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ये हैं हमारे देश में कुछ अजीबोगरीब और बेतूके कानून

आप भले न जानें कि कौन-सा कानून तोड़ रहे हैं पर जेल की हवा जरूर खा सकते हैं. पीएमओ के मुताबिक ऐसे 1,382 बेतुके कानून हैं जिन्हें निरस्त करने की जरूरत है.

अपडेटेड 9 सितंबर , 2014
आप जानते हैं कि पतंग उड़ाने पर आपको जेल हो सकती है? एक 80 साल पुराने कानून के मुताबिक आपको पतंग उड़ाने के लिए भी विमान उड़ाने की तरह परमिट की जरूरत है. फिर, 65 साल पुराने कानून के मुताबिक दिल्ली में अगर टिड्डी दल का हमला हो तो सड़कों पर जोर-जोर से ड्रम बजाने के लिए लोगों को बुलावा भेज सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि 127 साल पुराने एक कानून के मुताबिक आपको किसी होटल में जाकर मुफ्त में पानी पीने और निवृत्त होने या हाथ-मुंह धोने का अधिकार है? यही क्यों, 136 साल पुराना कानून कहता है कि सड़क पर पड़े 10 रु. पाकर आप चुप रह गए तो जेल की हवा खानी पड़ सकती है? और आंध्र प्रदेश में तो मोटर वेहिकल इंस्पेक्टर बनने के लिए आपको अपने दांत साफ करना जरूरी है. 100 साल पुराने एक कानून के मुताबिक अगर आपके दांत सुंदर न हुए तो आप इसके लिए अयोग्य करार दिए जा सकते हैं.
 
भारत में ऐसी कानूनों की इफरात है जो बेतुके, अप्रासंगिक और अजीबोगरीब हैं. जरूरी नहीं कि ये कानून बुरे ही हों लेकिन ये धुआं उड़ाते रेल इंजनों की तरह पुराने पड़ गए हैं. लेकिन ध्यान रखिए, ये कानून आज भी जिंदा हैं और इनके उल्लंघन पर आप कठघरे में पहुंच सकते हैं. देश में करीब 3.1 करोड़ मामले लंबित हैं जिनके निबटारे में 364 साल लगेंगे, बशर्ते न्यायाधीशों की संख्या प्रति 10 लाख लोगों पर 10.5 की हो. ऐसे में क्या हमें यह हक मिलता है कि अपनी विधि-व्यवस्था को पुराने और अप्रासंगिक कानूनों से और बोझिल कर लें? अच्छी खबर यह है कि कानूनी मशीनरी के पहिए अब आगे बढऩे लगे हैं. 11 अगस्त को केंद्र सरकार ने लोकसभा में 36 कानूनों को निरस्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया है. और 28 अगस्त को  पुराने और बेमतलब कानूनों की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई गई है.  लेकिन क्या यह देश के विधि-विधान से अप्रासंगिक कानूनों को छांटने में कामयाब हो पाएगी?

मुझे 10 कानून बताइए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की गद्दी संभालने के पहले, 27 फरवरी को दिल्ली में उद्योगपतियों और कारोबारियों की एक सभा में कहा था, ‘‘हमारी जिंदगी, कार्यस्थल और कारोबार को नियंत्रित करने के लिए कानूनों का कितना विशाल जाल है.’’ और प्रधानमंत्री नियुक्त होने के फौरन बाद उन्होंने केंद्रीय सचिवों से कहा कि ‘‘आप अपने विभाग से संबंधित मुझे 10 ऐसे कानून या नियम बताइए जिन्हें हम निरस्त कर सकते हैं.’’ 5 जून को कैबिनेट सचिव अजित सेठ ने आला अफसरशाहों को 11 दिशा-निर्देशों के साथ एक नोट भेजा. इनमें एक पुराने नियमों, कानूनों और ऐसी तमाम प्रक्रियाओं को चिन्हित करने से संबंधित था जिनसे कामकाज बाधित होता हो और जिन्हें निरस्त करने की जरूरत हो. केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसी महीने संसद में रिपीलिंग ऐंड एमेंडिंग बिल 2014 पेश किया. उन्होंने 15 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की एक सभा में कहा, ‘‘मैं यह तय करूंगा कि संसद के अगले सत्र में करीब 300 पुराने कानून निरस्त कर दिए जाएं.’’ 

उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी ले ली है. प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक करीब 1,382 पुराने कानूनों को निरस्त करने की जरूरत है. प्रधानमंत्री कार्यालय में सचिव आर. रामानुजम की अगुआई में बनी नई समिति पहले पुराने प्रशासकीय कानूनों की समीक्षा करेगी और तीन महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी. लेकिन समिति को कैसी दिक्कतों का सामना करना होगा? पहले तो यही स्पष्ट नहीं है कि ‘‘कानून’’ शब्द का अर्थ क्या है? आखिर किसे हम कानून का दर्जा देंगेरू केंद्रीय कानूनों, या राज्य स्तरीय कानूनों, नियमों, अधिसूचनाओं और प्रशासकीय कामकाज के लिए तय मान्यताओं या सामान्य वैधानिक परंपराओं, विशेष समुदायों के लिए बने पर्सनल लॉ या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को, जो कानून बन गए हैं?  यह उलझन भी पैदा होती है कि किसे निरस्त करना हैः कई बार पूरा कानून ही बेमानी होता है तो कई मामलों में उसकी कुछ धाराएं बेमानी हो सकती हैं.

अब इसमें यह तथ्य भी जोड़ लीजिए कि देश में लागू कानूनों की कोई संपूर्ण सूची उपलब्ध नहीं है. केंद्रीय कानूनों की संख्या अनुमानित 3,000 के करीब बताई जाती है. इसी तरह, 1998 में गठित जैन आयोग ने अनुमान लगाया था कि 25,000-30,000 के आसपास राज्यों के कानून हो सकते हैं. इसके अलावा प्रशासकीय और स्थानीय कानूनों की तो गणना ही संभव नहीं है. न्यायविद् सोली सोराबजी कहते हैं, ‘‘इसी वजह से पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को निरस्त करना असंभव बन जाता है.’’ लेकिन यह भी सही है कि जब तक कोई कानून विशेष रूप से निरस्त न किया जाए, वह कभी मरता नहीं है. देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल  बताते हैं, ‘‘इसी वजह से पुराने और बेमतलब हो गए कानूनों को सीधे-सीधे निरस्त कर देना चाहिए.’’
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अंग्रेजों की विरासत को बोझ
आखिर देश में पुराने और निष्क्रिय कानूनों को निरस्त करने में इतनी दिक्कत क्यों हो रही है? क्या यह औपनिवेशिक विरासत का नतीजा है? आखिरकार आजादी के 65 साल बाद भी देश के विधि-विधान में अंग्रेज अपनी विरासत लिए मानो आज भी बैठे हुए हैं. भारतीय रेलवे के ही 38 पुराने नियम नवंबर 2012 में इतिहास के कूड़ेदान में डाले जाने के पहले सक्रिय थे.

ढेर सारी कानूनी पेचीदगियां तो औपनिवेशिक विरासत की वजह से हैं. करीब 192 कानून तो 100 साल से अधिक पुराने हैं. इनमें बारंबार ईस्ट इंडिया कंपनी, ब्रिटिश ताज, गवर्नर जनरल या प्रिवी काउंसिल का जिक्र है. हमारे विधि-विधान में दो कानून तो 178 साल पुराने हैं. ये बंगाल इंडिगो कॉन्ट्रैक्ट्स ऐक्ट और 1836 का बंगाल डिस्ट्रिक्ट ऐक्ट हैं. इन दोनों के जरिए अंग्रेजों को तब की नकदी फसल नील की खेती को बढ़ावा देने और अपने हिसाब से नए जिले बनाने में मदद मिली थी. इसी तरह 1938 का बंगाल बॉन्डेड वेयरहाउस एसोसिएशन ऐक्ट कहता है कि एसोसिएशन अपनी संपत्ति सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच सकती है.

