वाकया 1980 का है. मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक हिंसा से गुस्से में सैयद अब्दुल करीम टुंडा मुंबई के पास भिवंडी की मस्जिदों में जाकर मुसलमानों पर होने वाले जुल्म के खिलाफ तकरीरें करने लगा. वहां इस्लामी संप्रदाय अहले-हदीस से जुड़े लोग पहुंचते थे. वह मुस्लिम युवाओं को जेहाद के लिए उकसाने लगा.
दिल्ली के दो किशोर उम्र के लड़कों अब्दुल हक और अब्दुल वाहिद पर उसका जादू चल गया और वे टुंडा की मुहिम में शामिल हो गए. टुंडा आगे चलकर लश्करे तैयबा (एलईटी) के लिए बम बनाने वाला एक खतरनाक आतंकवादी बन गया. 1990 के दशक में उसके माड्यूल ने कई बम विस्फोट किए. अब 72 वर्ष के हो चुके टुंडा को पिछले साल नेपाल की सीमा पर पकड़ा गया था. वहां वह आतंकवादी गतिविधियों के लिए कुछ नए लड़कों की तलाश में लगा हुआ था.
रंगरूट भर्ती करने की टुंडा की मुहिम के करीब तीन दशक बाद प्रतिबंधित संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) के सदस्य सुल्तान सल्फी के लिए लड़कों को भर्ती करने का काम अब अपेक्षाकृत आसान हो गया है. सल्फी ने छद्म नाम ‘‘मूसा’’ से फेसबुक पर एक बहस का मंच शुरू किया, जहां इस्लाम, जेहाद और इस्लाम के राज जैसे विषयों पर गहराई से चर्चा होती थी. उसने इस मंच के जरिए जयपुर में इंजीनियरिंग के चार छात्रों से संपर्क कायम कर लिया.
उन छात्रों की उम्र 18 से 22 साल के बीच थी. वे लड़के, जो अब गिरफ्तार हो चुके हैं, इस्लाम के बारे में कुछ सवालों का जवाब चाह रहे थे. मूसा ने उनसे भारत में मुसलमानों की दशा के बारे में बात की और उन्हें हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए उकसाया. मूसा को जब यकीन हो गया कि वे लड़के जेहाद के लिए तैयार हैं तो पाकिस्तान में आइएम के गुर्गे रियाज भटकल ने भारत में अपने गुट के खास सदस्य तहसीन अख्तर से संपर्क करने के लिए पालटॉक मेसेंजर पर एक फर्जी पहचान का इस्तेमाल किया और उसे जयपुर के लड़कों से संपर्क करने को कहा. इसके बाद अख्तर ने उन्हें विस्फोटक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया.
टुंडा से लेकर सल्फी और भटकल तक के आतंकवाद का मकसद एक ही है, लेकिन उनके तरीकों में भारी बदलाव आ चुका है. आज नए लड़कों की तलाश करने और उन्हें उकसाने के लिए भौगोलिक या राजनैतिक सरहदें कोई बाधा नहीं हैं. जांचकर्ताओं का कहना है कि अब आतंकवादी गतिविधियों के लिए लड़कों की तलाश में मदरसों या मस्जिदों में जाने की जरूरत नहीं पड़ती है. इसकी जगह इंटरनेट पर चैटरूम का सहारा लिया जा रहा है. चैटिंग के जरिए उन्हें धर्म के नाम पर भड़काया जाता है और उन्हें हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है.
सुरक्षा एजेंसियों के शब्दों में यह ‘‘इंटरनेट जेहाद’’ की एक नई और खतरनाक दुनिया है. इन आतंकवादियों का मिशन बम बनाना, उसे मनचाही जगह पर रखना और फिर चुपके से चंपत हो जाना है. आइएम के सह-संस्थापक यासीन भटकल जैसे उग्रवादी इसी तरीके को अपनाकर वर्षों से देश भर में घूमते रहे और उनके बारे में किसी को खबर तक नहीं लगी. हर आतंकवादी हमले के साथ उनका हौसला बढ़ता गया.
भर्ती का आसान रास्ता
लड़कों को आतंकी बनाना और उन्हें अपने गुटों में भर्ती करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल दुनिया भर में चिंता का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि जांच एजेंसियों के लिए कानूनी रूप से इसका सामना करना कठिन साबित हो रहा है. अभी एक ताजा मामले में बताया जा रहा है कि 18 भारतीय युवक इराक में इस्लामिक स्टेट (आइएस) संगठन में शामिल हो गए हैं. पिछले साल सिंगापुर का एक भारतीय युवक कथित रूप से सीरिया में विद्रोहियों के साथ शामिल हो गया, जबकि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला श्रीनगर का एक व्यक्ति कथित रूप से सीरिया चला गया.
