सहारनपुर में इस साल की ईद हर बार जैसी नहीं थी. 43 वर्षीय इमरान खान लकड़ी पर नक्काशी का काम करते हैं, लेकिन कर्फ्यू में ढील दिए जाने के बावजूद वे घर से बाहर नहीं निकले और अपने लोहानी सराय स्थित घर में ही उन्होंने नमाज अदा की. 29 जुलाई को ईद वाले दिन कर्फ्यू में चार घंटे की ढील दी गई पर वे पूरे समय घर के बाहर ही बैठे रहे. उनके कुछ पड़ोसी जरूर घर से बाहर निकले लेकिन ईद के मौके पर होने वाली चहल-पहल नदारद थी.
हथियारों से लैस पुलिसकर्मी सड़कों पर तैनात थे. इलाके की काफी लोकप्रिय जगह ईदगाह में भी पिछले साल की तुलना में बहुत कम नमाजी आए. अब से पहले रमजान के महीने में इस शहर में कभी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ था. हरियाणा और उत्तराखंड के बीच फंसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 1992 में बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद किसी तरह का दंगा हुआ नहीं था. खान कहते हैं, ''इस साल सब कुछ अलग लग रहा है, यह ईद फीकी रही.” दरअसल ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहते हैं.
सिख और मुस्लिम प्रदर्शनकारियों में हुआ विवाद 25-26 जुलाई की रात हिंसक झड़पों में बदल गया. विवाद जमीन के टुकड़े को लेकर था, जिस पर गुरु सिंह सभा गुरद्वारे का विस्तार करना चाहती थी. दोनों ही पक्ष उस जमीन को अपनी बता रहे थे. दंगा ऐसा भड़का कि घंटों आगजनी और लूटपाट चलती रही. हिंसा में तीन लोग मारे गए, 34 घायल हो गए और 165 दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं. इसके बाद कर्फ्यू लगाने के साथ देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए गए.
पुलिस ने 22 एफआइआर दर्ज कीं और 47 लोगों को गिरफ्तार किया. 33 लोगों को नजरबंद किया गया. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि शांति कायम करने के लिए राज्य मशीनरी ने दोनों गुटों में समझौता करवाने की बजाए उन्हें सिर्फ अलग करने की कोशिश की. कर्फ्यू में चार-चार घंटे की ढील जरूर दी गई. लेकिन मुस्लिम बहुल शहर के पुराने हिस्से और नए शहर में जहां हिंदू और सिखों की आबादी है, कर्फ्यू को अलग-अलग समय पर हटाया गया.
यह स्थिति अतीत से एकदम अलग है जब ऐसे मामलों का निबटारा सुलह से हो जाता था. लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक दंगों में ऐसा नहीं हुआ. सितंबर, 2013 से लेकर जुलाई, 2014 तक मामूली घटनाओं की परिणति सांप्रदायिक दंगों में हुई, प्रशासन लाचार और मूक बना रहा और जल्द ही दंगों पर राजनीति करने वालों की पौ-बारह हो गई. बीजेपी नेतृत्व वाले गठजोड़ ने तीन माह पहले हुए लोकसभा चुनाव में चांदी काटी थी.
मुजफ्फरनगर से लेकर शामली तक दंगा फैला और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक आधार पर बंट गया, नतीजतन यूपी की 80 में से 73 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. अब पार्टी सुलह के खिलाफ प्रयास कर रही है और हिंदुओं के लिए बेहतर सुविधाओं की मांग कर रही है, सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी पर उसने सिर्फ मुसलमानों पर ही इनायत करने का आरोप लगाया है.
स्थानीय लोग बताते हैं कि अब से पहले कभी कोई दुर्घटना या विवाद होने पर उसे समझदारी से निबटा लिया जाता था. खान कहते हैं, ''पिछले साल एक औरत की कांवड़ जुलूस के दौरान ट्रैक्टर के नीचे आने से मौत हो गई थी. दोनों समुदायों के नेता मामले को बातचीत के जरिए सुलझ लेते थे. इस तरह सांप्रदायिक तनाव को रोक दिया जाता था.” इस बार दोनों ही पक्ष झुकने को तैयार नहीं हैं और उन्हें हमेशा की तरह नेताओं से शह मिल रही है.
