मांसल, कुश्ती लडऩे वाली महिलाओं को समाज की स्वीकृति बदलाव का सबसे मजबूत और स्पष्ट संकेत हो सकती है. ग्लोरिया स्टेनम
पहले तो मिसाल. उम्मीदों को तुरंत पंख लगने की. साल 2000 में हरियाणा के भिवानी जिले के बलाली गांव में बड़े-से फोगट परिवार में सिडनी से आई खबर ने हलचल मचा दी. वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था. ओलंपिक में यह भारत का एकमात्र पदक और किसी भारतीय महिला का अब तक का पहला पदक था. ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में फ्रीस्टाइल कुश्ती में जीते अपने पदक की सुनहरी आभा में दमकती 24 वर्षीया बबिता फोगट यह बात कहते हुए मल्लेश्वरी के पदक से सीधा नाता जोड़ती हैं: महावीर सिंह फोगट ने अपने कुनबे के सारे बच्चों को घेरकर खेतों में कुश्ती सिखाना शुरू कर दिया ताकि वे भी पदक जीत सकें.
खुद पहलवान रह चुके महावीर ने जो कुछ आता था, उसे अपनी बेटियों, बेटे, भतीजों और भतीजियों को सिखाया. शायद उन्हें भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उन्होंने क्या शुरुआत की है. उनकी सबसे बड़ी बेटी गीता ने 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीता और 2012 में ओलंपिक के लिए क्वालीफाइ करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं. बबिता ने दिल्ली के रजत को ग्लासगो में स्वर्ण पदक में तब्दील कर दिया. चचेरी बहन विनेश अभी 20 साल की भी नहीं है और ग्लासगो से स्वर्ण पदक लेकर लौटी है. अपने खेतों के सिरे पर खानदानी अखाड़े में फोटो खिंचवाते समय उसकी आंखों पर नींद हावी थी. परिवार को अभी संतोष नहीं हुआ है. छोटे भाई-बहन अब भी कैडेट या जूनियर खिताबों की उम्मीद में अखाड़े से अंदर-बाहर होते रहते हैं. तमाम शोरगुल और घर में ग्लासगो के गुम हुए पदकों की तलाश से बेखबर पांच साल से भी छोटी जैनी मशीनों पर ट्रेनिंग ले रही है. फोगट परिवार के दूरदराज के वंशज बलाली के अखाड़े में चाचा महावीर की सोने की तलाश में शामिल होने पहुंच रहे हैं.
फोगट बहनों ने जिस तरह सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी है या धता बताया है, उसके बारे में कई तरह के किस्से सुनाई देते हैं. लेकिन एशियाई खेलों की ट्रेनिंग और ट्रायल के लिए जाने से पहले उन्होंने गांव में विजय चक्कर लगाया, और उसके बाद प्रदेश की राजधानी में, दिल्ली के टेलीविजन स्टुडियोज में उन्हें कई बार जाना पड़ा. यह सब करने में बबिता और विनेश को मशक्कत करनी पड़ती है. बबीता बताती हैं कि जब वे मिट्टी के अखाड़े (मैट उनकी पहली सफलता अर्जित करने के बाद आई) में पहली बार उतरीं तो कानाफूसी होती थी, “गांव वाले कहा करते थे, ‘अब के होगा’. हम लड़कों के साथ ही अभ्यास करते थे, उनसे बात करते और नेकर पहनते थे.”
विनेश कहती हैं, “तब हम बच्चे थे. भला बच्चों को इन सामाजिक परंपराओं के बारे में क्या मालूम होता है?”
पदकों ने ऐसी आपत्तियों पर लगाम कस दी. भला चैंपियन का बहिष्कार कौन करेगा? बबिता ने भारतीय खिलाड़ी के दिलदार अंदाज में माना कि उनकी कामयाबी का भारत और खासकर हरियाणा के संदर्भ में क्या महत्व हैः आज वे उस समाज को धूल चटाने वाली पहलवान बन गई हैं, जिसमें कोख में ही बच्ची को मारने से लेकर अंत तक महिलाओं को समाज से बाहर रखा जाता है. बबिता हाथ जोड़कर कहती हैं, “उन्हें मत मारो. हमें देखो. हम भी लड़कियां हैं. वे हम से आगे जा सकती हैं.”
शायद वे अपने खेल और आजीवन समर्पण की उसकी परंपरा की रोल मॉडल के रूप में खुद को पेश करने के लिए महिलाओं के बारे में पारंपरिक धारणा से उबरने को उतना महत्व नहीं देतीं. बबिता मानती हैं कि वे हर बार जब भी बड़ा टूर्नामेंट जीतकर लौटती हैं, तो गांव में कुश्ती में दिलचस्पी बढ़ जाती है. वे कहती हैं, “लेकिन उन्हें तुरंत नतीजे चाहिए. उन्हें यह नहीं दिखता कि यहां तक पहुंचने के लिए मैंने 10-12 साल पसीना बहाया है.”
