कर्नल दिलप्रीत सिंह 15 साल पहले एक नौजवान लेफ्टिनेंट के रूप में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आइएमए) से निकलकर मध्य प्रदेश में इंदौर के पास स्थित अपनी रेजिमेंट में पहुंचे थे. कुछ ही घंटों के भीतर इस युवा ने अपनी चुस्त हरी वर्दी उतारकर लड़ाकू पोशाक पहन ली और ट्रक पर सवार होकर राजस्थान में पाकिस्तान सीमा की तरफ चल पड़ा. यह जून 1999 की बात है. उन दिनों भारतीय तोपखाने की दहाड़ करगिल से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ रही थी. कर्नल सिंह की गोरखा राइफल्स यूनिट को रेगिस्तान में तैनात किया गया था, ताकि अगर दुश्मन पैर पसारे, तो हम फौरन पलटवार कर सकें.
आज 37 वर्षीय कर्नल दिलप्रीत सिंह अमृतसर छावनी में कमांडिंग ऑफिसर की कुर्सी पर बैठते हैं और मुस्तैद खड़े गार्ड राइफल उठाकर और एड़ी पटक कर उन्हें सलाम ठोकते हैं. चारों तरफ दीवार पर टंगी पिछले कमांडरों की तस्वीरों पर नजरें टिकाए दिलप्रीत सिंह कहते हैं, “किसी भी ऑफिसर के लिए अपनी यूनिट की कमान संभालना सबसे बड़ा सम्मान होता है.” उनके इर्द-गिर्द टंगी अधिकारियों की तस्वीरें सेना के बदलते चेहरे की प्रतीक हैं. भारतीय सेना को खुलकर जंग लड़े लगभग डेढ़ दशक हो चुका है और इस दौरान अधिकारी वर्ग ने बहुत तेजी से बदलाव होते देखा है.
कर्नल सिंह खुद इस परिवर्तन का हिस्सा हैं. अपने परिवार से सेना में आए वे पहले अधिकारी हैं. आज के अधिकारी महानगरों से बाहर की दुनिया से आते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी बोल लेते हैं लेकिन हिंदी बोलना पसंद करते हैं. वे हॉलीवुड की फिल्म ट्रांसफॉर्मर्स की बजाए सलमान खान की किक देखना ज्यादा पसंद करते हैं. कर्नल सिंह के पिता उत्तर प्रदेश के लखनऊ में राज्य बिजली बोर्ड में जूनियर इंजीनियर थे और उनकी मां गृहिणी हैं. उनकी पीढ़ी के दूसरे सैन्य अधिकारी भी ऐसे ही साधारण परिवारों से हैं, जूनियर कमीशंड अधिकारियों (जेसीओ) और सैनिकों के बेटे, जिनके लिए अधिकारियों के बीच उठना-बैठना बहुत बड़ी महत्वकांक्षा हुआ करता रहा है. दिल्ली स्थित रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (इडसा) के ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) रूमल दहिया कहते हैं, “अब सेना का अधिकारी वर्ग सही मायने में भारत का प्रतिनिधित्व करने लगा है.”
इस बदलाव की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी. अमेरिका के रक्षा विश्लेषक स्टीफन पी. कोहेन ने 1985 में अपने निबंध ‘द मिलिट्री ऐंड इंडियन डेमोक्रेसी’ में बताया है कि कैसे पारंपरिक सैनिक परिवार सेना से मुंह मोड़ रहे थे और सैनिक परिवारों में से सिर्फ 10 प्रतिशत ही सेना में आ रहे थे. भारत में 1991 में आर्थिक उदारीकरण ने इस बदलाव की रफ्तार को और भी तेज कर दिया. जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्रोही गतिविधियां शुरू होने से उन्हें सेना की कम वेतन वाली नौकरी जोखिम और मुश्किलों से भरी लगने लगी और भारत का नौजवान निजी क्षेत्र की नौकरियों के आकर्षण में बंधता चला गया.

(अमृतसर में कठिनाई भरे दिन के बाद हल्के-फुल्के दिन बिताते सेना के जवान)
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आइएमए) जैसी अधिकारी तैयार करने वाली संस्थाओं के लिए जवानों को तैयार करने वाले 22 सैनिक स्कूलों की ओर से अब कम लोग यहां पहुंच रहे थे. मिसाल के तौर पर, 1995 में लखनऊ में उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल में कर्नल सिंह की कक्षा में मौजूद 50 छात्रों में से सिर्फ सात ही सेना में शामिल हुए. इनमें से 8 अर्धसैनिक बलों में शामिल हो गए क्योंकि उन्हें सेना में प्रवेश नहीं मिला था. कर्नल सिंह कहते हैं, “लेकिन मेरा मानना है कि हमारा स्तर बहुत ऊंचा है इसलिए कम लोग आ रहे हैं.” करीब एक दशक पहले एनडीए के कार्यकाल में भर्ती के बारे में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 1998 और 2004 के बीच भर्ती 3,600 कैडेटों में से 9.5 प्रतिशत नौजवान अधिकारी रैंक से नीचे के सैनिकों के परिवारों के थे. सिर्फ 12.5 प्रतिशत बच्चे सैनिक अधिकारियों के परिवारों से आए थे.