इस बार सांप्रदायिक राजनैतिक साजिश का खेल लुक-छिपकर नहीं बल्कि खुले तौर पर खेला जा रहा है, यहां तक कि राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर इसे सुना जा सकता है. वे जिस तरह अपने-अपने समुदायों का पक्ष ले रहे हैं, वह चिंताजनक है. अगर दोनों पक्ष किसी बात पर एक राय दिखते हैं तो वह यह कि दोनों का मानना है कि दूसरा पक्ष सांप्रदायिक भावनाएं भड़का रहा है, क्योंकि वह चुनाव जीतना चाहता है. तीन माह पहले तक यहां के विधायक रहे राघव लखनपाल अब स्थानीय सांसद हैं.
उनकी खाली सीट के लिए छह माह के भीतर उपचुनाव होना है. स्थानीय कांग्रेस नेता मुहर्रम अली उर्फ पप्पू और उनके तीन साथियों को 30 जुलाई की शाम राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. एसएसपी राजेश कुमार पांडे ने इंडिया टुडे को बताया, ''26 जुलाई की सुबह उसने (पप्पू) भीड़ को उकसाया. हमारे पास सीसीटीवी फुटेज है, जिससे घटनाक्रम को जोडऩे में मदद मिली. पुलिस की जांच से पता चला है कि पप्पू अरसे से जमीन पर विवाद को भड़काने की कोशिश कर रहा था.
भीड़ ने पहले अग्निशमन विभाग के कंट्रोल रूम पर हमला कर सेवाएं बाधित कर दीं ताकि शहर में उनकी सेवाएं न मिल सकें और फिर दुकानें लूटकर उनमें आग लगा दी.”
पहली बार बीजेपी के टिकट पर सांसद बने लखनपाल कहते हैं, ''मैं शब्दों का गलत इस्तेमाल नहीं करने वाला लेकिन समाजवादी पार्टी ने हमेशा ही राजनैतिक लक्ष्य को सामने रखकर काम किया है.” उनका आरोप है कि उत्तर प्रदेश में सपा सरकार आगामी चुनाव को ध्यान मंह रखकर मुसलमानों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है. राज्य में विधानसभा की 12 और लोकसभा की एक सीट के लिए उप-चुनाव होने वाले हैं.
लखनपाल यह आरोप भी लगाते हैं कि राज्य सरकार ने कई बार पुलिस को सहारनपुर की घटना समेत और भी कई घटनाओं में कार्रवाई न करने के आदेश दिए हैं. वे कहते हैं, ''मुजफ्फरनगर में एक लड़की का यौन शोषण किया गया लेकिन पुलिस ने उसे न्याय दिलाने के मामले में कदम नहीं उठाया. इसी तरह हाथरस में एक बलात्कार पीड़ित लड़की ने पुलिस के एफआइआर लिखने से इनकार के बाद आत्मदाह कर लिया था.”
वे यह भी बताते हैं कि कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार इमरान मसूद अब सपा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं और 26 जुलाई को भड़की हिंसा की यही एक वजह है, ''पप्पू और मसूद ने हमले की साजिश रची. दंगा अचानक नहीं हो गया. भीड़ हथियार और पत्थर के हजारों टुकड़े लेकर आई थी. लोगों के हाथों में गैर-कानूनी हथियार और पेट्रोल बम थे.” उधर मसूद इन आरोपों का खंडन करते हैं. उनकी कैफियत है कि दंगा भड़काना तो दूर की बात, उन्होंने तो शांति स्थापना का प्रयास किया था. लेकिन उनकी बात किसी ने सुनी नहीं.
उनका यह भी आरोप है कि लखनपाल अपने छोटे भाई को यहां से विधानसभा का टिकट दिलवाना चाहते थे, ''लखनपाल बहुत जहरीला इंसान है. वह लोगों को ईद नहीं मनाने देना चाहता. सिखों को बीजेपी ने ही भड़काया था.” पिछले साल मुफ्फरनगर में हुए दंगे से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ध्रुवीकरण हुआ तो मसूद लखनपाल के हाथों चुनाव हार गए थे. हालांकि उन्हें 4.08 लाख वोट मिले जो यहां से पिछली बार सांसद रहे बीएसपी के जगदीश राणा को मिले वोटों से कहीं ज्यादा हैं.
