खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने जून के दूसरे सप्ताह में यह विचार आगे बढ़ाया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निगरानी के लिए हर पंचायत में सरकार के दो प्रतिनिधि नियुक्त किए जाएं. खाद्य सचिव सुधीर कुमार ने तुरंत इसे खारिज कर दिया. उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली राज्य का विषय है.
सुधीर कुमार ने उसके बाद भी पासवान के हस्तक्षेप की सारी कोशिशें नाकाम कर दीं. दो सप्ताह बाद पासवान के मातहत एक और सचिव, उपभोक्ता कार्य सचिव केशव देसीराजू ने खुले बाजार में मूल्यों की जांच करने के लिए टीमें बनाने का सुझाव दिया, जिसे पासवान ने यह कहकर ठुकरा दिया कि इसके लिए अतिरिक्त लोगों की जरूरत पड़ेगी. देसीराजू ने तुरंत जवाब दिया कि प्रधानमंत्री ने जो ‘लीक से हटकर समाधान’ मांगे थे, यह उनमें से एक है.
पासवान अकेले मंत्री नहीं हैं जिनके मातहत अफसरों की रीढ़ अचानक सीधी हो गई है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह भी अपने सचिव आशीष बहुगुणा से सलाह न करने की शर्मिंदगी झेल रहे हैं. पहली जुलाई को उन्होंने बहुगुणा से सलाह किए बिना ऐलान कर दिया कि पश्चिम भारत में सूखा पडऩे वाला है. मीडिया में शोर मचने पर राधामोहन सिंह को अपनी भूल का एहसास हुआ.
परोक्ष रूप से देश की एक अरब बीस करोड़ आबादी की भाग्य विधाता लुटियंस की दिल्ली के 26 वर्ग किमी. के दायरे की आबोहवा बदल रही है. अधिकारों के रथ पर सवार नौकरशाही मिशन मोड में आ गई है. उनके इस मिशन की शुरुआत करीब एक दशक में अपने किस्म की पहली बैठक से हुई. चार जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7, रेसकोर्स रोड स्थित सरकारी निवास पर अपनी सरकार के सभी 77 सचिवों से मिले और उनसे सुझाव मांगे. उनसे पूछा, “मुझे बताइए कि मैं अपनी सरकार कैसे चलाऊं.” इनमें से अनेक सचिव 30 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं पर पहली बार किसी प्रधानमंत्री से मुखातिब थे. उसके बाद मोदी ने उन्हें अपने फोन नंबर, ई-मेल और सरकारी रैक्स लाइन नंबर दे दिए और कहा कि जब भी जरूरी लगे, वे सीधे उनसे संपर्क कर सकते हैं. इस बैठक ने हवा का रुख पूरी तरह बदल दिया. साफ हो गया कि प्रधानमंत्री सरकारी अफसरों के जरिए सीधे अपनी सरकार चलाएंगे. अगले दिन कैबिनेट सचिव अजित सेठ की ओर से दो पन्नों का करारा पत्र सचिवों की मेज पर था. इनमें साफ-सुथरे दफ्तरों से लेकर तेजी से फैसले लेने और लक्ष्यों तथा वादों की समीक्षा करने जैसे 11 सूत्र बताए गए थे.

मशीनरी को हरकत में लाना
कैबिनेट सचिव के नोट ने अफसरों में बिजली-सी फुर्ती दौड़ा दी. सामान्य समय से करीब घंटा भर पहले ही सुबह 8 बजे दक्षिण दिल्ली में देश के सबसे बड़े अफसरों की 143 एकड़ में फैली न्यू मोतीबाग कॉलोनी से सफेद टाटा इंडिगो के काफिले दौडऩे लगे. दफ्तरों के गलियारों को फिनाइल से रगड़-रगड़ कर साफ करते लोक निर्माण विभाग के कर्मचारियों से बचते-बचाते अफसर अपने दफ्तरों में घुसने को उतावले थे. धीमे-धीमे आराम से फैसले लेने के दिन अब लद गए थे. वक्त कीमती हो गया है. मसलन, गृह सचिव अनिल गोस्वामी रोजाना सबेरे 9 बजे नॉर्थ ब्लॉक के सम्मेलन कक्ष में एक घंटे तक अपने सभी 32 प्रमुख अधिकारियों से मिलते हैं. बैठक से अनुपस्थित रहने वाले अफसरों को अनुपस्थिति का कारण लिखकर बताना पड़ता है. एक थके-हारे अफसर ने बताया कि गोस्वामी दिन में 12 घंटे काम करते हैं और बदलने के लिए एक जोड़ी कपड़े दफ्तर में रखते हैं और वहीं खटिया भी डाल सकते हैं. सरकारी दफ्तरों के माहौल में तनाव साफ झलकता है. अफसर और नई सरकार एक दूसरे से परिचित हो रहे हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस माहौल की तुलना कसकर बंधे हुए स्प्रिंग से की जिस पर दबाव दिनोदिन बढ़ रहा है.
मंत्री खुद मिसाल पेश कर रहे हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सुबह 8.30 बजे साउथ ब्लॉक में अपने दफ्तर पहुंच जाती हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी सुबह 9 बजे पहुंचती हैं, लेकिन चाहती हैं कि उनके कर्मचारी आधा घंटा पहले ही पहुंच जाएं. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी सुबह 8.30 बजे दफ्तर पहुंचती हैं और रात में 10 बजे तक वहां से निकलती हैं और सारे स्टाफ को देर तक रोकतीं हैं.
एक सचिव ने बताया, “यह सरकार जल्दी में है और साफ तौर पर, काम कराने की मांग लगातार करती रहती है.” फिर भी उनका कहना है कि बहुत जल्द बहुत कुछ पाने की अपेक्षा के खतरे भी हैं, “ऐसा नहीं हो सकता कि सब कुछ आज ही हो जाए. हमारी व्यवस्था जैसे काम करती है उसमें और देरी भी हो सकती है. लेकिन अब यह महसूस होता है कि हालात बहुत अलग होंगे और देर करने के नतीजे भुगतने होंगे.”
अंग्रेजों के जमाने के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के गलियारों से फाइलों और फर्नीचर के ढेर गायब हो गए हैं. भीतर विभागों में झटपट फैसले हो रहे हैं. कोयला सचिव एस.के. श्रीवास्तव ने अपने विभाग को ऐसा सॉफ्टवेयर लगाने के लिए सिर्फ तीन महीने का समय दिया है जो कोयला ब्लॉक आवंटन पर नजर रख सके. लंबी-लंबी बैठकों की जगह अब छोटी 7 स्लाइड की पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन ने ले ली है.
