बात बहुत पुरानी नहीं, 2004 की है जब दिल्ली का ए.के. गोपालन भवन भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर रखने का बायस बना था, जहां सीपीएम के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत ने मिलकर कांग्रेसनीत यूपीए की पहली सरकार के गठन में शानदार भूमिका निभाई थी. पिछले हफ्ते की एक ढलती दोपहर सीपीएम का वही मुख्यालय घिरते मानसून के बीच अपनी जगह पर बिल्कुल सूना और अकेला खड़ा दिखा.
सिर्फ एक दशक बीता है और फर्क देखने लायक है. गोपालन भवन के बाहर अब चैनलों की ओबी वैन की भीड़ नहीं दिखती. भवन के गलियारों से कभी चिपके रहने वाले पत्रकारों ने रास्ता बदल लिया है. ऐसा लगता है कि दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है और यह इमारत समय के प्रवाह में जम गई है. बेशक, ऐसा ही है क्योंकि बसु और सुरजीत दोनों ही अब नहीं रहे. सीपीएम के मुकुट में हीरे की तरह जड़ा पश्चिम बंगाल हार जाने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 42 में से सिर्फ दो सीटें ही हासिल हुईं.
लोकसभा में पूरा-का-पूरा वाम मोर्चा 10 सांसदों तक सिमट कर रह गया है. 2004 में यह आंकड़ा 60 हुआ करता था. इस मोर्चे में अब सिर्फ सीपीएम और सीपीआइ ही बचे हैं क्योंकि रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के इकलौते सदस्य ने चुनाव से पहले केरल में कांग्रेस का दामन थाम लिया था और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का इस बार खाता ही नहीं खुल सका. वाम मोर्चे का वोट प्रतिशत इस बार 4.8 फीसदी रहा जो अब तक का न्यूनतम है.
यह शर्मिंदगी यहीं खत्म नहीं होती. आंध्र प्रदेश में सीपीएम का वोट प्रतिशत 2014 में गिरकर एक फीसदी पर सिमट गया है, जबकि 1964 में अविभाजित सीपीआइ का विभाजन होने के बाद जब चुनाव हुआ था तो उसमें भी पार्टी को चार फीसद वोट मिले थे. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने पहले तो सीपीएम के साथ साझेदारी की बात कही, फिर उसे शर्मिंदा करते हुए सिर्फ एक सीट का प्रस्ताव दे डाला. भौचक सीपीएम ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. बस एक त्रिपुरा ही है, जो अपने दो सांसदों के भरोसे लाल झंडे को संभाले हुए है और वाम के राष्ट्रीय पतन के बावजूद उसकी सांसों को थामे हुए है.
गोपालन भवन आज भुतहा इमारत बन चुका है. सीपीएम के नौ सांसद संभवतः संसद के भीतर इस उम्मीद में जमे हुए हैं कि सत्ता में गिर चुकी अपनी साख को अपने फेफड़ों की सामूहिक ताकत से कैसे भी बचा ले जाएंगे. भवन के दूसरे तल पर स्थित पार्टी महासचिव प्रकाश करात के कमरे के बाहर चमकदार लाल रंग की सजधज के बीच अल्युमिनियम का एक ऐश ट्रे पड़ा हुआ है. उनके कमरे के भीतर पीछे वाली दीवार पर एक पुराना रूसी पोस्टर लगा है जिस पर रूसी में लिखा है, ‘‘रोशन भविष्य का रास्ता अक्तूबर क्रांति से निकलता है.’’
करात जानते हैं कि सीपीएम एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है. न उसके पास रणनीति है और न ही कार्यनीति. उनके साक्षात्कार में श्गिरावट,’’ ‘सफाया’ और ‘झटका’ जैसे शब्द बार-बार आते हैं. 1964 में सीपीआइ के विभाजन के बाद उससे अलग होकर लगातार मजबूत और व्यापक होती गई इस पार्टी के इतिहास में पहले कभी भी ऐसा वक्त नहीं आया था, जब उसे अपना भविष्य इतना धुंधला और अनिश्चित दिखा हो.
करात स्वीकार करने की मुद्रा में कहते हैं, ‘‘न सिर्फ वाम के चुनावी आधार में गिरावट आई है बल्कि देश भर में इसका राजनैतिक प्रभाव भी घटा है. जाहिर है हमें सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल में लगा है जहां 2011 में विधानसभा चुनाव में हम हार गए, लेकिन तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी दूसरी जगहों पर भी हमें चोट पहुंची. हमें खुद को संभालना होगा, पकड़ फिर से बनानी होगी और आगे बढऩा होगा.’’

पार्टी की अगली कांग्रेस अप्रैल 2015 में है. उससे पहले पार्टी की योजना जमीनी स्तर से लेकर गांव, मोहल्ला, जिलों और राज्यों में सिलसिलेवार बैठकें करने की है. इस दौरान पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के मन में दो पुराने सवाल उमड़ रहे हैः क्या कांग्रेस और बीजेपी को पहले की ही तरह एक समान बरता जाए चूंकि पैसे बनाने की कांग्रेसी मानसिकता बीजेपी की दक्षिणपंथी नीतियों से बहुत अलग नहीं है?