जांचकर्ताओं ने भारत में सबसे पहले 2004-05 में इंटरनेट के इस्तेमाल का पता लगाया. शुरू में इस मीडियम का इस्तेमाल अपने काडरों के बीच प्रचार और संपर्क के लिए किया जाता था, लेकिन पिछले दशक में आतंकवादी संगठनों ने लड़कों को भर्ती करने, प्रचार करने और उनसे बातचीत करने के लिए इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी, जो अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते, कहते हैं, ‘‘आतंकी बनाने की प्रक्रिया के दौरान लड़कों को व्यक्तिगत रूप से मौजूद तो रहना पड़ता है, लेकिन इंटरनेट संपर्क स्थापित करने का काम करता है.’’
यासीन भटकल ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को जो बयान दिया, उससे इस बात की पुष्टि होती है. ‘‘यासीन कहता है कि उसने मुस्लिम लड़कों को उकसाने के लिए उन लोगों की कहानियां सुनाईं, जो पहले जेहाद में हिस्सा ले चुके थे. उसने उन दस्तावेजों को डाउनलोड किया था, जिनमें जेहाद को हर मुस्लिम के लिए जरूरी बताया गया है. उसने ओसामा बिन लादेन, अल यज़ीद, अल जरकावी और अवलकी जैसे मुस्लिम नेताओं और लड़ाकों की तकरीरों को डाउनलोड किया था. उसने मुस्लिम लड़कों को ये वीडियो व डाक्यूमेंट दिखाए ताकि उन्हें जेहाद की खातिर अपनी जिंदगी कुर्बान करने के लिए प्रेरित किया जा सके.’’
‘‘यासीन ने उन्हें विस्फोटक और आइईडी (देशी बम) बनाने का तरीका भी सिखाया. इस काम के लिए उसने इंटरनेट से ढेरों डाक्यूमेंट और वीडियो डाउनलोड किए और उन्हें अपने सैमसंग लैपटॉप पर सेव किया.’’

चतुराई भरी गतिविधियां
सुरक्षा एजेंसियों ने 7 सितंबर, 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट के बाहर बम विस्फोट के बाद सबसे पहले आइएम पर शक जाहिर किया. लेकिन इस विस्फोट की जिम्मेदारी लेने का दावा करने वाले एक ई-मेल की जब छानबीन की गई तो जांचकर्ताओं को जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ के एक मेडिकल के छात्र 21 वर्षीय वसीम अकरम मलिक का पता चला. इस मामले की जांच करने वाले एनआइए ने मलिक को ‘‘इंटरनेट का बेहद शौकीन’’ और ‘‘बिना अगुआ के जेहाद’’ में विश्वास रखने वाला बताया.
वह विस्फोट, जिसमें 15 लोग मारे गए थे और 79 लोग घायल हुए थे, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी देने से रोकने के लिए किया गया था. वसीम ने खुद ही इस काम को अंजाम दिया था. उसने हूजी के आतंकवादी आमिर कमाल और छोटा हफीज की मदद से विस्फोटक मंगवाए थे. एनआइए की जांच में उन दोनों का नाम आने के बाद वे दोनों ही सुरक्षा एजेंसियों के हाथों मारे जा चुके हैं.
बंगलुरू में 2012 में एक आतंकवादी गुट, जिसका खात्मा किया जा चुका है, विहिप के नेता प्रवीन तोगडिय़ा जैसी प्रमुख हस्तियों को जान से मारने की योजना बना रहा था. यह गुट चार राज्यों में फैल चुका था और जिन 12 लोगों को पकड़ा गया था, उन्हें बंगलुरू, हुबली, हैदराबाद और महाराष्ट्र के नांदेड़ से गिरफ्तार किया गया था. एनआइए के मुताबिक, उन युवकों को सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिए भर्ती किया गया था और फिर उन्हें लश्करे तैयबा के कमांडर अब्दुल बारी को सौंप दिया गया था.
