बड़े घोटालेबाजों पर हाथ नहीं डालने को लेकर प्रतिबद्घ-से दिख रहे विशेष कार्यबल (एसटीएफ) ने अपने इस रवैये से अदालत को बुरी तरह नाराज कर दिया है. प्रदेश के व्यापम और नियुक्ति महाघोटाले की एसटीएफ जांच शुरू से सवालों के घेरे में रही है. और अब तो अदालत ने भी इस पर सवालिया निशान लगा दिया है. घोटाले के आरोपियों में से एक और पुलिस महानिरीक्षक सोनाली मिश्र के भाई भरत मिश्र के साथ जरूरत से ज्यादा नरमी बरतने के कारण 8 जुलाई को भोपाल की जिला अदालत के मजिस्ट्रेट संजय सिंह ने एसटीएफ को कड़ी फटकार लगाई. उनका कहना था, ''गंभीर अपराधों का आरोपी भरत मिश्र फरार घोषित है लेकिन वह खुलेआम घूमता पाया जाता है. इसी से एसटीएफ की कार्यप्रणाली का अंदाजा लगाया जा सकता है. ''
अदालत ने भरत को सरेंडर करने के लिए 7 जुलाई तक का समय दिया था और ऐसा नहीं होने की स्थिति में उसकी संपत्ति को कुर्क करने का निर्देश दिया था. भरत उस दिन सरेंडर करने अदालत पहुंच भी गया लेकिन बेहद आश्चर्य की बात यह कि वहां कोई पुलिसकर्मी ही मौजूद नहीं था जो उसे हिरासत में लेता. पुलिस के लचर रवैये के चलते भरत बड़े आराम से अपने घर लौट गया. 8 जुलाई को वह फिर से अदालत आया, तब जाकर उसे हिरासत में लिया गया.
भरत के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारी को लेकर अदालत के समक्ष पेश की गई अपनी बेहद रूखी टिप्पणी में डिप्टी पुलिस अधीक्षक डी.एस. बघेल ने उसे केवल प्री-पीजी मेडिकल टेस्ट फर्जीवाड़े में आरोपी बताया. इस पर मजिस्ट्रेट ने एसटीएफ के एडीजीपी सुधीर शाई को निर्देश दिया कि वे बघेल को अनुशासित करें और जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाएं.
प्रदेश एसटीएफ की कार्यप्रणाली पर हमेशा से ही सवाल उठते आए हैं. भरत को गिरफ्तार करने में नाकाम रहने पर एसटीएफ को अदालत ने 13 मई को भी फटकार लगाई थी और आरोपियों से उनके कद के आधार पर भेदभाव नहीं करने को कहा था. भरत व्यापम नियुक्ति घोटाले के चार मामलों में आरोपी है. उसने विभिन्न विभागीय परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा करके कई नियुक्तियां करवाई थीं. इस धंधे में उसने खूब कमाई की. 20 नवंबर, 2013 को घोटाले में नाम आने के बाद से ही भरत मिश्र गायब था. एफआइआर के मुताबिक, 2012 में हुए प्री-पीजी मेडिकल टेस्ट में पास करवाने के लिए उसने जूनियर डॉॅक्टरों से करोड़ों रु. लिए थे. वह पुलिस कांस्टेबल, सब-इंस्पेक्टर और फूड इंस्पेक्टर भर्ती घोटाले में भी वांटेड था.
एसटीएफ ने भरत के साथ-साथ व्यापम और नियुक्ति घोटाले के अन्य आरोपियों को लेकर भी भरपूर उदारता दिखाई है. स्कूल टीचर से खदान माफिया बना सुधीर शर्मा और अतिरिक्त प्रमुख सचिव (नियोजन) अजीता बाजपेयी पांडे का पति अमित पांडे अब तक एसटीएफ की पहुंच से बाहर हैं. फर्जीवाड़े के जरिए अपनी बेटी को मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज ङ्क्षसह चौहान के पूर्व निजी सहायक प्रेम प्रकाश के साथ भी एसटीएफ ने खासी रियायत बरती थी.

घोटाले में ज्यादातर एफआइआर व्यापम के पूर्व चीफ एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क से मिली जानकारी के आधार पर दर्ज की गई हैं. महिंद्रा को 16 जुलाई, 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया था. उसकी हार्ड डिस्क से एसटीएफ के हाथ रिश्वत, सिफारिशों और घोटाले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं. इसी में मध्य प्रदेश के पूर्व तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का नाम भी था. लेकिन उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज करने के लिए एसटीएफ ने विधानसभा चुनाव तक का इंतजार किया.