इतना ही नहीं, वामपंथ खुद में किन तरीकों से बदलाव लाए ताकि वह उस महत्वाकांक्षी ग्रामीण और शहरी तबके से दोबारा खुद को जोड़ सके जो आज भूमंडलीकरण और नव-उदारवादी अर्थशास्त्र के मोह में फंसा पड़ा है?
करात साठ के दशक में एडिनबरा यूनिवर्सिटी में मार्क्सवादी इतिहासकार विक्टर केर्नन के शिष्य रहे हैं, लिहाजा वे मार्क्स से भी उतने ही परिचित हैं जितना कि इतिहास से. वे मानते हैं कि पिछले एक दशक के दौरान मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों ने मध्यम वर्ग को एक अजीबोगरीब प्राणी में तब्दील कर दिया है.
जहां तक वाममार्गी बौद्धिकों का सवाल है, जो अब तक स्टडी सर्किलों से लेकर छात्रसंघ के चुनावों में जीत तक और लाल सलाम के नारे वाले प्रदर्शनों से लेकर निम्नवर्गीय अध्ययनों तक खुद को अभिव्यक्त करते आए थे, तो ऐसा लगता है कि वे काफी आगे जा चुके हैं, हालांकि शिन जिनपिंग के चीन या व्लादिमिर पुतिन के रूस के साथ उनकी तुलना करना बहुत न्यायसंगत नहीं होगा.
लेनिन की एकाध पोर्ट्रेट से घिरे अपने विशाल दफ्तर में बैठे करात कहते हैं, ‘‘वैश्वीकरण के बाद की दुनिया में हमें खुद से यह सवाल करना होगा कि आखिर वाम राजनीति युवाओं को क्यों आकर्षित नहीं कर पा रही है. इसके अलावा, काम का चरित्र भी अब बहुत ही बिखरा हुआ और केंद्रीकृत हो चला है.
मसलन सेवा क्षेत्र को ही देख लें. असंगठित क्षेत्र के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां हैं. एक जमाना था जब कोलकाता की ट्राम का किराया एक पैसा बढ़ जाता तो समूचा शहर रुक जाया करता था, लेकिन अब? आखिर वाम राजनीति इन सारे मसलों को कैसे संबोधित करे?
अर्थशास्त्री और राजनैतिक टीकाकार प्रभात पटनायक की मानें तो वाम का पतन एक सामाजिक प्रतिक्रांति के जैसा है जिसे उस उच्च मध्यवर्ग ने अंजाम दिया जिसे बीजेपी-कांग्रेस की नव-उदारवादी नीतियों का लाभ मिला है. इसके अलावा, भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थान जातिगत अवरोधों और चेतना को शिक्षितों के बीच तोड़ पाने में नाकाम रहे हैं जिसका नतीजा यह हुआ है कि जो पहले से सशक्त थे वे और ताकतवर हो गए हैं. पटनायक कहते हैं, ‘‘वे अपनी सुविधाओं को सही ठहराने के लिए असमानता को सही ठहराते हैं. उन्हें वाम विचारधारा से खतरा महसूस होता है.’’
दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जो एक जमाने में वाम छात्र संघर्षों का केंद्र हुआ करता था, वहां 2006 में ओबीसी आरक्षण के बाद जाति आधारित ध्रुवीकरण ने जगह बना ली है. सीपीएम के छात्र संगठन स्टुडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) के आधार को या तो बीजेपी समर्थक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या फिर नक्सल समर्थक अतिवामपंथी ऑल इंडिया स्टुडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने छीन लिया है.
जेएनयू में अर्थशास्त्र के शोधछात्र अभिनव प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘‘आइसा जैसे संगठनों ने यह महसूस किया कि आर्थिक सुधारों की संतानों को राजनैतिक रूप से संगठित करने में मार्क्सवाद की भूमिका व्यर्थ है. अगर वोट कुछ दूसरे आसान तरीकों से बंटोरे जा सकते हों, तो विश्वास खो चुकी एक विचारधारा को समझने में इतनी मेहनत क्यों की जाए?’’
सीपीएम के महासचिव के तौर पर करात का नौ वर्ष का कार्यकाल पार्टी के सबसे बड़े पतन का गवाह रहा है. बसु और सुरजीत ने 2004 में सक्रिय रूप से कांग्रेस के साथ तालमेल बैठाया और पहली यूपीए सरकार चलाने के लिए यूपीए के सहयोगियों के साथ मिलकर एक साझ न्यूनतम कार्यक्रम बनाया था. मनमोहन सिंह जब 2008 में अमेरिका के साथ एटमी सौदे पर आगे बढ़े तो करात ने पैर वापस खींच लिए और उसके पक्ष में यह तर्क दिया कि सीपीएम के लिए अकेले खड़े रहना कहीं ज्यादा बेहतर होगा बजाए इसके कि वह कांग्रेस के साम्राज्यवाद समर्थक निर्णयों से प्रदूषित हो जाए.
