तारीख: 17 मई. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के चुनाव में जबरदस्त जीत के एक दिन बाद. स्थान: नासिक रोड सेंट्रल जेल. मालेगांव बम धमाके का मुख्य आरोपी सुधाकर चतुर्वेदी यहीं पर कैद है. उसने चीफ जस्टिस आर.एम. लोढ़ा को पत्र लिखकर मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस रंजना देसाई की मौजूदगी पर आपत्ति जताई. चतुर्वेदी के साथ-साथ साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को अपनी हिरासत में लेने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) अदालत में मुकदमा लड़ रही है. यहां उसी मामले की सुनवाई चल रही थी.
चतुर्वेदी ने अपने चार पन्नों के पत्र में लिखा है कि जस्टिस देसाई बॉम्बे हाइकोर्ट में जज रहने के दौरान इस मामले की सुनवाई कर चुकी हैं. उसका कहना था, ''वहां उनके फैसले से हम असंतुष्ट और हताश थे. तो अब यह कैसे संभव है कि वही माननीय जस्टिस रंजना देसाई मामले की फिर सुनवाई कर रही हैं?”
इस पत्र से एनआइए के चतुर्वेदी और अन्य अभियुक्तों को विभिन्न मामलों में पूछताछ के लिए हिरासत में लेने की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है. इन सभी पर 2007 में समझौता ट्रेन बम धमाके, मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह में बम धमाकों के अलावा दक्षिणपंथी हिंदू आतंक की साजिश रचने का आरोप है. एनआइए को अब और इंतजार करना होगा. पहले मामले की सुनवाई 16-17 जुलाई को होने वाली थी. लेकिन इसे तब तक के लिए स्थगित कर दिया गया है जब तक आरोपी नंबर 11 चतुर्वेदी की आपत्तियों पर फैसला नहीं आ जाता.
सुप्रीम कोर्ट में बचाव पक्ष में हुए बदलाव से भी एनआइए की मुसीबतें बढ़ती नजर आ रही हैं. साध्वी प्रज्ञा के लिए बचाव पक्ष की वरिष्ठ वकील पिंकी आनंद को नरेंद्र मोदी सरकार ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बना दिया है. अब आनंद इस मामले पर कोई भी टिप्पणी करने से बच रही हैं. हालांकि यह पूछने पर कि क्या अब वे प्रज्ञा के बचाव पक्ष के वकील की हैसियत से आएंगी, उनका जवाब था, ''शायद नहीं.”
कानूनी टीम के एक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य महेश जेठमलानी भी बीजेपी से पिता राम जेठमलानी के निष्कासन के बाद अपनी भूमिका को लेकर दुविधा में हैं. वे कहते हैं, ''पहले मैं साध्वी प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व कर रहा था. अब मुझे नहीं पता कि आगे से वे मुझे सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से पेश होने के लिए कहेंगे भी या नहीं.”
पुरोहित के बचाव पक्ष के वकील यू.आर. ललित हैं. वे काफी वरिष्ठ वकील हैं और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए गए यू.यू. ललित के पिता भी हैं. यू.आर. ललित और उनके कार्यालय ने इस बारे में कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है कि अब भी वे पुरोहित का प्रतिनिधित्व करेंगे या नहीं.
इस बीच मामले के मुख्य आरोपी पुरोहित के लिए थोड़ी राहत की खबर आई है. मुंबई के स्पेशल कोर्ट ने उन्हें आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल के सामने इस आशय की दलील देने के लिए दिल्ली जाने की इजाजत दे दी है कि मुंबई पुलिस ने जो उनकी गिरफ्तारी की वह गैर-कानूनी थी. पुरोहित की पत्नी अपर्णा के केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने के कुछ ही दिन बाद 10 जुलाई को अदालत का आदेश आया था. अब पुरोहित 4 अगस्त को ट्राइब्यूनल के सामने पेश होंगे.
सब की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि चीफ जस्टिस लोढ़ा जस्टिस देसाई के केस की सुनवाई के सवाल पर कैसी प्रतिक्रिया करते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि जस्टिस एच.एल. दत्तू और जस्टिस देसाई की खंडपीठ में मालेगांव धमाकों की 2012 से ही सुनवाई चल रही है लेकिन चतुर्वेदी ने अपनी आपत्ति अभी यानी बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ही उठाई है. वैसे भी पुरोहित के करीबी समझे जाने वाले और दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत के 'राष्ट्रीय संयोजक’ चतुर्वेदी ने जस्टिस देसाई की सुनवाई के मामले में आपत्ति क्यों उठाई, जबकि बॉम्बे हाइकोर्ट का फैसला आने तक वे सुप्रीम कोर्ट जा चुकी थीं?
