला नहीं है-हथियारों की खरीद उन्हीं में से एक है.’’

एक असंतुलित बजट का आशय होता है कि सेना के पास नई प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए बहुत कम बचता है. इसी में सुधार करने के लिए सेना ने सुझाव दिया है कि सरकार रक्षा पर देश के खर्च को मौजूदा अब तक के निम्नतम स्तर जीडीपी के 1.7 फीसदी से बढ़ाने पर विचार करे. भारतीय सांसदों को एक प्रेजेंटेशन में सेना ने रक्षा पर खर्च को धीरे-धीरे बढ़ाकर 3 फीसदी तक ले जाने की बात कही थी. इससे न केवल आधुनिकीकरण में रह गई मुख्य खामियों को पाटा जा सकेगा बल्कि यह बाकी अन्य देशों द्वारा किए जा रहे खर्च के भी बराबर ही होगा. कंवल का कहना है कि दो मोर्चों पर जंग लडऩे के लिए कम- से-कम 2.5 फीसदी का आवंटन तो जरूरी है.
सेना की जरूरतें पूरी करने के मामले में सरकार का इम्तहान भी जल्द ही हो जाएगा, जब वह अगले वित्तीय वर्ष के लिए रक्षा खर्च का आवंटन करेगी. बहरहाल, सेना को इस बात की उम्मीद है कि इस साल के बजट में सुधार की दिशा में पहलकदमी तो नजर आ ही जाएगी.

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