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क्या नरेंद्र मोदी नौकरशाहों को सरकार के एजेंडे पर काम करने की ताकत देंगे?

कमजोर सरकार नौकरशाहों को दुलारती है, लेकिन उन्हें कमजोर करती है. मजबूत सरकार उसे सरकार के एजेंडे पर काम करने की ताकत देती है. क्या मोदी ऐसा कर पाएंगे?

अपडेटेड 14 जुलाई , 2014
यह  स्तंभ मैं 18 साल से लिख रहा हूं और  इस दौरान इससे नाराज होने वाले महानुभावों से मुझे अकसर यह सलाह मिलती रही कि मैं अपने दिमाग की जांच कराऊं. लेकिन मैं जरा भी नहीं डिगा, कम-से-कम अभी तक तो नहीं. अब जब मैं अपना यही स्तंभ पहली दफा उस पत्रिका में लिख रहा हूं, जिसके संपादन का दायित्व मैंने अभी हाल ही में संभाला है तो इसकी इस हफ्ते की एक खास रपट की केंद्रीय विषयवस्तु से कुछ छेड़छाड़ करने जा रहा हूं.

लेकिन सूचना के आधिक्य के इस दौर में जब हर शख्स हर चीज आपसे बेहतर जानता है, उस पर अपनी निश्चित राय भी रखता है, और स्वघोषित ‘न्यूजब्रेक’ में आपको चौंकाने का माद्दा नहीं रह गया है तो एक खास रपट से आप यह तो उम्मीद कर ही सकते हैं कि उसमें आपको उकसाने का माद्दा हो. लिहाजा, इस हफ्ते की खास रपट मुझे कुछ सवाल पूछने के लिए उकसाती है.

अगर नरेंद्र मोदी अपने नौकरशाहों को ऐसे अधिकारों से नवाज रहे हैं, जो करीब-करीब अप्रत्याशित है तो वे उन्हें ताकत दे रहे हैं या कमजोर कर रहे हैं?  वे बाबू राज का आगाज कर रहे हैं या उसे खत्म करने की ओर बढ़ रहे हैं?  राजनैतिक कार्यपालिका की ताकत और अधिकारों को सीमित कर रहे हैं या उसे बहाल कर रहे हैं?  वे ‘परंपरा’ तोडऩे जा रहे हैं या ‘व्यवस्था’ बनाने का इरादा रखते हैं या फिर परंपरा की तरफ ही लौटने की राह बना रहे हैं?

अगर मैं यह कहूं कि दरअसल नरेंद्र मोदी जो कदम उठा रहे हैं, वह पिछले 10 साल के बाबू राज के निर्णायक अंत की ओर बढ़ा हुआ कदम है तो इस पर आप क्या कहेंगे?

इससे पहले कि आप मुझे चिर-परिचित सलाह दें यानी कहें कि शेखर गुप्ता जी, अपने दिमाग की जांच करवाइए, जरा इन तथ्यों की जांच-पड़ताल कर लीजिए. हालांकि इन दिनों ऐसा कोई करता नहीं. आप जैसा सोचते हैं, उसके विपरीत, यूपीए का एक दशक का शासन असल में भारतीय बाबूशाही के लिए सबसे सुहाना दौर था

 इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि बाबूशाही सर्वशक्तिमान हो गई थी और मंत्रीगण कमजोर हो गए थे. एक मायने में इस दौर में दोनों ही कमजोर हुए, उनका आत्मविश्वास घटा, रुआब घटा और वे दयनीय हालत में आ गए.

अलबत्ता इस दशक में नौकरशाहों का जीवन बेहद आरामदायक रहा. कार्य अवधि भी कम-से-कम पांच साल तो बढ़ ही गई. भारत के इतिहास में इससे पहले यह कभी नहीं हुआ कि किसी एक दशक में इतने कम टेक्नोक्रैट, विशेषज्ञ और बाद मंत प्रवेश पाए अफसर वगैरह नौकरशाही में आए. डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त सचिव और बाद में बतौर टेक्नोक्रैट आरबीआइ का गवर्नर नियुक्त किया गया.

