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अब नौकरी का शानदार प्लेस है कॉफी शॉप

 कॉफी की बढ़ती संस्कृति के बीच इसे तैयार करने वाले भी उसी तरह से बदले हैं, जैसे इसे परोसने वाले. अब कॉफी शॉप्स शानदार और उम्मीदों भरा वर्क प्लेस बन गए हैं.

अपडेटेड 10 जून , 2014
अपने घर में 23 वर्ष के सलमान खान स्टार हैं. वे बताते हैं कि जब 2010 में उन्होंने कनार्टक स्थित भारत के कॉफी जिले चिकमंगलूर के सकरेपटना का अपना घर बंगलुरू जाने के लिए छोड़ा था, तब कॉफी उनके रगों में बहती थी, लेकिन उनके पास इसे बताने का कोई जरिया नहीं था. वे अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं बोल पाते थे और ग्रेजुएशन पूरा नहीं हुआ था क्योंकि उनके बारटेंडर पिता उनका और दो छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते थे.

अब चेन्नै के कॉफी बीन ऐंड टी लीफ  (सीबीटीएल) में शिफ्ट सुपरवाइजर, मिलनसार और बातूनी सलमान अरैबिका और रोबस्टा की पहचान के अलावा न सिर्फ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं, बल्कि कुछ हद तक तमिल भी. गर्मी में घर आए सलमान को स्थानीय लड़के मार्गदर्शन लेने के लिए घेरे रहते हैं. सभी कॉफी परोसने वालों को एचआर डिपार्टमेंट के जरिए रेफरल भेजने को प्रोत्साहित किया जाता है. इस प्रक्रिया को संक्षेप में समझें. इस नौकरी में न सिर्फ 10,000-15,000 रु. की शुरुआती तनख्वाह मिलती है, बल्कि प्रतिष्ठा, गरिमा और शानदार वर्क प्लेस भी. यह आकर्षण अब भारतीय गांवों से शहरी कॉफी चेन तक के नए पलायन को बढ़ावा दे रहा है.

कॉफी चेन कल्चर में अभिनेता रणवीर सिंह को भी भरोसा था, जिन्होंने यह माना है कि वे अमेरिका के इंडियाना में अपनी स्टुडेंट लाइफ के दौरान स्टारबक्स में कॉफी परोसते थे. इसी तरह केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी गर्व से बताती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में काम के लिए संघर्ष के दौरान उन्होंने मुंबई के मैकडोनाल्ड्स में बर्गर बनाने और झड़ू-पोंछा लगाने का काम किया था. यह बाकी भारत के लिए साफ संकेत है—ऊपर चढऩे के लिए अपना काम करते रहें.
पुष्पांजलि
(चेन्नै के कॉफी शॉप में काम करने वाली ओडिसा की पुष्पांजिल)
नई दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित कोस्टा कॉफी में कार्यरत 30 वर्षीय सौमिनलाल हाओकिप मणिपुर के खोदांग से आए हैं. इसी तरह मुंबई के एसओबीओ सेंट्रल मॉल स्थित सीबीटीएल में काम करने वाले 33 वर्षीय विनोद विश्वकर्मा जबलपुर के रहने वाले हैं. कोलकाता के कैफे कॉफी डे (सीसीडी) में वेटर के रूप में काम शुरू करने वाले 27 वर्षीय वसंत कुमार पी.ओ. अब सिटी मैनेजर हैं. वसंत चिकमंगलूर से आए हैं. चाहे सीबीटीएल, स्टारबक्स, ब्रू वल्र्ड कैफे, डनकिन डोनट्स, सीसीडी, ग्लोरिया ज्यां हो या बरिस्ता लवाजा, हर जगह ताजी रोस्टेड कॉफी की चिर-परिचित महक, पेटेंट की हुई कलर स्कीम और बिल्कुल तस्वीरों जैसे दिखने वाले सैंडविच के अलावा चुस्त यूनिफॉर्म, अभिवादन करती मुस्कराहटें दिखतीं हैं, जो काउंटर टॉप के पीछे खड़े लोगों की विविधताओं के बावजूद एक जैसी खासियत समटे हुए हैं.

