जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 जुलाई को ब्राजील में ब्रिक्स (बीआरआइसीएस) देशों के छठवें शिखर सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत में मध्यकाल के पहले भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और सांस्कृतिक संबंधों का जिक्र किया, तो ऐसा लगा कि वे उन्हीं बातों को दोहरा रहे हैं, जो उन्होंने चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के साथ टेलीफोन पर अपनी पहली बातचीत में कही थी. लेकिन बातचीत आगे बढ़ी तो मोदी ने चीनी राष्ट्रपति को बताया कि ह्वेन त्सांग उनके गांव आए थे. इसके जरिए शायद वे बौद्ध धर्म का मुद्दा छेडऩा चाहते थे जो चीन के संदर्भ में एक हद के बाद संवेदनशील हो जाता है क्योंकि इससे दलाई लामा और भारत के साथ उनके संबंधों का संदर्भ जुड़ा हुआ है.
लेकिन अंदरूनी सूत्रों ने खुलासा किया कि मोदी ने अपनी बातचीत में बौद्ध धर्म, उसके सिद्धांतों और शांति के प्रति प्रतिबद्धता का विस्तार से जिक्र किया. चीन के राष्ट्रपति खामोशी से उनकी बात सुनते रहे. और फिर मोदी ने कहा कि किस प्रकार यह साझी विरासत पाकिस्तान की शह पर चलने वाले आतंकवाद से लड़ाई का साझा आधार मुहैया कराती है. इस तरह बौद्ध धर्म और आतंकवाद के बहाने एक ही झटके में दो संवेदनशील मुद्दे—तिब्बत और पाकिस्तान—बातचीत की मेज पर आ गए. सूत्रों ने बताया कि इस मुद्दे पर चीनी पक्ष ने कोई प्रतिक्रिया न देना ही उचित समझा. इसके बाद मोदी ने इन मुद्दों पर ज्यादा जोर नहीं दिया. यहां यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि इसके पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत में ज्यादा खुलकर बोल चुकी थीं, जबकि वांग का रवैया इसके ठीक विपरीत था. सुषमा स्वराज ने उन्हें बताया था कि चीन को ‘वन चाइना’ नीति की तरह ही ‘वन इंडिया’ नीति अपनाने पर विचार करना चाहिए.
हालांकि मोदी दरअसल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विपरीत अपना राजनैतिक संदेश देने के लिए एजेंडे से हटकर बातचीत में निजी घटनाओं और अनुभवों का उल्लेख करते हैं, जो कभी-कभी “गैर-रणनीतिक” भी लग सकता है. मनमोहन सिंह अमूमन अपनी बातचीत की रूपरेखा हमेशा औपचारिक सरकारी एजेंडे के आसपास ही रखते थे और फोकस विशिष्ट मुद्दों पर ही होता था. उदाहरण के लिए, मोदी ने चीन के राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वे तिब्बत में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए चीन की तरफ से एक वैकल्पिक रास्ते की अनुमति देने पर विचार करें. यह मसला पहले भी आधिकारिक स्तर की बातचीत में उठाया जा चुका है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर नहीं उठा था, जिसमें ज्यादातर रणनीतिक मसले हावी रहते हैं. मोदी ने एक यात्री के तौर पर अपने खुद के अनुभव का जिक्र करते हुए इस मुद्दे को उठाया और बताया कि पहाड़ की चढ़ाई करते हुए उन्हें उस यात्रा में कितनी कठिनाइयां आई थीं और कितने कठोर मौसम का सामना करना पड़ा था.
इसी तरह चीन को बुनियादी ढांचे, खासकर रेलवे के क्षेत्र में निवेश करने का खुला न्यौता देना भी सामान्य कूटनीतिक तौर-तरीके से कुछ हटकर था क्योंकि घरेलू सुरक्षा चिंताएं चीनी निवेश के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुई हैं. दरअसल, इन मसलों पर दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक तौर पर आर्थिक बातचीत जारी है. लेकिन जैसा कि सूत्रों ने बताया, इस बातचीत पर चीनी राष्ट्रपति की ओर से सकारात्मक जवाब आया. उन्होंने मोदी को भरोसा दिलाया कि वे चीन में भारतीय निवेशकों के सामने पेश आ रही समस्याओं पर विचार करेंगे, खासकर सरकारी मामलों में.