पार्टी बिखरने लगी और खासकर पश्चिम बंगाल में वह पस्त होने लगी, लेकिन नेतृत्व अड़ा रहा. केरल के एक सीपीएम नेता बताते हैं, ‘‘हम भले ही 2004 से 2008 तक यूपीए-1 को बाहर से समर्थन देते रहे थे, लेकिन कम-से-कम हमारी पहुंच सत्ता तक तो थी. एक बार हमने समर्थन वापस ले लिया तो वह पहुंच भी चली गई. इससे सौदेबाजी के लिए हमारे हाथ-पैर ही कट गए और चुनाव परिणामों पर इसका असर दिखा. समर्थन वापसी के फैसले से जुड़ा अमेरिका विरोध हमारे समर्थकों को भरोसे में नहीं ले सका.’’
यह पूछे जाने पर कि क्या यूपीए-1 से भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे पर सीपीएम का समर्थन वापसी का फैसला ही पार्टी के पतन में निर्णायक बिंदु था, करात कहते हैं, ‘‘हमें शायद पहले ही समर्थन वापस ले लेना चाहिए था.’’ वे आगे जोड़ते हैं कि सीपीआइ के महासचिव ए.बी. बर्द्धन ने महंगाई के मसले पर पहले कई बार उनसे समर्थन वापस लेने की बात कही थी. ‘‘अब हमारे पास सबसे पहला काम यह है कि हम सीपीएम के भीतर सुधार करें और फिर वाम मोर्चे में जान वापस लाएं.’’

जाहिर है, बहाली का यह रास्ता पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है, जहां 2004 में वाम मोर्चे को 60 में से 35 सीटें मिली थीं. यह संख्या अब गिरकर सिर्फ दो पर आ गई है. लेकिन वाम मोर्चे का पतन तो 2008 के पंचायत चुनावों से ही दिख रहा था, जिसकी पुष्टि बस 2009 के लोकसभा और 2011 के विधानसभा चुनावों में हुई. 2014 में पार्टी बमुश्किल मुर्शिदाबाद और रानीगंज में खुद को बचा सकी. वाम मोर्चे का वोट प्रतिशत 13.7 फीसद गिर गया, जिसमें सीपीएम की हिस्सेदारी अकेले करीब 9 फीसद थी.
सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा समिति के प्रभारी बिमान बोस कहते हैं कि वोट प्रतिशत का जितना नुकसान वाम मोर्चे को हुआ उतना ही लाभ तृणमूल को मिला है. बोस कहते हैं, ‘‘टीएमसी ने बड़े पैमाने पर आतंक की रणनीति अख्तियार की है. वे लोग चुन-चुनकर सीपीएम के काडरों की हत्या करवा रहे हैं, ऐसे लोगों की जो पार्टी और जनता के बीच पुल का काम करते रहे हैं. हमारे 2011 के चुनाव में हारने के बाद से टीएमसी ने सीपीएम के 159 काडरों को मरवाया और 1,40,000 लोगों को बेघर कर दिया गया.’’
वे यह भी मानते हैं कि 34 साल की लंबी अवधि तक सत्ता में रहने के बाद राज्य सरकार के मुख्यालय राइटर्स बिल्डिंग या पार्टी के मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट से निकलने वाले फैसलों को व्यापक जनता तक पहुंचाने में भी नाकाम रही है. मसलन, हल्दिया पेट्रोकेमिकल प्लांट को बनाने के लिए भारी समर्थन था, लेकिन सीपीएम सरकार ने जब 2007 में नंदीग्राम में एक औद्योगिक प्लांट लगाने के लिए इंडोनेशियाई कंपनी को बुलाया तो भारी विरोध के कारण ‘‘पार्टी को बहुत झटका लगा.’’
यह तो तय है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम का पतन और टीएमसी का उभार एक-दूसरे के समानांतर रहा है. लेकिन इस दौरान बीजेपी ने भी यहां अच्छा प्रदर्शन किया. उसे भले ही दो सीटें मिलीं लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में वह 16.8 फीसद पर रही. बोस कहते हैं, ‘‘जाति और धर्म आधारित राजनीति का बड़ा असर हुआ है. हम इससे ठीक से निपट नहीं पाए.’’
सीपीएम के एक अन्य पोलित ब्यूरो सदस्य कहते हैं, ‘‘खुद को दुरुस्त करने का अब एक ही तरीका है. इन बरसों के दौरान वाम राजनीति जितना वाम झुकाव वाली रही है उससे कहीं ज्यादा वाममार्गी उसे होना पड़ेगा.’’ दूसरे शब्दों में यह कि वाम राजनीति को क्षेत्रीय दलों के साथ अपने गठबंधन को छोडऩा होगा, फिर चाहे वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो या तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक. साथ ही कांग्रेस जैसी मध्यमार्गी पार्टियों के साथ तालमेल बैठाने की आदत से भी बाज आना होगा.
सीपीआइ के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं, ‘‘जब समाजवादी पार्टी और अन्नाद्रमुक जैसी जाति आधारित पार्टियां हमारे साथ गठजोड़ करती हैं तो हम उन्हें वैधता प्रदान कर रहे होते हैं, लेकिन बदले में वे हमें जाति की दुर्गंध के अलावा और कुछ नहीं दे पाती हैं. पिछले वर्षों के दौरान हमारे अपने गढ़ों में हमारे समर्थन के खत्म होने की वजह भी यही रही है. इस हद तक यह पतन हुआ है कि अब पार्टी के कार्यकर्ता सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर वामपंथ का मतलब क्या है?’’