माना जाता है कि बारी सऊदी अरब से संचालन कर रहा है. 2002 में हैदराबाद के साईंबाबा मंदिर में विस्फोट के मामले में उसकी तलाश है. उन लोगों के पास से जो नक्शे और तस्वीरें मिलीं, उनसे पता चला कि उन्होंने अपने संभावित निशानों की पूरी पड़ताल कर ली थी. इस ढीले-ढाले नेटवर्क में हैदराबाद का ओबैद-उर-रहमान, जिसने बाद में सैयद मकबूल और इमरान को भर्ती किया था, शामिल था. आरोप है कि मकबूल और इमरान आइएम के सरगना रियाज भटकल को रिपोर्ट करते थे और 2012 में पुणे के विस्फोट में उनकी भूमिका थी. भटकल उन्हें छद्म सर्वरों पर बनाए गए फर्जी इंटरनेट चौट आइडी के जरिए निर्देश दिया करता था.
मुंबई में 26/11 का हमला सबसे आधुनिक तरकीब वाले आतंकवादी हमलों में एक था. जिन 10 हमलावरों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को नवंबर 2008 में करीब तीन दिन तक बंधक बनाए रखा, उन्हें पाकिस्तान से वीओआइपी (वाइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल) के जरिए निर्देश मिल रहे थे. भारत में घुसने के लिए उन्होंने जीपीएस ट्रैकर्स का इस्तेमाल किया था, जो पाकिस्तानी-अमेरिकी नागरिक और लश्कर के आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने मुहैया कराए थे.
हेडली ने तीन साल तक अपने निशानों की अच्छी तरह रेकी की थी. उसने और पाकिस्तान में लश्कर के उसके कुछ साथियों ने संपर्क के लिए ई-मेलों में कूट संदेशों का इस्तेमाल किया था. इन कूट संदेशों (कोड) में जो योजनाएं छिपी थीं, वे थीः मुंबई पर हमला करना और फिर कोपेनहैगन और आरहुस में एक डैनिश अखबार जाइलैंड्स-पोस्टेन, के दफ्तरों को बम से उड़ाना शामिल था जिसने मुहम्मद साहब के कार्टून प्रकाशित किए थे.
झांसा देने के जाल
आइएम ने अपनी स्थापना के बाद हर बम विस्फोट की जिम्मेदारी ई-मेल पर लेते हुए तीन साल तक जांचकर्ताओं को छकाए रखा. शुरू में सुरक्षा एजेंसियों ने इन ई-मेलों को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन जब दिल्ली, मुंबई और पुणे में आइएम के सदस्यों को पकड़ा गया तो 2008 में उनकी योजना का खुलासा हो गया. पकड़े गए लोगों में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर मंसूर अहमद पीरभॉय भी शामिल था, जो कथित रूप से इस गुट के मीडिया सेल का काम देखता था. आइएम के हमलों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल के कुछ नमूने इस प्रकार हैः
हैदराबाद में 22 जुलाई, 2008 को बम विस्फोट से चार दिन पहले रियाज और इकबाल भटकल ने उर्दू में एक नोट लिखा. मंसूर ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया और इसकी एक पीडीएफ फाइल बना दी. इसके बाद एक ईमेल आइडी alrbi_gujarat@yahoo.com, बनाई गई और गुट ने 15 मिनट बाद नवी मुंबई में एक अमेरिकी नागरिक केन हेवुड के असुरक्षित वाइ-फाइ का इस्तेमाल करके बम विस्फोट की जिम्मेदारी लेने वाला नोट ई-मेल कर दिया. ई-मेलों को Scribd.com पर भी चर्चा शुरू करने के लिए पोस्ट कर दिया गया. इनका इस्तेमाल ‘‘भर्ती की सामग्री’’ के तौर पर भी किया जाता है.
आइएम के अपने एक साथी के साथ एक चैट में यासीन भटकल ने एक छद्म पहचान के लिए, फ्रीगेट के इस्तेमाल की बात की और Filehippo.com का उल्लेख किया. यह एक ऐसी वेबसाइट मानी जाती है, जो कूटलेखन वाली फाइलें खोलने में मदद करती है.
2013 में उसकी गिरफ्तारी के बाद पता चला कि यासीन ‘‘निंबज’’ के जरिए रियाज से चैट किया करता था और hbahadur@yahoo.com khalida.k@nimbuzz.com, hoowx (MiG33 ID), mail77@yahoo.com, jankarkoo@yahoo.com. जैसी आइडी का इस्तेमाल किया करता था. चौट की भाषा सांकेतिक होती थी और फाइलें कूटभाषा में तैयार की जाती थीं.
यासीन के लैपटॉप पर एनआइए के जांचकर्ताओं को ‘‘आरडीएक्स’’ और ‘‘हाउ टु मेक टीएनटी’’ नाम से एक फाइल मिली. इन फोल्डरों को कथित रूप से इंटरनेट से डाउनलोड किया गया था और कूट फाइलों में उन्हें सेव कर लिया गया था. माना जाता है कि इन फोल्डरों का इस्तेमाल नए तरीके के विस्फोटकों का प्रयोग करने के लिए किया गया था.

