scorecardresearch

सतर्कता की बेडिय़ों में अटके फैसले

विपक्ष में बैठकर बीजेपी बड़ी-बड़ी बातें करती रही लेकिन गद्दी पर बैठकर उन्हें अमली जामा पहनाना हुआ मुश्किल. वह नीति-निर्माण में आ गई पीछे.

अपडेटेड 3 नवंबर , 2014
नरेंद्र मोदी सरकार इस वक्त अपने राजनैतिक कौशल के कठोर इम्तिहान से गुजर रही है. सत्ता संभालने के बाद जब अहम फैसलों की बारी आई तो बीजेपी ने पाया कि इन फैसलों और विपक्षी दल के रूप में की गई घोषणाओं में तालमेल बिठा पाना मुश्किल है. खासकर तब जब उसे सुप्रीम कोर्ट के गुस्से का शिकार होना पड़ रहा है.

सरकार धड़ाधड़ कई आर्थिक फैसलों के जरिए अपने निर्णायक इरादों का संकेत देना चाहती थी लेकिन उसे यकायक ठहर जाना पड़ा. वह एकमात्र निर्णायक फैसला प्रतिरक्षा निर्माण का ले पाई. भीतरी सूत्रों के मुताबिक, मोटे तौर पर निर्देश यह था कि अड़ंगा डालने वाले किसी झमेले में पड़े बगैर काम शुरू करो. नतीजा यह हुआ कि निडरता के साथ फैसले लेने की बजाए सावधानी बरती जाने लगी और बारीकियों ने फैसलों को लटका दिया.

कोयलाः अब भी अधर में अटका
नए कोयला अध्यादेश के अध्याय 3 की धारा 12 में इसी से संबंधित दो और प्रावधान जुड़े हैं. इनके मुताबिक केंद्र सरकार इस नए कानून के बाद कोल ब्लॉक का आवंटन गंवाने वाले खदान मालिकों को कर्ज देने वालों को मुआवजा या क्षतिपूर्ति देने के लिए वचनबद्ध है. इसमें यह भी साफ-साफ लिखा है कि मुआवजे के नियम बाद में तय किए जाएंगे. बाकी बातों को तो भूल ही जाएं.

खुद सरकारी अफसर मानते हैं कि यही अपने आप में बहुत भारी-भरकम काम होगा. मुआवजे की रकम पर मोल-भाव के लिए एक सेवानिवृत्त सिविल अधिकारी की छत्रछाया में विशाल नौकरशाही का ढांचा खड़ा करना होगा. फिर ऐसे समझौतों के अतिरिक्त कानूनी पचड़ों में फंस जाने की आशंका भी है. इससे नए बोली लगाने वाले डरकर पीछे हट सकते हैं. लिहाजा तय समय सीमाओं का पालन करना मुश्किल होगा.

सरकार का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट से कोयला खदानों के 214 आवंटन रद्द कर दिए जाने से उपजे बेहद मुश्किल हालात में वह बेहतर से बेहतर करने की कोशिश कर रही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को सही ठहराया है. इसके लिए उसने अपने 24 सितंबर के आदेश में अटॉर्नी जनरल (एजी) मुकुल रोहतगी की दलील का ही सहारा लिया. एजी ने सरकार की तरफ से कहा था कि वह सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द करने के फैसले को मानने के लिए तैयार है. अदालत ने अपने आदेश में इसी बात का जिक्र किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अक्सर अपने इस वादे को दोहराया है कि सरकार कोयला क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत करने के लिए इस मौके का इस्तेमाल करेगी. इस लिहाज से अध्यादेश ने निजी कंपनियों को खदानों के व्यावसायिक दोहन की इजाजत देने की तकनीकी संभावना का रास्ता जरूर खोल दिया है.

इसके तहत उन्हें कोयले के किसी निश्चित अंतिम उपयोग की बंदिश से मुक्त किया जा सकेगा. लेकिन वित्त मंत्री ने यह फैसला बाद के लिए टाल दिया है. यह इस बात का संकेत है कि उन्हें मजदूर यूनियनों की तरफ से डाले जा सकने वाले दबाव का एहसास है. खासकर तब जब आरएसएस से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ इस क्षेत्र का सबसे बड़ा  श्रमिक संगठन है.

गैस की कीमतः उलटे रास्ते पर
राजनैतिक मकसद था कि गैस की कीमत 8.4 डॉलर प्रति एमबीटीयू से कम करने का रास्ता तलाशना. यह कीमत यूपीए सरकार ने रंगराजन फॉर्मूले के जरिए तय की थी. यह फॉर्मूला दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों में गैस की कीमतों के औसत के आधार पर तय किया गया था. इसमें वह कीमत भी शामिल थी जो भारत की प्रमुख गैस आयात कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी विदेशों से प्राकृतिक गैस खरीदने के लिए चुकाती है.