इसका मतलब यह हुआ कि खुद को ताजादम करने और आत्मालोचना के नाम पर सीपीएम और ज्यादा अपने खोल में सिमटती जाएगी. कांग्रेस का अगर उतना ही विरोध किया जाएगा जितना बीजेपी का, तो इसका आशय यह निकलता है कि बीजेपी को और ज्यादा राजनैतिक स्पेस मिलेगा.
केरल में पिनारयी विजयन और अच्युतानंदन के बीच पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों, उत्तरी केरल में बागी टी.पी. चंद्रशेखरन की हत्या और केरल दिनेश बीड़ी कामगार केंद्रीय सहकारिता सोसाइटी जैसी उसकी कुछ उपलब्धियों के धीरे-धीरे बिखरते जाने के बावजूद सीपीएम की हालत वहां कुछ बेहतर है.
सवाल यह है कि पार्टी के लिए आगे का रास्ता क्या हो? क्या वाम दलों को आम आदमी पार्टी का एक और संस्करण बन जाना होगा? बेशक, प्रकाश करात और सीपीएम के कई नेता दिल्ली में दिसंबर 2013 में हुए चुनाव में आप के प्रदर्शन से काफी प्रभावित रहे हैं. यहां तक कि सीपीआइ के कई समर्थक जैसे जेएनयू के प्रोफेसर कमल मित्र चेनॉय और अकादमिक आदित्य निगम जैसे लोगों ने तो आम आदमी पार्टी की सदस्यता ही ले डाली.
लेकिन वाम दलों में सभी इस लाइन से सहमत नहीं हैं. केरल में एलडीएफ के संयोजक वाइकम विश्वन कहते हैं कि संभव है कि आप कुछ वोटों में हेरफेर कर पाने में सक्षम हों और बेशक उदारवाद की पैदाइशी पीढ़ी में उसका कुछ आकर्षण भी हो, लेकिन ‘‘हम नई परिस्थिति के अनुकूल खुद को बनाने के लिए संकल्पित हैं.’’
एक बात तय है कि वाम के पास अब वक्त नहीं बचा है. उसे जो करना है, अभी करना होगा.
वास्तविकता की कसौटी पर
वाम दायरे से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुख्यधारा की वाम राजनीति का आज के युवाओं के साथ जुड़ाव नहीं है.

के.के. रेमा, 43 वर्ष
स्टेट सेक्रेटेरिएट मेंबर, रेवॉल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी और सीपीएम के दिवंगत नेता टी.पी. चंद्रशेखरन की पत्नी
वाम का रोग स्थापित वाम दल मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य को समझने और स्वीकारने को तैयार नहीं हैं. युवाओं की वाम राजनीति में भागीदारी और गिरेगी यदि वाम दलों ने अपनी विचारधारा और आचरण में बदलाव नहीं किया.
नुस्खा जनतांत्रिक संघर्षों के माध्यम से व्यावहारिक समाधानों पर खुद को केंद्रित करना.

प्रसेनजित बोस, 40 वर्ष
वाम कार्यकर्ता और अर्थशास्त्री, सीपीएम के शोध प्रकोष्ठ के पूर्व प्रभारी
वाम का रोग आज का युवा विचारधाराओं को उसके प्रदर्शन की कसौटी पर परखता है, कि आखिर उससे वास्तव में उसकी जिंदगी में कितना फर्क आ रहा है. वाम राजनीति को यह बात अपने संज्ञान में लेनी होगी.
नुस्खा जनता से जुड़े मुद्दों पर उसे जनतांत्रिक तरीके से संगठित करने का और कोई विकल्प नहीं है.

अखिल रंजन दत्ता, 41 वर्ष
प्रोफेसर, राजनीतिशास्त्र, गुवाहाटी यूनिवर्सिटी और वाममार्गी पत्रिका नतुन पदातिक के संपादक
वाम का रोग आज का युवा सम्मानजनक जीवन जीने की आकांक्षा रखता है. वह बाजार की ताकतों की ओर से थोपे गए 16 या 18 घंटे काम नहीं करना चाहता. उसके रोष को सही दिशा नहीं मिल सकी है. इस संदर्भ में वाम राजनीति युवाओं के आक्रोश को भुना पाने की रणनीति विकसित करने में नाकाम रही है. आज वाम राजनीति करने वालों के मुकाबले कॉरपोरेट ताकतें ज्यादा आक्रामक और स्मार्ट हैं.
नुस्खा समय की मांग है कि सभी उपलब्ध माध्यमों- संगीत, साहित्य, नाटक, लोककलाओं, स्थानीय मुद्दों और संसाधनों के जरिए जनता के साथ एक करीबी रिश्ता बनाया जाए.

अनिंदिता सर्बाधिकारी, 40 वर्ष
फिल्मकार, वाम राजनीति पर बनी फिल्म रे ऑफ लाइट की निर्देशक
वाम का रोग वाम राजनीति खासकर शहरी पट्टी के युवाओं को खींच पाने में नाकाम रही है. उनके सीटू जैसे मजदूर संगठनों ने कभी भी आइटी जैसे उभरते हुए औद्योगिक क्षेत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया.