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इमर्जिंग रिसर्च इन मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी में जून, 2013 में प्रकाशित इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी हैदराबाद के अंदल एमिसेट्टी और आइसीएफएआइ बिजनेस स्कूल हैदराबाद की सुदीप्ता प्रधान की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कैफे से कॉफी बिक्री के 2013 के 23 करोड़ डॉलर से करीब दोगुनी होकर 2017 तक 41 करोड़ डॉलर हो जाने का अनुमान है. पिछले पांच साल में भारत में हर साल औसतन 250 नए आउटलेट खुले हैं. यह आंकड़ा 2007 के 700 आउटलेट से 2014 तक बढ़कर 1,950 तक पहुंच चुका है. कंसल्टेंसी फर्म टेक्नोपैक एडवाइजर्स को उम्मीद है कि 2017 तक 1,000 और कैफे खुल सकते हैं.
सलमान खान
(चेन्नै के कॉफी बीन ऐंड टी लीफ में काम करने वाल कर्नाटक के सलमान खान)

सीबीटीएल मुंबई में एचआर मैनेजर कैरिन कॉरिया बताती हैं, “आम तौर पर इस सेक्टर में एंट्री करने के लिए बारहवीं पास करने की जरूरत होती है, जो कभी-कभी घटाकर दसवीं क्लास भी कर दी जाती है. हम डिग्री या पहले से प्रशिक्षण की जरूरत नहीं समझते. हमें बस कुशल, माहौल में ढलने लायक, खुश रहने वाले और आत्मविश्वास से भरे लोग चाहिए.” बढ़ते बाजार और एंट्री में लचीलेपन की वजह से  धीरे-धीरे बढ़ रहे इस सेक्टर की वर्कफोर्स आज लहर में बदल चुकी है, उसी तरह जैसे शुरुआती दिनों में कॉल सेंटर इंडस्ट्री में भीड़ होती थी. कॉरिया कहती हैं, “अब तो बहुत से एप्लीकेशन कॉल सेंटर कर्मचारियों के भी आते हैं.” सीबीटीएल के सीईओ के.एस. नारायणन कहते हैं, “इसमें जॉब रिक्वायरमेंट अलग तरह की होती है. आत्मविश्वास ही कॉफी चेन कर्मचारियों को टॉप पर पहुंचाता है.”

दिल्ली में कोस्टा कॉफी जीके-2 आउटलेट में प्लेस किए जाने से पहले नोएडा डेफ सोसाइटी के मूक-बधिर शमीम अहमद एक होटल में हाउसकीपर का काम करते थे. असल में 26 वर्षीय अहमद पहले गोरखपुर के पास देवरिया में दर्जी थे. साइन लैंग्वेज और इंटरप्रेटर के माध्यम से उन्होंने बताया कि वे ऐसी नौकरी चाहते थे, जिसमें लोगों के सामने रहें तथा उन्हें और उनकी कमियों को छिपाया न जाए. उन्होंने कहा, “कोस्टा में मैं लोगों से मिला और बहुत से दोस्त बनाए.” अच्छे टिप और प्रोत्साहन के रूप में ग्राहकों से मिली सराहना से उनका खुद में भरोसा बढ़ता है. अहमद की तरह ही मूक-बधिर हाओकिप ने कोस्टा के ग्रीन पार्क स्थित आउटलेट में 2007 में पहले स्पेशली एबल्ड कर्मचारी के रूप में जॉइन किया था. उन्होंने बताया, “मैं चुनौतियों से कभी नहीं डरता. इस फील्ड में आपको सफलता के लिए बस इतना करना होगा कि बेहतरीन कॉफी सर्व करें.”

