रात का समय है. भीड़ है. तभी एक शख्स पुकारते हुए आता है, ''सुनो भाई सेठ साहूकार, मैं हजार मुद्रा में खुद को बेच रहा हूं, किसी को लेना है तो ले लो." उसकी पत्नी बोलती है, ''कोई मुझे खरीद लो तो बड़ा उपकार होगा." मां और पिता की बातों को आगे बढ़ाते हुए बेटा कहता है, ''कोई मुझे ले लो बड़ा उपकार होगा." भीड़ की सांसें उत्सुकता से थमी हैं कि आगे क्या होगा. पिछले हफ्ते यह नजारा था पटना के बाढ़ अनुमंडल के पंडारक गांव का, जहां भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकसत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का मंचन हो रहा था. इसमें हरिश्चंद्र की पत्नी की भूमिका में पटना की रूबी खातून थीं तो हरिश्चंद्र की भूमिका में पंडारक के रविशंकर. बेटे की भूमिका में रविशंकर की आठ वर्षीया बेटी अपर्णा थी. अपर्णा अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी की नुमाइंदगी कर रही है जो अभिनय में शामिल हो चुकी है. उसके दादा राम मनोहर शर्मा अब भी अभिनय करते हैं. इसी तरह यहां के दीपक भी अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के रंगकर्मी हैं.
ये इक्के-दुक्के उदाहरण नहीं हैं. करीब 15,000 की आबादी वाले पंडारक में कई परिवारों की तीसरी या चौथी पीढ़ी अभिनय कर रही है. हर घर में हरिश्चंद्र, राम, रावण, भगत सिंह, गांधी जैसे किरदार मिल जाते हैं. आलम यह है कि वे किरदारों से जाने जाते हैं. समाज का शिकार नाटक में कमलेश्वरी सिंह ने चौधरी की भूमिका की तो वे चौधरी के नाम से मशहूर हो गए. इस बार दशहरे में यहां दर्जन भर नाटकों का मंचन हुआ.
यहां की नाट्य परंपरा का इतिहास 100 साल पुराना है. इसके शुरू होने की कहानी भी दिलचस्प है. 1911 में स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद शर्मा कांग्रेस के गया अधिवेशन में गए जहां इंदर सभा नाटक का मंचन हुआ था. उसी की प्रेरणा से 1912 में उन्होंने घर के कैंपस में ही मंचन शुरू किया. गांव के रमेश शर्मा कहते हैं, ''नाटकों से लोगों को आजादी के लिए प्रेरित किया जाता था."
इस बार दशहरे में यहां बड़ा बदलाव हुआ कि पहली बार गांव की किसी महिला ने अभिनय में हिस्सा लिया. चौधरी की 18 वर्षीया पौत्री सौम्या भारती ने सीता की भूमिका निभाई. इससे पहले पटना से महिला कलाकारों की कमी पूरी की जाती रही है. हिन्दी नाटक समाज गांव की पहली नाट्य संस्था थी, जिसके जरिए यह परंपरा शुरू हुई थी. अब कला मंदिर, किरण कला निकेतन, पुण्यार्क कला निकेतन, कला कुंज, नव आट्र्स, आजाद कला जैसी कई संस्थाएं बन गई हैं. सभी संस्थाएं 25 साल या उससे ज्यादा पुरानी हैं. शुरुआत में यहां एक मंच ही था अब दो स्थायी मंच हैं. नाटकों के प्रति लगाव ही है कि स्थानीय रंगकर्मी राम मनोहर शर्मा के पिता श्रीपति नारायण सिंह अपनी 22 कट्ठा जमीन मंचन के लिए दे चुके हैं. शर्मा कहते हैं, ''छात्र हों, किसान, हों, नौकरीपेशा या कारोबारी, सभी दिलचस्पी लेते हैं." रंगकर्मी कृष्ण मुरारी शर्मा और अभिमन्यु कुमार जैसे ग्रामीणों ने कई नाटक लिखे भी हैं.
यहां कई हस्तियां आ चुकी हैं. 1956 में शम्मी कपूर, शशि कपूर और पृथ्वीराज कपूर यहां आए थे. रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष 'बेनीपुरी' सरीखे साहित्यकारों ने यहां की परंपरा की सराहना की थी. यहां भिखारी ठाकुर के बिदेसिया, विजय तेंदुलकर का घासीराम कोतवाल, चतुर्भुज के कङ्क्षलग विजय, हबीब तनवीर के चरण दास चोर जैसे मशहूर नाटकों का मंचन हो चुका है.
लेकिन सरकार और संस्कृति विभाग ने कभी पंडारक को तवज्जो नहीं दी. रंगकर्मी अजय कुमार कहते हैं, ''यहां के रंगकॢमयों को कस्बाई होने की सजा मिलती रही है. ये बाहर भी नाटकों का मंचन करते रहे हैं, पर सरकार की ओर से इन्हें कोई बढ़ावा नहीं मिला." वैसे रंगकर्मियों को ट्रेंड करने के लिए एनएसडी से पासआउट मिथिलेश राय और पुंज प्रकाश कई वर्कशॉप कर चुके हैं. पटना के रंगकर्मी भी सहयोग करते हैं. उन्हीं में से एक अनीश अंकुर कहते हैं, '' पंडारक गांव में नाट्य परंपरा के जीवंत रहने की सबसे बड़ी वजह है कि इसने गुणवत्ता और आधुनिकता के तालमेल को बनाए रखा है. पंडारक का इलाका सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र रहा है. इस इलाके के करीब 350 गांवों में नाटकों का मंचन होता है."
एक गांव जिसने एक सदी से अपने दम पर जिंदा रखा है नाट्य परंपरा
बिहार के एक गांव पंडारक में एक सदी के कायम है नाट्य मंचन की जीवंत परंपरा, लेकिन सरकार उदासीन.

अपडेटेड 20 अक्टूबर , 2014
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