उनके सबसे करीबी सलाहकार और सुधारों के पैरोकार मोंटेक सिंह अहलूवालिया को बाद में प्रवेश दिलाकर वित्त सचिव बनाया गया. यह बात उल्लेखनीय है कि 2004 से 2014 के बीच आर्थिक अफसरशाही में एक भी गैर-आइएएस अधिकारी इस सुहानी व्यवस्था में व्यवधान, बौद्धिक विविधता या चुनौती देने के लिए नहीं लाया गया.

डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सत्ता के आखिरी वर्ष में ही किसी ‘बाहरी’ व्यक्ति को महत्वपूर्ण आर्थिक पद के लिए चुना. रघुराम राजन को आरबीआइ का गवर्नर बनाया गया. वह भी तब, जब यह स्पष्ट हो गया कि उनसे हल्के कद का कोई शख्स वैश्विक चिंताओं को विराम नहीं दे पाएगा और देश की तेजी से गिरती रेटिंग को नहीं सुधार पाएगा.

अटल बिहारी वाजपेयी कम-से-कम उद्योग जगत के आर.वी. शाही को बिजली सचिव के रूप में लेकर आए थे और उनकी क्रांतिकारी सोच ने बिजली के क्षेत्र में व्यापक सुधारों की शुरुआत की थी. यूपीए के राज में नौकरशाही ऐसी किसी चुनौती से मुखातिब नहीं हुई, बल्कि इस दौरान नए नियामकों की स्थापना से नौकरशाही का अप्रत्याशित विस्तार हुआ. कुछ नए नियामक कई सदस्यों वाले हैं.

इससे हुआ यह कि कोई नहीं जानता था कि कौन किसे रेगुलेट कर रहा है क्योंकि सारी व्यवस्था उलझे तारों में बंधी हुई थी. लगता था कि नियामक के लिए दो ही योग्यताएं जरूरी हैं— करियर नौकरशाह हो और सेवा से रिटायर हो चुका हो. मोदी के दौर में जिस युवा, काम के प्रति जुनूनी और तेज-तर्रार अधिकारियों की चर्चाएं सुनी जाएंगी, वैसे ही एक अधिकारी (चलिए हमेशा की तरह नाम न छापने की शर्त का लाभ उन्हें दे देते हैं) ने हाल में मुझसे पूछाः आपने गौर किया कि किस तरह सरकार ने नियामक की नियुक्ति की न्यूनतम आयु 60 वर्ष तय कर दी है? अपने क्षेत्र के 40 वर्षीय विशेषज्ञ आखिर नियामक क्यों नहीं हो सकते?

लेकिन मैं आखिर नियामकों को लेकर इतना गंभीर क्यों हूं? वजह यह है कि यही मिसाल यह बताने के लिए सबसे सटीक है कि पिछले दशक में नौकरशाही को इतना दुलार मिला, जितना अब से पहले कभी नहीं मिला था. 60 वर्ष के बाद सेवा विस्तार और नई दिल्ली में मौजूद भवनों का विस्तार. दक्षिण दिल्ली में कुछ सबसे पुराने व्यावसायिक इलाकों में बैठने वाले अधिकारियों के लिए वरिष्ठता ही एकमात्र योग्यता रह गई थी. मानो चुनाव आयोग की आचार संहिता के तहत देश में कामचलाऊ सरकार हो, जिसमें योग्यता को तवज्जो ही नहीं दी जाती.

इन लोगों ने खुद को ही एक नायाब तोहफा दे डाला. दिल्ली में एक नया एनक्लेव बना लिया गया, जिसे नाम दिया गयाकृन्यू मोती बाग (ईमानदारी के आवेग वाले क्षणों में मैं इसे न्यू क्रेमलिन नाम देना चाहूंगा). यहां 21वीं सदी में लुटियंस शैली के लगभग 100 बंगले ‘सेल’ फाइनेंसिंग के आधार पर बनाए गए. इस किस्से पर फिर कभी चर्चा होगी.

उन बंगलों में रहने वालों की पड़ताल करें तो अधिकतर रिटायर्ड अधिकारी हैं, जो अब आरामदेह पदों पर बैठे हुए हैं. मोटा वेतन पा रहे हैं और दायित्व कुछ भी नहीं. तो राज्यों ने भी यहां से प्रेरणा ली और अपने यहां भी ऐसी ही आरामगाहों का निर्माण कर लिया. अधिकारियों को सूचना आयोग, बिजली दर नियामक, टैक्स ट्राइब्यूनल वगैरह में बिठा दिया.