कॉफी चेन इंडस्ट्री में सेल्फ-इमेज अहम है. आप किसी अच्छे रेस्तरां में वेटर बन सकते हैं और इतना ही वेतन पा सकते हैं. लेकिन कॉफी शॉप में काम करने से युवाओं को अपना सामाजिक दर्जा, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत संतुष्टि बढ़ाने का मौका मिलता है. मुंबई के सोबो सेंट्रल मॉल स्थित सीबीटीएल में शिफ्ट मैनेजर विनोद विश्वकर्मा कहते हैं, “मैं इससे पहले ताज ग्रुप ऑफ होटल्स में काम करता था. वह काम करने के लिए जबरदस्त ऑर्गेनाइजेशन है, लेकिन वहां और बाकी जगह सोच यह थी कि वेटर हमेशा ग्राहक से कमतर होता है. आपको उन्हें सर या मैडम कहकर ही बुलाना होता है. यहां हम हर किसी को उसके फस्र्ट नेम से बुलाते हैं.” विश्वकर्मा जबलपुर से हैं, जहां उनका परिवार तयाबली रोड पर एक छोटा-सा ढाबा ‘प्रेम होटल’ चलाता है.
सौमिनलाल हालोकिप
(दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित कोस्टा कॉफी में काम करने वाले मणिपुर के सौमिनलाल होओकिप अपने साथियों संग)

उन्होंने अपना करियर अखबार बेचकर 300 रु. की कमाई के साथ शुरू किया और सात लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए कई नौकरियां कीं. उन्हें मुंबई आए सात साल हो गए हैं और अब वे कॉफी चेन में काम करते हैं. वे जानते हैं कि ऐसी नौकरियों में या घर के ढाबे में करने और मौजूदा जॉब में क्या अंतर है. विश्वकर्मा बताते हैं, “जब कोई ग्राहक गुस्सा करता है तो उससे सलीके से निबटते हैं. शुरुआत में मैं अंग्रेजी नहीं बोल पाता था. काम करते हुए ही मैंने यह सीखा है.”

करीब 8,000 फ्रंट-ऐड कर्मचारियों वाले सबसे बड़े चेन सीसीडी ने अपने वोकेशनल ट्रेनिंग कॉलेजों (वीटीसी) के माध्यम से छोटे शहरों से आए वंचित तबके के स्त्री-पुरुषों की मदद करने की पूरी व्यवस्था बना रखी है. पटना, चिकमंगलूर और भुवनेश्वर स्थित इन कॉलेजों में प्रवेश मुफ्त होता है और छात्रों को स्टाइपेंड के साथ जॉब की गारंटी भी मिलती है. वसंत कुमार पी.ओ. को पैसे की तंगी की वजह से बी.कॉम की पढ़ाई बीच में छोडऩी पड़ी थी. उन्होंने सीसीडी की चिकमंगलूर ब्रांच के पहले बैच में जॉइन किया था, जहां उन्हें 750 रु. का मासिक स्टाइपेंड मिलता था. 2005 में ग्रेजुएट होने के बाद उन्हें सीसीडी के दिल्ली आउटलेट में नौकरी मिल गई.

अंग्रेजी का एक शब्द न जानने वाले वसंत याद करते हैं कि 15 दिसंबर, 2005 को पहले दिन ग्राहकों का सामना करने पर वे कैसे सकपका गए थे. उन्होंने कहा, दिल्ली भी मेरे लिए बहुत ‘हाइ-फाइ’ था. मैंने पहले औरतों को स्मोकिंग करते हुए नहीं देखा था. मेरा आत्मविश्वास पूरी तरह से डगमगा गया था.” अपनी पहली बिक्री करने से पहले उन्होंने दो दिन तक बस अपने सीनियर्स का कामकाज देखा. इसके छह साल बाद जब वे मुंबई गए तो उनके नियमित ग्राहक उनके लिए गिफ्ट लाते थे, उन्हें अपना फोन नंबर देते थे और वहां काम के अंतिम दिन उन्हें विदा करने भी आए. उन्होंने बताया, “कॉलेज के छात्र और बुजुर्ग लोग आसानी से दोस्त बन जाते हैं. आप फूड इंडस्ट्री में ऐसा और कहीं नहीं पा सकते.” वे गर्व के साथ घर वापस लौटे. उनके परिवार वालों को जिज्ञासा थी कि एक कॉफी शॉप में इंतजार करने में उन्हें क्या मिलता था. इसके बाद वह उनको एक कॉफी शॉप लेकर गए. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि नौकरी से शादी के बाजार में उनकी ‘प्रतिष्ठा’ बढ़ गई.