शर्मा के खिलाफ पहली एफआइआर विधानसभा चुनाव के परिणाम आने से ठीक एक दिन पहले 7 दिसंबर को दर्ज की गई, तो दूसरी एफआइआर 9 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के एक दिन बाद दर्ज की गई. शर्मा चुनाव हार गए थे. तीसरा मामला शर्मा की गिरफ्तारी के बाद इसी साल 15 जून को दर्ज किया गया. यह मामला बाट और माप विभाग में भर्ती घोटाले से जुड़ा है. इससे पहले एसटीएफ ने उन्हें दो बार पूछताछ कर छोड़ दिया था. सूत्रों के मुताबिक, शर्मा को हिरासत में भी वीआइपी सुविधाएं मुहैया करवाई गईं. एफआइआर में केंद्रीय मंत्री उमा भारती का भी नाम है जो खुद इस घोटाले को 'चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला' करार दे चुकी हैं. एफआइआर में 'उमा भारती जी' नाम से दो बार जिक्र है. इसमें बताया गया है कि उमा ने लक्ष्मीकांत शर्मा से संविदा शिक्षकों की भर्ती में कुछ लोगों की सिफारिश की थी.
हालांकि चौहान सरकार यह जताने की हरसंभव कोशिश कर रही है कि घोटालेबाजों को लेकर उसका रवैया बेहद सख्त है. सरकार ने 2008 से 2013 के बीच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फर्जीवाड़े के जरिए एडमिशन पाने वाले 1,095 छात्रों के प्रवेश (डिग्री) को रद्द कर दिया है तो विभिन्न सरकारी विभागों में विभागीय परीक्षाओं के जरिए नियुक्ति पाने वाले कुल 228 लोगों को नौकरी से हटा दिया गया है.
इस महाघोटाले में एसटीएफ ने 1,300 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया है. इनमें से गिरफ्तार 500 लोगों में ज्यादातर छात्र और उनके अभिभावक ही हैं. एसटीएफ बड़ी मछलियों पर हाथ डालने से अब तक बचता आया है. इस आरोप को खारिज करते हुए प्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर कहते हैं, ''हाइकोर्ट घोटाले की जांच की निगरानी कर रहा है. बड़े कद वाले आरोपियों पर अदालत की पैनी नजर है. मामला अदालत में है इसलिए मैं और टिप्पणी नहीं कर सकता. '' लेकिन तथ्य गौर को गलत साबित करते हैं. जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद यादव आरोप लगाते हैं, ''व्यापम शुरू से ही शिक्षा के व्यापारियों का मंडल रहा है. ''
इस बीच 16 जुलाई को डीआइजी हरिसिंह यादव के दामाद दीपक यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. प्रारंभिक पूछताछ में दीपक ने पुलिस को बताया है कि वह उत्तर प्रदेश के फर्जी
छात्रों को पीएमटी में बैठाता था. इसकीएवज में मेडिकल कॉलेज में दाखिले की चाह रखने वाले छात्रों से 10 लाख रु. तक वसूलता था. प्री-पीजी में दाखिले के लिए उसने कई छात्रों से एक करोड़ रु. भी लिए हैं. एक अनुमान के मुताबिक दीपक ने लगभग 100 फर्जी छात्रों को प्रवेश दिलाया है.
हालांकि अब तक तो अदालत की कड़ी टिप्पणियों और राष्ट्रीय स्तर पर छीछालेदर होने के बावजूद एसटीएफ की कार्यप्रणाली में खास सुधार देखने को नहीं मिला है. आगे भी स्थितियां सुधरेंगी, इसमें शक है.
—साथ में समीर गर्ग
अदालत ने भरत को सरेंडर करने के लिए 7 जुलाई तक का समय दिया था और ऐसा नहीं होने की स्थिति में उसकी संपत्ति को कुर्क करने का निर्देश दिया था. भरत उस दिन सरेंडर करने अदालत पहुंच भी गया लेकिन बेहद आश्चर्य की बात यह कि वहां कोई पुलिसकर्मी ही मौजूद नहीं था जो उसे हिरासत में लेता. पुलिस के लचर रवैये के चलते भरत बड़े आराम से अपने घर लौट गया. 8 जुलाई को वह फिर से अदालत आया, तब जाकर उसे हिरासत में लिया गया.
भरत के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारी को लेकर अदालत के समक्ष पेश की गई अपनी बेहद रूखी टिप्पणी में डिप्टी पुलिस अधीक्षक डी.एस. बघेल ने उसे केवल प्री-पीजी मेडिकल टेस्ट फर्जीवाड़े में आरोपी बताया. इस पर मजिस्ट्रेट ने एसटीएफ के एडीजीपी सुधीर शाई को निर्देश दिया कि वे बघेल को अनुशासित करें और जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाएं.
प्रदेश एसटीएफ की कार्यप्रणाली पर हमेशा से ही सवाल उठते आए हैं. भरत को गिरफ्तार करने में नाकाम रहने पर एसटीएफ को अदालत ने 13 मई को भी फटकार लगाई थी और आरोपियों से उनके कद के आधार पर भेदभाव नहीं करने को कहा था. भरत व्यापम नियुक्ति घोटाले के चार मामलों में आरोपी है. उसने विभिन्न विभागीय परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा करके कई नियुक्तियां करवाई थीं. इस धंधे में उसने खूब कमाई की. 20 नवंबर, 2013 को घोटाले में नाम आने के बाद से ही भरत मिश्र गायब था. एफआइआर के मुताबिक, 2012 में हुए प्री-पीजी मेडिकल टेस्ट में पास करवाने के लिए उसने जूनियर डॉॅक्टरों से करोड़ों रु. लिए थे. वह पुलिस कांस्टेबल, सब-इंस्पेक्टर और फूड इंस्पेक्टर भर्ती घोटाले में भी वांटेड था.
