हमें नहीं मालूम. मैं नहीं जानती कि ऐसा क्यों होता है.” 33 साल की अनुप्रिया पटेल ने तपाक से जवाब दिया. दरअसल सवाल यह था कि आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महंगाई रोकने के लिए क्या सुझाव देंगी? वे उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर से पहली बार सांसद बनी हैं. अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी हैं, लेकिन उन्हें अपने राजनेता होने का कोई गुमान नहीं है.
दिल्ली के अशोक होटल के कमरा नंबर 1401 में ठहरीं अनुप्रिया चारों तरफ समर्थकों से घिरी हुई थीं फिर भी उन्होंने माना कि हर वक्त लोगों से घिरे रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता. वे कहती हैं, ''अगर कल मैं मंत्री बन गई तो यह भीड़ और बढ़ जाएगी. मेरे कई नए रिश्तेदार पैदा हो जाएंगे.” अनुप्रिया समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता मुलायम सिंह यादव की इस काबिलियत की तारीफ करती हैं कि उन्हें अपने हर कार्यकर्ता का नाम और चेहरा याद रहता है. यह दीगर बात है किउनके बेटे अखिलेश यादव की सरकार के साथ हमेशा टकराव चलता रहता है.
अपना दल वैसे तो बीजेपी का सहयोगी है, लेकिन जब उनसे आरएसएस से जुड़े बजरंग दल और श्रीराम सेना के बारे में पूछा गया तो वे बोल पड़ीं, ''ये पगलेट हैं.” उन्होंने यह भी दावा किया कि वे अरेंज मैरिज के खिलाफ हैं और लिव इन रिलेशनशिप का समर्थन करती हैं.
यह बात और है कि उन्होंने खुद परंपरा को निभाया है. इस सबके बावजूद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से मनोविज्ञान की इस स्नातक ने सांसद के रूप में अपनी भूमिका तय कर रखी है, ''मेरी दो प्राथमिकताएं हैं—एक विश्वविद्यालय और दूसरा सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल खुलवाना.उसके बाद मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में आदिवासियों के लिए मकान, पीने का पानी और साफ-सफाई की सुविधा दिलाना चाहती हूं.”
2014 में पहली बार लोकसभा में प्रवेश करने वाले 315 सांसदों में से एक, अनुप्रिया राजनेताओं की उस नई नस्ल की प्रतिनिधि हैं जो महत्वाकांक्षी, लक्ष्यकेंद्रित और खुलकर अपनी बात कहने वाली है. चुनाव में कामयाबी के लिए पैसा, राजनैतिक संरक्षण और बाहुबल के इस्तेमाल को स्वीकार करने वाली सुष्मिता देव से लेकर मोदी की मुस्लिम विरोधी छवि को बकवास बताने वाले एनसीपी के मोहम्मद फैजल से होकर राजनेताओं के सफेद कुर्ते-पाजामे को दिखावा बताने वाले बाबुल सुप्रियो तक 16वीं लोकसभा के नए रंगरूट उस युवा और बेचैन भारत के प्रतिनिधि हैं जो दिखावे में नहीं, कुछ करके दिखाने में यकीन करते हैं.
लक्षद्वीप से कांग्रेस के पुराने नेता पी.एम. सईद के बेटे हमदुल्ला सईद को हराने वाले 38 वर्ष के फैजल का कहना है, ''आज लोग फौरन परिणाम चाहते हैं.” फैजल लक्षद्वीप के 11 द्वीपों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन प्रोत्साहन मॉडल पर काम कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लक्षद्वीप बुलाकर वहां की क्षमताएं दिखाना चाहते हैं.
निजामनगर की सांसद 36 वर्षीया कल्वकुंतला कविता तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव की बेटी हैं. वे नवगठित राज्य की प्रतिनिधि हैं और उन पर बड़ी भारी जिम्मेदारी है. प्रचार के दौरान उन्होंने पार्टी के घोषणा पत्र के अलावा अपना अलग घोषणा पत्र भी जारी किया था. हैदराबाद में जवाहरलाल नेहरू टेक्नो-लॉजिकल यूनिवर्सिटी से बी.टेक कविता ने कहा, ''मुझे अपना हर वादा पूरा करना है.”