यह विरासत दूसरे मकसद भी पूरा करती है. मसलन, भारत के मद्य कानून को ही लें. संविधान के निर्माताओं ने जब अनुच्छेद 47 की रचना की तो महात्मा गांधी के नजरिए ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, जिसमें लिखा गया, ‘‘राज्य चिकित्सा संबंधी जरूरतों के अलावा पूर्ण मद्यनिषेध के लिए कोशिश करेगा....’’ लेकिन राजस्व घाटे और बढ़ते काला बाजार ने इस उद्देश्य को असंभव बना दिया. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इसे दो बार लागू करने की असफल कोशिश की. 2012 में मुंबई में पार्टीबाजों पर अंकुश के लिए पुलिस ने 63 साल पुराने 1949 के बॉम्बे मद्य निषेध कानून को आधार बनाया और 25 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए लाइसेंस जरूरी कर दिया वरना 50,000 जुर्माना और/या 5 साल की कैद झेलनी होगी. 

पहिया घूमा
आखिर 1958 में एम.सी. सीतलवाड की अगुआई में विधि आयोग ने अंग्रेजों के बनाए पुराने कानूनों की समीक्षा की और देश में उनकी प्रासंगिकता को तौलकर 1866 के कन्वर्टर्स मैरेज डिजोल्यूशन ऐक्ट को निरस्त करने की सिफारिश की. दिल्ली में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रोफेसर, अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय कहते हैं, ‘‘1961 में जाकर पहला निरस्त करने का कानून लागू हो पाया.’’ उसी साल ब्रिटिश इंस्टीट्यूट्स (एप्लीकेशन टु इंडिया) रिपील ऐक्ट पारित हुआ और उसके बाद 1964, 1974 और 1979 में छोटे-मोटे निरस्त कानून पारित हुए. विधि आयोग ने 1984 में सिफारिश की कि पुराने केंद्रीय कानूनों पर एक व्यापक रिपोर्ट बनाई जाए. देबरॉय कहते हैं, ‘‘लेकिन एक झटके में सब साफ करने की मामला तब भी नहीं बना. यह माहौल 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद शायद जोर पकड़ पाया.’’

व्यापक असर वाले कानून
वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार, अर्थशास्त्री अशोक देसाई ने 1993 में देबरॉय से विधि सुधारों पर एक प्रोजेक्ट बनाने को कहा. तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह 1973 के विदेशी मुद्रा विनिमय कानून (फेरा) को बदलना चाहते थे. और इसे ही सभी आर्थिक और वाणिज्यिक कानून की समीक्षा करने का मौका बनाया गया. यूएनडीपी की आर्थिक मदद और बंगलुरू में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी की मदद से 1998 में लीगल एडजस्टमेंट ऐंड रिफॉर्म्स फॉर ग्लोबलाइजिंग द इकोनॉमी (लार्ज) प्रोजेक्ट तैयार हुआ. देबरॉय कहते हैं, ‘‘कानूनों की पहचान करने में तो लार्ज सफल नहीं हुआ लेकिन इससे माहौल बदलने में काफी सहायता मिली.’’

दरअसल लार्ज ने वाणिज्यिक और आर्थिक कानूनों का ही डाटाबेस तैयार किया. यह संयुक्त मोर्चा सरकार में मई, 1997 में पी.सी. जैन की अगुआई में बनी चार सदस्यीय समिति के लिए उपयोगी साबित हुआ. सभी केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और सरकारी विभागों से कहा गया कि अपने-अपने क्षेत्र में प्रासंगिक कानूनों की समीक्षा करें और उनकी सूची बनाएं. अप्रैल, 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कदम आगे बढ़ाया और सभी कानूनों और प्रक्रियाओं की व्यापक समीक्षा करने का वादा किया. समिति ने 1,300 कानूनों की सूची बनाई जिन्हें निरस्त करने की दरकार थी और हर कानून के साथ एक ‘‘सनसेट प्रोविजन’’ जोडऩे की सिफारिश की ताकि वे एक विशेष अवधि के बाद अपने आप निरस्त हो जाएं. केंद्रीय कानून मंत्री अरुण जेटली के कार्यकाल (2000-2002) में  200 पुराने कानून निरस्त किए गए. 

