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लजीज व्यंजनों की मनभावन दुनिया Foodporn

खानपान से जुड़ी हमारी भाषा और तस्वीरों पर ऐंद्रिकता और कामुकता हावी होती जा रही है. शायद इसीलिए तश्तरी में लजीज व्यंजनों के लिए ‘‘फूडपोर्न’’ जैसी शब्दावली का चलन बढ़ रहा.

अपडेटेड 3 नवंबर , 2014
अपने शरीर पर ढेर सारे गोदनों के लिए प्रसिद्ध 34 वर्षीय केल्विन चेउंग मुंबई के रेस्तरां ऐलिप्सिस के ऊर्जावान एग्जीक्यूटिव शेफ हैं. व्हाइट आउल रेस्तरां-बार की क्षमा प्रभु सहित ढेरों लोग इंस्टाग्राम पर उन्हें फॉलो करते हैं. एक हफ्ते पहले चेउंग ने अपने फीड पर ‘‘पिग ईयर्स ऐंड नैम प्रिक पाओ’’ नामक एक डिश की तस्वीर पोस्ट की. वे कहते हैं कि मुझे पता है कि बहुत कम लोग यह डिश ऑर्डर करेंगे.

इसके बावजूद वे इसे मेन्यू में रखते हैं क्योंकि उन्हें यकीन है कि नए-नए व्यंजनों के दीवाने कुछ लोग जरूर इसका स्वाद चखना चाहेंगे. चेउंग कहते हैं, ‘‘ऐसा भी हुआ है कि सुबह ही आजमाई एक नई डिश मैंने मेन्यू में रखी और कुछेक घंटों के भीतर ग्राहकों ने उसकी फरमाइश कर डाली.’’ अपने ऐसे ही नए-नए प्रयोगों से चेउंग ने वोल्ताजिओ ब्रदर्स के अमेरिकी रेस्तरां की किस्मत बदल दी, जहां पहले कीमत बहुत ज्यादा हुआ करती थी.

यह फूडपोर्न (#foodporn) का उदय है. इसमें व्यंजनों की लुभावनी तस्वीरें उतारी जाती हैं और उन्हें ऑनलाइन पोस्ट किया जाता है. साथ ही इंटरनेट और टीवी पर ऐसे व्यंजनों की तलाश की जाती है, जिनकी तस्वीरें देखकर ही मुंह से लार टपकने लगे. यह खब्त बढ़ती जा रही है. शेफ भी इसके उतने ही आदी हैं, जितने खाने के शौकीन. शेफ प्रभु बताती हैं कि यह उनके और किचन में उनके साथियों के प्लेट सजाने के तरीके पर अपना असर डालने लगा है.

होता यह है कि जैसे ही प्लेट सामने आती है, ग्राहक पहला काम यह करता है कि जेब से सेलफोन निकालता है, उसकी तस्वीर लेता है और ऑनलाइन पोस्ट कर देता है. यह तुरत-फुरत का फैसला होता है कि डिश अच्छी है या बुरी. लिहाजा प्रभु ने किचन में खुद ही तस्वीर लेना शुरू कर दिया, ताकि वह ग्राहक पर उसके असर के बारे में पहले से जान सकें. वे कहती हैं, ‘‘अब बात सिर्फ शुरुआती प्रभाव की भी नहीं रह गई है.

खाने वाला बर्गर के तीन कौर खाता है और फिर अपने सेलफोन से तस्वीर उतारता है, यानी आधा खाने के बाद बर्गर ऐसा दिखेगा.’’ इसीलिए उन्होंने अपने साथियों को कल्पना करना सिखाया कि कुछ कौर खाने के बाद, मद्धम रोशनी में ली गई तस्वीर में और खाना शुरू करने के 10 मिनट बाद ऑनलाइन पोस्ट करने पर वह कैसा दिखाई देगा. अपने रसोईघरों में अब वे सवाल पूछते हैं, ‘‘इंस्टाग्राम और फूडस्पॉटिंग पर डालने पर क्या यह अच्छा दिखेगा?’’

खाने की तस्वीरों का यह प्रसार पोर्नोग्राफी की हद तक बढ़ गया है. यही वजह है कि इससे जुड़ी वेबसाइटों के सौदे लाखों डॉलरों तक पहुंच गए हैं. अमेरिकी वेबसाइट फूडस्पॉटिंग दुनिया की सबसे बड़ी वेबसाइट में से एक है, जिस पर खाने की तस्वीरें डाली और उनकी सिफारिश की जाती है. 2013 में एक रिजर्वेशन वेबसाइट ‘‘ओपन टेबल’’ ने इसे एक करोड़ डॉलर में खरीद लिया.