फोगट परिवार में ट्रेनिंग के उन दिनों को बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है. हर किसी के पास बताने को कोई बात है और ऐसा लगता है कि सब कुल मिलाकर एक जैसे नाटकीय अंदाज में स्मृतियां ताजा करते हैं. बचपन के दिनों की मस्ती पाने की बेकरारी में बबिता याद करती हैं, “पापा हमें सुबह साढ़े तीन बजे जगा दिया करते थे. हम दो-ढाई घंटे प्रैक्टिस करते थे. पापा खेतों का चक्कर लगवाते थे. उसके बाद बीस मिनट घर में आराम होता था. फिर नहाना, खाना और स्कूल जाना. स्कूल में अकसर झपकी आ जाती थी. खासकर जब टीचर का मुंह ब्लैकबोर्ड की तरफ होता था. कभी-कभी वे हमें सोने देती थीं. घर लौटकर एक घंटा आराम और फिर ट्रेनिंग. रविवार को स्कूल से छुट्टी होती थी लेकिन ट्रेनिंग से नहीं.” विनेश अपनी बहनों से छोटी और कुछ पतली हैं (वे 48 किलोग्राम वर्ग में जबकि बबिता और गीता 51-55 किलोग्राम वर्ग में कुश्ती लड़ती हैं). विनेश ने बताया कि चोट लगने के डर से बहनों के साथ अखाड़े में उतरने में हिचकती थीं, “ताऊजी पूछते थे, तू कोई गुलाब का फूल है?”
महावीर फोगट सख्त गुरु हैं और बबिता ने दबी जबान में बताया कि ट्रेनिंग से बचने के लिए वे कैसी-कैसी तिकड़म लगाती थीं. कभी-कभी वे इधर-उधर चले जाते और वापस लौटकर पसीने से अंदाजा लगाते थे कि कितनी ट्रेनिंग हुई. लड़कियां सरसों के पत्तों पर जमी ओस से माथा गीला कर लेती थीं. उन्होंने इन्वर्टर लगवा रखा था ताकि बिजली जाने पर भी ट्रेनिंग न रुके. लड़कियां उसे फ्रिज से जोड़ देती थीं, ताकि बिजली जाने पर बैटरी खत्म हो चुकी हो.
लेकिन अब मैट पर आने के लिए सजा का डर नहीं है. वे अपनी टेक्नीक और फुर्ती पर काम कर रही हैं और उन्हें उस खेल का शुभंकर बताया जा रहा है, जिससे महिला पहलवानों से उम्मीदें बढ़ गई हैं. पिछले साल कुश्ती को ओलंपिक खेलों से हटाए जाने की आशंका पैदा हो गई थी. उससे उबरकर महिलाओं की श्रेणियां बढ़ाने और पुरुषों की कम करने की कोशिश हो रही है. नए समीकरण बताते हुए बबिता की आंखें गर्व से दमकने लगती हैं, “लड़कों के दो पदक कम, फ्रीस्टाइल और ग्रीको रोमन, हरेक में सात से छह और लड़कियों के दो और, यानी चार से छह. तो बराबर हो गए न 6-6-6” (महिला कुश्ती सिर्फ फ्रीस्टाइल है). कुश्ती की शुरुआत प्राचीन ओलंपिक में हो गई थी. लेकिन नए जमाने में पहचान बनाने में उसे महिला पहलवानों से सही दांव लगवाने की जरूरत है, जिन्हें 2004 में एथेंस से ओलंपिक के अखाड़े में उतरने की इजाजत मिली है.
फोगट बहनें 2016 के रियो ओलंपिक में ज्यादा संख्या में उतरना चाहती हैं. फिलहाल ट्रेनिंग और ट्रायल्स के लिए वे लखनऊ में हैं. विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेल आगे-पीछे हैं और जापानी तथा चीनी महिला पहलवानों का दबदबा इस कदर है कि जो पहला स्थान पाएगा, वही दक्षिण कोरिया के इंचियाने में एशियाई खेलों के अखाड़े में उतरेगा.
इससे पहले पर्वतारोही संतोष यादव जैसी महिलाओं ने हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आ रही धारणा को तोड़ा. दिल्ली के सुशील कुमार जैसे पहलवानों ने इक्कीसवीं सदी के भारत की दिलचस्पी इस प्राचीन खेल में जगाई. परिवर्तन के वाहक के रूप में फोगट बहनों की अनूठी भूमिका, शायद उनकी जोशीली पारिवारिक महागाथा में शामिल होने को उत्सुक कुछ और पहलवानों को आकर्षित कर सकेगी.