नुस्खा वाम नेताओं को कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम कर रहे शहरी युवाओं तक अपनी पहुंच बनानी होगी.
(- साथ में राजीव पी.आइ. और कौशिक डेका)
सिर्फ एक दशक बीता है और फर्क देखने लायक है. गोपालन भवन के बाहर अब चैनलों की ओबी वैन की भीड़ नहीं दिखती. भवन के गलियारों से कभी चिपके रहने वाले पत्रकारों ने रास्ता बदल लिया है. ऐसा लगता है कि दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है और यह इमारत समय के प्रवाह में जम गई है. बेशक, ऐसा ही है क्योंकि बसु और सुरजीत दोनों ही अब नहीं रहे. सीपीएम के मुकुट में हीरे की तरह जड़ा पश्चिम बंगाल हार जाने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 42 में से सिर्फ दो सीटें ही हासिल हुईं.
लोकसभा में पूरा-का-पूरा वाम मोर्चा 10 सांसदों तक सिमट कर रह गया है. 2004 में यह आंकड़ा 60 हुआ करता था. इस मोर्चे में अब सिर्फ सीपीएम और सीपीआइ ही बचे हैं क्योंकि रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के इकलौते सदस्य ने चुनाव से पहले केरल में कांग्रेस का दामन थाम लिया था और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का इस बार खाता ही नहीं खुल सका. वाम मोर्चे का वोट प्रतिशत इस बार 4.8 फीसदी रहा जो अब तक का न्यूनतम है.
यह शर्मिंदगी यहीं खत्म नहीं होती. आंध्र प्रदेश में सीपीएम का वोट प्रतिशत 2014 में गिरकर एक फीसदी पर सिमट गया है, जबकि 1964 में अविभाजित सीपीआइ का विभाजन होने के बाद जब चुनाव हुआ था तो उसमें भी पार्टी को चार फीसद वोट मिले थे. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने पहले तो सीपीएम के साथ साझेदारी की बात कही, फिर उसे शर्मिंदा करते हुए सिर्फ एक सीट का प्रस्ताव दे डाला. भौचक सीपीएम ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. बस एक त्रिपुरा ही है, जो अपने दो सांसदों के भरोसे लाल झंडे को संभाले हुए है और वाम के राष्ट्रीय पतन के बावजूद उसकी सांसों को थामे हुए है.
गोपालन भवन आज भुतहा इमारत बन चुका है. सीपीएम के नौ सांसद संभवतः संसद के भीतर इस उम्मीद में जमे हुए हैं कि सत्ता में गिर चुकी अपनी साख को अपने फेफड़ों की सामूहिक ताकत से कैसे भी बचा ले जाएंगे. भवन के दूसरे तल पर स्थित पार्टी महासचिव प्रकाश करात के कमरे के बाहर चमकदार लाल रंग की सजधज के बीच अल्युमिनियम का एक ऐश ट्रे पड़ा हुआ है. उनके कमरे के भीतर पीछे वाली दीवार पर एक पुराना रूसी पोस्टर लगा है जिस पर रूसी में लिखा है, ‘‘रोशन भविष्य का रास्ता अक्तूबर क्रांति से निकलता है.’’
करात जानते हैं कि सीपीएम एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है. न उसके पास रणनीति है और न ही कार्यनीति. उनके साक्षात्कार में श्गिरावट,’’ ‘सफाया’ और ‘झटका’ जैसे शब्द बार-बार आते हैं. 1964 में सीपीआइ के विभाजन के बाद उससे अलग होकर लगातार मजबूत और व्यापक होती गई इस पार्टी के इतिहास में पहले कभी भी ऐसा वक्त नहीं आया था, जब उसे अपना भविष्य इतना धुंधला और अनिश्चित दिखा हो.
करात स्वीकार करने की मुद्रा में कहते हैं, ‘‘न सिर्फ वाम के चुनावी आधार में गिरावट आई है बल्कि देश भर में इसका राजनैतिक प्रभाव भी घटा है. जाहिर है हमें सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल में लगा है जहां 2011 में विधानसभा चुनाव में हम हार गए, लेकिन तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी दूसरी जगहों पर भी हमें चोट पहुंची. हमें खुद को संभालना होगा, पकड़ फिर से बनानी होगी और आगे बढऩा होगा.’’

पार्टी की अगली कांग्रेस अप्रैल 2015 में है. उससे पहले पार्टी की योजना जमीनी स्तर से लेकर गांव, मोहल्ला, जिलों और राज्यों में सिलसिलेवार बैठकें करने की है. इस दौरान पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के मन में दो पुराने सवाल उमड़ रहे हैः क्या कांग्रेस और बीजेपी को पहले की ही तरह एक समान बरता जाए चूंकि पैसे बनाने की कांग्रेसी मानसिकता बीजेपी की दक्षिणपंथी नीतियों से बहुत अलग नहीं है?
इतना ही नहीं, वामपंथ खुद में किन तरीकों से बदलाव लाए ताकि वह उस महत्वाकांक्षी ग्रामीण और शहरी तबके से दोबारा खुद को जोड़ सके जो आज भूमंडलीकरण और नव-उदारवादी अर्थशास्त्र के मोह में फंसा पड़ा है?
