नरेंद्र मोदी के बुलावे पर पाकिस्तान के वजीरे-आजम नवाज शरीफ ने उनके शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत करके मौके की गरिमा बढ़ाई. उन्होंने मौके की नजाकत को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव या शर्मसार करने वाली सियासी बयानबाजी से परहेज किया. लेकिन हिंदुस्तान की विदेश सचिव सुजाता सिंह ने ऐसा शिष्टाचार नहीं दिखाया.
उन्होंने मुंबई आतंकी हमले का जिक्र किया और उसकी साजिश के आरोपी सात पाकिस्तानियों के खिलाफ मुकदमे में तेजी लाने की मांग की. उनके इस तरह सियासी नुक्ते छेडऩे के बावजूद शरीफ ने ‘‘कश्मीर’’ का विवादास्पद मसला न उठाकर घरेलू मोर्चे पर तीखी आलोचना का जोखिम उठाया. अगर नतीजे ऐसे ही एकतरफा होने थे तो सबसे पहला सवाल तो यह है कि क्या नवाज को न्यौता मंजूर करना चाहिए था?
हर वक्त नुक्ताचीनी करने वाले तो तौबा, तौबा कह रहे हैः शरीफ नासमझी में कदम उठा बैठे और नरेंद्र मोदी ने चतुराई से अपने जाल में फंसा लिया. शरीफ ने बिलाशर्त आगे बढऩे का इरादा जताया और कारोबार तथा लोगों के बीच आपसी रिश्तों की अहमियत पर जोर दिया, लेकिन मोदी ने हमेशा की तरह आतंकवाद से जुड़ी शर्तों का पुराना राग अलापा. शरीफ ने तो छलांग भर ली लेकिन मोदी एक कदम भी आगे नहीं बढ़े.
क्या यही असल तस्वीर है? परदे के पीछे क्या-क्या हुआ? दोनों तरफ के सार्वजनिक बयान घंटे भर की बातचीत में उभरी जमीनी हकीकत के बारे में नजरिए से कैसे अलग हैं? बेशक, साउथ ब्लॉक की आधिकारिक प्रेस रिलीज पूरी तस्वीर पेश नहीं करती है.
शरीफ पहले दिन से ही स्पष्ट कर चुके थे कि उन्हें हिंदुस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण में शिरकत करने का न्यौता मंजूर करना है. उन्होंने विवाद से बचने के लिए जान-बूझकर इसका ऐलान कुछ देर से होने दिया. वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी के मुताबिक, शरीफ ने फौज से इजाजत नहीं मांगी, बस उसे जानकारी भर दी. उन्होंने विदेश विभाग से ब्रीफिंग जरूर ली, मगर आइएसआइ या किसी और से कोई बात नहीं की.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज और विदेश विभाग ने उन्हें सलाह दी थी कि शपथ ग्रहण समारोह और रात्रि भोज में शिरकत करें और उसी दिन लौट आएं, द्विपक्षीय बातचीत में शामिल न हों. शरीफ को मालूम था कि इस सलाह में फौज की राय भी शामिल है.
आला हुक्मरानों को कोई दिक्कत नहीं थी, बशर्ते वे दोतरफा बातचीत में अपनी ओर से कोई ठोस पहल न करें. वे चाहते थे कि ऐसा बाद में तरीके से किया जाए. जब शरीफ ने ब्रीफ देखा तो वे जान गए कि इसका मतलब क्या है.
फौज के मुखिया जनरल रहील शरीफ इतवार को पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ से इन मसलों पर बातचीत के लिए मिले. जनरल ने प्रधानमंत्री के भाई से कहा कि मियां साहब ने तो हमसे ब्रीफ लिया नहीं है, इसलिए हम आपको अपनी राय से रू-ब-रू करा देते हैं. मुख्यमंत्री से कहा गया कि फौज प्रधानमंत्री से हिंदुस्तान के मोर्चे पर धीरे चलने की हिमायती है.
हुक्मरानों के साफ संदेश के बावजूद प्रधानमंत्री शरीफ ने अपनी शर्तों पर आगे बढऩे का फैसला किया. सेठी कहते हैं, ‘‘उन्होंने बिलाशर्त बातचीत पर जोर देकर अपनी गर्दन फंसा ली है और अगर हिंदुस्तानी शर्तों पर जोर देते रहे तो इस मौके का संभावित जादू बेकार चला जाएगा.’’
पत्रकार एजाज हैदर का मानना है कि मोदी ने चतुराई दिखाई, शरीफ को आवभगत में फंसाया और बाद में अपने तेवर दिखा दिए. वे कहते हैं, ‘‘शरीफ इसमें फंस गए और इसलिए फंस गए क्योंकि वे वाकई इस मौके को आगे की राह खोलने में तब्दील करना चाहते थे. लेकिन यह गलतफहमी थी.