पैसे के लेनदेन की कानूनी राह
हाल की गिरफ्तारियों से पता चलता है कि आतंकवादियों के वित्तीय नेटवर्क नकदी और अनौपचारिक तरीके से चलते हैं. अभी तक पैसे हवाला एजेंटों के जरिए भेजे जाते थे, लेकिन अब इसके लिए कानूनी तरीकों का इस्तेमाल किया जाने लगा है. यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि उन्हें पैसों के लेन-देन के सैकड़ों मामलों में संदिग्ध लेन-देन की पहचान करनी होती है.
जैसा कि यासीन ने पूछताछ में बताया कि रियाज अक्सर उसे वेस्टर्न यूनियन के जरिए पैसे भेजा करता था, ताकि कोई शक न हो. लेकिन सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि आतंकवादी अपने गुर्गों और मॉड्यूल को पैसा पहुंचाने के लिए अब भी हवाला एजेंटों का इस्तेमाल कर रहे हैं और ज्यादातर पैसा दुबई के रास्ते से ही आता है.
आतंक की पहचान
आतंकवादी गुटों के तकनीकी के बढ़ते इस्तेमाल ने जांच एजेंसियों के काम को मुश्किल बना दिया है. दिल्ली में 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जब जामा मस्जिद के बाहर विदेशी सैलानियों पर हमला किया गया था तो हमले की जिम्मेदारी लेने वाला आइएम का ई-मेल कनाडा और पाकिस्तान के सर्वरों के जरिए भेजा गया था. आतंकवाद विरोधी एक विशेषज्ञ बताते हैं, ‘‘इसे ओनियन रूटिंग कहा जाता है.
संदेशों को बार-बार कूट भाषा में लिखा जाता है और उन्हें कई नेटवर्क नोडों, जिन्हें ओनियन रूटर कहा जाता है, के जरिए भेजा जाता है. सर्वरों का पता पांच देशों में लगाया जा सकता है और जब तक आखिरी ठिकाने के पते की जांच करना शुरू करते हैं तो पता चलता है कि इसे चार अन्य देशों के जरिए भेज दिया गया है.’’ चूंकि इस काम में विदेशी जमीन पर जांच करनी होती है, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों को उस देश से अनुमति लेने के लिए पत्र भेजने पड़ते हैं, बशर्ते उस देश के साथ कोई सहायता संधि न हो.
उत्तर प्रदेश एटीएस के एक सीनियर अधिकारी कहते हैं, ‘‘ई-मेल आइडी और चैट को बीच में ही पकडऩा बहुत मुश्किल और जटिल काम है. व्हाट्सऐप, वाइबर और स्काइप का इस्तेमाल करके भेजे गए संदेशों का पता लगाना बहुत कठिन है. कूटभाषा में लिखे गए संदेश बातचीत को सुरक्षित बना देते हैं और देशविरोधी तत्व सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं, जैसा कि हमने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ मामलों में पाया.’’
जांचकर्ताओं को हाल में कुछ सफलताएं तब मिलीं, जब उन्होंने एक आतंकवादी माड्यूल के चौट रूम की छानबीन की. दो कथित पाकिस्तानी आतंकवादियों अब्दुल वलीद उर्फ मुर्तजा और फहीम उर्फ मोहम्मद ओवैस को एक चैटरूम में झंसा देकर शामिल किया गया और फिर मार्च में गोरखपुर में यूपी एटीएस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. एनआइए प्रमुख शरद कुमार कहते हैं कि जांचकर्ता अगर आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीक को हासिल कर सकें तो उन्हें सफलता मिल सकती है. वे कहते हैं, ‘‘यह बहुत जटिल काम है, जिसे जल्दी-से-जल्दी हल करने की जरूरत है. हम एक लंबे समय से गूगल, याहू और दूसरों से अपने सर्वर भारत में स्थापित करने की मांग करते रहे हैं.’’
आजकल प्रवर्तन निदेशालय में तैनात दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा के पूर्व प्रमुख करनैल सिंह का मानना है कि सरकार को हर नई तकनीक को देश में लाने से पहले उसकी जांच-परख करनी चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा पर किसी भी नई तकनीक के नतीजों से पहले उसकी जांच-परख की जानी चाहिए.’’