इस जॉब से एक और ऐसा फायदा मुफ्त में मिलता है, जो करियर की तरक्की के लिए अनिवार्य हैः फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना. इसके अलावा कॉल सेंटर कर्मियों के विपरीत कॉफी शॉप कर्मचारियों को अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी होता है और उन्हें हंसमुख तथा आत्मविश्वास से भरा दिखना चाहिए. नालंदा यूनिवर्सिटी, राजगीर में फेलो के रूप में युवा कर्मचारियों के बीच इंटरनेशनल कॉफी शॉप के आकर्षण का अध्ययन कर रहे एंथ्रोपोलॉजिस्ट मिशियल बास बताते हैं कि किसी कॉफी चेन में काम करने वाले वर्कर का करियर आम तौर पर केएफसी, मैकडोनाल्ड्स या पिज्जा हट से शुरू होता है. इसके बाद वह स्टारबक्स जैसे कॉफी चेन में चला जाता है और अंत में किसी फाइव-स्टार होटल में नौकरी पा जाता है. उन्होंने कहा, “इस लाइन के काम में प्रतिष्ठा काफी महत्व रखती है. उन्हें मिलने वाले अत्याधुनिक ग्राहक सेवा प्रशिक्षण की वजह से दूसरे एम्प्लॉयर भी उनकी तरफ आकर्षित होते हैं.”

कॉफी शॉप अकसर औरतों को रखने में हिचकिचाती हैं. यह देर रात तक खुली रहती हैं. आम तौर पर टाइमिंग सुबह 11 से रात 11 बजे तक होती है और औरतें देर तक रुकने में अनिच्छा दिखाती हैं. सीसीडी ने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए शिफ्ट की टाइमिंग बदल दी है. जो लोग अपना घर छोड़कर किसी कॉफी शॉप काउंटर के पीछे सर्विस देने का साहस रखते हैं, उनके लिए यह यात्रा काफी मजेदार हो सकती है.

ओडिसा के रामकृष्णपुर के एक किसान की बेटी 26 वर्षीया पुष्पांजलि मल्लिक ने अपने अंकल के पास रहकर होम साइंस की पढ़ाई की. इसके बाद भुवनेश्वर के वीटीसी में प्रशिक्षण हासिल करने के बाद वे चेन्नै के नंगमबक्कम स्थित सीसीडी स्क्वायर में काम करने के लिए आ गईं. वे अपने गांव की पहली ऐसी लड़की थीं जिसने अविवाहित ही, या वास्तव में नौकरी करने के लिए अपना घर छोड़ा था. मल्लिक अब कंपनी की ओर से मुहैया कराई गई जगह में रहती हैं. वे 25 वर्ष की हो चुकी थीं, इसलिए शादी को लेकर परिवार का काफी दबाव था. अब वे एक नए जीवन में अपने को व्यवस्थित कर रही हैं हालांकि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि यह संभव होगा. उन्होंने कहा, “मैं एक आजाद जीवन जी रही हूं और पैसा कमा रही हूं. मैं भी शादी करना चाहती हूं, लेकिन अपनी नौकरी नहीं छोडऩा चाहती. मैं नहीं जानती...क्या यहां से कोई वापस भी जा सकता है?”
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