पहले तो मिसाल. उम्मीदों को तुरंत पंख लगने की. साल 2000 में हरियाणा के भिवानी जिले के बलाली गांव में बड़े-से फोगट परिवार में सिडनी से आई खबर ने हलचल मचा दी. वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था. ओलंपिक में यह भारत का एकमात्र पदक और किसी भारतीय महिला का अब तक का पहला पदक था. ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में फ्रीस्टाइल कुश्ती में जीते अपने पदक की सुनहरी आभा में दमकती 24 वर्षीया बबिता फोगट यह बात कहते हुए मल्लेश्वरी के पदक से सीधा नाता जोड़ती हैं: महावीर सिंह फोगट ने अपने कुनबे के सारे बच्चों को घेरकर खेतों में कुश्ती सिखाना शुरू कर दिया ताकि वे भी पदक जीत सकें.
खुद पहलवान रह चुके महावीर ने जो कुछ आता था, उसे अपनी बेटियों, बेटे, भतीजों और भतीजियों को सिखाया. शायद उन्हें भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उन्होंने क्या शुरुआत की है. उनकी सबसे बड़ी बेटी गीता ने 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीता और 2012 में ओलंपिक के लिए क्वालीफाइ करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं. बबिता ने दिल्ली के रजत को ग्लासगो में स्वर्ण पदक में तब्दील कर दिया. चचेरी बहन विनेश अभी 20 साल की भी नहीं है और ग्लासगो से स्वर्ण पदक लेकर लौटी है. अपने खेतों के सिरे पर खानदानी अखाड़े में फोटो खिंचवाते समय उसकी आंखों पर नींद हावी थी. परिवार को अभी संतोष नहीं हुआ है. छोटे भाई-बहन अब भी कैडेट या जूनियर खिताबों की उम्मीद में अखाड़े से अंदर-बाहर होते रहते हैं. तमाम शोरगुल और घर में ग्लासगो के गुम हुए पदकों की तलाश से बेखबर पांच साल से भी छोटी जैनी मशीनों पर ट्रेनिंग ले रही है. फोगट परिवार के दूरदराज के वंशज बलाली के अखाड़े में चाचा महावीर की सोने की तलाश में शामिल होने पहुंच रहे हैं.
फोगट बहनों ने जिस तरह सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी है या धता बताया है, उसके बारे में कई तरह के किस्से सुनाई देते हैं. लेकिन एशियाई खेलों की ट्रेनिंग और ट्रायल के लिए जाने से पहले उन्होंने गांव में विजय चक्कर लगाया, और उसके बाद प्रदेश की राजधानी में, दिल्ली के टेलीविजन स्टुडियोज में उन्हें कई बार जाना पड़ा. यह सब करने में बबिता और विनेश को मशक्कत करनी पड़ती है. बबीता बताती हैं कि जब वे मिट्टी के अखाड़े (मैट उनकी पहली सफलता अर्जित करने के बाद आई) में पहली बार उतरीं तो कानाफूसी होती थी, “गांव वाले कहा करते थे, ‘अब के होगा’. हम लड़कों के साथ ही अभ्यास करते थे, उनसे बात करते और नेकर पहनते थे.”
विनेश कहती हैं, “तब हम बच्चे थे. भला बच्चों को इन सामाजिक परंपराओं के बारे में क्या मालूम होता है?”
पदकों ने ऐसी आपत्तियों पर लगाम कस दी. भला चैंपियन का बहिष्कार कौन करेगा? बबिता ने भारतीय खिलाड़ी के दिलदार अंदाज में माना कि उनकी कामयाबी का भारत और खासकर हरियाणा के संदर्भ में क्या महत्व हैः आज वे उस समाज को धूल चटाने वाली पहलवान बन गई हैं, जिसमें कोख में ही बच्ची को मारने से लेकर अंत तक महिलाओं को समाज से बाहर रखा जाता है. बबिता हाथ जोड़कर कहती हैं, “उन्हें मत मारो. हमें देखो. हम भी लड़कियां हैं. वे हम से आगे जा सकती हैं.”
शायद वे अपने खेल और आजीवन समर्पण की उसकी परंपरा की रोल मॉडल के रूप में खुद को पेश करने के लिए महिलाओं के बारे में पारंपरिक धारणा से उबरने को उतना महत्व नहीं देतीं. बबिता मानती हैं कि वे हर बार जब भी बड़ा टूर्नामेंट जीतकर लौटती हैं, तो गांव में कुश्ती में दिलचस्पी बढ़ जाती है. वे कहती हैं, “लेकिन उन्हें तुरंत नतीजे चाहिए. उन्हें यह नहीं दिखता कि यहां तक पहुंचने के लिए मैंने 10-12 साल पसीना बहाया है.”