‘‘साइबर आतंकवाद ने आतंकवादी संगठनों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच चूहे-बिल्ली की दौड़ शुरू कर दी है. और इस दौड़ में अब तक तो तकनीक में माहिर आतंकवादी संगठन ही बाजी मारते दिख रहे हैं.
दिल्ली के दो किशोर उम्र के लड़कों अब्दुल हक और अब्दुल वाहिद पर उसका जादू चल गया और वे टुंडा की मुहिम में शामिल हो गए. टुंडा आगे चलकर लश्करे तैयबा (एलईटी) के लिए बम बनाने वाला एक खतरनाक आतंकवादी बन गया. 1990 के दशक में उसके माड्यूल ने कई बम विस्फोट किए. अब 72 वर्ष के हो चुके टुंडा को पिछले साल नेपाल की सीमा पर पकड़ा गया था. वहां वह आतंकवादी गतिविधियों के लिए कुछ नए लड़कों की तलाश में लगा हुआ था.
रंगरूट भर्ती करने की टुंडा की मुहिम के करीब तीन दशक बाद प्रतिबंधित संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) के सदस्य सुल्तान सल्फी के लिए लड़कों को भर्ती करने का काम अब अपेक्षाकृत आसान हो गया है. सल्फी ने छद्म नाम ‘‘मूसा’’ से फेसबुक पर एक बहस का मंच शुरू किया, जहां इस्लाम, जेहाद और इस्लाम के राज जैसे विषयों पर गहराई से चर्चा होती थी. उसने इस मंच के जरिए जयपुर में इंजीनियरिंग के चार छात्रों से संपर्क कायम कर लिया.
उन छात्रों की उम्र 18 से 22 साल के बीच थी. वे लड़के, जो अब गिरफ्तार हो चुके हैं, इस्लाम के बारे में कुछ सवालों का जवाब चाह रहे थे. मूसा ने उनसे भारत में मुसलमानों की दशा के बारे में बात की और उन्हें हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए उकसाया. मूसा को जब यकीन हो गया कि वे लड़के जेहाद के लिए तैयार हैं तो पाकिस्तान में आइएम के गुर्गे रियाज भटकल ने भारत में अपने गुट के खास सदस्य तहसीन अख्तर से संपर्क करने के लिए पालटॉक मेसेंजर पर एक फर्जी पहचान का इस्तेमाल किया और उसे जयपुर के लड़कों से संपर्क करने को कहा. इसके बाद अख्तर ने उन्हें विस्फोटक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया.
टुंडा से लेकर सल्फी और भटकल तक के आतंकवाद का मकसद एक ही है, लेकिन उनके तरीकों में भारी बदलाव आ चुका है. आज नए लड़कों की तलाश करने और उन्हें उकसाने के लिए भौगोलिक या राजनैतिक सरहदें कोई बाधा नहीं हैं. जांचकर्ताओं का कहना है कि अब आतंकवादी गतिविधियों के लिए लड़कों की तलाश में मदरसों या मस्जिदों में जाने की जरूरत नहीं पड़ती है. इसकी जगह इंटरनेट पर चैटरूम का सहारा लिया जा रहा है. चैटिंग के जरिए उन्हें धर्म के नाम पर भड़काया जाता है और उन्हें हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है.
सुरक्षा एजेंसियों के शब्दों में यह ‘‘इंटरनेट जेहाद’’ की एक नई और खतरनाक दुनिया है. इन आतंकवादियों का मिशन बम बनाना, उसे मनचाही जगह पर रखना और फिर चुपके से चंपत हो जाना है. आइएम के सह-संस्थापक यासीन भटकल जैसे उग्रवादी इसी तरीके को अपनाकर वर्षों से देश भर में घूमते रहे और उनके बारे में किसी को खबर तक नहीं लगी. हर आतंकवादी हमले के साथ उनका हौसला बढ़ता गया.
भर्ती का आसान रास्ता
लड़कों को आतंकी बनाना और उन्हें अपने गुटों में भर्ती करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल दुनिया भर में चिंता का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि जांच एजेंसियों के लिए कानूनी रूप से इसका सामना करना कठिन साबित हो रहा है. अभी एक ताजा मामले में बताया जा रहा है कि 18 भारतीय युवक इराक में इस्लामिक स्टेट (आइएस) संगठन में शामिल हो गए हैं. पिछले साल सिंगापुर का एक भारतीय युवक कथित रूप से सीरिया में विद्रोहियों के साथ शामिल हो गया, जबकि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला श्रीनगर का एक व्यक्ति कथित रूप से सीरिया चला गया.