पतंग उड़ाने से जुड़े पचड़े भी कम नहीं हैंबाबुओं का पचड़ा
1998 की रिपोर्ट में अफसरशाही पर काफी कुछ कहा गया था जो न सिर्फ कानूनों के बोझ को कम करने में नाकाम रही थी, बल्कि उसे बढ़ाया ही था. 1996, 1999-2000 में केंद्रीय कानून मंत्री रहे न्यायविद् राम जेठमलानी कहते हैं, ‘‘अकसर अफसरशाही कानून परिवर्तन के रास्ते में रोड़ा बन जाती है.’’ वे बताते हैं, ‘‘मैंने कानून की समीक्षा करने के लिए एक कमेटी बनाई थी. विशेषज्ञों ने सलाह दी कि करीब 1,200 कानून बेमानी हो गए हैं और उन्हें निरस्त करने की दरकार है.’’ लेकिन जेठमलानी ने जब यह रिपोर्ट अफसरशाहों को थमाई तो वे अजीब-सी सलाह लेकर उपस्थित हुए, ‘‘सर, सिर्फ 12 कानूनों को निरस्त करने की दरकार है.’’ बकौल जेठमलानी, ‘‘वजह यह है कि हर कानून से कुछ अफसरशाहों को कुछ अधिकार मिल जाते हैं. इसलिए 1,200 अधिकारों को वे हटाना नहीं चाहते.’’ 2000 में 1923 के बेतुके इंडियन ब्वॉयलर्स ऐक्ट को निरस्त करने के दौरान के वाकए को वे याद करते हैं, ‘‘यह लंबे समय से बेमतलब हो गया था. ऐसे ब्वॉयलर्स अब थे ही नहीं लेकिन कानून बना हुआ था.’’

राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव
कई लोग राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव का जिक्र करते हैं. 18वें विधि आयोग में पुराने पड़ गए कानूनों की फेहरिस्त बनाने के प्रभारी रहे न्यायविद् ताहिर महमूद कहते हैं, ‘‘19वीं सदी के कानूनों को बिना संशोधित किए लागू रखना मूर्खता के सिवा और क्या है. लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति किसके पास है?’’ वे बताते हैं कि पिछले 10 साल से विधि आयोग के कामकाज की शर्तों में हमेशा पुराने कानूनों को निरस्त करने की सिफारिश जुड़ी रही है. आयोग की रिपोर्टें भी सही समय पर आती रही हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. वे कहते हैं, ‘‘कानून मंत्रालय में बैठे लोग पुराने कानूनों पर नजर दौड़ाने को तैयार नहीं होते. उन्हें इसके राजनैतिक दुष्प्रभाव का डर सताता रहता है.’’ यही क्यों, सरकारी तंत्र में ‘‘लालफीताशाही और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह’’ की भरमार है. दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि विभाग के पूर्व डीन महमूद कहते हैं, ‘‘हर तीन साल में सरकार नया आयोग बिठाने में अपने पैर पीछे खींचती रही है. इससे काम अटकता रहा है.’’

कानून अचानक पुराने या बेमानी नहीं बन जाते. वकील के.टी.एस. तुलसी कहते हैं, ‘‘देश में गंभीर सांस्कृतिक, आर्थिक या राजनैतिक परिवर्तनों से ही कुछ कानूनों में संशोधन की दरकार पड़ती है. हम बैलगाड़ी के दौर की तकनीक के सहारे सुपरसोनिक युग की न्याय-व्यवस्था चलाना चाहते हैं.’’  इसमें समन से लेकर जमानतों तक सभी कुछ व्यक्तियों के सहारे है. न्याय में देरी की पचास फीसदी वजह तो समन देने में देरी, समन की वैधानिकता पर दलीलों, वाजिब पहचान वगैरह के कारण होती हे. वे बताते हैं, ‘‘2जी जैसे बहुचर्चित मामले में कागजात बोरे में भरकर आरोपियों और अदालत के बीच लाए और ले जाते रहे.’’ पुरानी प्रक्रियाओं से अदालतों में मामले लंबित होते रहते हैं और कानून की किताबें मोटी होती जाती हैं.