एसटीएफ ने भरत के साथ-साथ व्यापम और नियुक्ति घोटाले के अन्य आरोपियों को लेकर भी भरपूर उदारता दिखाई है. स्कूल टीचर से खदान माफिया बना सुधीर शर्मा और अतिरिक्त प्रमुख सचिव (नियोजन) अजीता बाजपेयी पांडे का पति अमित पांडे अब तक एसटीएफ की पहुंच से बाहर हैं. फर्जीवाड़े के जरिए अपनी बेटी को मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज ङ्क्षसह चौहान के पूर्व निजी सहायक प्रेम प्रकाश के साथ भी एसटीएफ ने खासी रियायत बरती थी.

घोटाले में ज्यादातर एफआइआर व्यापम के पूर्व चीफ एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क से मिली जानकारी के आधार पर दर्ज की गई हैं. महिंद्रा को 16 जुलाई, 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया था. उसकी हार्ड डिस्क से एसटीएफ के हाथ रिश्वत, सिफारिशों और घोटाले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं. इसी में मध्य प्रदेश के पूर्व तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का नाम भी था. लेकिन उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज करने के लिए एसटीएफ ने विधानसभा चुनाव तक का इंतजार किया.
शर्मा के खिलाफ पहली एफआइआर विधानसभा चुनाव के परिणाम आने से ठीक एक दिन पहले 7 दिसंबर को दर्ज की गई, तो दूसरी एफआइआर 9 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के एक दिन बाद दर्ज की गई. शर्मा चुनाव हार गए थे. तीसरा मामला शर्मा की गिरफ्तारी के बाद इसी साल 15 जून को दर्ज किया गया. यह मामला बाट और माप विभाग में भर्ती घोटाले से जुड़ा है. इससे पहले एसटीएफ ने उन्हें दो बार पूछताछ कर छोड़ दिया था. सूत्रों के मुताबिक, शर्मा को हिरासत में भी वीआइपी सुविधाएं मुहैया करवाई गईं. एफआइआर में केंद्रीय मंत्री उमा भारती का भी नाम है जो खुद इस घोटाले को 'चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला' करार दे चुकी हैं. एफआइआर में 'उमा भारती जी' नाम से दो बार जिक्र है. इसमें बताया गया है कि उमा ने लक्ष्मीकांत शर्मा से संविदा शिक्षकों की भर्ती में कुछ लोगों की सिफारिश की थी.
हालांकि चौहान सरकार यह जताने की हरसंभव कोशिश कर रही है कि घोटालेबाजों को लेकर उसका रवैया बेहद सख्त है. सरकार ने 2008 से 2013 के बीच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फर्जीवाड़े के जरिए एडमिशन पाने वाले 1,095 छात्रों के प्रवेश (डिग्री) को रद्द कर दिया है तो विभिन्न सरकारी विभागों में विभागीय परीक्षाओं के जरिए नियुक्ति पाने वाले कुल 228 लोगों को नौकरी से हटा दिया गया है.
इस महाघोटाले में एसटीएफ ने 1,300 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया है. इनमें से गिरफ्तार 500 लोगों में ज्यादातर छात्र और उनके अभिभावक ही हैं. एसटीएफ बड़ी मछलियों पर हाथ डालने से अब तक बचता आया है. इस आरोप को खारिज करते हुए प्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर कहते हैं, ''हाइकोर्ट घोटाले की जांच की निगरानी कर रहा है. बड़े कद वाले आरोपियों पर अदालत की पैनी नजर है. मामला अदालत में है इसलिए मैं और टिप्पणी नहीं कर सकता. '' लेकिन तथ्य गौर को गलत साबित करते हैं. जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद यादव आरोप लगाते हैं, ''व्यापम शुरू से ही शिक्षा के व्यापारियों का मंडल रहा है. ''
इस बीच 16 जुलाई को डीआइजी हरिसिंह यादव के दामाद दीपक यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. प्रारंभिक पूछताछ में दीपक ने पुलिस को बताया है कि वह उत्तर प्रदेश के फर्जी
छात्रों को पीएमटी में बैठाता था. इसकीएवज में मेडिकल कॉलेज में दाखिले की चाह रखने वाले छात्रों से 10 लाख रु. तक वसूलता था. प्री-पीजी में दाखिले के लिए उसने कई छात्रों से एक करोड़ रु. भी लिए हैं. एक अनुमान के मुताबिक दीपक ने लगभग 100 फर्जी छात्रों को प्रवेश दिलाया है.
हालांकि अब तक तो अदालत की कड़ी टिप्पणियों और राष्ट्रीय स्तर पर छीछालेदर होने के बावजूद एसटीएफ की कार्यप्रणाली में खास सुधार देखने को नहीं मिला है. आगे भी स्थितियां सुधरेंगी, इसमें शक है.
—साथ में समीर गर्ग