जांचकर्ताओं ने भारत में सबसे पहले 2004-05 में इंटरनेट के इस्तेमाल का पता लगाया. शुरू में इस मीडियम का इस्तेमाल अपने काडरों के बीच प्रचार और संपर्क के लिए किया जाता था, लेकिन पिछले दशक में आतंकवादी संगठनों ने लड़कों को भर्ती करने, प्रचार करने और उनसे बातचीत करने के लिए इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी, जो अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते, कहते हैं, ‘‘आतंकी बनाने की प्रक्रिया के दौरान लड़कों को व्यक्तिगत रूप से मौजूद तो रहना पड़ता है, लेकिन इंटरनेट संपर्क स्थापित करने का काम करता है.’’
यासीन भटकल ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को जो बयान दिया, उससे इस बात की पुष्टि होती है. ‘‘यासीन कहता है कि उसने मुस्लिम लड़कों को उकसाने के लिए उन लोगों की कहानियां सुनाईं, जो पहले जेहाद में हिस्सा ले चुके थे. उसने उन दस्तावेजों को डाउनलोड किया था, जिनमें जेहाद को हर मुस्लिम के लिए जरूरी बताया गया है. उसने ओसामा बिन लादेन, अल यज़ीद, अल जरकावी और अवलकी जैसे मुस्लिम नेताओं और लड़ाकों की तकरीरों को डाउनलोड किया था. उसने मुस्लिम लड़कों को ये वीडियो व डाक्यूमेंट दिखाए ताकि उन्हें जेहाद की खातिर अपनी जिंदगी कुर्बान करने के लिए प्रेरित किया जा सके.’’
‘‘यासीन ने उन्हें विस्फोटक और आइईडी (देशी बम) बनाने का तरीका भी सिखाया. इस काम के लिए उसने इंटरनेट से ढेरों डाक्यूमेंट और वीडियो डाउनलोड किए और उन्हें अपने सैमसंग लैपटॉप पर सेव किया.’’

चतुराई भरी गतिविधियां
सुरक्षा एजेंसियों ने 7 सितंबर, 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट के बाहर बम विस्फोट के बाद सबसे पहले आइएम पर शक जाहिर किया. लेकिन इस विस्फोट की जिम्मेदारी लेने का दावा करने वाले एक ई-मेल की जब छानबीन की गई तो जांचकर्ताओं को जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ के एक मेडिकल के छात्र 21 वर्षीय वसीम अकरम मलिक का पता चला. इस मामले की जांच करने वाले एनआइए ने मलिक को ‘‘इंटरनेट का बेहद शौकीन’’ और ‘‘बिना अगुआ के जेहाद’’ में विश्वास रखने वाला बताया.
वह विस्फोट, जिसमें 15 लोग मारे गए थे और 79 लोग घायल हुए थे, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी देने से रोकने के लिए किया गया था. वसीम ने खुद ही इस काम को अंजाम दिया था. उसने हूजी के आतंकवादी आमिर कमाल और छोटा हफीज की मदद से विस्फोटक मंगवाए थे. एनआइए की जांच में उन दोनों का नाम आने के बाद वे दोनों ही सुरक्षा एजेंसियों के हाथों मारे जा चुके हैं.
बंगलुरू में 2012 में एक आतंकवादी गुट, जिसका खात्मा किया जा चुका है, विहिप के नेता प्रवीन तोगडिय़ा जैसी प्रमुख हस्तियों को जान से मारने की योजना बना रहा था. यह गुट चार राज्यों में फैल चुका था और जिन 12 लोगों को पकड़ा गया था, उन्हें बंगलुरू, हुबली, हैदराबाद और महाराष्ट्र के नांदेड़ से गिरफ्तार किया गया था. एनआइए के मुताबिक, उन युवकों को सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिए भर्ती किया गया था और फिर उन्हें लश्करे तैयबा के कमांडर अब्दुल बारी को सौंप दिया गया था.
माना जाता है कि बारी सऊदी अरब से संचालन कर रहा है. 2002 में हैदराबाद के साईंबाबा मंदिर में विस्फोट के मामले में उसकी तलाश है. उन लोगों के पास से जो नक्शे और तस्वीरें मिलीं, उनसे पता चला कि उन्होंने अपने संभावित निशानों की पूरी पड़ताल कर ली थी. इस ढीले-ढाले नेटवर्क में हैदराबाद का ओबैद-उर-रहमान, जिसने बाद में सैयद मकबूल और इमरान को भर्ती किया था, शामिल था. आरोप है कि मकबूल और इमरान आइएम के सरगना रियाज भटकल को रिपोर्ट करते थे और 2012 में पुणे के विस्फोट में उनकी भूमिका थी. भटकल उन्हें छद्म सर्वरों पर बनाए गए फर्जी इंटरनेट चौट आइडी के जरिए निर्देश दिया करता था.