जरा विरोधाभास पर नजर डालिएः मोदी ने मांग रखी और बातचीत की प्रक्रिया को करीब-करीब थिंपू दौर के पहले के हालात में ले जाने की कोशिश की, जबकि शरीफ यह सोचकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं से मुलाकात को टाल गए कि कहीं माहौल न बिगड़ जाए.’’ हैदर का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ होता, अगर शरीफ ने नया इतिहास बनाने के चक्कर में खुद न जाकर नेशनल असेंबली के स्पीकर को भेज दिया होता.
दूसरों का मानना है कि शरीफ ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर का जिक्र न करके और कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात न करके फौजी हुक्मरानों और पाकिस्तान आधारित जेहादी गुटों को कड़ा संदेश दिया है. हिंदुस्तान में मोदी की जीत के फौरन बाद कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात सियासी तौर पर गलत कदम होती.
डेली टाइम्स के स्तंभकार डॉ. मुहम्मद तकी ने कहा, ‘‘मियां साहब ने शायद महसूस किया कि मुल्क के सुरक्षा निजाम की बदौलत पाकिस्तान की हिंदुस्तान और बाकी दुनिया में साख मामूली ही रह गई है इसलिए कम-से-कम एक नई पहल के इस मौके को जाया नहीं होने देना चाहिए.’’ इन सब बातों पर गौर करने से यह मुलाकात एक मामूली पहल ही लगती है, कोई बड़ी कूटनयिक छलांग नहीं.
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, शरीफ ने द्विपक्षीय बातचीत में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री से कहा कि बातचीत पर शर्त थोपने या पुरानी बातों को दोहराने या आरोप-प्रत्यारोप की कोई तुक नहीं है. दोनों ही मुल्कों को भविष्य की ओर देखना चाहिए और रास्ते की रुकावटों को दूर करने के बारे में सोचना चाहिए.
शरीफ ने मोदी से कहा कि उन्होंने कांग्रेस सरकार को बेरोक-टोक बाजार तक पहुंच (एनडीएमए)-एमएफएन (सबसे पसंदीदा देश) के लिए नया नाम-का दर्जा नहीं दिया ताकि चुनाव में बीजेपी के खिलाफ इसका बेजा इस्तेमाल न किया जा सके. शरीफ ने सियाचिन से फौज हटाने, वीजा को आसान बनाने और क्रिकेट खेलने को लेकर भी बात की. सबसे अहम बात यह कि उन्होंने कश्मीर पर बातचीत के व्यापक दायरों को खोलने की भी बात की.
मियां साहब की कूटनयिक सोच सही लगती है. नई संभावनाओं के मौके पर पुराने राग अलापने से शरीफ की अमन की कोशिशों में बखेड़ा खड़ा हो सकता था. बेशक, शरीफ मुल्क में मजहबी और सियासी गुटों के निशाने पर होंगे, जो फौज के सुर में ही सुर मिलाते हैं क्योंकि हिंदुस्तान से टकराव कायम रखना उनके वजूद के लिए जरूरी है, न कि पाकिस्तान के लिए.
डॉ. तकी कहते हैं, ‘‘मियां साहब को अपने पीछे देखने की भी सही सलाह दी गई होगी क्योंकि जो लोग पाकिस्तान में हर मिनट उन्माद फैलाने की कोशिशों में लगे रहते हैं, उनके लिए कोई और करगिल, मुंबई या 11 अक्तूबर, 1999 को अंजाम देना मुश्किल नहीं है. उनके लिए तो मोर्चे अपने ही घर में खुले हैं, न कि दिल्ली में.’’
साउथ एशियन फ्री मीडिया एसोसिएशन के सेक्रेटरी जनरल इम्तियाज आलम हिंदुस्तान जाने के शरीफ के फैसले की सराहना करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह सद्भावना यात्रा थी. शरीफ बार-बार लाहौर घोषणा और वाजपेयी के साथ अपने तालमेल का हवाला देकर 1999 की रजामंदी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे.’’ फरवरी, 1999 में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दोनों देशों के बीच शुरू हुई बस पर सवार होकर पाकिस्तान पहुंच गए थे.
उनका वह दौरा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के एटमी परीक्षणों के बाद रिश्ते सुधारने की नई पहल के तौर पर देखा गया था. शरीफ और वाजपेयी ने द्विपक्षीय समझौता ‘‘लाहौर घोषणा’’ पर दस्तखत किए, जिस पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान की संसद ने अपनी मुहर लगाई. फौज शरीफ सरकार की अमन की कोशिशों से खुश नहीं थी और उन्होंने करगिल जंग के जरिए इन प्रयासों को बेअसर करने की कोशिश की.
इस हरकत से शरीफ और फौज के मुखिया जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच तनाव बढ़ गया. इससे न सिर्फ अमन की कोशिश बेकार गई, बल्कि अक्तूबर, 1999 में फौजी तख्तापलट में शरीफ सरकार की विदाई हो गई.