करात साठ के दशक में एडिनबरा यूनिवर्सिटी में मार्क्सवादी इतिहासकार विक्टर केर्नन के शिष्य रहे हैं, लिहाजा वे मार्क्स से भी उतने ही परिचित हैं जितना कि इतिहास से. वे मानते हैं कि पिछले एक दशक के दौरान मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों ने मध्यम वर्ग को एक अजीबोगरीब प्राणी में तब्दील कर दिया है.
जहां तक वाममार्गी बौद्धिकों का सवाल है, जो अब तक स्टडी सर्किलों से लेकर छात्रसंघ के चुनावों में जीत तक और लाल सलाम के नारे वाले प्रदर्शनों से लेकर निम्नवर्गीय अध्ययनों तक खुद को अभिव्यक्त करते आए थे, तो ऐसा लगता है कि वे काफी आगे जा चुके हैं, हालांकि शिन जिनपिंग के चीन या व्लादिमिर पुतिन के रूस के साथ उनकी तुलना करना बहुत न्यायसंगत नहीं होगा.
लेनिन की एकाध पोर्ट्रेट से घिरे अपने विशाल दफ्तर में बैठे करात कहते हैं, ‘‘वैश्वीकरण के बाद की दुनिया में हमें खुद से यह सवाल करना होगा कि आखिर वाम राजनीति युवाओं को क्यों आकर्षित नहीं कर पा रही है. इसके अलावा, काम का चरित्र भी अब बहुत ही बिखरा हुआ और केंद्रीकृत हो चला है.
मसलन सेवा क्षेत्र को ही देख लें. असंगठित क्षेत्र के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां हैं. एक जमाना था जब कोलकाता की ट्राम का किराया एक पैसा बढ़ जाता तो समूचा शहर रुक जाया करता था, लेकिन अब? आखिर वाम राजनीति इन सारे मसलों को कैसे संबोधित करे?
अर्थशास्त्री और राजनैतिक टीकाकार प्रभात पटनायक की मानें तो वाम का पतन एक सामाजिक प्रतिक्रांति के जैसा है जिसे उस उच्च मध्यवर्ग ने अंजाम दिया जिसे बीजेपी-कांग्रेस की नव-उदारवादी नीतियों का लाभ मिला है. इसके अलावा, भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थान जातिगत अवरोधों और चेतना को शिक्षितों के बीच तोड़ पाने में नाकाम रहे हैं जिसका नतीजा यह हुआ है कि जो पहले से सशक्त थे वे और ताकतवर हो गए हैं. पटनायक कहते हैं, ‘‘वे अपनी सुविधाओं को सही ठहराने के लिए असमानता को सही ठहराते हैं. उन्हें वाम विचारधारा से खतरा महसूस होता है.’’
दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जो एक जमाने में वाम छात्र संघर्षों का केंद्र हुआ करता था, वहां 2006 में ओबीसी आरक्षण के बाद जाति आधारित ध्रुवीकरण ने जगह बना ली है. सीपीएम के छात्र संगठन स्टुडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) के आधार को या तो बीजेपी समर्थक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या फिर नक्सल समर्थक अतिवामपंथी ऑल इंडिया स्टुडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने छीन लिया है.
जेएनयू में अर्थशास्त्र के शोधछात्र अभिनव प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘‘आइसा जैसे संगठनों ने यह महसूस किया कि आर्थिक सुधारों की संतानों को राजनैतिक रूप से संगठित करने में मार्क्सवाद की भूमिका व्यर्थ है. अगर वोट कुछ दूसरे आसान तरीकों से बंटोरे जा सकते हों, तो विश्वास खो चुकी एक विचारधारा को समझने में इतनी मेहनत क्यों की जाए?’’
सीपीएम के महासचिव के तौर पर करात का नौ वर्ष का कार्यकाल पार्टी के सबसे बड़े पतन का गवाह रहा है. बसु और सुरजीत ने 2004 में सक्रिय रूप से कांग्रेस के साथ तालमेल बैठाया और पहली यूपीए सरकार चलाने के लिए यूपीए के सहयोगियों के साथ मिलकर एक साझ न्यूनतम कार्यक्रम बनाया था. मनमोहन सिंह जब 2008 में अमेरिका के साथ एटमी सौदे पर आगे बढ़े तो करात ने पैर वापस खींच लिए और उसके पक्ष में यह तर्क दिया कि सीपीएम के लिए अकेले खड़े रहना कहीं ज्यादा बेहतर होगा बजाए इसके कि वह कांग्रेस के साम्राज्यवाद समर्थक निर्णयों से प्रदूषित हो जाए.
पार्टी बिखरने लगी और खासकर पश्चिम बंगाल में वह पस्त होने लगी, लेकिन नेतृत्व अड़ा रहा. केरल के एक सीपीएम नेता बताते हैं, ‘‘हम भले ही 2004 से 2008 तक यूपीए-1 को बाहर से समर्थन देते रहे थे, लेकिन कम-से-कम हमारी पहुंच सत्ता तक तो थी. एक बार हमने समर्थन वापस ले लिया तो वह पहुंच भी चली गई. इससे सौदेबाजी के लिए हमारे हाथ-पैर ही कट गए और चुनाव परिणामों पर इसका असर दिखा. समर्थन वापसी के फैसले से जुड़ा अमेरिका विरोध हमारे समर्थकों को भरोसे में नहीं ले सका.’’