अच्छे कानून, बुरे कानून
देश में कई कष्टकारी कानून हैं और अनेक ऐसे हैं जिन्हें निरस्त कर देना चाहिए. इसका यह मतलब नहीं है कि भारत की कानून-व्यवस्था की बुनियाद मजबूत नहीं है. जेठमलानी कहते हैं, ‘‘यह अपराध से संबंधित भारतीय दंड संहिता को ही लें. उसका मजमून 1860 के दशक में लॉर्ड मैकाले ने तैयार किया था, वक्त के इम्तिहान में यह खरा उतरा है.’’ तुलसी कहते हैं, ‘‘भारत का संविधान सबसे उम्दा है. यह अमेरिकी संविधान से प्रशासन का बेहतर दस्तावेज है.’’ सोराबजी बताते हैं, ‘‘दमें बस कुछ साफ-सफाई की दरकार है.’’ तो, आइए उन कानूनों की बात करें जो बेमानी और बेतुके हैः

इंडियन एयरक्राफ्ट ऐक्ट, 1934: पतंग उड़ाने का जोखिम दोपहर में छत पर पतंग जरा संभल कर उड़ाइए.  आप जेल भी जा सकते हैं क्योंकि विमान उड़ाने की तरह ही आपको पतंग बनाने,रखने, बेचने या उड़ाने के लिए परमिट की दरकार है.

इंडियन मोटर वेहिकल ऐक्ट, 1914: दंत कथा आंध्र प्रदेश में मोटर वेहिकल इंस्पेक्टर बनना चाहते हैं तो दांतों को खूब मांजिए, वरना अयोग्य ठहरा दिए जाएंगे. 


ईस्ट पंजाब एग्रीकलचर पेस्ट्स, डिजीज ऐंड नोक्सोसियस वीड्स ऐक्ट, 1949: दुस्साहसी दिल्ली दिल्ली के लोगों तैयार रहो. अगर शहर में टिड्डी दल का हमला हो गया तो आपको सड़कों पर ड्रम बजाने के लिए किसी भी वक्त बुलाया जा सकता है. नहीं आए तो 50 रु. का जुर्माना या जेल हो सकती है.

इंडियन सराय ऐक्ट, 1887 : मुफ्तिया होटल आप जानते हो कि 127 साल पहले के कानून के मुताबिक आप किसी होटल में पीने का पानी और शौचालय की सुविधा मुफ्त में पा सकते हो?

फैक्टरीज ऐक्ट, 1948: सही-सही करो किसी फैक्टरी में जाओ तो थूकने के पात्र में ही थूको (वरना 5 रु. जुर्माना भरो), मालिक दीवार पर चूना लगाएगा (रंग नहीं), मिट्टी की सुराही में ही पानी रखो, आग बुझाने के लिए लाल बाल्टी में बालू रखो और बिजली की गणना हार्स पावर में करो (किलोवॉट में नहीं).

इंडियन पोस्ट ऑफिस ऐक्ट, 1898 : कूरियर झमेले निजी कूरियर सेवा तकनीकी तौर पर गैर-कानूनी है. सिर्फ सरकार को ही चिट्ठियों के वितरण का अधिकार है. हालांकि वे चिट्ठियों को दस्तावेज बताकर छूट पा सकते हैं.

प्रिवेंशन ऑफ सेडिसियस मीटिंग्स ऐक्ट, 1911: टोपी का फेर भारत की जेल में आप खादी की गांधी टोपी नहीं पहन सकते. 1911 में गोपाल कृष्ण गोखले ने लिखा था, ‘‘हम सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं.’’ हम तो आज भी इसे दुर्भाग्यपूर्ण कहते हैं.