नए सैन्य अधिकारी लड़ाई में सेना की अगुआई ठीक तरह से कर पाएंगे या नहीं, उनकी सामथ्र्य के बारे में उठ रहे सारे सवालों के जवाब करगिल युद्ध ने दे दिए. अधिकारियों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला. इस जंग का सबसे जोशीला नारा, ‘ये दिल मांगे मोर’ हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पहली पीढ़ी के अधिकारी कैप्टन विक्रम बत्रा ने दिया था.
सेना भारतीय संदर्भ में हमेशा प्रासंगिक बनी रहेगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन के साथ लगी हमारी सीमा अशांत और अस्थिर है. इसी कारण दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भारतीय सेना 13 लाख सैनिकों के साथ अकेली ऐसी सेना है, जो आज भी बढ़ रही है. इस दशक की समाप्ति से पहले नई माउंटेन स्ट्राइक कोर के लिए 90,000 और सैनिक भर्ती किए जाने हैं. इसके बावजूद सेना में अधिकारियों के 9,384 और अन्य रैंकों के 20,561 पद खाली हैं. सेवानिवृत्त मेजर जनरल मृणाल सुमन कहते हैं, “अगर सेना की जिंदगी इतनी ही मुश्किलों भरी रही और इसके साथ वेतन में वृद्घि भी नहीं की गई तो हमें इस कमी का सामना करते ही रहना पड़ेगा.”
एक ओर सेना भले ही इस दुविधा से जूझ रही हो लेकिन कर्नल सिंह की कमान में जवानों के लिए बाहर से कुछ खास नहीं बदला है. उनके दफ्तर के नजदीक स्थित प्रशिक्षण मैदान पर एक एनसीओ बड़ी सफाई से आइएनएसएएस (इन्सास) राइफल खोलता है और सफेद बोर्ड पर हिंदी भाषा में छोटे-छोटे वाक्यों के जरिए समझता है कि इस राइफल को कैसे चलाया जाता है. तीन साल नियंत्रण रेखा पर बिताने के बाद यह यूनिट जिस छावनी में सुस्ता रही है, वहां साइकिल कभी-कभार ही दिखती है. जवान 100 सीसी की मोटरबाइक पर फर्राटा भरते हैं. बैरकों के ऊपर की ओर टाटा स्काइ सैटेलाइट डिश लगी हुई है और सैनिकों को किसी महानगर की मानिंद सभी आराम सुलभ हैं.
इस तरह के बदलाव सेना ने खुद को और अधिक आकर्षक बनाने की कोशिश में किए हैं. पदोन्नत्ति की रफ्तार बढ़ाई गई है. एक दशक पहले तक कमांडिंग ऑफिसर की उम्र 40-45 वर्ष के आसपास हुआ करती थी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने भी अधिकारियों और जवानों दोनों के जीवनस्तर को काफी सुधारा है. आज एक जवान या पैदल सैनिक की नौकरी की शुरुआत लगभग 20,000 रु. मासिक से होती है. उसमें रहने की जगह या मनोरंजन जैसी सुविधाओं के लिए अतिरिक्त राशि मिलती है. इससे उनकी आकांक्षाएं भी बदली हैं. अब जेसीओ अपने बच्चों के लिए पहले से बेहतर सपने पाल रहे हैं, जिस पर कुछ दशक पहले तक सिर्फ अधिकारियों का एकाधिकार हुआ करता था. नायक सुजान राई पत्नी सुचित्रा के साथ ‘न्यू अदर रैंक्स’ वाले सैनिकों के लिए बनाए गए नए मकानों में से एक के लिविंग रूम में बैठे हैं. राई का पांच साल का बेटा अमृतसर में सेंट पीटर्स स्कूल में पढ़ता है. पति-पत्नी दोनों चाहते हैं कि परिवार को अगर दार्जिलिंग वापस लौटना पड़े, तो भी उनका बेटा अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ता रहे.