उन्हें लखनपाल से 65,000 वोट कम मिले थे. पहले सपा में रह चुके मसूद को अप्रैल में भड़काऊ भाषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उनके प्रतिद्वंद्वी ने चुनाव प्रचार के दौरान उक्त भाषण का वीडियो प्रसारित कर दिया था. इमरान रशीद मसूद के राजनैतिक उत्तराधिकारी हैं. उनके चाचा मसूद मेडिकल दाखिला घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद अपनी सीट खोने वाले पहले सांसद हैं.
सहारनपुर लोकसभा सीट पर उन्होंने तीन बार तीन अलग-अलग पार्टियों के टिकट से जीत हासिल की थी और अंतत: 2012 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे. वहीं लखनपाल कांग्रेस नेता कमलनाथ के भानजे हैं. उनके पिता निर्भय पाल शर्मा भी 1995 में बीजेपी में शामिल होने से पहले कांग्रेस में थे.
सहारनपुर में एक-एक वोट मायने रखता है. जिले के हर पांच में से दो नागरिक मुस्लिम हैं. लखनपाल के एक करीबी स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता का कहना है, ''आपको पार्टी नहीं, बल्कि समुदाय की मदद मिलती है. अब हिंदुओं को समझ में आ गया है कि सपा के एजेंडे का मुकाबला करने के लिए उन्हें एकजुट होना होगा. यहां सिखों की संख्या बहुत कम है. अगर हमारे लड़के उनकी मदद को न आते तो हालात कहीं ज्यादा खराब होते.”
उधर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आजम खान ने सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को आरएसएस मुख्यालय की साजिश करार दिया तो लखनपाल इसे कांग्रेस और सपा के हाथ से निकली सत्ता को फिर पाने के लिए रची साजिश बताने से नहीं चूकते. वे कहते हैं, ''मुजफ्फरनगर दंगों के बाद लोगों को एहसास हो गया है कि बीजेपी के अलावा कोई भी पार्टी अच्छा प्रशासन देने के काबिल नहीं है. मैं उम्मीद करता हूं कि 2017 से पहले ऐसा हो जाए.”
हथियारों से लैस पुलिसकर्मी सड़कों पर तैनात थे. इलाके की काफी लोकप्रिय जगह ईदगाह में भी पिछले साल की तुलना में बहुत कम नमाजी आए. अब से पहले रमजान के महीने में इस शहर में कभी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ था. हरियाणा और उत्तराखंड के बीच फंसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 1992 में बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद किसी तरह का दंगा हुआ नहीं था. खान कहते हैं, ''इस साल सब कुछ अलग लग रहा है, यह ईद फीकी रही.” दरअसल ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहते हैं.
सिख और मुस्लिम प्रदर्शनकारियों में हुआ विवाद 25-26 जुलाई की रात हिंसक झड़पों में बदल गया. विवाद जमीन के टुकड़े को लेकर था, जिस पर गुरु सिंह सभा गुरद्वारे का विस्तार करना चाहती थी. दोनों ही पक्ष उस जमीन को अपनी बता रहे थे. दंगा ऐसा भड़का कि घंटों आगजनी और लूटपाट चलती रही. हिंसा में तीन लोग मारे गए, 34 घायल हो गए और 165 दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं. इसके बाद कर्फ्यू लगाने के साथ देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए गए.