यह पूछे जाने पर कि क्या यूपीए-1 से भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे पर सीपीएम का समर्थन वापसी का फैसला ही पार्टी के पतन में निर्णायक बिंदु था, करात कहते हैं, ‘‘हमें शायद पहले ही समर्थन वापस ले लेना चाहिए था.’’ वे आगे जोड़ते हैं कि सीपीआइ के महासचिव ए.बी. बर्द्धन ने महंगाई के मसले पर पहले कई बार उनसे समर्थन वापस लेने की बात कही थी. ‘‘अब हमारे पास सबसे पहला काम यह है कि हम सीपीएम के भीतर सुधार करें और फिर वाम मोर्चे में जान वापस लाएं.’’

जाहिर है, बहाली का यह रास्ता पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है, जहां 2004 में वाम मोर्चे को 60 में से 35 सीटें मिली थीं. यह संख्या अब गिरकर सिर्फ दो पर आ गई है. लेकिन वाम मोर्चे का पतन तो 2008 के पंचायत चुनावों से ही दिख रहा था, जिसकी पुष्टि बस 2009 के लोकसभा और 2011 के विधानसभा चुनावों में हुई. 2014 में पार्टी बमुश्किल मुर्शिदाबाद और रानीगंज में खुद को बचा सकी. वाम मोर्चे का वोट प्रतिशत 13.7 फीसद गिर गया, जिसमें सीपीएम की हिस्सेदारी अकेले करीब 9 फीसद थी.
सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा समिति के प्रभारी बिमान बोस कहते हैं कि वोट प्रतिशत का जितना नुकसान वाम मोर्चे को हुआ उतना ही लाभ तृणमूल को मिला है. बोस कहते हैं, ‘‘टीएमसी ने बड़े पैमाने पर आतंक की रणनीति अख्तियार की है. वे लोग चुन-चुनकर सीपीएम के काडरों की हत्या करवा रहे हैं, ऐसे लोगों की जो पार्टी और जनता के बीच पुल का काम करते रहे हैं. हमारे 2011 के चुनाव में हारने के बाद से टीएमसी ने सीपीएम के 159 काडरों को मरवाया और 1,40,000 लोगों को बेघर कर दिया गया.’’
वे यह भी मानते हैं कि 34 साल की लंबी अवधि तक सत्ता में रहने के बाद राज्य सरकार के मुख्यालय राइटर्स बिल्डिंग या पार्टी के मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट से निकलने वाले फैसलों को व्यापक जनता तक पहुंचाने में भी नाकाम रही है. मसलन, हल्दिया पेट्रोकेमिकल प्लांट को बनाने के लिए भारी समर्थन था, लेकिन सीपीएम सरकार ने जब 2007 में नंदीग्राम में एक औद्योगिक प्लांट लगाने के लिए इंडोनेशियाई कंपनी को बुलाया तो भारी विरोध के कारण ‘‘पार्टी को बहुत झटका लगा.’’
यह तो तय है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम का पतन और टीएमसी का उभार एक-दूसरे के समानांतर रहा है. लेकिन इस दौरान बीजेपी ने भी यहां अच्छा प्रदर्शन किया. उसे भले ही दो सीटें मिलीं लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में वह 16.8 फीसद पर रही. बोस कहते हैं, ‘‘जाति और धर्म आधारित राजनीति का बड़ा असर हुआ है. हम इससे ठीक से निपट नहीं पाए.’’
सीपीएम के एक अन्य पोलित ब्यूरो सदस्य कहते हैं, ‘‘खुद को दुरुस्त करने का अब एक ही तरीका है. इन बरसों के दौरान वाम राजनीति जितना वाम झुकाव वाली रही है उससे कहीं ज्यादा वाममार्गी उसे होना पड़ेगा.’’ दूसरे शब्दों में यह कि वाम राजनीति को क्षेत्रीय दलों के साथ अपने गठबंधन को छोडऩा होगा, फिर चाहे वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो या तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक. साथ ही कांग्रेस जैसी मध्यमार्गी पार्टियों के साथ तालमेल बैठाने की आदत से भी बाज आना होगा.
सीपीआइ के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं, ‘‘जब समाजवादी पार्टी और अन्नाद्रमुक जैसी जाति आधारित पार्टियां हमारे साथ गठजोड़ करती हैं तो हम उन्हें वैधता प्रदान कर रहे होते हैं, लेकिन बदले में वे हमें जाति की दुर्गंध के अलावा और कुछ नहीं दे पाती हैं. पिछले वर्षों के दौरान हमारे अपने गढ़ों में हमारे समर्थन के खत्म होने की वजह भी यही रही है. इस हद तक यह पतन हुआ है कि अब पार्टी के कार्यकर्ता सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर वामपंथ का मतलब क्या है?’’