बहरहाल, संवेदनशील रणनीतिक मुद्दों पर मोदी कम ही बोले और उस दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो पाई. सीमा विवाद ऐसा ही मसला था. दोनों नेताओं ने नेक इरादों का तो इजहार किया, लेकिन असलियत में बातचीत शुरू ही नहीं हो पाई है, क्योंकि मोदी सरकार बातचीत के लिए अभी विशेष प्रतिनिधि का नाम तय नहीं कर पाई है. हालांकि उम्मीद यह थी कि पहली बैठक में ही भारतीय पक्ष किसी प्रतिनिधि का नाम तय कर लेगा, लेकिन इस बारे में किसी फैसले की जानकारी नहीं दी गई. इसी तरह कोई फैसला न होने के कारण रणनीतिक दृष्टि से आर्थिक बातचीत भी दोबारा शुरू नहीं हो पाई है. पहले इस मामले में योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन नई सरकार इस पद पर किसी को नियुक्त नहीं कर पाई है और कोई वैकल्पिक नाम भी सामने नहीं आ पाया है.
इन मुख्य मुद्दों पर कोई खास प्रगति न होने के बावजूद भारतीय खेमे को लगता है कि इस सम्मेलन के दौरान सर्वोच्च स्तर पर संबंध बनाने का मकसद जरूर पूरा हुआ है. सूत्रों के मुताबिक, ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस दौरान मुद्दों में एक राजनीतिक स्पर्श का एहसास हुआ, जो मनमोहन सिंह के दौर में नदारद होता था, जिनकी बातचीत ज्यादातर मुद्दों पर केंद्रित होती थी और अक्सर विद्वतापूर्ण होती थी.
ऐसा ही माहौल मोदी के इस दौरे के समय एक अन्य नेता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी देश के नेता हैं) के साथ बातचीत में भी था. इस बातचीत में मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में अस्त्राखान की अपनी यात्रा का जिक्र किया और बताया कि किस तरह उनकी सरकार ने दोनों क्षेत्रों के बीच सहयोग स्थापित किया था. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, 40 मिनट की बातचीत ज्यादातर इसी विषय पर केंद्रित रही. मोदी ने यहां तक सुझाव दिया कि इस साल के अंत में अपनी यात्रा के दौरान पुतिन को दिल्ली से बाहर भी जाना चाहिए. अधिकारियों के मुताबिक, दरअसल योजना यह है कि दोनों नेता कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र निर्माण स्थल का दौरा साथ-साथ करें.
लेकिन पुतिन के साथ बहुत सारे रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत तय थी. इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने छात्रों के लिए वीजा नियमों को आसान बनाने पर जोर दिया और उनकी डिग्रियों की मान्यता को लेकर आ रही समस्याओं को दूर करने की गुजारिश की. मान्यता की इस समस्या के कारण भारतीय छात्रों को रोजगार मिलने में समस्या आती रही है. उन्होंने पुतिन को बताया कि भारत में अगर लोगों से पूछा जाए कि देश का सबसे करीबी दोस्त कौन है तो ज्यादातर लोग रूस को ही भारत का दोस्त बताएंगे. मोदी ने कहा कि वे इस दोस्ती को और मजबूत करना चाहते हैं. हालांकि मोदी विशेष मुद्दों से दूर ही रहे और बातचीत में किसी भी मौके पर उसका जिक्र नहीं किया. मोटे तौर पर यह बातचीत परिचय बढ़ाने का अवसर ही साबित हुई.
इस सम्मेलन के दौरान मोदी की मनमोहन सिंह के मुकाबले खासियत यह भी दिखी कि उन्होंने व्यापकता के बदले स्थानीयता पर जोर दिया. मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन में अपने संबोधन में साफ-साफ कहा कि वे इस संगठन को महज ‘सम्मेलन-केंद्रित’ रखने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि इसका विस्तार शहरों, राज्यों और क्षेत्रों के बीच “उप-राष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान” की तरह भी होना चाहिए. इसके विपरीत मनमोहन सिंह हमेशा बहुस्तरीय आयोजनों में उपयोगिता देखा करते थे, क्योंकि इससे एक ही स्थान पर नेताओं के बीच मेल-मुलाकात का मंच मिल जाता था और एक निश्चित अवधि के बाद सर्वोच्च स्तरों पर बातचीत का मौका मुहैया हो जाता था.
इस शिखर सम्मेलन के नतीजे अनुमान के अनुसार ही रहे. ब्रिक्स देशों के बैंक का नाम क्या हो, इस पर भारत की राय को अहमियत दी गई. भारत की ओर से सुझाए गए नाम ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ को स्वीकार कर लिया गया और इसकी जमा पूंजी 50 अरब डॉलर रखी गई (देखें बॉक्स), जिसमें ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत होगी और उन्हें वोट देने का समान अधिकार होगा.
