सन् 1997 की बात है. भारत की आजादी के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जारी उत्सव के कारण एक व्यक्ति इतने जोश में आ गया कि वह खटकर कलां गांव के बाहर बने शहीदों के संग्रहालय में घुस गया. तब संग्रहालय की सुरक्षा के लिए वहां गार्ड तैनात नहीं हुआ करते थे. वहां रखी तमाम कीमती चीजों की ओर रत्ती भर भी ध्यान न देते हुए वह सीधे अंदर घुसा और भगत सिंह की राख, उनके मोजे, कलाई घड़ी और दो फटी-पुरानी पैंट (जो भगत सिंह के क्रांतिकारी चाचा अजीत सिंह की थी) लेकर चंपत हो गया. दो दिन बाद पंजाब पुलिस के जवानों ने उसे खोज निकाला. वे उसे पकडऩे के लिए आगे बढ़े तो लूटे गए अपने खजाने को बचाने की कोशिश करते हुए उसने घुड़़ककर कहा, “खबरदार, मेरे पास मत आना. मैं भगत सिंह हूं.”
संयोग से उस वक्त भी राज्य में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन की ही सरकार थी. उसने उस भोले-भाले देशभक्त बलबीर सिंह को उसकी इस गलती के लिए माफ नहीं किया और उसे पूरे 18 महीने जेल की सजा हो गई.

भगत सिंह अगर जीवित होते तो शायद अपने चाचा की वह पैंट उसे पहनने को दे देते, जो कांच के शोकेस में बेकार पड़ी हुई थी. और यह बेघर आदमी जनवरी महीने की कड़ाके की ठंड में उस पैंट को पहनकर सर्दी से तो बच सकता था.
शहीद भगत सिंह ने शिवराम राजगुरु, और सुखदेव थापर के साथ फांसी पर चढ़ाए जाने से कई महीने पहले लाहौर जेल में उन्हें जारी की गई एक नोटबुक के दूसरे पन्ने पर लिखा था, “प्रेमी, दीवाने और कवि एक ही मिट्टी से बने होते हैं.”
आज हर कोई भगत सिंह से जुड़ी किसी न किसी चीज को हासिल करना चाहता है. 23 मार्च, 1931 को शहीद हुए उन्हें 84 वर्ष हो चुके हैं. इतने लंबे अंतराल में तो किसी की भी यादें फीकी पड़ जाएंगी. लेकिन भगत सिंह आज भी आजादी के आंदोलन के सबसे अविस्मरणीय प्रतीक बने हुए हैं. घोर वामपंथी नक्सलियों से लेकर खालिस्तानी जैसे अति दक्षिणपंथी संगठन तक हर राजनैतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार उन्हें अपना आदर्श बनाकर पेश करने की कोशिश करता रहा है.

लेकिन इस शहीद की विरासत को टुकड़ों-टुकड़ों में हथियाने की होड़ के बावजूद सभी को कुछ-न-कुछ विरोधाभासों का भी सामना करना पड़ता है. ऑक्सफोर्ड ब्रुक्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर प्रीतम सिंह कहते हैं, “गांधी से प्रेरित राष्ट्रवादियों को भगत सिंह की हिंसा से परहेज है, हिंदू और सिख राष्ट्रवादियों को उनकी नास्तिकता रास नहीं आती, संसदीय व्यवस्था में विश्वास रखने वाले वामपंथियों को उनके विचार और उनकी गतिविधियां नक्सलियों जैसी मालूम होती हैं और नक्सलियों के लिए भगत सिंह की व्यक्तिगत आतंकवाद पर टिप्पणी एक असहज ऐतिहासिक तथ्य है.”
भगत सिंह को अपना बताने की इस लड़ाई की असली वजह यह है कि वे आज भी युवाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र, समुदाय या भाषा से ताल्लुक रखते हों.