हिमाचल प्रदेश में चंबा के निवासी नायब सूबेदार बृज कुमार थापा की दो बेटियां हैं. एक दसवीं में पढ़ती है और ह्युमेनिटीज के क्षेत्र में आगे बढऩा चाहती है. छोटी बेटी नौसेना में अधिकारी बनना चाहती है. थापा का कहना है, “मैं उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता हूं, ताकि वे अपना करियर खुद चुन सकें.” जाहिर है, एक फौजी घर और जंग, दोनों मोर्चों को सुरक्षित करने में पूरी तरह से सक्षम है.
आज 37 वर्षीय कर्नल दिलप्रीत सिंह अमृतसर छावनी में कमांडिंग ऑफिसर की कुर्सी पर बैठते हैं और मुस्तैद खड़े गार्ड राइफल उठाकर और एड़ी पटक कर उन्हें सलाम ठोकते हैं. चारों तरफ दीवार पर टंगी पिछले कमांडरों की तस्वीरों पर नजरें टिकाए दिलप्रीत सिंह कहते हैं, “किसी भी ऑफिसर के लिए अपनी यूनिट की कमान संभालना सबसे बड़ा सम्मान होता है.” उनके इर्द-गिर्द टंगी अधिकारियों की तस्वीरें सेना के बदलते चेहरे की प्रतीक हैं. भारतीय सेना को खुलकर जंग लड़े लगभग डेढ़ दशक हो चुका है और इस दौरान अधिकारी वर्ग ने बहुत तेजी से बदलाव होते देखा है.
कर्नल सिंह खुद इस परिवर्तन का हिस्सा हैं. अपने परिवार से सेना में आए वे पहले अधिकारी हैं. आज के अधिकारी महानगरों से बाहर की दुनिया से आते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी बोल लेते हैं लेकिन हिंदी बोलना पसंद करते हैं. वे हॉलीवुड की फिल्म ट्रांसफॉर्मर्स की बजाए सलमान खान की किक देखना ज्यादा पसंद करते हैं. कर्नल सिंह के पिता उत्तर प्रदेश के लखनऊ में राज्य बिजली बोर्ड में जूनियर इंजीनियर थे और उनकी मां गृहिणी हैं. उनकी पीढ़ी के दूसरे सैन्य अधिकारी भी ऐसे ही साधारण परिवारों से हैं, जूनियर कमीशंड अधिकारियों (जेसीओ) और सैनिकों के बेटे, जिनके लिए अधिकारियों के बीच उठना-बैठना बहुत बड़ी महत्वकांक्षा हुआ करता रहा है. दिल्ली स्थित रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (इडसा) के ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) रूमल दहिया कहते हैं, “अब सेना का अधिकारी वर्ग सही मायने में भारत का प्रतिनिधित्व करने लगा है.”
इस बदलाव की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी. अमेरिका के रक्षा विश्लेषक स्टीफन पी. कोहेन ने 1985 में अपने निबंध ‘द मिलिट्री ऐंड इंडियन डेमोक्रेसी’ में बताया है कि कैसे पारंपरिक सैनिक परिवार सेना से मुंह मोड़ रहे थे और सैनिक परिवारों में से सिर्फ 10 प्रतिशत ही सेना में आ रहे थे. भारत में 1991 में आर्थिक उदारीकरण ने इस बदलाव की रफ्तार को और भी तेज कर दिया. जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्रोही गतिविधियां शुरू होने से उन्हें सेना की कम वेतन वाली नौकरी जोखिम और मुश्किलों से भरी लगने लगी और भारत का नौजवान निजी क्षेत्र की नौकरियों के आकर्षण में बंधता चला गया.

(अमृतसर में कठिनाई भरे दिन के बाद हल्के-फुल्के दिन बिताते सेना के जवान)
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आइएमए) जैसी अधिकारी तैयार करने वाली संस्थाओं के लिए जवानों को तैयार करने वाले 22 सैनिक स्कूलों की ओर से अब कम लोग यहां पहुंच रहे थे. मिसाल के तौर पर, 1995 में लखनऊ में उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल में कर्नल सिंह की कक्षा में मौजूद 50 छात्रों में से सिर्फ सात ही सेना में शामिल हुए. इनमें से 8 अर्धसैनिक बलों में शामिल हो गए क्योंकि उन्हें सेना में प्रवेश नहीं मिला था. कर्नल सिंह कहते हैं, “लेकिन मेरा मानना है कि हमारा स्तर बहुत ऊंचा है इसलिए कम लोग आ रहे हैं.” करीब एक दशक पहले एनडीए के कार्यकाल में भर्ती के बारे में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 1998 और 2004 के बीच भर्ती 3,600 कैडेटों में से 9.5 प्रतिशत नौजवान अधिकारी रैंक से नीचे के सैनिकों के परिवारों के थे. सिर्फ 12.5 प्रतिशत बच्चे सैनिक अधिकारियों के परिवारों से आए थे.
