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नटवर सिंह वाकई दोषी थे या फिर बलि का बकरा बन गए

नटवर कहते हैं कि न्यायमूर्ति आर.एस. पाठक को तेल के बदले अनाज घोटाले में उनके किसी तरह के गलत काम का कोई प्रमाण नहीं मिला था. रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का सही समय.

अपडेटेड 11 अगस्त , 2014
नटवर सिंह ने अपनी आत्मकथा वन लाइफ इज नॉट इनफ में तेल के बदले अनाज घोटाले में खुद को निर्दोष बताया है. इसी घोटाले के कारण 10 साल पहले उनका राजनैतिक वनवास हुआ था. उनका यह दावा भले ही प्रत्याशित लग सकता है, लेकिन पूर्व विदेश मंत्री ने अपनी पुरानी पार्टी पर भी उंगली उठाई है. वे कहते हैं कि कांग्रेस को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया गया.

सद्दाम हुसैन के तेल ने नटवर के राजनैतिक जीवन पर दाग लगा दिया. पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार हैरू सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमला करने के बाद इराक के खिलाफ लगे आर्थिक प्रतिबंधों से परेशान आम इराकियों की मदद करने के लिए  1996 में संयुक्त राष्ट्र ने तेल के बदले अनाज कार्यक्रम शुरू किया. इस कार्यक्रम के तहत संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में इराकी तेल बेचने के बदले में अनाज दिया जाना था. 60 अरब डॉलर की इस योजना पर जल्द ही गड़बडिय़ों के आरोप लगने लगे कि सद्दाम सरकार पैसे और रसूख के लिए इस कार्यक्रम में घालमेल कर रही है. तब संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने यूएस फेडरल रिजर्व के पूर्व चेयरमैन पॉल वोल्कर से इन आरोपों की जांच करने के लिए कहा. वोल्कर की 2005 की रिपोर्ट में “गैर अनुबंध वाले लाभार्थियों” के तौर पर नटवर सिंह, पैंथर्स पार्टी के भीम सिंह और कुछ कॉर्पोरेट घरानों का नाम लिया गया.

यह आरोप लगाया गया कि नटवर की मदद से उनके बेटे जगत और उसके दोस्त अंदलीब सहगल को तेल के 40 लाख बैरल मिले, जो उन्होंने गैरकानूनी तरीके से एक स्विस कंपनी मेसफील्ड एजी को बेच दिए. आरोप था कि उन्होंने दलाली ली, जिसे ‘सरचार्ज’ का नाम दिया गया. माना जाता है कि उसका एक हिस्सा बगदाद में सद्दाम हुसैन की सरकार को पहुंचा दिया गया था. 2005 में इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में उस समय क्रोएशिया में राजदूत अनिल मथरानी ने कहा था कि जनवरी, 2001 में बगदाद यात्रा के दौरान नटवर सिंह ने अपने बेटे और सहगल को इराक सरकार के लोगों से मिलवायाः “मोटी बात यह है कि इसी मुलाकात के दौरान उस लेन-देन को हरी झ्ंडी मिली थी.” इस क्रम में राजनैतिक आरोप यह था कि बदले में नटवर सिंह ने सद्दाम का जमकर समर्थन किया.

अब नटवर सिंह इस मामले में अपना दामन साफ करने की कोशिश में लगे हैं. वे पूछते हैं कि आखिर कांग्रेस पर सवाल क्यों नहीं उठ रहा, जिसका नाम वोल्कर की रिपोर्ट में था. वे कहते हैं, “अगर आप वोल्कर रिपोर्ट के अनुच्छेदों को देखें तो पता चलता है कि 1997 में कांग्रेस पार्टी का जिक्र किया गया था. मेरा नाम तो मार्च, 2005 में जोड़ा गया. चूंकि मैडम सोनिया ने कहा कि मुझे इसमें फंसाना है.” (देखें बातचीत).

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) किताब में किए गए दावों को सही नहीं मानता है. ईडी ने विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन कानून (एफईएमए) के तहत इसकी जांच की थी. उसका कहना है कि सबूत सिंह और सहगल के शामिल होने की तरफ इशारा करते हैं. यह मामला अब दिल्ली में ईडी के न्यायाधिकरण के पास है.

ईडी के कारण बताओ नोटिस में यह आरोप था कि नटवर के पास “संयुक्त रूप से और कई बार” विदेशी पैसा आया. कुल 898,027 डॉलर (5.4 करोड़), जो एफईएमए का उल्लंघन है.

नटवर कहते हैं कि वोल्कर के आरोपों की जांच करने वाले न्यायमूर्ति आर.एस. पाठक ने जांच कमेटी की रिपोर्ट में उन्हें दोषमुक्त कर दिया था. यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी गई थी. उसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया.