आम आदमी पार्टी (आप) के प्रवक्ता योगेंद्र यादव कहते हैं, “भगत सिंह ऐसे नायक हैं, जो सभी पीढिय़ों को प्रभावित करते आए हैं. वे 80 साल पहले भी युवाओं के नायक थे और आज भी नायक बने हुए हैं.” वे कहते हैं, “भगत सिंह स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी सेनानी से ज्यादा लोकप्रिय हैं. चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव को हथियाने की ऐसी कोशिश कभी नहीं हुई.”
भगत सिंह की मौत के चार साल बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक होरेस विलियमसन ने लिखा थाः “उनकी (भगत सिंह की) फोटो हर शहर और कस्बे में बिक रही थी और कुछ समय के लिए तो उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी से टक्कर ले रही थी.” 2008 में इंडिया टुडे के जनमत सर्वेक्षण में भगत सिंह को, ‘महानतम भारतीय’ माना गया था. इस सूची में वे महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस से भी ऊपर थे.
सबसे नए राजनैतिक दल आप के नेता योगेंद्र यादव मानते हैं कि वे भगत सिंह को नायक के रूप में स्वीकार करने के लिए एक तरह से मजबूर हो गए. नवंबर, 2012 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर पार्टी के पहले धरने के समय भारत माता का चित्र लगाया गया था. जबकि दिल्ली के रामलीला मैदान में दूसरा बड़ा शक्ति प्रदर्शन महात्मा गांधी से प्रेरित था.
यादव कहते हैं, “आप ने औपचारिक रूप से कभी भी भगत सिंह को अपने प्रतीक के तौर पर नहीं पेश किया. बाद में हमारे युवा कार्यकर्ताओं ने उन्हें प्रतीक बनाया.” वे बताते हैं कि किसी आधिकारिक निर्देश के बगैर ही शहीद भगत सिंह स्वाभाविक रूप से आप के केंद्रीय प्रतीक और प्रेरणा स्रोत बन गए.
चंडीगढ़ में गुल पनाग और दिल्ली में राखी बिड़ला ने भगत सिंह को श्रद्धांजलि देने के बाद ही अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था. और संगरूर लोकसभा सीट पर शानदार जीत हासिल करने वाले भगवंत मान अब भगत सिंह की तरह ही बसंती रंग की पगड़ी पहनकर संसद में जाते हैं.
पंजाब, जहां भगत सिंह का जन्म हुआ था, वहां के लोगों को आज भी उनसे सबसे ज्यादा लगाव है. आज वे जीवित होते तो सौ साल से ज्यादा के होते. यहां आज भी लोग उन्हें ‘भाई जी’, ‘वीर जी’ या ‘म्रित्तर’ कहकर संबोधित करते हैं. लगभग हर पंजाबी गायक अपने गानों में उन्हें बड़ा भाई या दोस्त बताता है. यूट्यूब पर भगत सिंह का नाम डालकर उन सभी गानों को सुना जा सकता है.

(दिल्ली में भगत सिंह के रिश्तेदार का सम्मान करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी)
बॉलीवुड की सनसनी यो यो हनी सिंह ने भी 2009 के अपने एक रैप सांग में जॉन सांडर्स की हत्या का जिक्र करते हुए भगत सिंह के प्रति अपना ‘सम्मान’ जाहिर किया था. इस गीत के अल्फाज थे, “सूरमे हाथ-पिस्तोलां वाले करदे फायर फिरंगी ते...” अपनी खास शैली में हनी सिंह आगे बोलते हैं, “यह गाना कौमी हीरो के लिए है, द वन ऐंड ओनली, सरदार भगत सिंह.”
तमाम कलाकारों की कल्पनाओं से निकलकर बनीं भगत सिंह की तस्वीरों में उन्हें 1924 में लाहौर के नेशनल कॉलेज में एक ग्रुप फोटो में पगड़ी पहने हुए या अप्रैल, 1929 में दाढ़ी-मूंछ के बिना सिर पर हैट और शेक्सपीयर वाली कॉलर में दिखाया गया है. उनकी यह तस्वीर कारों के स्टिकर और ट्रकों के पीछे अकसर देखने को मिलती है और अब तो फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भी उनकी ये तस्वीरें खूब प्रचलित हैं. पिछले साल उनकी शहादत की वर्षगांठ के मौके पर भारत के साथ-साथ पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी ट्विटर पर वे हैशटेग #bhagatsingh के साथ खूब चर्चा में रहे.