कामकाजी दिशा-निर्देशों के नोट्स और ज्ञापन सरकार की कार्यशैली की पहचान बन गए हैं. माहौल को इस स्पष्ट संदेश से और ऊर्जा मिल रही है कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र की अगुआई में प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कभी बंद नहीं होता. एक सचिव ने बताया, “प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव स्तर के दो अधिकारी हैं और हमें बताया गया है कि वे दिन-रात काम करते हैं. अब फर्क यह है कि मुझे घर पर शाम को देर से और कभी-कभी रात में 11 बजे भी कॉल आ जाती है. इससे थोड़ी परेशानी होती है.” अजित सेठ का कैबिनेट सचिवालय भी सचिवों पर नजर रखता है. मोबाइल फोन कॉल अब पुरानी बात हो गई हैं. हर सचिव को रोजाना शाम को देर से अपने लैंडलाइन फोन पर कैबिनेट सचिवालय से कम-से-कम दो कॉल आते हैं, ताकि पता चल सके कि वे दफ्तर में मौजूद हैं और काम कर रहे हैं. कैबिनेट नोट की समय-सीमा होती है. प्रश्नों के उत्तर देने के लिए दो सप्ताह की सीमा का सख्ती से पालन हो रहा है. अब हर फाइल के दाहिने कोने पर विशेष रूप से लिखा होता हैः आवश्यक और समयबद्ध.
नई कार्यशैली में ‘चलता है’ वाली सोच की बलि सबसे पहले चढ़ी. एक विदेशी निवेशक को भारत की तीसरी यात्रा के दौरान सुखद आश्चर्य हुआ जब एक सचिव ने उनसे गांव के नौजवानों को तेजी से कौशल सिखाने और विदेश में नौकरी करने लायक बनाने के सुझव मांगे. मुंबई के एक निवेश बैंकर को उस समय झटका लगा जब वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने सुबह 9.15 बजे उनका फोन उठाकर जवाब दिया. अफसरों के दिल बहलाने के अड्डे दिल्ली जिमखाना क्लब और दिल्ली गोल्फ क्लब अब सूने हो गए हैं. अब कई सरकारी कार्यालय सप्ताह में छह दिन काम करने लगे हैं तो गोल्फ की अय्याशी के लिए अब वक्त ही कहां है.
कुछ वर्ष पहले तक ऐसा नहीं था. पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया, “बड़े से बड़े अफसर भी अपने को शक्तिहीन महसूस करते थे. कई सचिव हमेशा बताते थे कि सरकार उन्हें कुछ करने नहीं देगी.” एक केंद्रीय सचिव ने बताया कि अब आइएएस अधिकारी समझ गए हैं कि वे सीधे निशाने पर होंगे. इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो सक्रिय मुख्यमंत्री रहे हैं और अपने साथ प्रशासन की वही चुस्ती लेकर आए हैं, जो अपने राज्य में चलाया करते थे. इस समय उनका सारा ध्यान घरेलू मसलों और अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने पर है. एक सचिव ने दम भरते हुए कहा, “इस सरकार की पहली प्राथमिकता घरेलू प्रशासन है. आज जब इतना दबाव है तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि संसद का सत्र शुरू होने के बाद क्या हाल होगा.”
इस सख्ती के साथ-साथ मोदी ने यूपीए की कई दूसरी विरासतों का भी सफाया किया है. मंत्री-समूह भंग कर दिए गए हैं. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ठंडे बस्ते में है और योजना आयोग के वित्तीय अधिकार सीधे मंत्रालयों को दे दिए गए हैं. अफसरों को अधिकार देकर मोदी सरकार ने मनमोहन सिंह के काल की एक और परंपरा को तोड़ा है कि बेरीढ़ के कमजोर सरकारी अफसरों से घिरे ताकतवर कैबिनेट मंत्रियों के भरोसे सरकार चलाई जाए. अब सचिव समझ गए हैं कि मंत्रियों को काबू में रखने का फैसला सोच-समझकर किया गया है जबकि पिछली सरकार में मंत्रियों की सक्रियता का आलम ही कुछ और था. उनका कहना है कि इसका संकेत इस फैसले से मिलता है कि मंत्री अपनी पसंद के निजी सचिव तक नियुक्त नहीं कर सकते. दैनिक प्रक्रिया में भी इसके साफ संकेत मिलते हैं.
प्रक्रिया तो पुरानी ही अपनाई जाती है लेकिन पहले की तरह फाइलें अब कहीं रुकती नहीं हैं. एक सचिव ने बताया, “सिस्टम वही है. फाइल सचिव से मंत्री को भेजी जाती है, मंत्री मंजूरी दे देता है और फिर उसे पीएमओ को भेजा जाता है. लेकिन अब ये फाइलें सिफारिशों या अस्वीकृति के साथ वापस आ जाती हैं. इसके विपरीत पिछली सरकार में मंत्रियों की ओर से भेजी गईं कुछ फाइलें बस स्वीकार कर ली जाती थीं और हम जानते थे कि उन्हें वापस कभी नहीं भेजा जाएगा.”
मनमोहन सिंह के जमाने में न्यायपालिका से निर्देशित कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच प्रधानमंत्री कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच गई थी. मोदी के कार्यकाल में सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की सरकार के सभी अफसरों तक सीधी पहुंच है. कैबिनेट सचिव अजित सेठ के 5 जून के परिपत्र से साफ पता लगता है कि असली अधिकार किसके पास है. उसका एक सूत्र है, “जो मसले अनसुलझे रह जाएंगे, उन्हें सुलझने के लिए कैबिनेट सचिवालय/प्रधानमंत्री कार्यालय के पास भेजा जाएगा.”
दलालों का सफाया
दलालों की एक समानांतर व्यवस्था दशकों तक नई दिल्ली में अपनी जड़ें भीतर तक जमाए रही. मंत्रालय उनके अखाड़े बन गए थे. बात न मानने वाले अफसरों का तबादला हो जाता था. 2010 में नीरा राडिया टेप्स से पता चला कि देश के सबसे ताकतवर कारोबारी को भी मंत्रालयों में फैसलों को मंजूरी दिलाने के लिए लॉबिस्ट की जरूरत थी. मोदी ने अय्याशी के इन अड्डों को पनपने न देने के लिए कदम उठाए हैं. सो, फरमान जारी किए गए. मंत्री अपने निजी स्टाफ में उन लोगों को नहीं रख सकते जो यूपीए सरकार में काम कर चुके हैं. रिश्तेदारों की नियुक्ति पर पाबंदी है. निजी स्टाफ के सभी उम्मीदवारों की जांच खुफिया एजेंसियां करेंगी. दलालों की जगह निष्पक्ष अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे.
पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम ने सरकारी अधिकारियों के लिए नए निर्देशों का स्वागत किया है पर उनका कहना है कि यह तो सिर्फ उन नियमों की पुनस्र्थापना ही है जो कहीं खो गए थे. उन्होंने कहा, “सचिवों को बस याद दिलाया जा रहा है कि वे किस लिए नियुक्त किए गए हैं और उनका काम आखिर क्या है. उन्हें राजनीति खेलने और मंत्रियों के साथ गलबहियां डालने के लिए नियुक्त नहीं किया गया है. उनका काम नीति बनाने में मदद करना और राष्ट्रहित में निष्पक्ष फैसले लेना है. हर सरकारी अफसर के लिए यह भगवत् गीता है और यही नियम उन्हें हमेशा सिखाए गए हैं.”
आइएएस अधिकारी से बीजेपी नेता बने केजे अल्फॉन्ज जैसे पूर्व सरकारी अधिकारी मोदी के निर्देशों को मौन बहुसंख्या को सशक्त करने की कोशिश मानते हैं. उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री के निर्देशों के बल पर अब 50 प्रतिशत मौन लेकिन कमजोर सरकारी अफसर भी बोल सकेंगे.”
सुधार की राह
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पाया कि प्रशासनिक सेवा अपने औपनिवेशिक अतीत का खंडहर मात्र नहीं रह गई है. इसी लिए उन्होंने इसे ‘स्टील फ्रेम’ की उपमा दी थी. यह उपमा इस समझ की देन थी कि नौकरशाही वह इंजन है जो भारत को विकास के रास्ते पर आगे ले जा सकती है. आर्थिक वृद्धि तेज करने के वादे के दम पर सत्ता में पहुंचे मोदी को विरासत में ठप्प इंजन मिला है. पहले से ही जोखिम से बचने के लिए बदनाम नौकरशाही कई बड़े अफसरों की गिरफ्तारी के बाद एकदम निष्क्रिय हो गई थी. अधिकतर सरकारी अधिकारी अगर गलती न करें और अपनी बात ज्यादा न कहें तो सचिव की कुर्सी तक पहुंच ही जाते हैं. अधिकारियों ने सजा के डर से फैसले लेने में रुकावट डालने के नए तरीके निकाल लिए. पूर्व सरकारी अधिकारियों ने कार्यपालिका को हस्तक्षेप से मुक्त रखने के बारे में जो याचिका दायर की थी, उस पर अक्तूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दियाः राजनैतिक हस्तक्षेप और मौखिक आदेशों ने नौकरशाही के कामकाज का स्तर घटाया है. मगर यह फैसला भी इससे बचने का रास्ता नहीं दे पाया.
कहा जा सकता है कि छह साल में भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे निचले स्तर तक पहुंच जाने का एक सीधा कारण नौकरशाही को पक्षाघात होना था. इससे अरबों डॉलर निवेश की परियोजनाएं रुकी रहीं. मिसाल के तौर पर फैसलों में देरी की वजह से कोयले की आपूर्ति मंद पड़ गई जिस पर देश की आधी से अधिक बिजली आपूर्ति निर्भर है.
पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख ने 2005 में सिफारिश की थी कि कोयला मंत्री को कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धात्मक निविदाएं मंगवानी चाहिए, लेकिन अब वे सीबीआइ जांच में फंसे हुए हैं. उनका कहना है कि मोदी के निर्देशों के दम पर सरकारी अफसर किसी बाहरी दबाव में आए बिना बेबाक सलाह दे सकेंगे. उन्होंने कहा, “अगर सचिव अपने मंत्री से सहमत न हों और अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचा सकें तो मंत्री सरकारी अफसरों को अपनी बात मानने पर मजबूर करने से हिचकेंगे.”
मोदी ने 4 जून को अपने निवास पर जिन सचिवों से भेंट की थी, उनमें अधिकतर यूपीए-2 के दौरान पदोन्नत हुए थे. मनमोहन सिंह के प्रेस सलाहकार रह चुके संजय बारू का कहना था, “प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि मौजूदा सचिव ही नतीजे दिखाएं इसलिए उन्हें संरक्षण और अधिकार देने का आश्वासन दिया गया है.” पूर्व कैबिनेट सचिव और प्रतिष्ठित सरकारी अफसर रहे नरेश चंद्र का कहना है कि नौकरशाही को सही संकेत देने के लिए मोदी को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 में संशोधन करना होगा, ताकि सरकारी कर्मचारियों को अपने फैसलों के लिए प्रताड़ित किए जाने से बचाया जा सके. उनका कहना था, “अधिनियम की धारा 13(1)डी के तहत ‘जनहित’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा की जानी चाहिए. सरकारी अफसर की समीक्षा उनके वरिष्ठ साथियों को करनी चाहिए और उन्हें अपने फैसलों के कारण बताने के लिए कम से कम तीन महीने का समय दिया जाना चाहिए.”
लेकिन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जुड़ी हुई है. नौकरशाही के इस उत्साह के पीछे ‘100 दिन की योजना’ है. मोदी ने सभी सरकारी विभागों से अपने लिए तीन महीने की समय-सीमा तय करने को कहा है. 100 दिन के सभी लक्ष्यों की समय-सीमा निश्चित है. यही नहीं, हर विभाग को 2009 के बाद से पांच वर्ष में तय किए गए तमाम लक्ष्यों का अध्ययन कर बताना है कि उन्हें हासिल क्यों नहीं किया जा सका.
पिछले एक महीने में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रु. की सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी है. उसने 2016 से हर दिन 30 किलोमीटर सड़क बनाने की योजना बनाई है और 60,000 करोड़ रु. मूल्य की 250 परियोजनाओं की पहचान की है जिन्हें अगले तीन महीने में मंजूरी दी जाएगी. सरकार ने कर्नाटक में कारवाड़ में एशिया के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डे प्रोजेक्ट सीबर्ड के दो अरब डॉलर खर्च के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है. औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग में स्वदेशी रक्षा उद्योग को खड़ा करने के लिए औद्योगिक लाइसेंस नीति घोषित की गई है.
रक्षा क्षेत्र में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी मिल गई है और घरेलू कारखानों में उत्पादन के लिए वस्तुओं की सूची का विस्तार किया गया है. इन फैसलों से वैश्विक बाजारों में भारी उत्साह है. विदेशी संस्थागत निवेशक जोश में हैं. निवेश बढ़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने पहली जुलाई को अपना आकलन जाहिर किया कि अगले वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर मौजूदा 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 5.5 प्रतिशत और 2016 तक 6.5 प्रतिशत हो जाएगी.