चतुर्वेदी ने पत्र में लिखा है कि हाइकोर्ट में जस्टिस देसाई सात बार सुनवाई कर चुकी थीं. अदालत ने अंतत: चतुर्वेदी और दूसरे आरोपियों को जमानत नहीं दी थी. बल्कि उसने तो एनआइए को महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम ऐक्ट (मकोका) के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की इजाजत दी थी, जिसका मतलब यह था कि अदालत को भी लगता है कि बम धमाकों का संबंध किसी बड़े आतंकी गुट से हो सकता है.
चतुर्वेदी के पत्र के बारे में एनआइए के एक अधिकारी का कहना है, ''एजेंसी इन आपत्तियों को लेकर चिंतित नहीं है. यह तो अदालत और याचिकाकर्ताओं के बीच का मामला है. हम तो केवल प्रतिवादी हैं. हां, लेकिन हम अपने कानूनी अधिकारियों से इस मामले में चर्चा जरूर करेंगे.”
पिछले चार साल से दक्षिणपंथी आतंक के मामले की जांच में जुटी एनआइए को इससे हो रही खीज छिप नहीं रही है. लेकिन बावजूद इसके, साध्वी प्रज्ञा, पुरोहित और अन्य आरोपियों को हिरासत में लेने की इजाजत के लिए उसे जमकर जूझना पड़ा है. समझौता एक्सप्रेस में धमाके जैसे मामलों में एजेंसी को अब भी बहुत कुछ करना बाकी है.
हाल ही में यह आरोप लगाकर कि पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में धमाके की साजिश में आरएसएस का भी हाथ था और बाद में अपने इस बयान से मुकर जाने वाले स्वामी असीमानंद के खिलाफ एनआइए ने चार्जशीट दायर कर दी है. इस मामले में दो अन्य आरोपी संदीप डांगे और रामचंद्र कलसांगरा अब तक फरार हैं.
जब भी भारत पाकिस्तान को मुंबई में हुए 26/11 हमले के छह अभियुक्तों के खिलाफ रावलपिंडी अदालत में चल रहे मामले में तेजी लाने को कहता है तो पाकिस्तान समझैता एक्सप्रेस मामले की सुस्त रफ्तार का मुद्दा उठाकर पलटवार कर देता है.
एनआइए सूत्रों का दावा है कि यदि मालेगांव अभियुक्तों को हिरासत में लेने का मामला खिंचता है तो जांच का आगे बढऩा मुश्किल होगा. चतुर्वेदी के पत्र ने एनआइए के इंतजार को और लंबा तथा मुश्किल बना दिया है.
इस पत्र से एनआइए के चतुर्वेदी और अन्य अभियुक्तों को विभिन्न मामलों में पूछताछ के लिए हिरासत में लेने की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है. इन सभी पर 2007 में समझौता ट्रेन बम धमाके, मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह में बम धमाकों के अलावा दक्षिणपंथी हिंदू आतंक की साजिश रचने का आरोप है. एनआइए को अब और इंतजार करना होगा. पहले मामले की सुनवाई 16-17 जुलाई को होने वाली थी. लेकिन इसे तब तक के लिए स्थगित कर दिया गया है जब तक आरोपी नंबर 11 चतुर्वेदी की आपत्तियों पर फैसला नहीं आ जाता.
सुप्रीम कोर्ट में बचाव पक्ष में हुए बदलाव से भी एनआइए की मुसीबतें बढ़ती नजर आ रही हैं. साध्वी प्रज्ञा के लिए बचाव पक्ष की वरिष्ठ वकील पिंकी आनंद को नरेंद्र मोदी सरकार ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बना दिया है. अब आनंद इस मामले पर कोई भी टिप्पणी करने से बच रही हैं. हालांकि यह पूछने पर कि क्या अब वे प्रज्ञा के बचाव पक्ष के वकील की हैसियत से आएंगी, उनका जवाब था, ''शायद नहीं.”
कानूनी टीम के एक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य महेश जेठमलानी भी बीजेपी से पिता राम जेठमलानी के निष्कासन के बाद अपनी भूमिका को लेकर दुविधा में हैं. वे कहते हैं, ''पहले मैं साध्वी प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व कर रहा था. अब मुझे नहीं पता कि आगे से वे मुझे सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से पेश होने के लिए कहेंगे भी या नहीं.”