दो साल पहले पंजाब के पाटरन कस्बे में ट्रक यूनियन के सदस्यों ने भगत सिंह की आदमकद प्रतिमा अपने परिसर में लगाई थी. ट्रक चालकों ने उनके भतीजे जगमोहन को उस प्रतिमा के अनावरण के लिए बुलाया था, जिन्हें ट्रक चालकों ने बताया कि भगत सिंह वर्षों से उनके संकटमोचन रहे हैं. उन्होंने बताया, “अगर हमारे ट्रकों के पीछे भगत सिंह की तस्वीर है तो पंजाब से बाहर कठिन से कठिन समय में भी कोई हमारी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठा सकता है.” और इसीलिए उन्होंने शहीद की प्रतिमा यूनियन के दफ्तर में लगवाने का फैसला किया है.
भगत सिंह की प्रासंगिकता युवा भारत के उदय के साथ और बढ़ गई है. देश में इस समय 25 साल के आसपास के युवाओं की जनसंख्या सबसे ज्यादा है जो अगले छह वर्षों में 50 करोड़ तक पहुंच जाएगी. ऐसे में अगर युवाओं में भगत सिंह की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है.
23 फरवरी को बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने वारविक यूनिवर्सिटी के इतिहासकार डेविड हार्डिमान के भगत सिंह को ‘आतंकवादी’ बताने पर कड़ी आपत्ति जाहिर की थी. पंजाब के जगरांव में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने वादा किया कि वे संसद में प्रस्ताव लाकर ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालेंगे कि ब्रिटेन में इतिहास की किताबों में इस गलती को सुधारा जाए. हालांकि यह एक तरह से एम.एस. गोलवलकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक के.बी. हेगडेवार की सोच के खिलाफ है, जो कभी भी भगत सिंह के क्रांतिकारी तरीकों के समर्थक नहीं रहे. इसलिए भगत सिंह को राष्ट्र नायक बताने वाले राजनाथ के इस वक्तव्य को मोहन भागवत की अगुआई वाले आरएसएस की सहमति प्राप्त दिखती है. जनवरी, 2008 में आरएसएस के मुखपत्र पाञ्चचजन्य के संपादकीय में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की बीजेपी की मांग का जवाब देते हुए सलाह दी गई कि यह सम्मान “शहीद भगत सिंह और भारतीय सेनानी” को दिया जाना चाहिए.

(कच्छ के रण में पतंग मोहत्सव में भगत सिंह की छवि वाली पतंग)
भगत सिंह की जन्म शती पर बनी पांच फिल्मों में से सबसे चर्चित रही द लीजेंड ऑफ भगत सिंह की पटकथा लिखने वाले 56 वर्षीय अंजुम रजब अली को 2002 में पूना में शूटिंग के दौरान एक दिलचस्प अनुभव हुआ. उन्होंने बताया कि बीजेपी के कुछ छात्र कार्यकर्ता वहां आ गए और उन्होंने कहाः “भगत सिंह सीधी लड़ाई करने वाले योद्धा थे. उन्होंने अंग्रेजों को गोली से उड़ाया और फिर देशद्रोहियों की संसद में बम फेंका. वे हमारी तरह सच्चे देशभक्त थे.”