असम कांग्रेस के जाने-माने नेता संतोष मोहन देव की 41 वर्षीय बेटी सुष्मिता राजनीति को साध्य नहीं, साधन मानती हैं. दिल्ली में मिरांडा हाउस की स्नातक सुष्मिता पेशे से वकील थीं और बाद में राजनेता बनीं. उनका कहना है, ''जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं अपने काम में फेल हो गई, राजनीति छोड़ दूंगी.”
40 वर्ष से कम आयु के 60 नए सांसदों में से करीब आधे राजनैतिक परिवारों से आए हैं, लेकिन वे इसे अपनी कामयाबी का मूल कारण मानने को तैयार नहीं हैं. लोकसभा के सबसे कम उम्र के सदस्य 26 वर्षीय दुष्यंत चौटाला का कहना था, ''राजनैतिक संरक्षण टिकट दिलाने में तो शायद मदद कर सकता है, लेकिन वोट कमाने के लिए जमीन पर काम करना पड़ता है. मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में सभी 436 गांवों में गया जबकि दूसरे तो 200 तक भी नहीं पहुंच पाए.”

परिवार कभी नहीं मिटते
हिसार से भारतीय लोकदल के सांसद दुष्यंत हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पौत्र हैं. पिछले साल भ्रष्टाचार के आरोप में अपने पिता अजय सिंह चौटाला और दादा को जेल हो जाने के बाद दुष्यंत ने इस जीत से एक तरह से परिवार को नया जीवन दिया है. दुष्यंत ने सिरसा से जीते अपनी पार्टी के ही एक और सांसद चरणजीत सिंह की मिसाल देते हुए कहा कि वे किसी खानदान के वारिस नहीं हैं फिर भी बड़ी जीत हासिल करके आए हैं, ''इनकी कोई राजनैतिक विरासत नहीं है.
21 साल की उम्र में राजनीति में आए और अपनी मेहनत के दम पर 36 में सांसद बन गए.” तेलंगाना के गठन के लिए लंबे आंदोलन का हिस्सा रहे उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र सुमन बलका पेडापल्ली से टीआरएस के सांसद हैं. वे इस बात का समर्थन करते हैं, ''अगर आप किसी मकसद के लिए काम करेंगे तो मौका अपने आप मिलेगा.” संसद के सुरक्षा गार्ड ने जब उनसे पूछा कि क्या वे आंध्र प्रदेश से आए हैं तो बलका तुरंत बोल पड़े, 'तेलंगाना से’.
एक और खानदान के वारिस 32 वर्षीय चिराग पासवान लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के अध्यक्ष रामविलास पासवान के पुत्र हैं. उनका मानना है कि कभी-कभी राजनैतिक विरासत बोझ बन सकती है. उन्होंने कहा, ''ऐसे कई उदाहरण हैं कि पैसा और संरक्षण होने के बावजूद लोग एकदम पिछड़ गए.” बी.टेक की पढ़ाई बीच में छोड़ चुके चिराग ने मुंबई फिल्म जगत में अभिनेता के तौर पर किस्मत आजमाई पर कामयाबी नहीं मिली.
मुंबई में बिहार से आए लोगों को 'अपमानित होते’ देखने के बाद उन्होंने 2011 में राजनीति में आने का फैसला किया. बीजेपी के साथ एलजेपी का गठजोड़ कराने और लोकसभा में छह सीटें जिताने का श्रेय बहुत हद तक चिराग को जाता है. जमुई में चिराग ने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी को हराया है. महाराष्ट्र में नंदुरबार से जीत कर आईं बीजेपी की 26 वर्षीय सांसद हिना गावित ने चुनाव के बाद एमडी की परीक्षा दी है.