पुरोहित के बचाव पक्ष के वकील यू.आर. ललित हैं. वे काफी वरिष्ठ वकील हैं और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए गए यू.यू. ललित के पिता भी हैं. यू.आर. ललित और उनके कार्यालय ने इस बारे में कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है कि अब भी वे पुरोहित का प्रतिनिधित्व करेंगे या नहीं.
इस बीच मामले के मुख्य आरोपी पुरोहित के लिए थोड़ी राहत की खबर आई है. मुंबई के स्पेशल कोर्ट ने उन्हें आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल के सामने इस आशय की दलील देने के लिए दिल्ली जाने की इजाजत दे दी है कि मुंबई पुलिस ने जो उनकी गिरफ्तारी की वह गैर-कानूनी थी. पुरोहित की पत्नी अपर्णा के केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने के कुछ ही दिन बाद 10 जुलाई को अदालत का आदेश आया था. अब पुरोहित 4 अगस्त को ट्राइब्यूनल के सामने पेश होंगे.
सब की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि चीफ जस्टिस लोढ़ा जस्टिस देसाई के केस की सुनवाई के सवाल पर कैसी प्रतिक्रिया करते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि जस्टिस एच.एल. दत्तू और जस्टिस देसाई की खंडपीठ में मालेगांव धमाकों की 2012 से ही सुनवाई चल रही है लेकिन चतुर्वेदी ने अपनी आपत्ति अभी यानी बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ही उठाई है. वैसे भी पुरोहित के करीबी समझे जाने वाले और दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत के 'राष्ट्रीय संयोजक’ चतुर्वेदी ने जस्टिस देसाई की सुनवाई के मामले में आपत्ति क्यों उठाई, जबकि बॉम्बे हाइकोर्ट का फैसला आने तक वे सुप्रीम कोर्ट जा चुकी थीं?
चतुर्वेदी ने पत्र में लिखा है कि हाइकोर्ट में जस्टिस देसाई सात बार सुनवाई कर चुकी थीं. अदालत ने अंतत: चतुर्वेदी और दूसरे आरोपियों को जमानत नहीं दी थी. बल्कि उसने तो एनआइए को महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम ऐक्ट (मकोका) के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की इजाजत दी थी, जिसका मतलब यह था कि अदालत को भी लगता है कि बम धमाकों का संबंध किसी बड़े आतंकी गुट से हो सकता है.
चतुर्वेदी के पत्र के बारे में एनआइए के एक अधिकारी का कहना है, ''एजेंसी इन आपत्तियों को लेकर चिंतित नहीं है. यह तो अदालत और याचिकाकर्ताओं के बीच का मामला है. हम तो केवल प्रतिवादी हैं. हां, लेकिन हम अपने कानूनी अधिकारियों से इस मामले में चर्चा जरूर करेंगे.”
पिछले चार साल से दक्षिणपंथी आतंक के मामले की जांच में जुटी एनआइए को इससे हो रही खीज छिप नहीं रही है. लेकिन बावजूद इसके, साध्वी प्रज्ञा, पुरोहित और अन्य आरोपियों को हिरासत में लेने की इजाजत के लिए उसे जमकर जूझना पड़ा है. समझौता एक्सप्रेस में धमाके जैसे मामलों में एजेंसी को अब भी बहुत कुछ करना बाकी है.
हाल ही में यह आरोप लगाकर कि पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में धमाके की साजिश में आरएसएस का भी हाथ था और बाद में अपने इस बयान से मुकर जाने वाले स्वामी असीमानंद के खिलाफ एनआइए ने चार्जशीट दायर कर दी है. इस मामले में दो अन्य आरोपी संदीप डांगे और रामचंद्र कलसांगरा अब तक फरार हैं.
जब भी भारत पाकिस्तान को मुंबई में हुए 26/11 हमले के छह अभियुक्तों के खिलाफ रावलपिंडी अदालत में चल रहे मामले में तेजी लाने को कहता है तो पाकिस्तान समझैता एक्सप्रेस मामले की सुस्त रफ्तार का मुद्दा उठाकर पलटवार कर देता है.
एनआइए सूत्रों का दावा है कि यदि मालेगांव अभियुक्तों को हिरासत में लेने का मामला खिंचता है तो जांच का आगे बढऩा मुश्किल होगा. चतुर्वेदी के पत्र ने एनआइए के इंतजार को और लंबा तथा मुश्किल बना दिया है.