भगत सिंह के, देशभर में फैले असंख्य युवा समर्थकों की तरह बीजेपी के इन कार्यकर्ताओं को भी बिल्कुल पता नहीं था कि उनके इस नायक की सही मायने में विचारधारा क्या थी और वे दरअसल क्या चाहते थे. योगेंद्र यादव कहते हैं कि उनकी “अदम्य उग्रवादी देशभक्त की छवि” युवाओं को सबसे ज्यादा लुभाती है. वे स्वीकार करते हैं कि आप के बहुत-से युवा कार्यकर्ताओं को भी यही छवि आकर्षित करती है. प्रीतम सिंह कहते हैं कि संभवतः अपनी बहादुरी के अलावा भगत सिंह का आकर्षक व्यक्तित्व भी भारत के युवाओं में अर्जेंटीना के क्रांतिकारी चे ग्वेवारा की तरह का जोश पैदा करता है. चे-ग्वेवारा की तरह ही टी-शर्ट से लेकर कॉफी मग, जिगसॉ पजल और और गूगल प्लस के वॉलपेपर तक पर भगत सिंह की तस्वीरें मिल जाएंगी.
भगत सिंह की मूल विचारधारा से भले ही युवा अनजान हों लेकिन यह युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता का ही सबब है कि 2008 में संसद परिसर में उनकी मूर्ति लगाने का फैसला किया गया था. देर से आए इस फैसले का काफी विरोध भी हुआ था और इस मुद्दे पर नेताओं के बीच काफी दिलचस्प नोक-झोंक देखने को मिली थी. कांग्रेस के मंत्री मनोहर सिंह गिल ने वाममोर्चे के सांसदों के उन्हें हैट वाली छवि में दिखाने के सुझाव पर घोर आपत्ति जाहिर की थी. गिल का कहना था कि “वे एक शहीद सिख थे” इसलिए उन्हें पगड़ी में दिखाया जाए. आखिरकार पगड़ी वाली छवि की जीत हुई.
भगत सिंह का पुश्तैनी गांव अब उनके नाम पर रखे गए जिले में आता है. वहां पगड़ी और हैट को लेकर किसी तरह की बहस नहीं होती. 90 वर्षीय बलजीत कौर कहती हैं, “शहीद हो गया पर मुल्क आजाद करा गया.” खटकर कलां के पास इस महान शहीद के अलावा गर्व करने के लिए और भी वजहें हैं: खूबसूरत सड़कें, हरे-भरे पार्क के अलावा विदेशों में कमाई से बनाए गए बड़े-बड़े बंगले (यहां ज्यादातर लोग विदेशों में बस गए हैं). यह पंजाब का एकमात्र गांव है, जहां 24 घंटे बिजली रहती है. बुजुर्ग महिला कहती हैं, “बाकी पिंडन विच बिजली आंदी नईं, पर इत्थे बिजली कदी जांदी नईं.” यह कहते हुए उनकी आंखों में चमक-सी आ जाती है.
संयोग से उस वक्त भी राज्य में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन की ही सरकार थी. उसने उस भोले-भाले देशभक्त बलबीर सिंह को उसकी इस गलती के लिए माफ नहीं किया और उसे पूरे 18 महीने जेल की सजा हो गई.

भगत सिंह अगर जीवित होते तो शायद अपने चाचा की वह पैंट उसे पहनने को दे देते, जो कांच के शोकेस में बेकार पड़ी हुई थी. और यह बेघर आदमी जनवरी महीने की कड़ाके की ठंड में उस पैंट को पहनकर सर्दी से तो बच सकता था.
शहीद भगत सिंह ने शिवराम राजगुरु, और सुखदेव थापर के साथ फांसी पर चढ़ाए जाने से कई महीने पहले लाहौर जेल में उन्हें जारी की गई एक नोटबुक के दूसरे पन्ने पर लिखा था, “प्रेमी, दीवाने और कवि एक ही मिट्टी से बने होते हैं.”
आज हर कोई भगत सिंह से जुड़ी किसी न किसी चीज को हासिल करना चाहता है. 23 मार्च, 1931 को शहीद हुए उन्हें 84 वर्ष हो चुके हैं. इतने लंबे अंतराल में तो किसी की भी यादें फीकी पड़ जाएंगी. लेकिन भगत सिंह आज भी आजादी के आंदोलन के सबसे अविस्मरणीय प्रतीक बने हुए हैं. घोर वामपंथी नक्सलियों से लेकर खालिस्तानी जैसे अति दक्षिणपंथी संगठन तक हर राजनैतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार उन्हें अपना आदर्श बनाकर पेश करने की कोशिश करता रहा है.