तमाम उत्साही फूड फोटोग्राफर खाने की अपनी तस्वीरें ऑनलाइन डालने के लिए ‘‘हैशटैग फूडपोर्न’’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इसे अब इतनी गंभीरता से लिया जाने लगा है कि निवेशक रेस्तरांओं की सेवाओं के मूल्यांकन के लिए टेबल और ग्राफ में इसे दिखाने लगे हैं.

खाने की ऑनलाइन दीवानगी को बढ़ाने के लिए बनाई गई भारतीय वेबसाइर्ट Zomato.com के संस्थापक दीपेंदर गोयल बताते हैं कि उनकी यह वेबसाइट 2009 में फूडपोर्न के अनुमानित मूल्य पर आधारित थी. अब इसका मूल्य एक अरब डॉलर आंका जा रहा है. गोयल कहते हैं कि जोमैटो ने हाल ही में टोरंटो के 11,000 रेस्तरांओं के साथ कनाडा में नई शुरुआत की है. कंपनी अगले एक साल के दौरान कनाडा के फूडपोर्न में एक करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगी.

खाने के शौकीनों के लिए तस्वीरें शुरुआती खेल की तरह हैं. देखते-देखते खाने और उसके शेफ के साथ उनका गहरा रिश्ता बन जाता है. 26 वर्षीय शुचिर सूरी की नई छोटी-सी कंपनी फूड टॉक इंडिया अपने विस्तार के लिए इसी का इस्तेमाल कर रही है. फिलहाल यह फेसबुक पर एक सीक्रेट कम्युनिटी है, जिससे ‘‘मुंबई, दिल्ली और बंगलुरू के घूमने और खाने के शौकीन’’ 46,000 सदस्य जुड़े हैं.

इसका सदस्य सिर्फ आमंत्रितों को ही बनाया जाता है. कंपनी नेटवर्किंग डिनर भी आयोजित करती है, जिन्हें ‘‘डिनर विद स्ट्रेंजर्स’’ कहा जाता है. नए-नए स्वाद का लुत्फ उठाने के लिए रेस्तरांओं में फोर-कोर्स ब्लाइंड टेस्टिंग भी आयोजित की जाती हैं. जनवरी, 2015 में कंपनी अपना मोबाइल एप्लिकेशन भी लॉन्च करने वाली है. सूरी कहते हैं, ‘‘आप किसी शख्स को कैसे परखते हैं? पहले कपड़ों से परखते थे. अब आप देखते हैं कि उसका खानपान क्या कहता है. आज जो भी खाना आप इंस्टाग्राम पर दिखाते हैं, उसी से आपका व्यक्तित्व बनता है.’’

शौकीनों के अलावा शेफ और रेस्तरां भी फूडपोर्न की राह पर हैं. दुनियाभर के शेफ मासाहारू मोरिमोतो और रेने रेडजेपि के दीवाने हैं और किचन के भीतर उनके प्रयोगों के अपडेट का इंतजार करते हैं. अगर किसी दिग्गज शेफ की रसोई में उसके संग होने का मौका मिले तो खाने के साथ लगाव और भी बढ़ जाता है. पेस्ट्री शेफ और मुंबई के ली 15 पेटिसरी की संस्थापक पूजा ढींगरा ने इंस्टाग्राम करना 2009 में शुरू किया था.

तब सामने आने के मौके बहुत कम हुआ करते थे. वे इटली और फ्रांस के पेस्ट्री शेफ को ऑनलाइन फॉलो करती हैं और उनसे नए विचार हासिल करके नए-नए प्रयोग करती हैं. दुनियाभर में फैले फूड इंडस्ट्री के उनके दोस्त भी उनकी मदद करते हैं. वे कहती हैं, ‘‘फूडपोर्न ने विशेषज्ञता हासिल कर सकने को मुमकिन बनाया है. फिर चाहे वह  मैकरोन्स हो या महज एक कुकी स्टोर. इतना सब कुछ उपलब्ध है कि हम काफी गहराई तक जा सकते हैं.’’

दिल्ली के मैनोर होटल का इंडियन एक्सेंट वह रेस्तरां है, जो सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है. इसकी हरेक डिश स्टेटस सिंबल है और उनकी ऑनलाइन तस्वीरें अमिताभ बच्चन से लेकर उद्योगपति आनंद महिंद्रा तक को आकर्षित करती हैं.

शेफ मनीष मेहरोत्रा मजाक में कहते हैं, ‘‘कभी-कभी मुझे जलन होती है कि किचन के शेफ से ज्यादा तस्वीरें तो प्रेशर कुकर की ली जाती हैं.’’ वे मानते हैं कि एक डिश के दिखने के ढंग से उनके काम का तरीका प्रभावित होता है. वे कहते हैं, ‘‘यह नई पीढ़ी का बदलाव है, जिसके साथ चलना पड़ता है.’’ वही रेस्तरां फायदे में रहते हैं, जो याऊआचा की तरह अपने को बदलते हैं. याऊआचा का रास्पबेरी गोल्ड लीफ चॉकलेट केक दुनिया और भारत में इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा दिखने वाला केक है.