उनका कहना था कि चार बार निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके विजय कुमार गावित की बेटी होने से मदद तो जरूर मिली लेकिन नौ बार से कांग्रेस सांसद माणिक राव गावित को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराने की कामयाबी का श्रेय और उनके इरादे, गरीबों के लिए काम करने की तत्परता और निष्ठा को जाता है. उनका आत्मविश्वास कमाल का है.

राजनीति से अजनबी भी सांसद बने
निशानेबाजी में ओलंपिक रजत पदक विजेता 44 वर्षीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का मानना है कि सेना और खेल जगत में अपनी भूमिका निभाने के बाद राजनीति में कदम रखना उनकी स्वाभाविक प्रगति का हिस्सा है. जयपुर ग्रामीण से बीजेपी के लोकसभा सांसद राठौड़ कहते हैं कि यह जरूरी है कि अच्छे लोग राष्ट्र के फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल हों.
''अगर हमने वह जगह नहीं संभाली, तो दूसरे संभालेंगे.” राठौड़ की तरह उत्तर प्रदेश की रूहेलखंड यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में एम.ए. प्रियंका सिंह रावत भी राजनीति में कदम रख चुकी हैं, क्योंकि वे मानती हैं कि पढ़े-लिखे लोग अधिक जिम्मेदारी और प्रभावी तरीके से समाज की सेवा कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में कांग्रेस के दिग्गज पी.एल. पुनिया को 2 लाख से ज्यादा मतों से हराने वाली 28 वर्षीया बीजेपी सांसद का कहना है, ''मैं हमेशा से देश के लिए कुछ करना चाहती थी और मुझे महसूस हुआ कि राजनीति सबसे अच्छा मंच है.”
पंजाब से आम आदमी पार्टी (आप) के चार विजयी उम्मीदवारों में शामिल पटियाला के 62 साल के डॉ. धर्मपाल वीरा गांधी अपनी कामयाबी का श्रेय लोगों के साथ जुडऩे की अपनी काबिलियत को देते हैं. तीन बार सांसद और यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुकीं प्रणीत कौर के बारे में गांधी कहते हैं, ''पिछले एक दशक से ज्यादा समय से लोगों के साथ जमीनी स्तर पर बने मेरे जुड़ाव के असर का आकलन करने में वे विफल रहीं.”
गांधी इलाज के लिए आए ईंट-भट्टों के कई कामगारों और गरीब खेतिहर मजदूरों की फीस खुशी-खुशी माफ कर देते हैं. ये लोग हैं जो कौर के मोती बाग के आलीशान बंगले से कुछ दूर सुख एन्क्लेव में उनके साधारण से क्लिनिक के सामने हर दिन लंबी कतार में खड़े रहते हैं. वे गांधी हार्ट क्लिनिक में अपना काम जारी रखना चाहते हैं, ''संसद में साल में ज्यादा-से-ज्यादा तीन महीने काम होता है. बाकी का समय मेरे मरीजों और लोगों के लिए होगा.”
पार्टी में शामिल होने वाले ज्यादातर नए लोग मानते हैं कि महज कानून बना देने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा. कइयों का मानना है कि राजनेताओं को भ्रष्ट बनाने में कहीं-न-कहीं व्यवस्था भी दोषी है. सुष्मिता कहती हैं, ''लोग बदलाव का आगाज करें, न कि राजनेता.”
दुष्यंत बताते हैं कि कैसे आज हर गांव खेल टूर्नामेंट आयोजित करने के एवज में राजनेताओं से पैसे की मांग करता है. हालांकि, कविता का मानना है कि भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने में राजनेताओं को बड़ी भूमिका निभानी होगी. ''हम (टीआरएस) नहीं चाहते कि हमारा राज्य उस मुश्किल से गुजरे जिससे एक राष्ट्र के रूप में भारत वर्षों से जूझ रहा है. नेता के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम सभी चीजों पर नजर रखें.”

बदलेगी सियासत की सूरत
समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं कि 'आप’ ने चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन के बावजूद अच्छे लोगों के राजनीति में शामिल होने और सफल होने के लिए एक मॉडल और ढांचा पेश किया है. सुष्मिता भी सहमति जताती हैं, ''आप की कामयाबी प्रेरणादायी थी. मतदाता को ऐसे उम्मीदवार का चुनाव करना चाहिए जो विकास का वादा करे न कि उसे जो मुफ्त शराब बांटे.”