फोगट परिवार में ट्रेनिंग के उन दिनों को बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है. हर किसी के पास बताने को कोई बात है और ऐसा लगता है कि सब कुल मिलाकर एक जैसे नाटकीय अंदाज में स्मृतियां ताजा करते हैं. बचपन के दिनों की मस्ती पाने की बेकरारी में बबिता याद करती हैं, “पापा हमें सुबह साढ़े तीन बजे जगा दिया करते थे. हम दो-ढाई घंटे प्रैक्टिस करते थे. पापा खेतों का चक्कर लगवाते थे. उसके बाद बीस मिनट घर में आराम होता था. फिर नहाना, खाना और स्कूल जाना. स्कूल में अकसर झपकी आ जाती थी. खासकर जब टीचर का मुंह ब्लैकबोर्ड की तरफ होता था. कभी-कभी वे हमें सोने देती थीं. घर लौटकर एक घंटा आराम और फिर ट्रेनिंग. रविवार को स्कूल से छुट्टी होती थी लेकिन ट्रेनिंग से नहीं.” विनेश अपनी बहनों से छोटी और कुछ पतली हैं (वे 48 किलोग्राम वर्ग में जबकि बबिता और गीता 51-55 किलोग्राम वर्ग में कुश्ती लड़ती हैं). विनेश ने बताया कि चोट लगने के डर से बहनों के साथ अखाड़े में उतरने में हिचकती थीं, “ताऊजी पूछते थे, तू कोई गुलाब का फूल है?”
महावीर फोगट सख्त गुरु हैं और बबिता ने दबी जबान में बताया कि ट्रेनिंग से बचने के लिए वे कैसी-कैसी तिकड़म लगाती थीं. कभी-कभी वे इधर-उधर चले जाते और वापस लौटकर पसीने से अंदाजा लगाते थे कि कितनी ट्रेनिंग हुई. लड़कियां सरसों के पत्तों पर जमी ओस से माथा गीला कर लेती थीं. उन्होंने इन्वर्टर लगवा रखा था ताकि बिजली जाने पर भी ट्रेनिंग न रुके. लड़कियां उसे फ्रिज से जोड़ देती थीं, ताकि बिजली जाने पर बैटरी खत्म हो चुकी हो.लेकिन अब मैट पर आने के लिए सजा का डर नहीं है. वे अपनी टेक्नीक और फुर्ती पर काम कर रही हैं और उन्हें उस खेल का शुभंकर बताया जा रहा है, जिससे महिला पहलवानों से उम्मीदें बढ़ गई हैं. पिछले साल कुश्ती को ओलंपिक खेलों से हटाए जाने की आशंका पैदा हो गई थी. उससे उबरकर महिलाओं की श्रेणियां बढ़ाने और पुरुषों की कम करने की कोशिश हो रही है. नए समीकरण बताते हुए बबिता की आंखें गर्व से दमकने लगती हैं, “लड़कों के दो पदक कम, फ्रीस्टाइल और ग्रीको रोमन, हरेक में सात से छह और लड़कियों के दो और, यानी चार से छह. तो बराबर हो गए न 6-6-6” (महिला कुश्ती सिर्फ फ्रीस्टाइल है). कुश्ती की शुरुआत प्राचीन ओलंपिक में हो गई थी. लेकिन नए जमाने में पहचान बनाने में उसे महिला पहलवानों से सही दांव लगवाने की जरूरत है, जिन्हें 2004 में एथेंस से ओलंपिक के अखाड़े में उतरने की इजाजत मिली है.
फोगट बहनें 2016 के रियो ओलंपिक में ज्यादा संख्या में उतरना चाहती हैं. फिलहाल ट्रेनिंग और ट्रायल्स के लिए वे लखनऊ में हैं. विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेल आगे-पीछे हैं और जापानी तथा चीनी महिला पहलवानों का दबदबा इस कदर है कि जो पहला स्थान पाएगा, वही दक्षिण कोरिया के इंचियाने में एशियाई खेलों के अखाड़े में उतरेगा.
इससे पहले पर्वतारोही संतोष यादव जैसी महिलाओं ने हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आ रही धारणा को तोड़ा. दिल्ली के सुशील कुमार जैसे पहलवानों ने इक्कीसवीं सदी के भारत की दिलचस्पी इस प्राचीन खेल में जगाई. परिवर्तन के वाहक के रूप में फोगट बहनों की अनूठी भूमिका, शायद उनकी जोशीली पारिवारिक महागाथा में शामिल होने को उत्सुक कुछ और पहलवानों को आकर्षित कर सकेगी.