लेकिन इस शहीद की विरासत को टुकड़ों-टुकड़ों में हथियाने की होड़ के बावजूद सभी को कुछ-न-कुछ विरोधाभासों का भी सामना करना पड़ता है. ऑक्सफोर्ड ब्रुक्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर प्रीतम सिंह कहते हैं, “गांधी से प्रेरित राष्ट्रवादियों को भगत सिंह की हिंसा से परहेज है, हिंदू और सिख राष्ट्रवादियों को उनकी नास्तिकता रास नहीं आती, संसदीय व्यवस्था में विश्वास रखने वाले वामपंथियों को उनके विचार और उनकी गतिविधियां नक्सलियों जैसी मालूम होती हैं और नक्सलियों के लिए भगत सिंह की व्यक्तिगत आतंकवाद पर टिप्पणी एक असहज ऐतिहासिक तथ्य है.”
भगत सिंह को अपना बताने की इस लड़ाई की असली वजह यह है कि वे आज भी युवाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र, समुदाय या भाषा से ताल्लुक रखते हों.

आम आदमी पार्टी (आप) के प्रवक्ता योगेंद्र यादव कहते हैं, “भगत सिंह ऐसे नायक हैं, जो सभी पीढिय़ों को प्रभावित करते आए हैं. वे 80 साल पहले भी युवाओं के नायक थे और आज भी नायक बने हुए हैं.” वे कहते हैं, “भगत सिंह स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी सेनानी से ज्यादा लोकप्रिय हैं. चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव को हथियाने की ऐसी कोशिश कभी नहीं हुई.”
भगत सिंह की मौत के चार साल बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक होरेस विलियमसन ने लिखा थाः “उनकी (भगत सिंह की) फोटो हर शहर और कस्बे में बिक रही थी और कुछ समय के लिए तो उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी से टक्कर ले रही थी.” 2008 में इंडिया टुडे के जनमत सर्वेक्षण में भगत सिंह को, ‘महानतम भारतीय’ माना गया था. इस सूची में वे महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस से भी ऊपर थे.
सबसे नए राजनैतिक दल आप के नेता योगेंद्र यादव मानते हैं कि वे भगत सिंह को नायक के रूप में स्वीकार करने के लिए एक तरह से मजबूर हो गए. नवंबर, 2012 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर पार्टी के पहले धरने के समय भारत माता का चित्र लगाया गया था. जबकि दिल्ली के रामलीला मैदान में दूसरा बड़ा शक्ति प्रदर्शन महात्मा गांधी से प्रेरित था.
यादव कहते हैं, “आप ने औपचारिक रूप से कभी भी भगत सिंह को अपने प्रतीक के तौर पर नहीं पेश किया. बाद में हमारे युवा कार्यकर्ताओं ने उन्हें प्रतीक बनाया.” वे बताते हैं कि किसी आधिकारिक निर्देश के बगैर ही शहीद भगत सिंह स्वाभाविक रूप से आप के केंद्रीय प्रतीक और प्रेरणा स्रोत बन गए.
चंडीगढ़ में गुल पनाग और दिल्ली में राखी बिड़ला ने भगत सिंह को श्रद्धांजलि देने के बाद ही अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था. और संगरूर लोकसभा सीट पर शानदार जीत हासिल करने वाले भगवंत मान अब भगत सिंह की तरह ही बसंती रंग की पगड़ी पहनकर संसद में जाते हैं.
पंजाब, जहां भगत सिंह का जन्म हुआ था, वहां के लोगों को आज भी उनसे सबसे ज्यादा लगाव है. आज वे जीवित होते तो सौ साल से ज्यादा के होते. यहां आज भी लोग उन्हें ‘भाई जी’, ‘वीर जी’ या ‘म्रित्तर’ कहकर संबोधित करते हैं. लगभग हर पंजाबी गायक अपने गानों में उन्हें बड़ा भाई या दोस्त बताता है. यूट्यूब पर भगत सिंह का नाम डालकर उन सभी गानों को सुना जा सकता है.