मुंबई में 26/11 का हमला सबसे आधुनिक तरकीब वाले आतंकवादी हमलों में एक था. जिन 10 हमलावरों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को नवंबर 2008 में करीब तीन दिन तक बंधक बनाए रखा, उन्हें पाकिस्तान से वीओआइपी (वाइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल) के जरिए निर्देश मिल रहे थे. भारत में घुसने के लिए उन्होंने जीपीएस ट्रैकर्स का इस्तेमाल किया था, जो पाकिस्तानी-अमेरिकी नागरिक और लश्कर के आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने मुहैया कराए थे.
हेडली ने तीन साल तक अपने निशानों की अच्छी तरह रेकी की थी. उसने और पाकिस्तान में लश्कर के उसके कुछ साथियों ने संपर्क के लिए ई-मेलों में कूट संदेशों का इस्तेमाल किया था. इन कूट संदेशों (कोड) में जो योजनाएं छिपी थीं, वे थीः मुंबई पर हमला करना और फिर कोपेनहैगन और आरहुस में एक डैनिश अखबार जाइलैंड्स-पोस्टेन, के दफ्तरों को बम से उड़ाना शामिल था जिसने मुहम्मद साहब के कार्टून प्रकाशित किए थे.
झांसा देने के जाल
आइएम ने अपनी स्थापना के बाद हर बम विस्फोट की जिम्मेदारी ई-मेल पर लेते हुए तीन साल तक जांचकर्ताओं को छकाए रखा. शुरू में सुरक्षा एजेंसियों ने इन ई-मेलों को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन जब दिल्ली, मुंबई और पुणे में आइएम के सदस्यों को पकड़ा गया तो 2008 में उनकी योजना का खुलासा हो गया. पकड़े गए लोगों में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर मंसूर अहमद पीरभॉय भी शामिल था, जो कथित रूप से इस गुट के मीडिया सेल का काम देखता था. आइएम के हमलों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल के कुछ नमूने इस प्रकार हैः
हैदराबाद में 22 जुलाई, 2008 को बम विस्फोट से चार दिन पहले रियाज और इकबाल भटकल ने उर्दू में एक नोट लिखा. मंसूर ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया और इसकी एक पीडीएफ फाइल बना दी. इसके बाद एक ईमेल आइडी alrbi_gujarat@yahoo.com, बनाई गई और गुट ने 15 मिनट बाद नवी मुंबई में एक अमेरिकी नागरिक केन हेवुड के असुरक्षित वाइ-फाइ का इस्तेमाल करके बम विस्फोट की जिम्मेदारी लेने वाला नोट ई-मेल कर दिया. ई-मेलों को Scribd.com पर भी चर्चा शुरू करने के लिए पोस्ट कर दिया गया. इनका इस्तेमाल ‘‘भर्ती की सामग्री’’ के तौर पर भी किया जाता है.
आइएम के अपने एक साथी के साथ एक चैट में यासीन भटकल ने एक छद्म पहचान के लिए, फ्रीगेट के इस्तेमाल की बात की और Filehippo.com का उल्लेख किया. यह एक ऐसी वेबसाइट मानी जाती है, जो कूटलेखन वाली फाइलें खोलने में मदद करती है.
2013 में उसकी गिरफ्तारी के बाद पता चला कि यासीन ‘‘निंबज’’ के जरिए रियाज से चैट किया करता था और hbahadur@yahoo.com khalida.k@nimbuzz.com, hoowx (MiG33 ID), mail77@yahoo.com, jankarkoo@yahoo.com. जैसी आइडी का इस्तेमाल किया करता था. चौट की भाषा सांकेतिक होती थी और फाइलें कूटभाषा में तैयार की जाती थीं.
यासीन के लैपटॉप पर एनआइए के जांचकर्ताओं को ‘‘आरडीएक्स’’ और ‘‘हाउ टु मेक टीएनटी’’ नाम से एक फाइल मिली. इन फोल्डरों को कथित रूप से इंटरनेट से डाउनलोड किया गया था और कूट फाइलों में उन्हें सेव कर लिया गया था. माना जाता है कि इन फोल्डरों का इस्तेमाल नए तरीके के विस्फोटकों का प्रयोग करने के लिए किया गया था.