पुलिस ने 22 एफआइआर दर्ज कीं और 47 लोगों को गिरफ्तार किया. 33 लोगों को नजरबंद किया गया. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि शांति कायम करने के लिए राज्य मशीनरी ने दोनों गुटों में समझौता करवाने की बजाए उन्हें सिर्फ अलग करने की कोशिश की. कर्फ्यू में चार-चार घंटे की ढील जरूर दी गई. लेकिन मुस्लिम बहुल शहर के पुराने हिस्से और नए शहर में जहां हिंदू और सिखों की आबादी है, कर्फ्यू को अलग-अलग समय पर हटाया गया.यह स्थिति अतीत से एकदम अलग है जब ऐसे मामलों का निबटारा सुलह से हो जाता था. लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक दंगों में ऐसा नहीं हुआ. सितंबर, 2013 से लेकर जुलाई, 2014 तक मामूली घटनाओं की परिणति सांप्रदायिक दंगों में हुई, प्रशासन लाचार और मूक बना रहा और जल्द ही दंगों पर राजनीति करने वालों की पौ-बारह हो गई. बीजेपी नेतृत्व वाले गठजोड़ ने तीन माह पहले हुए लोकसभा चुनाव में चांदी काटी थी.
मुजफ्फरनगर से लेकर शामली तक दंगा फैला और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक आधार पर बंट गया, नतीजतन यूपी की 80 में से 73 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. अब पार्टी सुलह के खिलाफ प्रयास कर रही है और हिंदुओं के लिए बेहतर सुविधाओं की मांग कर रही है, सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी पर उसने सिर्फ मुसलमानों पर ही इनायत करने का आरोप लगाया है.
स्थानीय लोग बताते हैं कि अब से पहले कभी कोई दुर्घटना या विवाद होने पर उसे समझदारी से निबटा लिया जाता था. खान कहते हैं, ''पिछले साल एक औरत की कांवड़ जुलूस के दौरान ट्रैक्टर के नीचे आने से मौत हो गई थी. दोनों समुदायों के नेता मामले को बातचीत के जरिए सुलझ लेते थे. इस तरह सांप्रदायिक तनाव को रोक दिया जाता था.” इस बार दोनों ही पक्ष झुकने को तैयार नहीं हैं और उन्हें हमेशा की तरह नेताओं से शह मिल रही है.
इस बार सांप्रदायिक राजनैतिक साजिश का खेल लुक-छिपकर नहीं बल्कि खुले तौर पर खेला जा रहा है, यहां तक कि राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर इसे सुना जा सकता है. वे जिस तरह अपने-अपने समुदायों का पक्ष ले रहे हैं, वह चिंताजनक है. अगर दोनों पक्ष किसी बात पर एक राय दिखते हैं तो वह यह कि दोनों का मानना है कि दूसरा पक्ष सांप्रदायिक भावनाएं भड़का रहा है, क्योंकि वह चुनाव जीतना चाहता है. तीन माह पहले तक यहां के विधायक रहे राघव लखनपाल अब स्थानीय सांसद हैं.
उनकी खाली सीट के लिए छह माह के भीतर उपचुनाव होना है. स्थानीय कांग्रेस नेता मुहर्रम अली उर्फ पप्पू और उनके तीन साथियों को 30 जुलाई की शाम राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. एसएसपी राजेश कुमार पांडे ने इंडिया टुडे को बताया, ''26 जुलाई की सुबह उसने (पप्पू) भीड़ को उकसाया. हमारे पास सीसीटीवी फुटेज है, जिससे घटनाक्रम को जोडऩे में मदद मिली. पुलिस की जांच से पता चला है कि पप्पू अरसे से जमीन पर विवाद को भड़काने की कोशिश कर रहा था.भीड़ ने पहले अग्निशमन विभाग के कंट्रोल रूम पर हमला कर सेवाएं बाधित कर दीं ताकि शहर में उनकी सेवाएं न मिल सकें और फिर दुकानें लूटकर उनमें आग लगा दी.”
पहली बार बीजेपी के टिकट पर सांसद बने लखनपाल कहते हैं, ''मैं शब्दों का गलत इस्तेमाल नहीं करने वाला लेकिन समाजवादी पार्टी ने हमेशा ही राजनैतिक लक्ष्य को सामने रखकर काम किया है.” उनका आरोप है कि उत्तर प्रदेश में सपा सरकार आगामी चुनाव को ध्यान मंह रखकर मुसलमानों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है. राज्य में विधानसभा की 12 और लोकसभा की एक सीट के लिए उप-चुनाव होने वाले हैं.