(दिल्ली में भगत सिंह के रिश्तेदार का सम्मान करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी)
बॉलीवुड की सनसनी यो यो हनी सिंह ने भी 2009 के अपने एक रैप सांग में जॉन सांडर्स की हत्या का जिक्र करते हुए भगत सिंह के प्रति अपना ‘सम्मान’ जाहिर किया था. इस गीत के अल्फाज थे, “सूरमे हाथ-पिस्तोलां वाले करदे फायर फिरंगी ते...” अपनी खास शैली में हनी सिंह आगे बोलते हैं, “यह गाना कौमी हीरो के लिए है, द वन ऐंड ओनली, सरदार भगत सिंह.”
तमाम कलाकारों की कल्पनाओं से निकलकर बनीं भगत सिंह की तस्वीरों में उन्हें 1924 में लाहौर के नेशनल कॉलेज में एक ग्रुप फोटो में पगड़ी पहने हुए या अप्रैल, 1929 में दाढ़ी-मूंछ के बिना सिर पर हैट और शेक्सपीयर वाली कॉलर में दिखाया गया है. उनकी यह तस्वीर कारों के स्टिकर और ट्रकों के पीछे अकसर देखने को मिलती है और अब तो फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भी उनकी ये तस्वीरें खूब प्रचलित हैं. पिछले साल उनकी शहादत की वर्षगांठ के मौके पर भारत के साथ-साथ पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी ट्विटर पर वे हैशटेग #bhagatsingh के साथ खूब चर्चा में रहे.
दो साल पहले पंजाब के पाटरन कस्बे में ट्रक यूनियन के सदस्यों ने भगत सिंह की आदमकद प्रतिमा अपने परिसर में लगाई थी. ट्रक चालकों ने उनके भतीजे जगमोहन को उस प्रतिमा के अनावरण के लिए बुलाया था, जिन्हें ट्रक चालकों ने बताया कि भगत सिंह वर्षों से उनके संकटमोचन रहे हैं. उन्होंने बताया, “अगर हमारे ट्रकों के पीछे भगत सिंह की तस्वीर है तो पंजाब से बाहर कठिन से कठिन समय में भी कोई हमारी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठा सकता है.” और इसीलिए उन्होंने शहीद की प्रतिमा यूनियन के दफ्तर में लगवाने का फैसला किया है.
भगत सिंह की प्रासंगिकता युवा भारत के उदय के साथ और बढ़ गई है. देश में इस समय 25 साल के आसपास के युवाओं की जनसंख्या सबसे ज्यादा है जो अगले छह वर्षों में 50 करोड़ तक पहुंच जाएगी. ऐसे में अगर युवाओं में भगत सिंह की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है.
23 फरवरी को बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने वारविक यूनिवर्सिटी के इतिहासकार डेविड हार्डिमान के भगत सिंह को ‘आतंकवादी’ बताने पर कड़ी आपत्ति जाहिर की थी. पंजाब के जगरांव में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने वादा किया कि वे संसद में प्रस्ताव लाकर ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालेंगे कि ब्रिटेन में इतिहास की किताबों में इस गलती को सुधारा जाए. हालांकि यह एक तरह से एम.एस. गोलवलकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक के.बी. हेगडेवार की सोच के खिलाफ है, जो कभी भी भगत सिंह के क्रांतिकारी तरीकों के समर्थक नहीं रहे. इसलिए भगत सिंह को राष्ट्र नायक बताने वाले राजनाथ के इस वक्तव्य को मोहन भागवत की अगुआई वाले आरएसएस की सहमति प्राप्त दिखती है. जनवरी, 2008 में आरएसएस के मुखपत्र पाञ्चचजन्य के संपादकीय में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की बीजेपी की मांग का जवाब देते हुए सलाह दी गई कि यह सम्मान “शहीद भगत सिंह और भारतीय सेनानी” को दिया जाना चाहिए.