फिर भी ये फैसले ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर हैं. नई सरकार के सामने कामों का पहाड़ खड़ा है क्योंकि उसके इरादे देश की दिशा को पूरी तरह बदल देने के हैं या वह ऐसा ही जाहिर कर रही है. भारत में हर वर्ष 1.2 करोड़ लोगों को रोजगार देने की जरूरत है जबकि उसके 10वें हिस्से के बराबर ही नौकरियों का सृजन हो पाता है. कारखानों का उत्पादन पिछले वर्ष 0.2 प्रतिशत गिरा है जबकि उससे पिछले वर्ष 1.1 प्रतिशत बढ़ा था. इसका एक कारण यह भी है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए बहुत पसीना बहाना पड़ता है. पिछले अक्तूबर में कारोबार शुरू करने में आसानी की दृष्टि से विश्व बैंक ने 189 देशों की जो सूची बनाई थी उसमें भारत का स्थान 179 था. सरकार के एक प्रमुख विभाग के सचिव का कहना था, “हमें सब्सिडी से ध्यान हटाकर बुनियादी ढांचे के विकास पर लगाना होगा.”

केंद्रीयकरण की दिक्कतें
दिल्ली की नौकरशाही, खास तौर पर मझोले और निचले स्तर के अधिकारी, सुधार के समर्पित प्रयासों का विरोध करते रहे हैं. नौकरशाही को पटरी पर लाने का पिछला प्रयास 2008 में तब किया गया था जब गृह मंत्री के रूप में पी. चिदंबरम के कदम नॉर्थ ब्लॉक में पड़े थे. उन्होंने नॉर्थ ब्लॉक के बाबुओं के लिए नई कार्य संस्कृति लागू करने की नाकाम कोशिश की थी. देर से आने वालों अधिकारियों ने आगमन-प्रस्थान समय दर्ज करने वाली एक बायोमेट्रिक प्रणाली स्थापित करने की उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया था. अहम फैसलों को लटकाने के लिए नौकरशाह साठ-गांठ किया करते थे. 2012 में जब चिदंबरम वित्त मंत्रालय में वापस चले गए तो गृह मंत्रालय अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया.
कुछ नौकरशाह चेतावनी देते हैं कि मोदी की अगुआई वाली पहल का भी यही हश्र होना है. वे इस पहल को उपलब्धि की खातिर एक भ्रामक गतिविधि बताते हुए खारिज करते हैं. एक वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, “देखते रहिए, यह सब तमाशा है. छह महीने में हम फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से चले थे.” सचमुच कागज से नौकरशाही के लगाव जैसी कई भारी बाधाएं हैं जो निर्णय लेने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं. मामूली फैसले भी फाइलों पर लिखे जाते हैं और दफ्तर दर दफ्तर दस्तखतों की बाट जोहते हैं. इस प्रक्रिया में कई-कई दिन लग जाते हैं. एक नौकरशाह समझते हैं कि कैसे ज्यादातर सरकारी अधिकारी ई-मेल इस्तेमाल करने से इनकार करते हैं और यह प्रवृत्ति पदानुक्रम में ऊपर बढऩे के साथ-साथ और भी बढ़ती जाती है. वे कहते हैं, “महज आधे संयुक्त सचिव ही ई-मेल इस्तेमाल करते हैं. ई-मेल इस्तेमाल करने वाले सचिवों तथा अपर सचिवों की संख्या नगण्य है.” अधिकारी यह भी शिकायत करते हैं कि सरकार के आधिकारिक वेब सेवा प्रदाता नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर की ईमेल का ‘इस्तेमाल असंभव’ है.
भूगोल की चुनौती भी अपनी जगह है. नौकरशाही में सुधार के प्रयास फिलहाल दिल्ली तक ही सीमित हैं जहां सरकार महज नीतियां ही निर्धारित कर सकती है. अर्थव्यवस्था में तेजी लाने की असली लड़ाई तो राज्यों पर निर्भर करती है. एक सचिव का कहना है, “एक कारखाना खोलने की अनुमति प्राप्त करने के लिए किसी कारोबारी को बृहनमुंबई महानगरपालिका के 40 विभागों में भटकना पड़ता है. यहां दिल्ली में बैठकर मैं उसकी मदद कैसे कर सकता हूं?” अधिकारी यह भी ताकीद करते हैं कि नौकरशाहों से सीधा संपर्क रखने वाले पीएमओ के मॉडल को बनाए रखना विशेष रूप से इसलिए मुश्किल होगा क्योंकि इसका मतलब मंत्रियों को हाशिए पर धकेलना हो जाएगा. एक अधिकारी बताते हैं, “बड़ा खतरा यह है कि मंत्री हाथ खड़े कर देंगे या अपने विभागों में दिलचस्पी खो बैठेंगे. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा.” उदाहरण के लिए कृषि मंत्री राधामोहन सिंह अब संयुक्त सचिवों से संपर्क रखना पसंद करते हैं और उनका इरादा प्रधानमंत्री से कहकर अपने सचिव आशीष बहुगुणा को बदलवाने का है.
प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता के इस केंद्रीयकरण की एक कमी यह है कि कुछ फैसले लेने में देरी हो जाती है. कुछ नियुक्तियां अटकी पड़ी हैं. बुनियादी ढांचे से संबंधित तीन प्रमुख मंत्रालयों-दूरसंचार, शहरी विकास और उर्वरक, में सचिवों के पद पिछले महीने रिक्त हुए हैं और उनकी जगह पर किसी नए अधिकारी की तैनाती नहीं हो रही है.
विपक्ष ने इस मुद्दे को लपकने में देरी नहीं की. पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा तिरुवनंतपुरम के मौजूदा सांसद शशि थरूर ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा, “यदि हमें एक ऐसी सरकार मिलने वाली है जिसमें नीतियां वस्तुतः नौकरशाहों के साथ प्रधानमंत्री बनाएंगे तो मंत्रिमंडल की जवाबदेही के सिद्धांत और शासन की संसदीय प्रणाली पर ही सवालिया निशान लग जाएगा.”
पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी फिलिप मैसन ने 1953 में प्रकाशित अपने संस्मरण ‘द मेन हू रूल्ड इंडिया’ में सरकार के कारोबार को “एक के बाद दूसरे अभिशप्त गड्ढे से बाहर निकलना” बताया था. भारतीय नौकरशाही को अभी एक गड्ढे से बाहर निकाला गया है. अब उसे ध्यान रखना होगा कि वह दूसरे गड्ढे में न गिर पड़े. मोदी का परिवर्तन का वादा अब नौकरशाही की कड़ी मेहनत की क्षमता पर निर्भर करता है.

