राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 10 माह में पहली बार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करके अपनी ताकत साबित की है. इस विस्तार में उन्होंने उन सभी नेताओं को दरकिनार कर दिया जो उनके लिए परेशानी बन सकते थे. उन्होंने यह भी दिखाने की कोशिश कि उनके और हाइकमान के बीच कोई रस्साकशी नहीं है, जिसकी अटकलें लगाई जा रही थीं.
27 अक्तूबर को राजे ने 15 मंत्रियों को शपथ दिलाई. इनमें चार कैबिनेट मंत्री हैं. उन्होंने अरुण चतुर्वेदी और हेम सिंह भड़ाना को पदोन्नत करके कैबिनेट मंत्री बना दिया. राजे ने 46 विभागों को अपने पास ही रखा था और विस्तार के दबावों को नाकाम करती आई थीं क्योंकि कुछ विधायकों को मंत्रिमंडल में लेने से बाकियों के नाराज होने का डर था. 200 सदस्यों की विधानसभा में बीजेपी के 160 विधायक हैं और कुछ को मंत्री बना, अपने वफादारों सहित बाकियों को छोड़ देना उनके लिए मुश्किल था. वैसे इस विस्तार से उन्हें शासन चलाने में मदद जरूर मिलेगी. इससे राजे ने यह भी दिखाया है कि प्रदेश बीजेपी में उन्हीं की बात मानी जाती है. विस्तार की हरी झ्ंडी अगस्त में ही मिल गई थी, पर इसका वक्त भी उन्होंने अपनी सुविधा और मर्जी से चुना. वे संघ के उदार नेताओं और अपने वफादारों को मंत्री बनाने में सफल रहीं.
उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने पार्टी के भीतर अपने एकमात्र मुखर विरोधी घनश्याम तिवाड़ी को मंत्री नहीं बनाया. केंद्र के कई आला नेताओं ने तिवाड़ी को शामिल करने की सलाह दी थी. इससे एकछत्र बाह्मण नेता बनने की तिवाड़ी की कोशिशों को धक्का लगा है. ब्राह्मण लॉबी के जबरदस्त दबाव में राजे ने अगले ही दिन चतुर्वेदी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया. इस तरह उन्होंने एक ही झ्टके में आरएसएस को खुश और तिवाड़ी का कद और छोटा कर दिया. अलबत्ता इस कदम से आरएसएस ही कमजोर हुआ है, क्योंकि चतुर्वेदी को बार-बार उनके कद से ज्यादा महत्व दिया गया है. पहले तो उन्हें राज्यमंत्री बना दिया गया, बावजूद इसके कि वे पहली बार विधायक बने हैं. उस वक्त आरएसएस ने यह कहकर उनकी पैरवी की थी कि वे अध्यक्ष रह चुके हैं. अब 10 माह में ही उन्हें कैबिनेट मंत्री बना देने से पहली बार चुनकर आए कई विधायक ईर्ष्या कर रहे हैं. राजे ने इंडिया टुडे से कहा, ''पहली बार चुनकर आए कई विधायक मंत्री बनने के काबिल हैं. फिर भी मैंने उन्हें विस्तार में शामिल नहीं किया ताकि उनके मंत्री बनने से वंचित रह गए दूसरे विधायकों को बुरा नहीं लगे."
राजे ने नरपत सिंह राजवी को भी मंत्री नहीं बनाया. राजवी बीजेपी के कद्दावर नेता दिवंगत भैरों सिंह शेखावत के दामाद हैं. इससे उनका अपने ससुर की राजपूत विरासत का वाहक बनने का सपना अधूरा रह गया है. उनकी बजाए राजे ने राजपाल सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल किया, जो आरएसएस से जुड़े होने के बावजूद उनके लिए ज्यादा मुश्किल पैदा नहीं करेंगे. राजपाल को राजे ने शहरी विकास और आवास जैसे महत्वपूर्ण महकमे की जिम्मेदारी दी है. उन्होंने राव राजेंद्र सिंह को भी मंत्री नहीं बनाया. वे अपनी बुद्धिमत्ता और स्वतंत्र नजरिए की वजह से राजे के लिए मंत्रिपरिषद में सर्वानुमति बनाने की राह में रोड़ा बन सकते थे. उन्हें शामिल न करके राजे ने पूर्वाग्रह-रहित और ताॢकक विचारों से मंत्रिपरिषद को वंचित कर दिया है.
उन्होंने ऐसे कुछ अन्य लोगों को भी जगह दी है, जो या तो पहली बार विधायक बने हैं या दूसरे दर्जे के माने जाते हैं. इनमें ऐसे भी हैं जिन्हें संघ का वरदहस्त प्राप्त है और वे जातिगत तथा क्षेत्रीय संतुलन साधने में मंत्रिमंडल से बाहर छोड़ दिए गए वरिष्ठ और स्थापित नेताओं की भरपाई करेंगे. उन्होंने पार्टी के दिग्गज नेता ओम माथुर के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए उन्हीं के इलाके के पुष्पेंद्र सिंह को मंत्री बनाया है.
विस्तार में नए और पुराने, दोनों चेहरे लिए गए हैं, पर उनमें कोई अनुभवी मंत्री नहीं है. चार नए कैबिनेट मंत्रियों में से सुङ्क्षरदर गोयल राजे के पहले कार्यकाल में कुछ वक्ïत के लिए राज्यमंत्री थे. राजपाल सिंह शेखावत और डॉ. राम प्रताप भी मंत्री रह चुके हैं. इनमें प्रताप को राजे विरोधी माना जाता था. किरण माहेश्वरी एकमात्र महिला कैबिनेट मंत्री होंगी. उन्हें उदयपुर में गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए मंत्री बनाया गया है.
राजे के मंत्रिमंडल में नए शामिल राज्यमंत्री हैं—पुष्पेंद्र सिंह, बाबूलाल वर्मा, अर्जुनलाल गर्ग, अमरा राम, कृष्णेंद्र कौर दीपा, वासुदेव देवनानी, राजकुमार रेणवां, सुरेंद्र पाल टीटी, ओटा राम देवासी और अनीता भदेल. दीपा काफी अनुभवी राजनीतिक हैं. वे लंबे समय से अलग-अलग पार्टियों से या निर्दलीय चुनकर विधानसभा पहुंचती रही हैं. भरतपुर में उनकी जाट-राजशाही पृष्ठभूमि पार्टी के लिए फायदेमंद होगी.
देवनानी को उनकी काबिलियत के मुताबिक विभाग नहीं मिला है पर उनके पास शिक्षा विभाग में खुद को साबित करने का मौका है. वे कट्टर आरएसएस के आदमी हैं लेकिन कभी राजे-विरोधी नहीं रहे, जैसा कि चतुर्वेदी और ओंकार सिंह लखावत कभी रहे थे. दोनों हालांकि बाद में अपनी राजे-विरोधी छवि से निजात पाने में सफल रहे. इसका नुकसान अजमेर क्षेत्र की राजनीति में लखावत गुट के विरोधी माने जाने वाले देवनानी को उठाना पड़ा, जिन्हें कभी उनका हक नहीं दिया गया. उनकी प्रतिद्वंद्वी अनीता भदेल लखावत के समर्थन के बल पर आज मंत्रिपरिषद में देवनानी की समकक्ष हैं, बावजूद इसके कि वे पहली बार मंत्री बनी हैं.
मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए राजे ने बीजेपी में अपने विरोधियों को किया चित
अपने विरोधी बीजेपी नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल न करके राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने एक बार फिर अपनी ताकत का एहसास कराया.

अपडेटेड 3 नवंबर , 2014
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