कुल मिलाकर मोदी ने अपना वही उद्देश्य हासिल किया, जिसे उन्होंने “दुनिया के नेताओं के साथ निजी संबंधों का बीज बोने” का नाम दिया है. उन्होंने शायद शांत और धीमी शुरुआत की और ऐसा करते हुए उन्होंने लगभग किसी तरह के विवाद को जन्म नहीं दिया, लेकिन चीन के मामले में शुरुआत में ही वे एक नया मुद्दा छेडऩे और ठोस बात रखने में कामयाब रहे.
लेकिन अंदरूनी सूत्रों ने खुलासा किया कि मोदी ने अपनी बातचीत में बौद्ध धर्म, उसके सिद्धांतों और शांति के प्रति प्रतिबद्धता का विस्तार से जिक्र किया. चीन के राष्ट्रपति खामोशी से उनकी बात सुनते रहे. और फिर मोदी ने कहा कि किस प्रकार यह साझी विरासत पाकिस्तान की शह पर चलने वाले आतंकवाद से लड़ाई का साझा आधार मुहैया कराती है. इस तरह बौद्ध धर्म और आतंकवाद के बहाने एक ही झटके में दो संवेदनशील मुद्दे—तिब्बत और पाकिस्तान—बातचीत की मेज पर आ गए. सूत्रों ने बताया कि इस मुद्दे पर चीनी पक्ष ने कोई प्रतिक्रिया न देना ही उचित समझा. इसके बाद मोदी ने इन मुद्दों पर ज्यादा जोर नहीं दिया. यहां यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि इसके पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत में ज्यादा खुलकर बोल चुकी थीं, जबकि वांग का रवैया इसके ठीक विपरीत था. सुषमा स्वराज ने उन्हें बताया था कि चीन को ‘वन चाइना’ नीति की तरह ही ‘वन इंडिया’ नीति अपनाने पर विचार करना चाहिए.
हालांकि मोदी दरअसल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विपरीत अपना राजनैतिक संदेश देने के लिए एजेंडे से हटकर बातचीत में निजी घटनाओं और अनुभवों का उल्लेख करते हैं, जो कभी-कभी “गैर-रणनीतिक” भी लग सकता है. मनमोहन सिंह अमूमन अपनी बातचीत की रूपरेखा हमेशा औपचारिक सरकारी एजेंडे के आसपास ही रखते थे और फोकस विशिष्ट मुद्दों पर ही होता था. उदाहरण के लिए, मोदी ने चीन के राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वे तिब्बत में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए चीन की तरफ से एक वैकल्पिक रास्ते की अनुमति देने पर विचार करें. यह मसला पहले भी आधिकारिक स्तर की बातचीत में उठाया जा चुका है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर नहीं उठा था, जिसमें ज्यादातर रणनीतिक मसले हावी रहते हैं. मोदी ने एक यात्री के तौर पर अपने खुद के अनुभव का जिक्र करते हुए इस मुद्दे को उठाया और बताया कि पहाड़ की चढ़ाई करते हुए उन्हें उस यात्रा में कितनी कठिनाइयां आई थीं और कितने कठोर मौसम का सामना करना पड़ा था.
इसी तरह चीन को बुनियादी ढांचे, खासकर रेलवे के क्षेत्र में निवेश करने का खुला न्यौता देना भी सामान्य कूटनीतिक तौर-तरीके से कुछ हटकर था क्योंकि घरेलू सुरक्षा चिंताएं चीनी निवेश के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुई हैं. दरअसल, इन मसलों पर दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक तौर पर आर्थिक बातचीत जारी है. लेकिन जैसा कि सूत्रों ने बताया, इस बातचीत पर चीनी राष्ट्रपति की ओर से सकारात्मक जवाब आया. उन्होंने मोदी को भरोसा दिलाया कि वे चीन में भारतीय निवेशकों के सामने पेश आ रही समस्याओं पर विचार करेंगे, खासकर सरकारी मामलों में.
बहरहाल, संवेदनशील रणनीतिक मुद्दों पर मोदी कम ही बोले और उस दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो पाई. सीमा विवाद ऐसा ही मसला था. दोनों नेताओं ने नेक इरादों का तो इजहार किया, लेकिन असलियत में बातचीत शुरू ही नहीं हो पाई है, क्योंकि मोदी सरकार बातचीत के लिए अभी विशेष प्रतिनिधि का नाम तय नहीं कर पाई है. हालांकि उम्मीद यह थी कि पहली बैठक में ही भारतीय पक्ष किसी प्रतिनिधि का नाम तय कर लेगा, लेकिन इस बारे में किसी फैसले की जानकारी नहीं दी गई. इसी तरह कोई फैसला न होने के कारण रणनीतिक दृष्टि से आर्थिक बातचीत भी दोबारा शुरू नहीं हो पाई है. पहले इस मामले में योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन नई सरकार इस पद पर किसी को नियुक्त नहीं कर पाई है और कोई वैकल्पिक नाम भी सामने नहीं आ पाया है.