महत्वपूर्ण बात यह है कि नटवर अपनी पुस्तक में जस्टिस आर.एस.पाठक के बारे में जो कुछ कहते हैं और जो बताया जाता रहा है, उसमें काफी विरोधाभास है. नटवर अपनी किताब में लिखते हैं कि पाठक ने “औपचारिक रूप से अपनी रिपोर्ट 7 अगस्त, 2006 को पीएम को सौंप दी. उन्होंने अपने निष्कर्ष में कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह दोषमुक्त करार दे दिया था.” बकौल नटवर सिंह, “मेरे बारे में उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि नटवर सिंह ने ठेकों से कोई आर्थिक या अन्य व्यक्तिगत फायदा उठाया.” इसके बावजूद ईडी ने “मेरे बेटे और मुझ पर आरोप लगाए.” वे लिखते हैं, “जस्टिस पाठक ने एक बार मुझसे कहा था कि उन पर बहुत ज्यादा दबाव था. उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि उन्हें मेरे खिलाफ किसी भी वित्तीय गड़बड़ी का सबूत नहीं मिला.” लेकिन माना जाता है कि पाठक समिति ने अपने निष्कर्ष में लिखा था कि “अंदलीब सहगल और आदित्य खन्ना (एक एनआरआइ कारोबारी, जो नटवर सिंह के रिश्तेदार हैं और जिन्होंने कथित तौर पर मेसफील्ड एजी से पैसों को भारत पहुंचाया था) को जो ठेके मिले, वे पूर्व विदेश मंत्री के. नटवर सिंह के दखल के बिना संभव नहीं थे.”
वोल्कर केस
नटवर सिंह ने अपनी किताब में जस्टिस पाठक के साथ अपनी बातचीत के बारे में जो कुछ लिखा है, अब उसकी पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि अपनी रिपोर्ट सौंपने के एक साल बाद 2007 में दिल का दौरा पडऩे से जस्टिस पाठक का निधन हो गया था.

नटवर का आरोप है कि यूपीए सरकार की ओर से गठित जस्टिस पाठक जांच समिति पूर्वाग्रह से ग्रस्त थीरू “31 मई, 2006 को मुझे पाठक जांच समिति के सामने हाजिर होने के लिए कहा गया. पांच मिनट के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि समिति पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी. उन्हें कांग्रेस को सभी आरोपों से दोषमुक्त करने का निर्देश दिया गया था.”

पाठक समिति ने कहा था कि सहगल और खन्ना ने कथित रूप से तेल के दो ठेकों से दलाली के तौर पर 1,46,000 डॉलर (88 लाख रु.) हासिल किए थे. उस समय हमदान एक्सपोट्र्स के निदेशक सहगल जगत के बचपन के दोस्त हैं. समिति ने माना कि सहगल को ये ठेके सिर्फ नटवर सिंह के कारण मिले थे और उन्होंने कांग्रेस के नाम का गलत इस्तेमाल किया. ईडी के अधिकारियों ने दावा किया था कि पूछताछ के दौरान सहगल ने नटवर सिंह का लिखा एक पत्र इराकी अधिकारियों के पास ले जाने की बात कबूल की थी, जिसमें हमदान एक्सपोट्र्स को तेल के कूपन देने का अनुरोध किया गया था.

यह संयोग ही था कि वोल्कर रिपोर्ट आने के दो साल बाद जगत ने सहगल की बहन सौम्या से शादी कर ली थी. अचरज की बात है कि नटवर सहगल से अपने संबंधों और इराकी अधिकारियों के लिए लिखे अपने खत के बारे में कोई बात नहीं करते.

नटवर लिखते हैं कि यूपीए की पूर्व सरकार उन्हें उन दस्तावेजों की जानकारी नहीं देना चाहती थी, जिन्हें विशेष दूत वीरेंद्र दयाल ने संयुक्त राष्ट्र से हासिल किया था. ये दस्तावेज उन भारतीय व्यक्तियों के बारे में थे, जिनका नाम वोल्कर रिपोर्ट में लिया गया था. ईडी का दावा है कि नटवर ने कभी किसी विशेष दस्तावेज की मांग नहीं की और जांच एजेंसी सारे दस्तावेज नहीं दे सकती थी.

नटवर सिंह विशेष दूत दयाल के भारत लाए दस्तावेजों पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के  ढुलमुल रवैए के बारे में भी लिखते हैं. 2006 में बंगलुरू के एक वकील अरुण कुमार अग्रवाल की ओर से दाखिल आरटीआइ के आवेदन को मुख्य सूचना आयुक्त (सीआइसी) ने मई, 2013 में खारिज कर दिया था. पीएमओ का कहना था कि उसके पास दस्तावेज तो हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता था. इससे पहले 2006 में पीएमओ ने तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह को बताया था कि उसके पास दस्तावेज ही नहीं हैं.
दयाल जो जरूरी दस्तावेज लेकर आए थे, उन्हें नटवर सिंह को नहीं दिया गया था. दयाल कहते हैं, “मुझे नहीं मालूम कि वे दस्तावेज पाठक समिति को दिए गए या नहीं. मेरा काम केवल नटवर या किसी अन्य से संबंधित दस्तावेज लाना नहीं था, बल्कि वोल्कर रिपोर्ट में उल्लिखित सभी दस्तावेजों को लाना था.” नटवर के निर्दोष होने के दावों के बारे में पूछने पर दयाल कहते हैं, “यह कहना बहुत कठिन है कि वे इस घोटाले में शामिल थे. यह बहुत व्यक्तिपरक मामला है और मेरी भूमिका काफी सीमित थी.” यानी इस मामले में अभी और खुलासे होंगे.
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