भारत के साईं भक्तों पर द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 23 जून को एक बयान देकर जैसे बिजली ही गिरा दी. “यह कहा जाता है कि साईं बाबा हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है. यह तब होता जब उसे हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान भी मानते. लेकिन मुसलमान तो उसे मानते नहीं हैं, तो हम ही क्यों मानें?”
शंकराचार्य के हरिद्वार से ‘अचानक’ जारी हुए इस बयान ने देश में खलबली मचा दी. जगह-जगह शंकराचार्य के पुतले जले, शिरडी में साईं भक्तों ने उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला दर्ज करवा दिया. यह पहली बार नहीं था जब शंकराचार्य की किसी बात ने विवाद का रूप लिया हो. लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने बीजेपी के नारे “हर-हर मोदी” पर भी कड़ी आपत्ति जताई थी. इसके बाद बीजेपी को सफाई पेश करनी पड़ी थी और नरेंद्र मोदी को अपने समर्थकों से इस नारे का इस्तेमाल नहीं करने की गुहार लगानी पड़ी थी.
समाचार चैनलों को जारी एक वीडियो में 90 वर्षीय शंकराचार्य ने कहा, “शिरडी के साईं बाबा की आमदनी तिरुपति बालाजी की आमदनी से थोड़ी ही कम है.” वे किस ओर इशारा करना चाह रहे थे, यह समझना मुश्किल नहीं है. देशभर में हो रहे तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद शंकराचार्य अपनी बात पर डटे रहे. यही नहीं, उन्होंने आगे भी जोड़ा, “लोगों को पता नहीं है कि जिसकी वे पूजा कर रहे हैं वह गंगा को नहीं मानता था, केवल अल्लाह को मानता था और मांसाहारी था.” इसके जवाब में साईं भक्तों में साईं प्रतिमाओं को गंगा स्नान करवाने की जैसे होड़-सी मच गई.
और जैसे यही काफी न था. केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती भी इस विवाद में कूद पड़ीं. शंकराचार्य के समर्थन में नागा साधु भी उतर आए. नागा साधुओं के अखाड़ों के प्रमुखों ने साईं बाबा की पूजा में शंकराचार्य के मत को समर्थन देने और सनातन धर्म की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध में उतरने को कहा. अखाड़ा प्रमुखों ने उग्र नागा साधुओं को “धर्म की खोई हुई क्रांति वापस लाने” का दायित्व सौंपा है.
शंकराचार्य का मानना है कि साईं बाबा ईश्वर के अवतार नहीं हैं. इसी धारणा को पूरे हिंदू जगत में फैलाने के लिए अखाड़ा प्रमुखों ने नागा साधुओं को इलाहाबाद और हरिद्वार में डेरा डालने को कहा है. यहां वे एकजुट होकर रणनीति बनाएंगे कि साईं बाबा को भगवान मानने की धारणा किस तरह से तोड़ी जाए. कुंभ के शाही स्नान को छोड़कर नागा साधु आम तौर पर कहीं नजर नहीं आते हैं. माना जाता है कि इस दौरान वे तपस्या में लीन रहते हैं. लेकिन अब उन्हें अपनी तपस्या छोड़कर धर्म की रक्षा के लिए ‘युद्ध’ में शामिल होने को तैयार रहने का आदेश मिला है. देश में लगभग दो लाख नागा साधु हैं. उग्र स्वभाव के माने जाने वाले ये साधु सड़कों पर उतर आए तो कानून और व्यवस्था की हालत गंभीर हो सकती है.
इधर, साईं के समर्थन में बयान देकर उमा भारती ने अपने आप को इस सारे विवाद में उलझा लिया. उन्होंने हरिद्वार में कहा, “साईं बाबा ने कभी नहीं कहा कि मैं भगवान हूं. साईं बाबा के भक्तों ने भी कभी यह नहीं कहा कि उन्हें अवतार घोषित करो. कितने लोगों ने साईं के दरबार पर मत्था टेका है और उनके संकट निवारण हुए हैं.” उनके इस बयान से शंकराचार्य और उनके समर्थक भड़क उठे. शंकराचार्य ने पलटवार करते हुए कहा कि वे अब तक मानते थे कि उमा भारती भगवान राम की भक्त हैं लेकिन असल में वे मुसलमानों की अनुगामी हैं और इसीलिए वे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण नहीं करवा पाईं. स्वामी स्वरूपानंद कांग्रेसी रुझान वाले संत माने जाते हैं. वे बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राम मंदिर आंदोलन के मुखर आलोचक रहे हैं.