कर्नाटक से बीजेपी के सांसद 47 वर्षीय भगवंत खूबा और 37 वर्षीय प्रताप सिंह का मानना है कि उनकी जीत उसी बदलाव की ओर इशारा करती है जिसका जिक्र सुष्मिता ने किया है. दोनों की जीत में धन या बाहुबल की कोई भूमिका नहीं रही. अब, उन्हें राजनैतिक दलों की संस्कृति में बदलाव की उम्मीद है.
मंगलूर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में एमए करने वाले प्रताप सिंह कहते हैं, ''राजनैतिक दल माफिया की तरह काम करते हैं. ज्यादातर घोर परिवारवादी हैं. नतीजतन, सबसे प्रतिभाशाली उम्मीदवार को भी राजनीति में प्रवेश नहीं मिलता.” इन्हें बदलाव का सुर कहा जा सकता है.
नई ब्रिगेड 15वीं लोकसभा में सांसदों के दिखाए भयानक प्रदर्शन को दोहराना नहीं चाहती. 74 से ज्यादा बिल लंबित रह गए क्योंकि संसद के महत्वपूर्ण विधेयक, विधायी कार्यों के लिए सदन में आवंटित समय का सिर्फ 13 फीसदी ही इस्तेमाल हुआ. उन्हें उम्मीद है कि पेपर स्प्रे से लेकर लडऩे के लिए आमादा सांसदों के उपद्रवों के लिए अब कोई जगह नहीं होगी, जो हाल के समय में संसद की कार्यवाही का आम नजारा बनते रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में आसनसोल से बीजेपी के टिकट पर जीत कर आए 44 वर्षीय बॉलीवुड गायक बाबुल सुप्रियो कहते हैं, ''हमें सामूहिक रूप से यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि ऐसी घटनाएं न हों. हम यहां चर्चा, बहस और काम पूरा करने के लिए आए हैं.” दुष्यंत को विश्वास है कि सरकार को विधेयक पारित करने में ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना होगा, क्योंकि पिछली लोकसभा की तरह यह सदन बंटा हुआ नहीं है.

लेकिन चलेगी मोदी की
दीपांकर गुप्ता के लिए भारी संख्या में युवा सांसदों की मौजूदगी खास मायने नहीं रखती, क्योंकि 1980 के दशक में भी चंद्रशेखर जैसे नेता उभरे थे, लेकिन भारतीय राजनीति में कोई प्रभावी बदलाव नहीं आया था. गुप्ता मानते हैं कि पहली बार सांसद बने लोगों का प्रदर्शन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर निर्भर करेगा, चाहे वे किसी पार्टी से हों. वे कहते हैं, ''उन्हें निश्चित तौर पर बदलाव का आगाज करना होगा, क्योंकि उन्हें एक स्पष्ट और निर्णायक जनादेश मिला है.
युवा नेता निश्चित रूप से उनका अनुसरण करेंगे. मुझे ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो ऐसा न हो.” गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले नानी गोपाल महंत कहते हैं, ''राजनैतिक परिवारों से आने वालों से मुझे बहुत उम्मीद नहीं, पर अपनी जगह खुद बनाने वाले अकसर मेहनतकश होते हैं. क्षेत्रीय दलों के सांसद भाषाई मुश्किलों के बावजूद संसद में राष्ट्रीय दलों से ज्यादा साफ तरीके से अपने विचार पेश करते हैं.”
ये 'नए चेहरे’ संसद में नए युग की शुरुआत करते हैं या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन भारत को अब कम बातें, ज्यादा काम चाहिए. कविता कहती हैं, ''मैं जिस विषय को नहीं जानती उस पर भाषण नहीं देना चाहती. इसके बजाए मैं उस पर ज्यादा ध्यान देना चाहूंगी जो मैं कर सकती हूं.” उन्हें मानो कोई दिशा मिल गई है. उन्हें काम करना होगा. राष्ट्र की निगाहें उन पर जमी होंगी.