फूडपोर्न का उभार खाने पर केंद्रित ऑनलाइन एकाउंट की बाढ़ से तो पता चलता ही है. वह नए-नए शब्दों के चलन और खाने के शौकीनों और शेफ के बीच रिश्तों में भी दिखाई दे रहा है. एक नई किताब डैन जुराफस्की की लैंग्वेज ऑफ फूडरू अ लिंग्विस्ट रीड्स द मेन्यू में खाने की नई उभरती भाषा के बारे में बताया गया है. ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है, जो ऐंद्रिकता और कामुकता जगाते हैं. इसमें मदिरा को ‘‘लिक्विड वियाग्रा’’ या ‘‘खूब मांसल और नशीली’’ बताया जाता है तो डेजर्ट को ‘‘सेंसुअल’’ और ‘‘ऑर्गेज्मिक’’ कहा जाता है.

38 वर्षीय बैंकर राजा देबनाथ ने हाल ही में मुंबई के पवई में बंगाली रेस्तरां कैफे बोदा खोला है. वे कहते हैं कि शेफ और रेस्तरां पर निर्भरता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि परिवारों में खाना पकाने में महिलाओं की भूमिका बदल गई है. वे कहते हैं, ‘‘आप रेस्तरां में या तो दावत के लिए जाते हैं या घर के खाने को याद करने के लिए क्योंकि हममें से कई लोगों के पास अब घर में खाना पकाने का न तो वक्त है, न इच्छा.’’

एक लजीज डिश की तारीफ जितनी अच्छी लगती है, ऑनलाइन आलोचना उतनी ही कठोर और दिल तोड़ देने वाली होती है. आलोचना कई बार इतनी गाली-गलौज की भाषा में की जाती है कि शेफ समझ ही नहीं पाते कि गड़बड़ी कहां हुई. शेफ मनु चंद्रा कहते हैं, ‘‘ऐसा इसलिए है क्योंकि शेफ और डिश से उम्मीदें बहुत बढ़ गई हैं. डिश अब केवल डिश नहीं है.

वह ऐसी चीज है, जिसमें निवेश किया जाता है और उम्मीद की जाती है कि वह दिखने में तो अच्छी होगी ही, आपकी जीभ और भावना को भी संतुष्ट करेगी.’’ मंकी बार अड्डेबाजी के लिए बनाया गया है. काम में मसरूफ रहते हुए भी वे फीडबैक के लिए जोमैटो जैसी साइट लगातार देखते रहते हैं. इन दिनों वे खाने में स्वाभाविक सहजता पैदा करने के काम में जुटे हैं. वे कहते हैं, ‘‘खाने को आपके जिगरी दोस्त की तरह बनना पड़ेगा.’’

उसे इतना अच्छा दिखना होगा कि तस्वीर उतारी जा सके. उसे इतना लुभावना होना होगा कि खाने वाला बार-बार लौटकर आए. संक्षेप में, खाने को पूरी पीढ़ी के लिए जीवनसाथी की तरह बनना होगा, जो सामाजिक कामों में भी साथ दे और रोमांस के लिए भी खरा हो.

एवरस्टोन ग्रुप के कॉपर चिमनी और बॉम्बे ब्लू जैसे रेस्तरांओं के शेफ-इन-चार्ज संजय मलकानी बताते हैं कि यह परिवर्तन बदलते सामाजिक ढांचे और खान-पान की बदलती आदतों की वजह से है. मास्टरशेफ ऑस्ट्रेलिया जैसे शो की बढ़ती लोकप्रियता के साथ अब जोर खाना परोसने के तरीकों पर है. मलकानी कहते हैं, ‘‘पश्चिम की तरह भारत में लोग डेट पर बाहर खाना खाने नहीं जाते. वे परिवार या मेहमानों को खाना खिलाने बाहर ले जाते हैं.

बाहर खाना खाना सामाजिक घटना होती है और खाने को इंस्टाग्राम पर डालना सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा बन जाता है.’’ वे  कहते हैं, ‘‘ये रिश्ता खाने के शौकीन शख्स, शेफ और उस प्लेट के बीच है, जिस पर दोनों का बराबर हक है. संयुक्त परिवार की रसोई अब बिखर चुकी है और इसलिए शेफ को कई भूमिकाएं अदा करनी पड़ती हैं. तृप्ति का जादू तो कई मायनों में डिश का महज आधा हिस्सा ही है.’’ 
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