—साथ में जयंत श्रीराम
सुधीर कुमार ने उसके बाद भी पासवान के हस्तक्षेप की सारी कोशिशें नाकाम कर दीं. दो सप्ताह बाद पासवान के मातहत एक और सचिव, उपभोक्ता कार्य सचिव केशव देसीराजू ने खुले बाजार में मूल्यों की जांच करने के लिए टीमें बनाने का सुझाव दिया, जिसे पासवान ने यह कहकर ठुकरा दिया कि इसके लिए अतिरिक्त लोगों की जरूरत पड़ेगी. देसीराजू ने तुरंत जवाब दिया कि प्रधानमंत्री ने जो ‘लीक से हटकर समाधान’ मांगे थे, यह उनमें से एक है.
पासवान अकेले मंत्री नहीं हैं जिनके मातहत अफसरों की रीढ़ अचानक सीधी हो गई है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह भी अपने सचिव आशीष बहुगुणा से सलाह न करने की शर्मिंदगी झेल रहे हैं. पहली जुलाई को उन्होंने बहुगुणा से सलाह किए बिना ऐलान कर दिया कि पश्चिम भारत में सूखा पडऩे वाला है. मीडिया में शोर मचने पर राधामोहन सिंह को अपनी भूल का एहसास हुआ.
परोक्ष रूप से देश की एक अरब बीस करोड़ आबादी की भाग्य विधाता लुटियंस की दिल्ली के 26 वर्ग किमी. के दायरे की आबोहवा बदल रही है. अधिकारों के रथ पर सवार नौकरशाही मिशन मोड में आ गई है. उनके इस मिशन की शुरुआत करीब एक दशक में अपने किस्म की पहली बैठक से हुई. चार जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7, रेसकोर्स रोड स्थित सरकारी निवास पर अपनी सरकार के सभी 77 सचिवों से मिले और उनसे सुझाव मांगे. उनसे पूछा, “मुझे बताइए कि मैं अपनी सरकार कैसे चलाऊं.” इनमें से अनेक सचिव 30 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं पर पहली बार किसी प्रधानमंत्री से मुखातिब थे. उसके बाद मोदी ने उन्हें अपने फोन नंबर, ई-मेल और सरकारी रैक्स लाइन नंबर दे दिए और कहा कि जब भी जरूरी लगे, वे सीधे उनसे संपर्क कर सकते हैं. इस बैठक ने हवा का रुख पूरी तरह बदल दिया. साफ हो गया कि प्रधानमंत्री सरकारी अफसरों के जरिए सीधे अपनी सरकार चलाएंगे. अगले दिन कैबिनेट सचिव अजित सेठ की ओर से दो पन्नों का करारा पत्र सचिवों की मेज पर था. इनमें साफ-सुथरे दफ्तरों से लेकर तेजी से फैसले लेने और लक्ष्यों तथा वादों की समीक्षा करने जैसे 11 सूत्र बताए गए थे.

मशीनरी को हरकत में लाना
कैबिनेट सचिव के नोट ने अफसरों में बिजली-सी फुर्ती दौड़ा दी. सामान्य समय से करीब घंटा भर पहले ही सुबह 8 बजे दक्षिण दिल्ली में देश के सबसे बड़े अफसरों की 143 एकड़ में फैली न्यू मोतीबाग कॉलोनी से सफेद टाटा इंडिगो के काफिले दौडऩे लगे. दफ्तरों के गलियारों को फिनाइल से रगड़-रगड़ कर साफ करते लोक निर्माण विभाग के कर्मचारियों से बचते-बचाते अफसर अपने दफ्तरों में घुसने को उतावले थे. धीमे-धीमे आराम से फैसले लेने के दिन अब लद गए थे. वक्त कीमती हो गया है. मसलन, गृह सचिव अनिल गोस्वामी रोजाना सबेरे 9 बजे नॉर्थ ब्लॉक के सम्मेलन कक्ष में एक घंटे तक अपने सभी 32 प्रमुख अधिकारियों से मिलते हैं. बैठक से अनुपस्थित रहने वाले अफसरों को अनुपस्थिति का कारण लिखकर बताना पड़ता है. एक थके-हारे अफसर ने बताया कि गोस्वामी दिन में 12 घंटे काम करते हैं और बदलने के लिए एक जोड़ी कपड़े दफ्तर में रखते हैं और वहीं खटिया भी डाल सकते हैं. सरकारी दफ्तरों के माहौल में तनाव साफ झलकता है. अफसर और नई सरकार एक दूसरे से परिचित हो रहे हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस माहौल की तुलना कसकर बंधे हुए स्प्रिंग से की जिस पर दबाव दिनोदिन बढ़ रहा है.
मंत्री खुद मिसाल पेश कर रहे हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सुबह 8.30 बजे साउथ ब्लॉक में अपने दफ्तर पहुंच जाती हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी सुबह 9 बजे पहुंचती हैं, लेकिन चाहती हैं कि उनके कर्मचारी आधा घंटा पहले ही पहुंच जाएं. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी सुबह 8.30 बजे दफ्तर पहुंचती हैं और रात में 10 बजे तक वहां से निकलती हैं और सारे स्टाफ को देर तक रोकतीं हैं.
एक सचिव ने बताया, “यह सरकार जल्दी में है और साफ तौर पर, काम कराने की मांग लगातार करती रहती है.” फिर भी उनका कहना है कि बहुत जल्द बहुत कुछ पाने की अपेक्षा के खतरे भी हैं, “ऐसा नहीं हो सकता कि सब कुछ आज ही हो जाए. हमारी व्यवस्था जैसे काम करती है उसमें और देरी भी हो सकती है. लेकिन अब यह महसूस होता है कि हालात बहुत अलग होंगे और देर करने के नतीजे भुगतने होंगे.”
अंग्रेजों के जमाने के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के गलियारों से फाइलों और फर्नीचर के ढेर गायब हो गए हैं. भीतर विभागों में झटपट फैसले हो रहे हैं. कोयला सचिव एस.के. श्रीवास्तव ने अपने विभाग को ऐसा सॉफ्टवेयर लगाने के लिए सिर्फ तीन महीने का समय दिया है जो कोयला ब्लॉक आवंटन पर नजर रख सके. लंबी-लंबी बैठकों की जगह अब छोटी 7 स्लाइड की पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन ने ले ली है.