नए सैन्य अधिकारी लड़ाई में सेना की अगुआई ठीक तरह से कर पाएंगे या नहीं, उनकी सामथ्र्य के बारे में उठ रहे सारे सवालों के जवाब करगिल युद्ध ने दे दिए. अधिकारियों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला. इस जंग का सबसे जोशीला नारा, ‘ये दिल मांगे मोर’ हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पहली पीढ़ी के अधिकारी कैप्टन विक्रम बत्रा ने दिया था.
सेना भारतीय संदर्भ में हमेशा प्रासंगिक बनी रहेगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन के साथ लगी हमारी सीमा अशांत और अस्थिर है. इसी कारण दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भारतीय सेना 13 लाख सैनिकों के साथ अकेली ऐसी सेना है, जो आज भी बढ़ रही है. इस दशक की समाप्ति से पहले नई माउंटेन स्ट्राइक कोर के लिए 90,000 और सैनिक भर्ती किए जाने हैं. इसके बावजूद सेना में अधिकारियों के 9,384 और अन्य रैंकों के 20,561 पद खाली हैं. सेवानिवृत्त मेजर जनरल मृणाल सुमन कहते हैं, “अगर सेना की जिंदगी इतनी ही मुश्किलों भरी रही और इसके साथ वेतन में वृद्घि भी नहीं की गई तो हमें इस कमी का सामना करते ही रहना पड़ेगा.”
एक ओर सेना भले ही इस दुविधा से जूझ रही हो लेकिन कर्नल सिंह की कमान में जवानों के लिए बाहर से कुछ खास नहीं बदला है. उनके दफ्तर के नजदीक स्थित प्रशिक्षण मैदान पर एक एनसीओ बड़ी सफाई से आइएनएसएएस (इन्सास) राइफल खोलता है और सफेद बोर्ड पर हिंदी भाषा में छोटे-छोटे वाक्यों के जरिए समझता है कि इस राइफल को कैसे चलाया जाता है. तीन साल नियंत्रण रेखा पर बिताने के बाद यह यूनिट जिस छावनी में सुस्ता रही है, वहां साइकिल कभी-कभार ही दिखती है. जवान 100 सीसी की मोटरबाइक पर फर्राटा भरते हैं. बैरकों के ऊपर की ओर टाटा स्काइ सैटेलाइट डिश लगी हुई है और सैनिकों को किसी महानगर की मानिंद सभी आराम सुलभ हैं.
इस तरह के बदलाव सेना ने खुद को और अधिक आकर्षक बनाने की कोशिश में किए हैं. पदोन्नत्ति की रफ्तार बढ़ाई गई है. एक दशक पहले तक कमांडिंग ऑफिसर की उम्र 40-45 वर्ष के आसपास हुआ करती थी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने भी अधिकारियों और जवानों दोनों के जीवनस्तर को काफी सुधारा है. आज एक जवान या पैदल सैनिक की नौकरी की शुरुआत लगभग 20,000 रु. मासिक से होती है. उसमें रहने की जगह या मनोरंजन जैसी सुविधाओं के लिए अतिरिक्त राशि मिलती है. इससे उनकी आकांक्षाएं भी बदली हैं. अब जेसीओ अपने बच्चों के लिए पहले से बेहतर सपने पाल रहे हैं, जिस पर कुछ दशक पहले तक सिर्फ अधिकारियों का एकाधिकार हुआ करता था. नायक सुजान राई पत्नी सुचित्रा के साथ ‘न्यू अदर रैंक्स’ वाले सैनिकों के लिए बनाए गए नए मकानों में से एक के लिविंग रूम में बैठे हैं. राई का पांच साल का बेटा अमृतसर में सेंट पीटर्स स्कूल में पढ़ता है. पति-पत्नी दोनों चाहते हैं कि परिवार को अगर दार्जिलिंग वापस लौटना पड़े, तो भी उनका बेटा अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ता रहे.
हिमाचल प्रदेश में चंबा के निवासी नायब सूबेदार बृज कुमार थापा की दो बेटियां हैं. एक दसवीं में पढ़ती है और ह्युमेनिटीज के क्षेत्र में आगे बढऩा चाहती है. छोटी बेटी नौसेना में अधिकारी बनना चाहती है. थापा का कहना है, “मैं उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता हूं, ताकि वे अपना करियर खुद चुन सकें.” जाहिर है, एक फौजी घर और जंग, दोनों मोर्चों को सुरक्षित करने में पूरी तरह से सक्षम है.