—साथ में संतोष कुमार, असित जौली, राजीव पी.आइ., एम.जी. अरुण और अमिताभ श्रीवास्तव
दिल्ली के अशोक होटल के कमरा नंबर 1401 में ठहरीं अनुप्रिया चारों तरफ समर्थकों से घिरी हुई थीं फिर भी उन्होंने माना कि हर वक्त लोगों से घिरे रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता. वे कहती हैं, ''अगर कल मैं मंत्री बन गई तो यह भीड़ और बढ़ जाएगी. मेरे कई नए रिश्तेदार पैदा हो जाएंगे.” अनुप्रिया समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता मुलायम सिंह यादव की इस काबिलियत की तारीफ करती हैं कि उन्हें अपने हर कार्यकर्ता का नाम और चेहरा याद रहता है. यह दीगर बात है किउनके बेटे अखिलेश यादव की सरकार के साथ हमेशा टकराव चलता रहता है.
अपना दल वैसे तो बीजेपी का सहयोगी है, लेकिन जब उनसे आरएसएस से जुड़े बजरंग दल और श्रीराम सेना के बारे में पूछा गया तो वे बोल पड़ीं, ''ये पगलेट हैं.” उन्होंने यह भी दावा किया कि वे अरेंज मैरिज के खिलाफ हैं और लिव इन रिलेशनशिप का समर्थन करती हैं.
यह बात और है कि उन्होंने खुद परंपरा को निभाया है. इस सबके बावजूद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से मनोविज्ञान की इस स्नातक ने सांसद के रूप में अपनी भूमिका तय कर रखी है, ''मेरी दो प्राथमिकताएं हैं—एक विश्वविद्यालय और दूसरा सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल खुलवाना.उसके बाद मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में आदिवासियों के लिए मकान, पीने का पानी और साफ-सफाई की सुविधा दिलाना चाहती हूं.”
2014 में पहली बार लोकसभा में प्रवेश करने वाले 315 सांसदों में से एक, अनुप्रिया राजनेताओं की उस नई नस्ल की प्रतिनिधि हैं जो महत्वाकांक्षी, लक्ष्यकेंद्रित और खुलकर अपनी बात कहने वाली है. चुनाव में कामयाबी के लिए पैसा, राजनैतिक संरक्षण और बाहुबल के इस्तेमाल को स्वीकार करने वाली सुष्मिता देव से लेकर मोदी की मुस्लिम विरोधी छवि को बकवास बताने वाले एनसीपी के मोहम्मद फैजल से होकर राजनेताओं के सफेद कुर्ते-पाजामे को दिखावा बताने वाले बाबुल सुप्रियो तक 16वीं लोकसभा के नए रंगरूट उस युवा और बेचैन भारत के प्रतिनिधि हैं जो दिखावे में नहीं, कुछ करके दिखाने में यकीन करते हैं.
लक्षद्वीप से कांग्रेस के पुराने नेता पी.एम. सईद के बेटे हमदुल्ला सईद को हराने वाले 38 वर्ष के फैजल का कहना है, ''आज लोग फौरन परिणाम चाहते हैं.” फैजल लक्षद्वीप के 11 द्वीपों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन प्रोत्साहन मॉडल पर काम कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लक्षद्वीप बुलाकर वहां की क्षमताएं दिखाना चाहते हैं.
निजामनगर की सांसद 36 वर्षीया कल्वकुंतला कविता तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव की बेटी हैं. वे नवगठित राज्य की प्रतिनिधि हैं और उन पर बड़ी भारी जिम्मेदारी है. प्रचार के दौरान उन्होंने पार्टी के घोषणा पत्र के अलावा अपना अलग घोषणा पत्र भी जारी किया था. हैदराबाद में जवाहरलाल नेहरू टेक्नो-लॉजिकल यूनिवर्सिटी से बी.टेक कविता ने कहा, ''मुझे अपना हर वादा पूरा करना है.”