लखनपाल यह आरोप भी लगाते हैं कि राज्य सरकार ने कई बार पुलिस को सहारनपुर की घटना समेत और भी कई घटनाओं में कार्रवाई न करने के आदेश दिए हैं. वे कहते हैं, ''मुजफ्फरनगर में एक लड़की का यौन शोषण किया गया लेकिन पुलिस ने उसे न्याय दिलाने के मामले में कदम नहीं उठाया. इसी तरह हाथरस में एक बलात्कार पीड़ित लड़की ने पुलिस के एफआइआर लिखने से इनकार के बाद आत्मदाह कर लिया था.”
वे यह भी बताते हैं कि कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार इमरान मसूद अब सपा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं और 26 जुलाई को भड़की हिंसा की यही एक वजह है, ''पप्पू और मसूद ने हमले की साजिश रची. दंगा अचानक नहीं हो गया. भीड़ हथियार और पत्थर के हजारों टुकड़े लेकर आई थी. लोगों के हाथों में गैर-कानूनी हथियार और पेट्रोल बम थे.” उधर मसूद इन आरोपों का खंडन करते हैं. उनकी कैफियत है कि दंगा भड़काना तो दूर की बात, उन्होंने तो शांति स्थापना का प्रयास किया था. लेकिन उनकी बात किसी ने सुनी नहीं.
उनका यह भी आरोप है कि लखनपाल अपने छोटे भाई को यहां से विधानसभा का टिकट दिलवाना चाहते थे, ''लखनपाल बहुत जहरीला इंसान है. वह लोगों को ईद नहीं मनाने देना चाहता. सिखों को बीजेपी ने ही भड़काया था.” पिछले साल मुफ्फरनगर में हुए दंगे से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ध्रुवीकरण हुआ तो मसूद लखनपाल के हाथों चुनाव हार गए थे. हालांकि उन्हें 4.08 लाख वोट मिले जो यहां से पिछली बार सांसद रहे बीएसपी के जगदीश राणा को मिले वोटों से कहीं ज्यादा हैं.
उन्हें लखनपाल से 65,000 वोट कम मिले थे. पहले सपा में रह चुके मसूद को अप्रैल में भड़काऊ भाषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उनके प्रतिद्वंद्वी ने चुनाव प्रचार के दौरान उक्त भाषण का वीडियो प्रसारित कर दिया था. इमरान रशीद मसूद के राजनैतिक उत्तराधिकारी हैं. उनके चाचा मसूद मेडिकल दाखिला घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद अपनी सीट खोने वाले पहले सांसद हैं.
सहारनपुर लोकसभा सीट पर उन्होंने तीन बार तीन अलग-अलग पार्टियों के टिकट से जीत हासिल की थी और अंतत: 2012 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे. वहीं लखनपाल कांग्रेस नेता कमलनाथ के भानजे हैं. उनके पिता निर्भय पाल शर्मा भी 1995 में बीजेपी में शामिल होने से पहले कांग्रेस में थे.
सहारनपुर में एक-एक वोट मायने रखता है. जिले के हर पांच में से दो नागरिक मुस्लिम हैं. लखनपाल के एक करीबी स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता का कहना है, ''आपको पार्टी नहीं, बल्कि समुदाय की मदद मिलती है. अब हिंदुओं को समझ में आ गया है कि सपा के एजेंडे का मुकाबला करने के लिए उन्हें एकजुट होना होगा. यहां सिखों की संख्या बहुत कम है. अगर हमारे लड़के उनकी मदद को न आते तो हालात कहीं ज्यादा खराब होते.”
उधर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आजम खान ने सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को आरएसएस मुख्यालय की साजिश करार दिया तो लखनपाल इसे कांग्रेस और सपा के हाथ से निकली सत्ता को फिर पाने के लिए रची साजिश बताने से नहीं चूकते. वे कहते हैं, ''मुजफ्फरनगर दंगों के बाद लोगों को एहसास हो गया है कि बीजेपी के अलावा कोई भी पार्टी अच्छा प्रशासन देने के काबिल नहीं है. मैं उम्मीद करता हूं कि 2017 से पहले ऐसा हो जाए.”