पैसे के लेनदेन की कानूनी राह
हाल की गिरफ्तारियों से पता चलता है कि आतंकवादियों के वित्तीय नेटवर्क नकदी और अनौपचारिक तरीके से चलते हैं. अभी तक पैसे हवाला एजेंटों के जरिए भेजे जाते थे, लेकिन अब इसके लिए कानूनी तरीकों का इस्तेमाल किया जाने लगा है. यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि उन्हें पैसों के लेन-देन के सैकड़ों मामलों में संदिग्ध लेन-देन की पहचान करनी होती है.
जैसा कि यासीन ने पूछताछ में बताया कि रियाज अक्सर उसे वेस्टर्न यूनियन के जरिए पैसे भेजा करता था, ताकि कोई शक न हो. लेकिन सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि आतंकवादी अपने गुर्गों और मॉड्यूल को पैसा पहुंचाने के लिए अब भी हवाला एजेंटों का इस्तेमाल कर रहे हैं और ज्यादातर पैसा दुबई के रास्ते से ही आता है.
आतंक की पहचान
आतंकवादी गुटों के तकनीकी के बढ़ते इस्तेमाल ने जांच एजेंसियों के काम को मुश्किल बना दिया है. दिल्ली में 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जब जामा मस्जिद के बाहर विदेशी सैलानियों पर हमला किया गया था तो हमले की जिम्मेदारी लेने वाला आइएम का ई-मेल कनाडा और पाकिस्तान के सर्वरों के जरिए भेजा गया था. आतंकवाद विरोधी एक विशेषज्ञ बताते हैं, ‘‘इसे ओनियन रूटिंग कहा जाता है.
संदेशों को बार-बार कूट भाषा में लिखा जाता है और उन्हें कई नेटवर्क नोडों, जिन्हें ओनियन रूटर कहा जाता है, के जरिए भेजा जाता है. सर्वरों का पता पांच देशों में लगाया जा सकता है और जब तक आखिरी ठिकाने के पते की जांच करना शुरू करते हैं तो पता चलता है कि इसे चार अन्य देशों के जरिए भेज दिया गया है.’’ चूंकि इस काम में विदेशी जमीन पर जांच करनी होती है, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों को उस देश से अनुमति लेने के लिए पत्र भेजने पड़ते हैं, बशर्ते उस देश के साथ कोई सहायता संधि न हो.
उत्तर प्रदेश एटीएस के एक सीनियर अधिकारी कहते हैं, ‘‘ई-मेल आइडी और चैट को बीच में ही पकडऩा बहुत मुश्किल और जटिल काम है. व्हाट्सऐप, वाइबर और स्काइप का इस्तेमाल करके भेजे गए संदेशों का पता लगाना बहुत कठिन है. कूटभाषा में लिखे गए संदेश बातचीत को सुरक्षित बना देते हैं और देशविरोधी तत्व सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं, जैसा कि हमने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ मामलों में पाया.’’
जांचकर्ताओं को हाल में कुछ सफलताएं तब मिलीं, जब उन्होंने एक आतंकवादी माड्यूल के चौट रूम की छानबीन की. दो कथित पाकिस्तानी आतंकवादियों अब्दुल वलीद उर्फ मुर्तजा और फहीम उर्फ मोहम्मद ओवैस को एक चैटरूम में झंसा देकर शामिल किया गया और फिर मार्च में गोरखपुर में यूपी एटीएस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. एनआइए प्रमुख शरद कुमार कहते हैं कि जांचकर्ता अगर आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीक को हासिल कर सकें तो उन्हें सफलता मिल सकती है. वे कहते हैं, ‘‘यह बहुत जटिल काम है, जिसे जल्दी-से-जल्दी हल करने की जरूरत है. हम एक लंबे समय से गूगल, याहू और दूसरों से अपने सर्वर भारत में स्थापित करने की मांग करते रहे हैं.’’
आजकल प्रवर्तन निदेशालय में तैनात दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा के पूर्व प्रमुख करनैल सिंह का मानना है कि सरकार को हर नई तकनीक को देश में लाने से पहले उसकी जांच-परख करनी चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा पर किसी भी नई तकनीक के नतीजों से पहले उसकी जांच-परख की जानी चाहिए.’’
‘‘साइबर आतंकवाद ने आतंकवादी संगठनों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच चूहे-बिल्ली की दौड़ शुरू कर दी है. और इस दौड़ में अब तक तो तकनीक में माहिर आतंकवादी संगठन ही बाजी मारते दिख रहे हैं.