लाइसेंसिंग ऐंड कंट्रोलिंग प्लेसेज ऑफ एम्युजमेंट (अदर दैन सिनेमा), 1960 : दस पर बस एक ही डांस फ्लोर पर दस जोड़ों से ज्यादा का डांस करना गैर-कानूनी है.

इंडियन टेलिग्राफ ऐक्ट, 1885: नए-पुराने में फर्क नहीं रेडियो (1923) और टेलीविजन (1959) को एक ही 129 साल पुराने कानून के तहत कैसे रखा जा सकता है.

द पुलिस ऐक्ट, 1861: टोपी सलामी पुलिस वालों को आज भी शाही खानदान को देखकर टोपी उतारकर सलामी देनी पड़ सकती है. लेकिन शाही खानदान है कहां?

गंगा टोल ऐक्ट, 1867: पैसे का चक्कर अब आना तो है नहीं कि खर्च किया जाए मगर गंगा में नाव पर प्रति सौ मन सामान पर 12 आना देना पड़ सकता है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 294 (ए), 1860  : अश्लील हरकत आप सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करते पाए गए और लोगों की नजरों में आए तो जेल या जुर्माना या दोनों झेलना पड़ सकता है. नजरों में आने का क्या अर्थ है, यह स्पष्ट नहीं है. आप चाहें तो किसी पर यह आरोप मढ़ सकते हैं.

भारतीय दंड संहिता की धारा 309 : करो और मरो खुदकुशी कानूनी है मगर उसकी कोशिश नहीं. आप कोशिश सफल रही तो मर जाएंगे मगर नाकाम हुए तो पकड़े जाएंगे.

द इंडियन ट्रेजर ट्रोव ऐक्ट, 1878 : पाओ और फंसो आप सड़क पर चाहे 10 रु. का नोट ही क्यों न पा जाएं और अगर इसकी खबर न दें तो 136 साल पुराने कानून के मुताबिक आप जेल जा सकते हैं.  

अवध ताल्लुकादार रिलीफ ऐक्ट, 1870: कहां है अवध? अवध के नवाब तो न जाने कब के विदा हो गए और उनके ताल्लुकेदार भी अब कहीं नहीं दिखते. लेकिन अवध के लिए आज भी एक कानून 1908 का आगरा प्रोविंस नाम से बना हुआ है.

भारतीय रिजर्व बैंक ऐक्ट, 1934 : अस्थायी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक, भारत का यह केंद्रीय बैंक एक अस्थायी निकाय है, और आज भी वैसा ही बना हुआ है.

द बंगाल बॉन्डेड वेयरहाउस एसोसिएशन ऐक्ट, 1938 : अंग्रेजों का बोझ यकीन कीजिए, 176 साल पुराना यह कानून आज भी जिंदा है. इसके मुताबिक, एक समूह अपनी संपत्ति सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी को ही बेच सकता है.

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा-497: पुरुष अपराध किसी की पत्नी से संबंध बनाने के लिए सिर्फ विवाहित पुरुष ही दंड का भागी हो सकता है. अगर उसने अविवाहित स्त्री से संबंध बनाए तो कानून इसे विवाहेतर संबंध नहीं मानता. इस कानून के मुताबिक, स्त्री तो विवाहेतर संबंध बना ही नहीं सकती.

ऑफिशियल सीक्रेट्स ऐक्ट, 1923: गुप्त हथियार आरटीआइ कार्यकर्ता सावधान. एक कानून आपको और/या उस अफसरशाह को 14 साल तक की जेल दिला सकता है, जो आपको सरकारी दफ्तर की सूचनाएं दे रहा हो.

इंडियन मेजरिटी ऐक्ट, 1875  : अविवाहित बाप लड़कियां तो 18 साल की उम्र में शादी कर सकती हैं और लड़कों को 21 साल तक की उम्र का इंतजार करना पड़ता है. लेकिन शादी न होने से क्या आप बाप नहीं बन सकते? जरा सोचिए, कानून तो लड़कों को 18 साल की उम्र में ही गोद लेने का अधिकार देता है.

1867 के सराय ऐक्ट के मुताबिक सभी होटल सराय हैं
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