शंकराचार्य के बयान के विरोध में कई संगठन खुलकर सामने आ गए हैं. आरएसएस ने साईं बाबा की आलोचना को अनावश्यक बताया है. आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने कहा, “संतों और साधुओं को देवी-देवताओं के विषय में दूसरों की आस्था में दखल नहीं देना चाहिए.” अखाड़ा परिषद के पूर्व प्रधान महंत ज्ञान दास कहते हैं, “यह कोई मुद्दा ही नहीं. स्वरूपानंद पता नहीं किस वजह से अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं.”
तलवारें खिंच चुकी हैं. न तो शंकराचार्य और न ही साईं भक्त पीछे हटने के मूड में हैं. नागा साधुओं को इस लड़ाई में उतारने के बारे में अग्नि अखाड़ा के सचिव गोविंदानंद ब्रह्मचारी कहते हैं, “धार्मिक आपात स्थिति पैदा हो गई है. नागा साधुओं को वह दायित्व निभाना होगा जो उन्हें आदि शंकराचार्य ने सौंपा था. आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में नागा साधुओं को धर्म के संरक्षक की दीक्षा दी थी. हमने उन्हें प्रयाग और हरिद्वार में एकत्र होने को कहा है.” निरंजनी अखाड़े के सचिव आचार्य नरेंद्र गिरि कहते हैं, “हमारे कुछ सदस्यों ने मंदिरों से साईं बाबा की प्रतिमा हटानी शुरू कर दी है. साईं भक्तों ने शंकराचार्य का अपमान किया है. शस्त्र सज्जित साधु जल्द कार्रवाई करेंगे.”
विवाद का हल चाहे जो निकले पर हर मंदिर में जगह पा रहे साईं अपने पुजारियों को तो जरूर मालामाल कर रहे हैं.
—साथ में मानसी शर्मा माहेश्वरी
शंकराचार्य के हरिद्वार से ‘अचानक’ जारी हुए इस बयान ने देश में खलबली मचा दी. जगह-जगह शंकराचार्य के पुतले जले, शिरडी में साईं भक्तों ने उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला दर्ज करवा दिया. यह पहली बार नहीं था जब शंकराचार्य की किसी बात ने विवाद का रूप लिया हो. लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने बीजेपी के नारे “हर-हर मोदी” पर भी कड़ी आपत्ति जताई थी. इसके बाद बीजेपी को सफाई पेश करनी पड़ी थी और नरेंद्र मोदी को अपने समर्थकों से इस नारे का इस्तेमाल नहीं करने की गुहार लगानी पड़ी थी.
समाचार चैनलों को जारी एक वीडियो में 90 वर्षीय शंकराचार्य ने कहा, “शिरडी के साईं बाबा की आमदनी तिरुपति बालाजी की आमदनी से थोड़ी ही कम है.” वे किस ओर इशारा करना चाह रहे थे, यह समझना मुश्किल नहीं है. देशभर में हो रहे तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद शंकराचार्य अपनी बात पर डटे रहे. यही नहीं, उन्होंने आगे भी जोड़ा, “लोगों को पता नहीं है कि जिसकी वे पूजा कर रहे हैं वह गंगा को नहीं मानता था, केवल अल्लाह को मानता था और मांसाहारी था.” इसके जवाब में साईं भक्तों में साईं प्रतिमाओं को गंगा स्नान करवाने की जैसे होड़-सी मच गई.
और जैसे यही काफी न था. केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती भी इस विवाद में कूद पड़ीं. शंकराचार्य के समर्थन में नागा साधु भी उतर आए. नागा साधुओं के अखाड़ों के प्रमुखों ने साईं बाबा की पूजा में शंकराचार्य के मत को समर्थन देने और सनातन धर्म की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध में उतरने को कहा. अखाड़ा प्रमुखों ने उग्र नागा साधुओं को “धर्म की खोई हुई क्रांति वापस लाने” का दायित्व सौंपा है.