असम कांग्रेस के जाने-माने नेता संतोष मोहन देव की 41 वर्षीय बेटी सुष्मिता राजनीति को साध्य नहीं, साधन मानती हैं. दिल्ली में मिरांडा हाउस की स्नातक सुष्मिता पेशे से वकील थीं और बाद में राजनेता बनीं. उनका कहना है, ''जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं अपने काम में फेल हो गई, राजनीति छोड़ दूंगी.”
40 वर्ष से कम आयु के 60 नए सांसदों में से करीब आधे राजनैतिक परिवारों से आए हैं, लेकिन वे इसे अपनी कामयाबी का मूल कारण मानने को तैयार नहीं हैं. लोकसभा के सबसे कम उम्र के सदस्य 26 वर्षीय दुष्यंत चौटाला का कहना था, ''राजनैतिक संरक्षण टिकट दिलाने में तो शायद मदद कर सकता है, लेकिन वोट कमाने के लिए जमीन पर काम करना पड़ता है. मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में सभी 436 गांवों में गया जबकि दूसरे तो 200 तक भी नहीं पहुंच पाए.”

परिवार कभी नहीं मिटते
हिसार से भारतीय लोकदल के सांसद दुष्यंत हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पौत्र हैं. पिछले साल भ्रष्टाचार के आरोप में अपने पिता अजय सिंह चौटाला और दादा को जेल हो जाने के बाद दुष्यंत ने इस जीत से एक तरह से परिवार को नया जीवन दिया है. दुष्यंत ने सिरसा से जीते अपनी पार्टी के ही एक और सांसद चरणजीत सिंह की मिसाल देते हुए कहा कि वे किसी खानदान के वारिस नहीं हैं फिर भी बड़ी जीत हासिल करके आए हैं, ''इनकी कोई राजनैतिक विरासत नहीं है.
21 साल की उम्र में राजनीति में आए और अपनी मेहनत के दम पर 36 में सांसद बन गए.” तेलंगाना के गठन के लिए लंबे आंदोलन का हिस्सा रहे उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र सुमन बलका पेडापल्ली से टीआरएस के सांसद हैं. वे इस बात का समर्थन करते हैं, ''अगर आप किसी मकसद के लिए काम करेंगे तो मौका अपने आप मिलेगा.” संसद के सुरक्षा गार्ड ने जब उनसे पूछा कि क्या वे आंध्र प्रदेश से आए हैं तो बलका तुरंत बोल पड़े, 'तेलंगाना से’.
एक और खानदान के वारिस 32 वर्षीय चिराग पासवान लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के अध्यक्ष रामविलास पासवान के पुत्र हैं. उनका मानना है कि कभी-कभी राजनैतिक विरासत बोझ बन सकती है. उन्होंने कहा, ''ऐसे कई उदाहरण हैं कि पैसा और संरक्षण होने के बावजूद लोग एकदम पिछड़ गए.” बी.टेक की पढ़ाई बीच में छोड़ चुके चिराग ने मुंबई फिल्म जगत में अभिनेता के तौर पर किस्मत आजमाई पर कामयाबी नहीं मिली.
मुंबई में बिहार से आए लोगों को 'अपमानित होते’ देखने के बाद उन्होंने 2011 में राजनीति में आने का फैसला किया. बीजेपी के साथ एलजेपी का गठजोड़ कराने और लोकसभा में छह सीटें जिताने का श्रेय बहुत हद तक चिराग को जाता है. जमुई में चिराग ने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी को हराया है. महाराष्ट्र में नंदुरबार से जीत कर आईं बीजेपी की 26 वर्षीय सांसद हिना गावित ने चुनाव के बाद एमडी की परीक्षा दी है.
उनका कहना था कि चार बार निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके विजय कुमार गावित की बेटी होने से मदद तो जरूर मिली लेकिन नौ बार से कांग्रेस सांसद माणिक राव गावित को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराने की कामयाबी का श्रेय और उनके इरादे, गरीबों के लिए काम करने की तत्परता और निष्ठा को जाता है. उनका आत्मविश्वास कमाल का है.