कामकाजी दिशा-निर्देशों के नोट्स और ज्ञापन सरकार की कार्यशैली की पहचान बन गए हैं. माहौल को इस स्पष्ट संदेश से और ऊर्जा मिल रही है कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र की अगुआई में प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कभी बंद नहीं होता. एक सचिव ने बताया, “प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव स्तर के दो अधिकारी हैं और हमें बताया गया है कि वे दिन-रात काम करते हैं. अब फर्क यह है कि मुझे घर पर शाम को देर से और कभी-कभी रात में 11 बजे भी कॉल आ जाती है. इससे थोड़ी परेशानी होती है.” अजित सेठ का कैबिनेट सचिवालय भी सचिवों पर नजर रखता है. मोबाइल फोन कॉल अब पुरानी बात हो गई हैं. हर सचिव को रोजाना शाम को देर से अपने लैंडलाइन फोन पर कैबिनेट सचिवालय से कम-से-कम दो कॉल आते हैं, ताकि पता चल सके कि वे दफ्तर में मौजूद हैं और काम कर रहे हैं. कैबिनेट नोट की समय-सीमा होती है. प्रश्नों के उत्तर देने के लिए दो सप्ताह की सीमा का सख्ती से पालन हो रहा है. अब हर फाइल के दाहिने कोने पर विशेष रूप से लिखा होता हैः आवश्यक और समयबद्ध.
नई कार्यशैली में ‘चलता है’ वाली सोच की बलि सबसे पहले चढ़ी. एक विदेशी निवेशक को भारत की तीसरी यात्रा के दौरान सुखद आश्चर्य हुआ जब एक सचिव ने उनसे गांव के नौजवानों को तेजी से कौशल सिखाने और विदेश में नौकरी करने लायक बनाने के सुझव मांगे. मुंबई के एक निवेश बैंकर को उस समय झटका लगा जब वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने सुबह 9.15 बजे उनका फोन उठाकर जवाब दिया. अफसरों के दिल बहलाने के अड्डे दिल्ली जिमखाना क्लब और दिल्ली गोल्फ क्लब अब सूने हो गए हैं. अब कई सरकारी कार्यालय सप्ताह में छह दिन काम करने लगे हैं तो गोल्फ की अय्याशी के लिए अब वक्त ही कहां है.
कुछ वर्ष पहले तक ऐसा नहीं था. पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया, “बड़े से बड़े अफसर भी अपने को शक्तिहीन महसूस करते थे. कई सचिव हमेशा बताते थे कि सरकार उन्हें कुछ करने नहीं देगी.” एक केंद्रीय सचिव ने बताया कि अब आइएएस अधिकारी समझ गए हैं कि वे सीधे निशाने पर होंगे. इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो सक्रिय मुख्यमंत्री रहे हैं और अपने साथ प्रशासन की वही चुस्ती लेकर आए हैं, जो अपने राज्य में चलाया करते थे. इस समय उनका सारा ध्यान घरेलू मसलों और अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने पर है. एक सचिव ने दम भरते हुए कहा, “इस सरकार की पहली प्राथमिकता घरेलू प्रशासन है. आज जब इतना दबाव है तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि संसद का सत्र शुरू होने के बाद क्या हाल होगा.”
इस सख्ती के साथ-साथ मोदी ने यूपीए की कई दूसरी विरासतों का भी सफाया किया है. मंत्री-समूह भंग कर दिए गए हैं. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ठंडे बस्ते में है और योजना आयोग के वित्तीय अधिकार सीधे मंत्रालयों को दे दिए गए हैं. अफसरों को अधिकार देकर मोदी सरकार ने मनमोहन सिंह के काल की एक और परंपरा को तोड़ा है कि बेरीढ़ के कमजोर सरकारी अफसरों से घिरे ताकतवर कैबिनेट मंत्रियों के भरोसे सरकार चलाई जाए. अब सचिव समझ गए हैं कि मंत्रियों को काबू में रखने का फैसला सोच-समझकर किया गया है जबकि पिछली सरकार में मंत्रियों की सक्रियता का आलम ही कुछ और था. उनका कहना है कि इसका संकेत इस फैसले से मिलता है कि मंत्री अपनी पसंद के निजी सचिव तक नियुक्त नहीं कर सकते. दैनिक प्रक्रिया में भी इसके साफ संकेत मिलते हैं.
प्रक्रिया तो पुरानी ही अपनाई जाती है लेकिन पहले की तरह फाइलें अब कहीं रुकती नहीं हैं. एक सचिव ने बताया, “सिस्टम वही है. फाइल सचिव से मंत्री को भेजी जाती है, मंत्री मंजूरी दे देता है और फिर उसे पीएमओ को भेजा जाता है. लेकिन अब ये फाइलें सिफारिशों या अस्वीकृति के साथ वापस आ जाती हैं. इसके विपरीत पिछली सरकार में मंत्रियों की ओर से भेजी गईं कुछ फाइलें बस स्वीकार कर ली जाती थीं और हम जानते थे कि उन्हें वापस कभी नहीं भेजा जाएगा.”
मनमोहन सिंह के जमाने में न्यायपालिका से निर्देशित कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच प्रधानमंत्री कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच गई थी. मोदी के कार्यकाल में सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की सरकार के सभी अफसरों तक सीधी पहुंच है. कैबिनेट सचिव अजित सेठ के 5 जून के परिपत्र से साफ पता लगता है कि असली अधिकार किसके पास है. उसका एक सूत्र है, “जो मसले अनसुलझे रह जाएंगे, उन्हें सुलझने के लिए कैबिनेट सचिवालय/प्रधानमंत्री कार्यालय के पास भेजा जाएगा.”
दलालों का सफाया
दलालों की एक समानांतर व्यवस्था दशकों तक नई दिल्ली में अपनी जड़ें भीतर तक जमाए रही. मंत्रालय उनके अखाड़े बन गए थे. बात न मानने वाले अफसरों का तबादला हो जाता था. 2010 में नीरा राडिया टेप्स से पता चला कि देश के सबसे ताकतवर कारोबारी को भी मंत्रालयों में फैसलों को मंजूरी दिलाने के लिए लॉबिस्ट की जरूरत थी. मोदी ने अय्याशी के इन अड्डों को पनपने न देने के लिए कदम उठाए हैं. सो, फरमान जारी किए गए. मंत्री अपने निजी स्टाफ में उन लोगों को नहीं रख सकते जो यूपीए सरकार में काम कर चुके हैं. रिश्तेदारों की नियुक्ति पर पाबंदी है. निजी स्टाफ के सभी उम्मीदवारों की जांच खुफिया एजेंसियां करेंगी. दलालों की जगह निष्पक्ष अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे.
पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम ने सरकारी अधिकारियों के लिए नए निर्देशों का स्वागत किया है पर उनका कहना है कि यह तो सिर्फ उन नियमों की पुनस्र्थापना ही है जो कहीं खो गए थे. उन्होंने कहा, “सचिवों को बस याद दिलाया जा रहा है कि वे किस लिए नियुक्त किए गए हैं और उनका काम आखिर क्या है. उन्हें राजनीति खेलने और मंत्रियों के साथ गलबहियां डालने के लिए नियुक्त नहीं किया गया है. उनका काम नीति बनाने में मदद करना और राष्ट्रहित में निष्पक्ष फैसले लेना है. हर सरकारी अफसर के लिए यह भगवत् गीता है और यही नियम उन्हें हमेशा सिखाए गए हैं.”
आइएएस अधिकारी से बीजेपी नेता बने केजे अल्फॉन्ज जैसे पूर्व सरकारी अधिकारी मोदी के निर्देशों को मौन बहुसंख्या को सशक्त करने की कोशिश मानते हैं. उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री के निर्देशों के बल पर अब 50 प्रतिशत मौन लेकिन कमजोर सरकारी अफसर भी बोल सकेंगे.”
सुधार की राह
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पाया कि प्रशासनिक सेवा अपने औपनिवेशिक अतीत का खंडहर मात्र नहीं रह गई है. इसी लिए उन्होंने इसे ‘स्टील फ्रेम’ की उपमा दी थी. यह उपमा इस समझ की देन थी कि नौकरशाही वह इंजन है जो भारत को विकास के रास्ते पर आगे ले जा सकती है. आर्थिक वृद्धि तेज करने के वादे के दम पर सत्ता में पहुंचे मोदी को विरासत में ठप्प इंजन मिला है. पहले से ही जोखिम से बचने के लिए बदनाम नौकरशाही कई बड़े अफसरों की गिरफ्तारी के बाद एकदम निष्क्रिय हो गई थी. अधिकतर सरकारी अधिकारी अगर गलती न करें और अपनी बात ज्यादा न कहें तो सचिव की कुर्सी तक पहुंच ही जाते हैं. अधिकारियों ने सजा के डर से फैसले लेने में रुकावट डालने के नए तरीके निकाल लिए. पूर्व सरकारी अधिकारियों ने कार्यपालिका को हस्तक्षेप से मुक्त रखने के बारे में जो याचिका दायर की थी, उस पर अक्तूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दियाः राजनैतिक हस्तक्षेप और मौखिक आदेशों ने नौकरशाही के कामकाज का स्तर घटाया है. मगर यह फैसला भी इससे बचने का रास्ता नहीं दे पाया.
कहा जा सकता है कि छह साल में भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे निचले स्तर तक पहुंच जाने का एक सीधा कारण नौकरशाही को पक्षाघात होना था. इससे अरबों डॉलर निवेश की परियोजनाएं रुकी रहीं. मिसाल के तौर पर फैसलों में देरी की वजह से कोयले की आपूर्ति मंद पड़ गई जिस पर देश की आधी से अधिक बिजली आपूर्ति निर्भर है.
पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख ने 2005 में सिफारिश की थी कि कोयला मंत्री को कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धात्मक निविदाएं मंगवानी चाहिए, लेकिन अब वे सीबीआइ जांच में फंसे हुए हैं. उनका कहना है कि मोदी के निर्देशों के दम पर सरकारी अफसर किसी बाहरी दबाव में आए बिना बेबाक सलाह दे सकेंगे. उन्होंने कहा, “अगर सचिव अपने मंत्री से सहमत न हों और अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचा सकें तो मंत्री सरकारी अफसरों को अपनी बात मानने पर मजबूर करने से हिचकेंगे.”
मोदी ने 4 जून को अपने निवास पर जिन सचिवों से भेंट की थी, उनमें अधिकतर यूपीए-2 के दौरान पदोन्नत हुए थे. मनमोहन सिंह के प्रेस सलाहकार रह चुके संजय बारू का कहना था, “प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि मौजूदा सचिव ही नतीजे दिखाएं इसलिए उन्हें संरक्षण और अधिकार देने का आश्वासन दिया गया है.” पूर्व कैबिनेट सचिव और प्रतिष्ठित सरकारी अफसर रहे नरेश चंद्र का कहना है कि नौकरशाही को सही संकेत देने के लिए मोदी को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 में संशोधन करना होगा, ताकि सरकारी कर्मचारियों को अपने फैसलों के लिए प्रताड़ित किए जाने से बचाया जा सके. उनका कहना था, “अधिनियम की धारा 13(1)डी के तहत ‘जनहित’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा की जानी चाहिए. सरकारी अफसर की समीक्षा उनके वरिष्ठ साथियों को करनी चाहिए और उन्हें अपने फैसलों के कारण बताने के लिए कम से कम तीन महीने का समय दिया जाना चाहिए.”
लेकिन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जुड़ी हुई है. नौकरशाही के इस उत्साह के पीछे ‘100 दिन की योजना’ है. मोदी ने सभी सरकारी विभागों से अपने लिए तीन महीने की समय-सीमा तय करने को कहा है. 100 दिन के सभी लक्ष्यों की समय-सीमा निश्चित है. यही नहीं, हर विभाग को 2009 के बाद से पांच वर्ष में तय किए गए तमाम लक्ष्यों का अध्ययन कर बताना है कि उन्हें हासिल क्यों नहीं किया जा सका.
पिछले एक महीने में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रु. की सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी है. उसने 2016 से हर दिन 30 किलोमीटर सड़क बनाने की योजना बनाई है और 60,000 करोड़ रु. मूल्य की 250 परियोजनाओं की पहचान की है जिन्हें अगले तीन महीने में मंजूरी दी जाएगी. सरकार ने कर्नाटक में कारवाड़ में एशिया के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डे प्रोजेक्ट सीबर्ड के दो अरब डॉलर खर्च के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है. औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग में स्वदेशी रक्षा उद्योग को खड़ा करने के लिए औद्योगिक लाइसेंस नीति घोषित की गई है.
रक्षा क्षेत्र में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी मिल गई है और घरेलू कारखानों में उत्पादन के लिए वस्तुओं की सूची का विस्तार किया गया है. इन फैसलों से वैश्विक बाजारों में भारी उत्साह है. विदेशी संस्थागत निवेशक जोश में हैं. निवेश बढ़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने पहली जुलाई को अपना आकलन जाहिर किया कि अगले वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर मौजूदा 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 5.5 प्रतिशत और 2016 तक 6.5 प्रतिशत हो जाएगी.