पेट्रोनेट एक अनूठा सरकारी उपक्रम है जो गैस आयात करने के घोषित उद्देश्य से बनाया गया था. सार्वजनिक क्षेत्र की सभी बड़ी तेल कंपनियों की हिस्सेदारी के साथ इसका गठन किया गया था. लेकिन उनकी कुल हिस्सेदारी 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती थी. इस तरह यह पूरी तरह सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी नहीं थी और सरकार के वित्तीय नियम-कायदों की बंदिशों से इसे बाहर रखा जा सकता था. इसके बावजूद सबसे अधिक हिस्सेदारी की वजह से पेट्रोलियम सचिव इसके अध्यक्ष हो सकते थे.

पेट्रोनेट ने कतर से करीब 13 डॉलर प्रति एमबीटीयू की दर से गैस आयात करने का सौदा किया हुआ है. देश के भीतर उत्पन्न गैस की नई कीमत की गणना के लिए बनाए गए रंगराजन फॉर्मूले में यह कीमत भी शामिल की गई थी. अब यह कीमत इस फॉर्मूले से निकाल दी गई है. इसके साथ ही जापान की एशियाई देशों के लिए तय कीमत भी निकाल दी गई. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कुल कीमत को घटाकर 5.6 डॉलर प्रति एमबीटीयू तक लाया जा सके.

इसके लिए दलील यह दी गई कि घरेलू उत्पादक घरेलू कीमत को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए गैस का आयात कर सकते हैं. लेकिन जो बात नहीं बताई गई वह यह कि मौजूदा समय में कोई घरेलू कंपनी बिक्री के लिए गैस का आयात नहीं करती. दूसरी ओर, पेट्रोनेट घरेलू उत्पादन के काम में शामिल नहीं है.

अहम बात यह थी कि घरेलू गैस उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए अधिकतम प्रोत्साहन दिया जाए. देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए यह बहुत जरूरी है. गैस की और अधिक खोज से भविष्य में कीमतें भी कम की जा सकती हैं. अमेरिका में ऐसा ही हुआ था. वहां शेल की खोज की वजह से कीमतें नाटकीय ढंग से 13 डॉलर प्रति एमबीटीयू से घटकर 4 डॉलर प्रति एमबीटीयू पर आ गईं.

दूसरी ओर चीन में कीमतें 10-12 डॉलर प्रति एमबीटीयू के दायरे में बनी हुई हैं. ये बाजार आधारित कीमतें हैं. सरकार बाजार दरों पर आधारित फॉर्मूले के और करीब जा सकती थी. लेकिन राजनैतिक दुष्परिमाणों से बचने के लिए उसने पैर पीछे खींच लिए, यूपीए जहां खड़ा था वह उससे भी पीछे आ गई. परिणाम यह हुआ कि घरेलू उत्पादन में निवेश को खास प्रोत्साहन नहीं दिया गया. एक डर यह भी था कि उत्पादक आयात को बेहतर विकल्प न मान लें क्योंकि कीमत तो अंततः उपभोक्ता को ही अदा करनी है.

प्रतिरक्षाः सही दिशा में कदम
2007 में फैसला लिया जाना था कि क्या निजी कंपनियों को पनडुब्बियां बनाने दी जाएं. लेकिन तब ढेरों अंदेशों का माहौल बना दिया गया. बावजूद इसके कि भारत की परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी आइएनएस अरिहंत को एक निजी शिपयार्ड कंपनी संभाल रही थी.

आखिरकार इस पर विचार करने के लिए नेशनल मैन्यूफैक्चरिंग कॉम्पीटीटिवनेस काउंसिल के पूर्व चेयरमैन वी. कृष्णमूर्ति की अध्यक्षता में एक समिति बना दी गई. समिति ने सिफारिश की कि कुल छह पनडुब्बियों में से कम-से-कम दो के निर्माण का आदेश निजी कंपनियों को दिया जाना चाहिए. रक्षा मंत्रालय के कुछ लोग इस सिफारिश का विरोध कर रहे थे. संयोग से आरा (बिहार) के बीजेपी सांसद आर.के. सिंह उन दिनों प्रतिरक्षा उत्पादन सचिव थे.

मोदी सरकार ने एक झटके में सभी छह पनडुब्बियों के निर्माण के लिए भारत की निजी कंपनियों को बोली लगाने की इजाजत दे दी. इसी के साथ सरकार ने उस बहस को खत्म कर दिया जो यूपीए के राज में कभी पूरी नहीं हो सकती थी क्योंकि तब प्रधानमंत्री कार्यालय एक दिशा में खींचता था, तो रक्षा मंत्रालय दूसरी दिशा में.

प्रतिरक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार सही कदम उठा रही है. यह वह क्षेत्र है जो यूपीए के राज में किसी भी किस्म के सुधारों से अछूता था. अब परीक्षा ऐसे फैसले लेने में है जो पार्टी के रुख के खिलाफ जाते हैं. मिसाल के लिए सरकार को तय करना है कि वह दूसरे देशों के साथ कामकाज में अहम दोतरफा समझौतों का पालन करना चाहती है या फिर विदेशों में जमा भारत के धन को वापस लाने के पार्टी के मिशन को पूरा करने के लिए इन समझौतों पर दोबारा बातचीत करना चाहती है.
Advertisement
Advertisement