राजनीति से अजनबी भी सांसद बने
निशानेबाजी में ओलंपिक रजत पदक विजेता 44 वर्षीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का मानना है कि सेना और खेल जगत में अपनी भूमिका निभाने के बाद राजनीति में कदम रखना उनकी स्वाभाविक प्रगति का हिस्सा है. जयपुर ग्रामीण से बीजेपी के लोकसभा सांसद राठौड़ कहते हैं कि यह जरूरी है कि अच्छे लोग राष्ट्र के फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल हों.
''अगर हमने वह जगह नहीं संभाली, तो दूसरे संभालेंगे.” राठौड़ की तरह उत्तर प्रदेश की रूहेलखंड यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में एम.ए. प्रियंका सिंह रावत भी राजनीति में कदम रख चुकी हैं, क्योंकि वे मानती हैं कि पढ़े-लिखे लोग अधिक जिम्मेदारी और प्रभावी तरीके से समाज की सेवा कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में कांग्रेस के दिग्गज पी.एल. पुनिया को 2 लाख से ज्यादा मतों से हराने वाली 28 वर्षीया बीजेपी सांसद का कहना है, ''मैं हमेशा से देश के लिए कुछ करना चाहती थी और मुझे महसूस हुआ कि राजनीति सबसे अच्छा मंच है.”
पंजाब से आम आदमी पार्टी (आप) के चार विजयी उम्मीदवारों में शामिल पटियाला के 62 साल के डॉ. धर्मपाल वीरा गांधी अपनी कामयाबी का श्रेय लोगों के साथ जुडऩे की अपनी काबिलियत को देते हैं. तीन बार सांसद और यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुकीं प्रणीत कौर के बारे में गांधी कहते हैं, ''पिछले एक दशक से ज्यादा समय से लोगों के साथ जमीनी स्तर पर बने मेरे जुड़ाव के असर का आकलन करने में वे विफल रहीं.”
गांधी इलाज के लिए आए ईंट-भट्टों के कई कामगारों और गरीब खेतिहर मजदूरों की फीस खुशी-खुशी माफ कर देते हैं. ये लोग हैं जो कौर के मोती बाग के आलीशान बंगले से कुछ दूर सुख एन्क्लेव में उनके साधारण से क्लिनिक के सामने हर दिन लंबी कतार में खड़े रहते हैं. वे गांधी हार्ट क्लिनिक में अपना काम जारी रखना चाहते हैं, ''संसद में साल में ज्यादा-से-ज्यादा तीन महीने काम होता है. बाकी का समय मेरे मरीजों और लोगों के लिए होगा.”
पार्टी में शामिल होने वाले ज्यादातर नए लोग मानते हैं कि महज कानून बना देने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा. कइयों का मानना है कि राजनेताओं को भ्रष्ट बनाने में कहीं-न-कहीं व्यवस्था भी दोषी है. सुष्मिता कहती हैं, ''लोग बदलाव का आगाज करें, न कि राजनेता.”
दुष्यंत बताते हैं कि कैसे आज हर गांव खेल टूर्नामेंट आयोजित करने के एवज में राजनेताओं से पैसे की मांग करता है. हालांकि, कविता का मानना है कि भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने में राजनेताओं को बड़ी भूमिका निभानी होगी. ''हम (टीआरएस) नहीं चाहते कि हमारा राज्य उस मुश्किल से गुजरे जिससे एक राष्ट्र के रूप में भारत वर्षों से जूझ रहा है. नेता के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम सभी चीजों पर नजर रखें.”

बदलेगी सियासत की सूरत
समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं कि 'आप’ ने चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन के बावजूद अच्छे लोगों के राजनीति में शामिल होने और सफल होने के लिए एक मॉडल और ढांचा पेश किया है. सुष्मिता भी सहमति जताती हैं, ''आप की कामयाबी प्रेरणादायी थी. मतदाता को ऐसे उम्मीदवार का चुनाव करना चाहिए जो विकास का वादा करे न कि उसे जो मुफ्त शराब बांटे.”