फिर भी ये फैसले ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर हैं. नई सरकार के सामने कामों का पहाड़ खड़ा है क्योंकि उसके इरादे देश की दिशा को पूरी तरह बदल देने के हैं या वह ऐसा ही जाहिर कर रही है. भारत में हर वर्ष 1.2 करोड़ लोगों को रोजगार देने की जरूरत है जबकि उसके 10वें हिस्से के बराबर ही नौकरियों का सृजन हो पाता है. कारखानों का उत्पादन पिछले वर्ष 0.2 प्रतिशत गिरा है जबकि उससे पिछले वर्ष 1.1 प्रतिशत बढ़ा था. इसका एक कारण यह भी है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए बहुत पसीना बहाना पड़ता है. पिछले अक्तूबर में कारोबार शुरू करने में आसानी की दृष्टि से विश्व बैंक ने 189 देशों की जो सूची बनाई थी उसमें भारत का स्थान 179 था. सरकार के एक प्रमुख विभाग के सचिव का कहना था, “हमें सब्सिडी से ध्यान हटाकर बुनियादी ढांचे के विकास पर लगाना होगा.”

केंद्रीयकरण की दिक्कतें
दिल्ली की नौकरशाही, खास तौर पर मझोले और निचले स्तर के अधिकारी, सुधार के समर्पित प्रयासों का विरोध करते रहे हैं. नौकरशाही को पटरी पर लाने का पिछला प्रयास 2008 में तब किया गया था जब गृह मंत्री के रूप में पी. चिदंबरम के कदम नॉर्थ ब्लॉक में पड़े थे. उन्होंने नॉर्थ ब्लॉक के बाबुओं के लिए नई कार्य संस्कृति लागू करने की नाकाम कोशिश की थी. देर से आने वालों अधिकारियों ने आगमन-प्रस्थान समय दर्ज करने वाली एक बायोमेट्रिक प्रणाली स्थापित करने की उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया था. अहम फैसलों को लटकाने के लिए नौकरशाह साठ-गांठ किया करते थे. 2012 में जब चिदंबरम वित्त मंत्रालय में वापस चले गए तो गृह मंत्रालय अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया.
कुछ नौकरशाह चेतावनी देते हैं कि मोदी की अगुआई वाली पहल का भी यही हश्र होना है. वे इस पहल को उपलब्धि की खातिर एक भ्रामक गतिविधि बताते हुए खारिज करते हैं. एक वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, “देखते रहिए, यह सब तमाशा है. छह महीने में हम फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से चले थे.” सचमुच कागज से नौकरशाही के लगाव जैसी कई भारी बाधाएं हैं जो निर्णय लेने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं. मामूली फैसले भी फाइलों पर लिखे जाते हैं और दफ्तर दर दफ्तर दस्तखतों की बाट जोहते हैं. इस प्रक्रिया में कई-कई दिन लग जाते हैं. एक नौकरशाह समझते हैं कि कैसे ज्यादातर सरकारी अधिकारी ई-मेल इस्तेमाल करने से इनकार करते हैं और यह प्रवृत्ति पदानुक्रम में ऊपर बढऩे के साथ-साथ और भी बढ़ती जाती है. वे कहते हैं, “महज आधे संयुक्त सचिव ही ई-मेल इस्तेमाल करते हैं. ई-मेल इस्तेमाल करने वाले सचिवों तथा अपर सचिवों की संख्या नगण्य है.” अधिकारी यह भी शिकायत करते हैं कि सरकार के आधिकारिक वेब सेवा प्रदाता नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर की ईमेल का ‘इस्तेमाल असंभव’ है.
भूगोल की चुनौती भी अपनी जगह है. नौकरशाही में सुधार के प्रयास फिलहाल दिल्ली तक ही सीमित हैं जहां सरकार महज नीतियां ही निर्धारित कर सकती है. अर्थव्यवस्था में तेजी लाने की असली लड़ाई तो राज्यों पर निर्भर करती है. एक सचिव का कहना है, “एक कारखाना खोलने की अनुमति प्राप्त करने के लिए किसी कारोबारी को बृहनमुंबई महानगरपालिका के 40 विभागों में भटकना पड़ता है. यहां दिल्ली में बैठकर मैं उसकी मदद कैसे कर सकता हूं?” अधिकारी यह भी ताकीद करते हैं कि नौकरशाहों से सीधा संपर्क रखने वाले पीएमओ के मॉडल को बनाए रखना विशेष रूप से इसलिए मुश्किल होगा क्योंकि इसका मतलब मंत्रियों को हाशिए पर धकेलना हो जाएगा. एक अधिकारी बताते हैं, “बड़ा खतरा यह है कि मंत्री हाथ खड़े कर देंगे या अपने विभागों में दिलचस्पी खो बैठेंगे. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा.” उदाहरण के लिए कृषि मंत्री राधामोहन सिंह अब संयुक्त सचिवों से संपर्क रखना पसंद करते हैं और उनका इरादा प्रधानमंत्री से कहकर अपने सचिव आशीष बहुगुणा को बदलवाने का है.
प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता के इस केंद्रीयकरण की एक कमी यह है कि कुछ फैसले लेने में देरी हो जाती है. कुछ नियुक्तियां अटकी पड़ी हैं. बुनियादी ढांचे से संबंधित तीन प्रमुख मंत्रालयों-दूरसंचार, शहरी विकास और उर्वरक, में सचिवों के पद पिछले महीने रिक्त हुए हैं और उनकी जगह पर किसी नए अधिकारी की तैनाती नहीं हो रही है.
विपक्ष ने इस मुद्दे को लपकने में देरी नहीं की. पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा तिरुवनंतपुरम के मौजूदा सांसद शशि थरूर ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा, “यदि हमें एक ऐसी सरकार मिलने वाली है जिसमें नीतियां वस्तुतः नौकरशाहों के साथ प्रधानमंत्री बनाएंगे तो मंत्रिमंडल की जवाबदेही के सिद्धांत और शासन की संसदीय प्रणाली पर ही सवालिया निशान लग जाएगा.”
पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी फिलिप मैसन ने 1953 में प्रकाशित अपने संस्मरण ‘द मेन हू रूल्ड इंडिया’ में सरकार के कारोबार को “एक के बाद दूसरे अभिशप्त गड्ढे से बाहर निकलना” बताया था. भारतीय नौकरशाही को अभी एक गड्ढे से बाहर निकाला गया है. अब उसे ध्यान रखना होगा कि वह दूसरे गड्ढे में न गिर पड़े. मोदी का परिवर्तन का वादा अब नौकरशाही की कड़ी मेहनत की क्षमता पर निर्भर करता है.

—साथ में जयंत श्रीराम