शंकराचार्य का मानना है कि साईं बाबा ईश्वर के अवतार नहीं हैं. इसी धारणा को पूरे हिंदू जगत में फैलाने के लिए अखाड़ा प्रमुखों ने नागा साधुओं को इलाहाबाद और हरिद्वार में डेरा डालने को कहा है. यहां वे एकजुट होकर रणनीति बनाएंगे कि साईं बाबा को भगवान मानने की धारणा किस तरह से तोड़ी जाए. कुंभ के शाही स्नान को छोड़कर नागा साधु आम तौर पर कहीं नजर नहीं आते हैं. माना जाता है कि इस दौरान वे तपस्या में लीन रहते हैं. लेकिन अब उन्हें अपनी तपस्या छोड़कर धर्म की रक्षा के लिए ‘युद्ध’ में शामिल होने को तैयार रहने का आदेश मिला है. देश में लगभग दो लाख नागा साधु हैं. उग्र स्वभाव के माने जाने वाले ये साधु सड़कों पर उतर आए तो कानून और व्यवस्था की हालत गंभीर हो सकती है.
इधर, साईं के समर्थन में बयान देकर उमा भारती ने अपने आप को इस सारे विवाद में उलझा लिया. उन्होंने हरिद्वार में कहा, “साईं बाबा ने कभी नहीं कहा कि मैं भगवान हूं. साईं बाबा के भक्तों ने भी कभी यह नहीं कहा कि उन्हें अवतार घोषित करो. कितने लोगों ने साईं के दरबार पर मत्था टेका है और उनके संकट निवारण हुए हैं.” उनके इस बयान से शंकराचार्य और उनके समर्थक भड़क उठे. शंकराचार्य ने पलटवार करते हुए कहा कि वे अब तक मानते थे कि उमा भारती भगवान राम की भक्त हैं लेकिन असल में वे मुसलमानों की अनुगामी हैं और इसीलिए वे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण नहीं करवा पाईं. स्वामी स्वरूपानंद कांग्रेसी रुझान वाले संत माने जाते हैं. वे बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राम मंदिर आंदोलन के मुखर आलोचक रहे हैं.
शंकराचार्य के बयान के विरोध में कई संगठन खुलकर सामने आ गए हैं. आरएसएस ने साईं बाबा की आलोचना को अनावश्यक बताया है. आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने कहा, “संतों और साधुओं को देवी-देवताओं के विषय में दूसरों की आस्था में दखल नहीं देना चाहिए.” अखाड़ा परिषद के पूर्व प्रधान महंत ज्ञान दास कहते हैं, “यह कोई मुद्दा ही नहीं. स्वरूपानंद पता नहीं किस वजह से अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं.”
तलवारें खिंच चुकी हैं. न तो शंकराचार्य और न ही साईं भक्त पीछे हटने के मूड में हैं. नागा साधुओं को इस लड़ाई में उतारने के बारे में अग्नि अखाड़ा के सचिव गोविंदानंद ब्रह्मचारी कहते हैं, “धार्मिक आपात स्थिति पैदा हो गई है. नागा साधुओं को वह दायित्व निभाना होगा जो उन्हें आदि शंकराचार्य ने सौंपा था. आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में नागा साधुओं को धर्म के संरक्षक की दीक्षा दी थी. हमने उन्हें प्रयाग और हरिद्वार में एकत्र होने को कहा है.” निरंजनी अखाड़े के सचिव आचार्य नरेंद्र गिरि कहते हैं, “हमारे कुछ सदस्यों ने मंदिरों से साईं बाबा की प्रतिमा हटानी शुरू कर दी है. साईं भक्तों ने शंकराचार्य का अपमान किया है. शस्त्र सज्जित साधु जल्द कार्रवाई करेंगे.”
विवाद का हल चाहे जो निकले पर हर मंदिर में जगह पा रहे साईं अपने पुजारियों को तो जरूर मालामाल कर रहे हैं.
—साथ में मानसी शर्मा माहेश्वरी