(कच्छ के रण में पतंग मोहत्सव में भगत सिंह की छवि वाली पतंग)
भगत सिंह की जन्म शती पर बनी पांच फिल्मों में से सबसे चर्चित रही द लीजेंड ऑफ भगत सिंह की पटकथा लिखने वाले 56 वर्षीय अंजुम रजब अली को 2002 में पूना में शूटिंग के दौरान एक दिलचस्प अनुभव हुआ. उन्होंने बताया कि बीजेपी के कुछ छात्र कार्यकर्ता वहां आ गए और उन्होंने कहाः “भगत सिंह सीधी लड़ाई करने वाले योद्धा थे. उन्होंने अंग्रेजों को गोली से उड़ाया और फिर देशद्रोहियों की संसद में बम फेंका. वे हमारी तरह सच्चे देशभक्त थे.”
भगत सिंह के, देशभर में फैले असंख्य युवा समर्थकों की तरह बीजेपी के इन कार्यकर्ताओं को भी बिल्कुल पता नहीं था कि उनके इस नायक की सही मायने में विचारधारा क्या थी और वे दरअसल क्या चाहते थे. योगेंद्र यादव कहते हैं कि उनकी “अदम्य उग्रवादी देशभक्त की छवि” युवाओं को सबसे ज्यादा लुभाती है. वे स्वीकार करते हैं कि आप के बहुत-से युवा कार्यकर्ताओं को भी यही छवि आकर्षित करती है. प्रीतम सिंह कहते हैं कि संभवतः अपनी बहादुरी के अलावा भगत सिंह का आकर्षक व्यक्तित्व भी भारत के युवाओं में अर्जेंटीना के क्रांतिकारी चे ग्वेवारा की तरह का जोश पैदा करता है. चे-ग्वेवारा की तरह ही टी-शर्ट से लेकर कॉफी मग, जिगसॉ पजल और और गूगल प्लस के वॉलपेपर तक पर भगत सिंह की तस्वीरें मिल जाएंगी.
भगत सिंह की मूल विचारधारा से भले ही युवा अनजान हों लेकिन यह युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता का ही सबब है कि 2008 में संसद परिसर में उनकी मूर्ति लगाने का फैसला किया गया था. देर से आए इस फैसले का काफी विरोध भी हुआ था और इस मुद्दे पर नेताओं के बीच काफी दिलचस्प नोक-झोंक देखने को मिली थी. कांग्रेस के मंत्री मनोहर सिंह गिल ने वाममोर्चे के सांसदों के उन्हें हैट वाली छवि में दिखाने के सुझाव पर घोर आपत्ति जाहिर की थी. गिल का कहना था कि “वे एक शहीद सिख थे” इसलिए उन्हें पगड़ी में दिखाया जाए. आखिरकार पगड़ी वाली छवि की जीत हुई.
भगत सिंह का पुश्तैनी गांव अब उनके नाम पर रखे गए जिले में आता है. वहां पगड़ी और हैट को लेकर किसी तरह की बहस नहीं होती. 90 वर्षीय बलजीत कौर कहती हैं, “शहीद हो गया पर मुल्क आजाद करा गया.” खटकर कलां के पास इस महान शहीद के अलावा गर्व करने के लिए और भी वजहें हैं: खूबसूरत सड़कें, हरे-भरे पार्क के अलावा विदेशों में कमाई से बनाए गए बड़े-बड़े बंगले (यहां ज्यादातर लोग विदेशों में बस गए हैं). यह पंजाब का एकमात्र गांव है, जहां 24 घंटे बिजली रहती है. बुजुर्ग महिला कहती हैं, “बाकी पिंडन विच बिजली आंदी नईं, पर इत्थे बिजली कदी जांदी नईं.” यह कहते हुए उनकी आंखों में चमक-सी आ जाती है.