इन मुख्य मुद्दों पर कोई खास प्रगति न होने के बावजूद भारतीय खेमे को लगता है कि इस सम्मेलन के दौरान सर्वोच्च स्तर पर संबंध बनाने का मकसद जरूर पूरा हुआ है. सूत्रों के मुताबिक, ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस दौरान मुद्दों में एक राजनीतिक स्पर्श का एहसास हुआ, जो मनमोहन सिंह के दौर में नदारद होता था, जिनकी बातचीत ज्यादातर मुद्दों पर केंद्रित होती थी और अक्सर विद्वतापूर्ण होती थी.
ऐसा ही माहौल मोदी के इस दौरे के समय एक अन्य नेता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी देश के नेता हैं) के साथ बातचीत में भी था. इस बातचीत में मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में अस्त्राखान की अपनी यात्रा का जिक्र किया और बताया कि किस तरह उनकी सरकार ने दोनों क्षेत्रों के बीच सहयोग स्थापित किया था. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, 40 मिनट की बातचीत ज्यादातर इसी विषय पर केंद्रित रही. मोदी ने यहां तक सुझाव दिया कि इस साल के अंत में अपनी यात्रा के दौरान पुतिन को दिल्ली से बाहर भी जाना चाहिए. अधिकारियों के मुताबिक, दरअसल योजना यह है कि दोनों नेता कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र निर्माण स्थल का दौरा साथ-साथ करें. लेकिन पुतिन के साथ बहुत सारे रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत तय थी. इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने छात्रों के लिए वीजा नियमों को आसान बनाने पर जोर दिया और उनकी डिग्रियों की मान्यता को लेकर आ रही समस्याओं को दूर करने की गुजारिश की. मान्यता की इस समस्या के कारण भारतीय छात्रों को रोजगार मिलने में समस्या आती रही है. उन्होंने पुतिन को बताया कि भारत में अगर लोगों से पूछा जाए कि देश का सबसे करीबी दोस्त कौन है तो ज्यादातर लोग रूस को ही भारत का दोस्त बताएंगे. मोदी ने कहा कि वे इस दोस्ती को और मजबूत करना चाहते हैं. हालांकि मोदी विशेष मुद्दों से दूर ही रहे और बातचीत में किसी भी मौके पर उसका जिक्र नहीं किया. मोटे तौर पर यह बातचीत परिचय बढ़ाने का अवसर ही साबित हुई.
इस सम्मेलन के दौरान मोदी की मनमोहन सिंह के मुकाबले खासियत यह भी दिखी कि उन्होंने व्यापकता के बदले स्थानीयता पर जोर दिया. मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन में अपने संबोधन में साफ-साफ कहा कि वे इस संगठन को महज ‘सम्मेलन-केंद्रित’ रखने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि इसका विस्तार शहरों, राज्यों और क्षेत्रों के बीच “उप-राष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान” की तरह भी होना चाहिए. इसके विपरीत मनमोहन सिंह हमेशा बहुस्तरीय आयोजनों में उपयोगिता देखा करते थे, क्योंकि इससे एक ही स्थान पर नेताओं के बीच मेल-मुलाकात का मंच मिल जाता था और एक निश्चित अवधि के बाद सर्वोच्च स्तरों पर बातचीत का मौका मुहैया हो जाता था.
इस शिखर सम्मेलन के नतीजे अनुमान के अनुसार ही रहे. ब्रिक्स देशों के बैंक का नाम क्या हो, इस पर भारत की राय को अहमियत दी गई. भारत की ओर से सुझाए गए नाम ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ को स्वीकार कर लिया गया और इसकी जमा पूंजी 50 अरब डॉलर रखी गई (देखें बॉक्स), जिसमें ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत होगी और उन्हें वोट देने का समान अधिकार होगा.
कुल मिलाकर मोदी ने अपना वही उद्देश्य हासिल किया, जिसे उन्होंने “दुनिया के नेताओं के साथ निजी संबंधों का बीज बोने” का नाम दिया है. उन्होंने शायद शांत और धीमी शुरुआत की और ऐसा करते हुए उन्होंने लगभग किसी तरह के विवाद को जन्म नहीं दिया, लेकिन चीन के मामले में शुरुआत में ही वे एक नया मुद्दा छेडऩे और ठोस बात रखने में कामयाब रहे.