कर्नाटक से बीजेपी के सांसद 47 वर्षीय भगवंत खूबा और 37 वर्षीय प्रताप सिंह का मानना है कि उनकी जीत उसी बदलाव की ओर इशारा करती है जिसका जिक्र सुष्मिता ने किया है. दोनों की जीत में धन या बाहुबल की कोई भूमिका नहीं रही. अब, उन्हें राजनैतिक दलों की संस्कृति में बदलाव की उम्मीद है.
मंगलूर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में एमए करने वाले प्रताप सिंह कहते हैं, ''राजनैतिक दल माफिया की तरह काम करते हैं. ज्यादातर घोर परिवारवादी हैं. नतीजतन, सबसे प्रतिभाशाली उम्मीदवार को भी राजनीति में प्रवेश नहीं मिलता.” इन्हें बदलाव का सुर कहा जा सकता है.
नई ब्रिगेड 15वीं लोकसभा में सांसदों के दिखाए भयानक प्रदर्शन को दोहराना नहीं चाहती. 74 से ज्यादा बिल लंबित रह गए क्योंकि संसद के महत्वपूर्ण विधेयक, विधायी कार्यों के लिए सदन में आवंटित समय का सिर्फ 13 फीसदी ही इस्तेमाल हुआ. उन्हें उम्मीद है कि पेपर स्प्रे से लेकर लडऩे के लिए आमादा सांसदों के उपद्रवों के लिए अब कोई जगह नहीं होगी, जो हाल के समय में संसद की कार्यवाही का आम नजारा बनते रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में आसनसोल से बीजेपी के टिकट पर जीत कर आए 44 वर्षीय बॉलीवुड गायक बाबुल सुप्रियो कहते हैं, ''हमें सामूहिक रूप से यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि ऐसी घटनाएं न हों. हम यहां चर्चा, बहस और काम पूरा करने के लिए आए हैं.” दुष्यंत को विश्वास है कि सरकार को विधेयक पारित करने में ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना होगा, क्योंकि पिछली लोकसभा की तरह यह सदन बंटा हुआ नहीं है.

लेकिन चलेगी मोदी की
दीपांकर गुप्ता के लिए भारी संख्या में युवा सांसदों की मौजूदगी खास मायने नहीं रखती, क्योंकि 1980 के दशक में भी चंद्रशेखर जैसे नेता उभरे थे, लेकिन भारतीय राजनीति में कोई प्रभावी बदलाव नहीं आया था. गुप्ता मानते हैं कि पहली बार सांसद बने लोगों का प्रदर्शन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर निर्भर करेगा, चाहे वे किसी पार्टी से हों. वे कहते हैं, ''उन्हें निश्चित तौर पर बदलाव का आगाज करना होगा, क्योंकि उन्हें एक स्पष्ट और निर्णायक जनादेश मिला है.
युवा नेता निश्चित रूप से उनका अनुसरण करेंगे. मुझे ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो ऐसा न हो.” गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले नानी गोपाल महंत कहते हैं, ''राजनैतिक परिवारों से आने वालों से मुझे बहुत उम्मीद नहीं, पर अपनी जगह खुद बनाने वाले अकसर मेहनतकश होते हैं. क्षेत्रीय दलों के सांसद भाषाई मुश्किलों के बावजूद संसद में राष्ट्रीय दलों से ज्यादा साफ तरीके से अपने विचार पेश करते हैं.”
ये 'नए चेहरे’ संसद में नए युग की शुरुआत करते हैं या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन भारत को अब कम बातें, ज्यादा काम चाहिए. कविता कहती हैं, ''मैं जिस विषय को नहीं जानती उस पर भाषण नहीं देना चाहती. इसके बजाए मैं उस पर ज्यादा ध्यान देना चाहूंगी जो मैं कर सकती हूं.” उन्हें मानो कोई दिशा मिल गई है. उन्हें काम करना होगा. राष्ट्र की निगाहें उन पर जमी होंगी.
—साथ में संतोष कुमार, असित जौली, राजीव पी.आइ., एम.जी. अरुण और अमिताभ श्रीवास्तव