इसका मतलब यह हुआ कि खुद को ताजादम करने और आत्मालोचना के नाम पर सीपीएम और ज्यादा अपने खोल में सिमटती जाएगी. कांग्रेस का अगर उतना ही विरोध किया जाएगा जितना बीजेपी का, तो इसका आशय यह निकलता है कि बीजेपी को और ज्यादा राजनैतिक स्पेस मिलेगा.
केरल में पिनारयी विजयन और अच्युतानंदन के बीच पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों, उत्तरी केरल में बागी टी.पी. चंद्रशेखरन की हत्या और केरल दिनेश बीड़ी कामगार केंद्रीय सहकारिता सोसाइटी जैसी उसकी कुछ उपलब्धियों के धीरे-धीरे बिखरते जाने के बावजूद सीपीएम की हालत वहां कुछ बेहतर है.
सवाल यह है कि पार्टी के लिए आगे का रास्ता क्या हो? क्या वाम दलों को आम आदमी पार्टी का एक और संस्करण बन जाना होगा? बेशक, प्रकाश करात और सीपीएम के कई नेता दिल्ली में दिसंबर 2013 में हुए चुनाव में आप के प्रदर्शन से काफी प्रभावित रहे हैं. यहां तक कि सीपीआइ के कई समर्थक जैसे जेएनयू के प्रोफेसर कमल मित्र चेनॉय और अकादमिक आदित्य निगम जैसे लोगों ने तो आम आदमी पार्टी की सदस्यता ही ले डाली.
लेकिन वाम दलों में सभी इस लाइन से सहमत नहीं हैं. केरल में एलडीएफ के संयोजक वाइकम विश्वन कहते हैं कि संभव है कि आप कुछ वोटों में हेरफेर कर पाने में सक्षम हों और बेशक उदारवाद की पैदाइशी पीढ़ी में उसका कुछ आकर्षण भी हो, लेकिन ‘‘हम नई परिस्थिति के अनुकूल खुद को बनाने के लिए संकल्पित हैं.’’
एक बात तय है कि वाम के पास अब वक्त नहीं बचा है. उसे जो करना है, अभी करना होगा.
वास्तविकता की कसौटी पर
वाम दायरे से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुख्यधारा की वाम राजनीति का आज के युवाओं के साथ जुड़ाव नहीं है.

के.के. रेमा, 43 वर्ष
स्टेट सेक्रेटेरिएट मेंबर, रेवॉल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी और सीपीएम के दिवंगत नेता टी.पी. चंद्रशेखरन की पत्नी
वाम का रोग स्थापित वाम दल मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य को समझने और स्वीकारने को तैयार नहीं हैं. युवाओं की वाम राजनीति में भागीदारी और गिरेगी यदि वाम दलों ने अपनी विचारधारा और आचरण में बदलाव नहीं किया.
नुस्खा जनतांत्रिक संघर्षों के माध्यम से व्यावहारिक समाधानों पर खुद को केंद्रित करना.

प्रसेनजित बोस, 40 वर्ष
वाम कार्यकर्ता और अर्थशास्त्री, सीपीएम के शोध प्रकोष्ठ के पूर्व प्रभारी
वाम का रोग आज का युवा विचारधाराओं को उसके प्रदर्शन की कसौटी पर परखता है, कि आखिर उससे वास्तव में उसकी जिंदगी में कितना फर्क आ रहा है. वाम राजनीति को यह बात अपने संज्ञान में लेनी होगी.
नुस्खा जनता से जुड़े मुद्दों पर उसे जनतांत्रिक तरीके से संगठित करने का और कोई विकल्प नहीं है.

अखिल रंजन दत्ता, 41 वर्ष
प्रोफेसर, राजनीतिशास्त्र, गुवाहाटी यूनिवर्सिटी और वाममार्गी पत्रिका नतुन पदातिक के संपादक
वाम का रोग आज का युवा सम्मानजनक जीवन जीने की आकांक्षा रखता है. वह बाजार की ताकतों की ओर से थोपे गए 16 या 18 घंटे काम नहीं करना चाहता. उसके रोष को सही दिशा नहीं मिल सकी है. इस संदर्भ में वाम राजनीति युवाओं के आक्रोश को भुना पाने की रणनीति विकसित करने में नाकाम रही है. आज वाम राजनीति करने वालों के मुकाबले कॉरपोरेट ताकतें ज्यादा आक्रामक और स्मार्ट हैं.
नुस्खा समय की मांग है कि सभी उपलब्ध माध्यमों- संगीत, साहित्य, नाटक, लोककलाओं, स्थानीय मुद्दों और संसाधनों के जरिए जनता के साथ एक करीबी रिश्ता बनाया जाए.

अनिंदिता सर्बाधिकारी, 40 वर्ष
फिल्मकार, वाम राजनीति पर बनी फिल्म रे ऑफ लाइट की निर्देशक
वाम का रोग वाम राजनीति खासकर शहरी पट्टी के युवाओं को खींच पाने में नाकाम रही है. उनके सीटू जैसे मजदूर संगठनों ने कभी भी आइटी जैसे उभरते हुए औद्योगिक क्षेत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया.
नुस्खा वाम नेताओं को कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम कर रहे शहरी युवाओं तक अपनी पहुंच बनानी होगी.
(- साथ में राजीव पी.आइ. और कौशिक डेका)