यूपीए सरकार ने काफी बड़ी संख्या में नेताओं की बजाए पूर्व नौकरशाहों को राज्यपाल नियुक्त किया. उसने कभी किसी राजनीतिज्ञ को महत्वपूर्ण दूतावास में नहीं भेजा. डॉ. सिंह ने अपने सर्वाधिक विश्वसनीय नौकरशाहों को अधिकार दिए, ताकि वे उनके एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ा सकें.

उदाहरण के लिए राहुल खुल्लर (कभी वित्त मंत्रालय में उनके निजी सचिव रहे) को कॉमर्स सचिव बनाया गया और बाद में ट्राई प्रमुख, श्याम सरन और सतिंदर लांबा को परमाणु करार करने और कश्मीर पर संभावित समझौते के लिए भेजा गया. दोनों ने अपने मंत्रियों को बेमानी बना दिया.

जब यूपीए के एक दशक के शासनकाल में नौकरशाही को इतना दुलार दिया गया तो क्या वह अधिक ताकतवर बन गई थी? यदि आप ऐसा सोचते हैं तो मुझे सिर्फ पांच नौकरशाहों के नाम गिना दीजिए, जिन्होंने अपनी छाप छोड़ी. मैं तीन नामों पर अटक जाता हूं—विदेश सेवा से श्याम सरन और शिवशंकर मेनन और आइपीएस से एम.के. नारायणन. अब मैं व्यक्तिगत रूप में इनके बारे में बताऊंगा.

हमारे सबसे तेज-तर्रार विदेश सचिवों में से एक, सरन ने 2007-08  की अल्प अवधि में वह समय भी देखा, जब डॉ. सिंह ने नई विदेश नीति का आधार रखा. खासकर के. नटवर सिंह के जाने के बाद. बाद में वे जलवायु परिवर्तन संधि वार्ताकार के रूप में अपनी भूमिका से मुकर गए क्योंकि मनमोहन सिंह राजनैतिक अहमियत गंवा बैठे थे. मेनन में तो इतनी प्रतिभा थी कि एक प्रभावशाली प्रधानमंत्री के अधीन वे बहुत कुछ हासिल कर सकते थे. नारायणन को ताकत अपने अतीत से मिलती थी.

जहां तक हमें याद पड़ता है, टी.के.ए. नायर और पुलक चटर्जी पीएमओ में सबसे कमजोर मुख्य सचिव रहे हैं. असल में यूपीए का कार्यकाल इसीलिए याद किया जाएगा कि नौकरशाह खुद को कितना कमजोर महसूस करते थे, कितने वरिष्ठ अधिकारी जेल गए या सीबीआइ द्वारा परेशान किए गए और कितने उसके खिलाफ हो गए.

इनमें सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों की नियुक्ति भी शामिल है—गृह सचिव आर.के. सिंह, इंटेलीजेंस ब्यूरो प्रमुख अजीत डोभाल, रॉ प्रमुख संजीव त्रिपाठी, सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह, पेट्रोलियम सचिव आर.एस. पांडेय. आप तब तक गिनती जारी रखें, जब तक सीबीआइ प्रमुख रंजीत सिन्हा और सीएजी विनोद राय तक नहीं पहुंच जाते.

यहां विरोधाभास है और मेरी अवधारणा है कि कमजोर नेतृत्व नौकरशाहों को सुख-सुविधाएं तो भरपूर देता है, लेकिन उसे कमजोर भी करता है. हमारे इतिहास में सबसे ताकतवर नौकरशाह बी.एन. मल्लिक, आर.एन. काव, टी.वी. राजेश्वर और 1950, ‘60 और ‘70 के दशक में सदाबहार सचिव- एस.एस. खेड़ा, पी.एन. हक्सर, एल.पी. सिंह, टी.एन. कौल और बी.के. नेहरू रहे हैं. और आगे बढ़ूं तो एन.एल. वोहरा, ए.एन. वर्मा, बृजेश मिश्रा, एन.के. सिंह और सबसे प्रभावशाली (मेरे ख्याल से एक दशक तक भारत की परमाणु ताकत के सबसे बड़े संरक्षक) नरेश चंद्रा.

इन सबमें एक चीज साझी थी—इन्होंने ताकतवर प्रधानमंत्रियों के अधीन काम कियाः जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, पी.वी. नरसिंह राव, वाजपेयी. यह इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है कि ताकवतर नेता नौकरशाही को ताकतवर बनाते हैं और उन्हें अपनी सत्ता के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. मोदी यही करने जा रहे हैं.

मोदी राजनैतिक वर्ग और उसके वफादार नौकरशाह, दोनों को मजबूत बनाने जा रहे हैं या उर्दू के एक शब्द का प्रयोग करते हुए कहें तो उनका इकबाल बुलंद करने जा रहे हैं. इसके लिए यही सही समय भी है. पांच सालों तक आप इसके साथ क्या करेंगे, यह नितांत अलग चुनौती होगी.

इस बीच रू एम.के. नारायणन ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया. सामान्यतः मैं इसका उल्लेख न करता, लेकिन घटनाक्रम के चश्मदीद गवाह रहे संजय बारू ने अपनी पुस्तक द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में इसका उल्लेख किया है. नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में एक पार्टी में नारायणन मेरे पास आए और मेरी आंखों के सामने अपनी उंगलियां लाकर बोले कि मेरा अखबार (तब इंडियन एक्सप्रेस) राष्ट्रपति पद के लिए यूपीए उम्मीदवार प्रतिभा पाटील के पीछे क्यों पड़ा है.

हमारे लेख सही हैं, तब भी क्या छपना जरूरी है. हम कैसे फैसला करते हैं कि क्या छापें? मेरा जवाब था, जो छपने लायक होता है, छापते हैं. उनका कहना था, शायद आप सोचते हैं कि आपका अखबार न्यूयार्क टाइम्स है और यह अमेरिका है. अब यदि मैं किसी महत्वपूर्ण शख्सियत के दागदार पहलू को छापना चाहता हूं तो वे मुझे किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति के दागदार पहलू बता सकते हैं. मेरा जवाब था, यदि ऐसा जनहित में है तो मैं जरूर छापूंगा. हम में से एक भी हार मानने को तैयार नहीं था.

लेकिन समय के साथ हमारे बीच समझौता हो गया और मैं उन्हें समझने, पसंद करने लगा—उनकी प्रतिभा, ऊर्जा, देशभक्ति और यहां तक कि हास्य बोध को भी. 2008 में कश्मीर घाटी में फिर उबाल आया. नेता और अधिकारी अपना धैर्य खो रहे थे. लेकिन नारायणन मजबूती से वहां खड़े रहे. मैं तो यहां तक कहूंगा कि उन्होंने भारत के लिए कश्मीर को बचा लिया. हाल में घटा एक मजाकिया वाकया भी याद आ रहा है.

हाल ही में हैदराबाद में एक शादी में उनसे मुलाकात हुई. जब हम लोग डिनर के लिए जाने लगे तो हमसे पीछे के रास्ते से वैंक्वेट हॉल में प्रवेश करने के लिए कहा गया, जहां एक कोने में वीआइपी के लिए आरक्षित जगह थी.  जासूसों के शहंशाह मुस्कुराकर बोले, “मैं तो भूल ही गया हूं कि पिछली बार कहीं सामने के दरवाजे से कब प्रवेश किया था.”

यदि उन्होंने कभी अपना संस्मरण लिखा तो हमें पता चलेगा कि वास्तव में बेस्ट सेलर क्या होता है. लेकिन जहां तक मैं उन्हें जानता हूं, वे ऐसा नहीं करेंगे. उनके राज उनके साथ ही रहेंगे.

आप जैसा सोचते हैं, उसके विपरीत यूपीए के 10 साल  असल में भारतीय बाबूशाही के लिए सबसे सुहाना दौर था. इसका यह अर्थ नहीं है कि बाबूशाही सर्वशक्तिमान हो गई थी और मंत्रीगण कमजोर. एक मायने में उस दौर में दोनों ही कमजोर, लाचार और दयनीय हो गए.

हमारे इतिहास में सबसे ताकतवर नौकरशाह बी.एन. मल्लिक, आर.एन. काव, टी.वी. राजेश्वर और 1950, ‘60 और ‘70 के दशक में सदाबहार सचिव- एस.एस. खेड़ा, पी.एन. हक्सर, एल.पी. सिंह, टी.एन. कौल और बी.के. नेहरू रहे हैं. इन सबमें एक चीज साझी थी. सबने ताकतवर प्रधानमंत्रियों के अधीन काम किया.
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