अपने हालिया दिल्ली दौरे में शरीफ ने वाजपेयी से मिलने उनके घर जाकर एक बार फिर हिंदुस्तान के साथ अमन कायम करने के अपने इरादे को दोहराया. उनका मानना है कि बीजेपी और मोदी वाजपेयी की विरासत को आगे बढ़ाएंगे. इम्तियाज आलम का मानना है कि यह द्विपक्षीय बातचीत शुरू करने का सही मौका है, लेकिन लगता है कि दिल्ली अभी आतंकवाद पर पाकिस्तान के रवैए का इंतजार करेगी.
अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को न्यौता देकर मोदी ने इस क्षेत्र के बारे में अपने सरोकारों पर जोर दिया है, और शरीफ भी वही नजरिया रखते हैं. आलम कहते हैं, ‘‘हालात की मांग है कि बातचीत दोनों तरफ के बुनियादी मसलों की बंधक नहीं बननी चाहिए.
यह देखना बाकी है कि मोदी अपनी कट्टर या युद्ध करने वाली छवि से आगे जाते हैं या अफगानिस्तान की छद्म जंग में उलझकर रह जाते हैं.’’ पाकिस्तान में कइयों को इस बात की आशंका है कि मोदी अफगानिस्तान के मामले में ज्यादा आक्रामक रुख अपनाएंगे.
राजनैतिक टिप्पणीकार उमर जावेद का मानना है कि दोनों नेताओं को एक-दूसरे की घरेलू मजबूरियों का एहसास है. दूसरे सार्क देशों के नेताओं के साथ न्यौता मंजूर करके शरीफ ने हिंदुस्तान की कुछ हद तक बड़ी क्षेत्रीय हैसियत और चाहे अपने हितों में ही सही, रिश्ते सुधारने की जरूरत को पहचाना है. उनके अपने हित अपने मुल्क में आर्थिक तरक्की और फौज पर अवाम की सरपरस्ती कायम करना है.
जावेद की राय में शरीफ और उनकी पार्टी के नेताओं का फौज और लश्करे तैयबा जैसी कट्टर ताकतों के हमलावर रुख से अलग रवैया इख्तियार करना नई उम्मीद जगाता है. वे कहते हैं, ‘‘तरक्की की दोनों की समझ के केंद्र में व्यापार होगा और गुजरात जैसे भारतीय राज्यों को मैन्युफैक्चरिंग में बढ़त मिल सकती है तो पाकिस्तान के पंजाब में भी फायदा हो सकता है क्योंकि वहां का बाजार उपभोक्ताओं से भरा पड़ा है.’’
उनका यह भी मानना है कि शरीफ और मोदी, दोनों का मूल जनाधार एक जैसा है और वह है महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग और व्यापार घराने. इसी वजह से एक खास तरह की आर्थिक तरक्की की जरूरत का एहसास उन्हें है. कारोबार के मामले में एक समझौता और कार्ययोजना पहले से तैयार है, जिसका पाकिस्तान को ऐलान करना ही बाकी है.
वह नरेंद्र मोदी के अच्छे संकेत का इंतजार कर रहा है. नवाज शरीफ और मोदी, दोनों ताकतवर प्रधानमंत्री हैं, लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि वे अपने वादों को पूरा कर पाते हैं या नहीं.
(लेखिका पाकिस्तान में स्वतंत्र पत्रकार हैं)
उन्होंने मुंबई आतंकी हमले का जिक्र किया और उसकी साजिश के आरोपी सात पाकिस्तानियों के खिलाफ मुकदमे में तेजी लाने की मांग की. उनके इस तरह सियासी नुक्ते छेडऩे के बावजूद शरीफ ने ‘‘कश्मीर’’ का विवादास्पद मसला न उठाकर घरेलू मोर्चे पर तीखी आलोचना का जोखिम उठाया. अगर नतीजे ऐसे ही एकतरफा होने थे तो सबसे पहला सवाल तो यह है कि क्या नवाज को न्यौता मंजूर करना चाहिए था?
हर वक्त नुक्ताचीनी करने वाले तो तौबा, तौबा कह रहे हैः शरीफ नासमझी में कदम उठा बैठे और नरेंद्र मोदी ने चतुराई से अपने जाल में फंसा लिया. शरीफ ने बिलाशर्त आगे बढऩे का इरादा जताया और कारोबार तथा लोगों के बीच आपसी रिश्तों की अहमियत पर जोर दिया, लेकिन मोदी ने हमेशा की तरह आतंकवाद से जुड़ी शर्तों का पुराना राग अलापा. शरीफ ने तो छलांग भर ली लेकिन मोदी एक कदम भी आगे नहीं बढ़े.
क्या यही असल तस्वीर है? परदे के पीछे क्या-क्या हुआ? दोनों तरफ के सार्वजनिक बयान घंटे भर की बातचीत में उभरी जमीनी हकीकत के बारे में नजरिए से कैसे अलग हैं? बेशक, साउथ ब्लॉक की आधिकारिक प्रेस रिलीज पूरी तस्वीर पेश नहीं करती है.
शरीफ पहले दिन से ही स्पष्ट कर चुके थे कि उन्हें हिंदुस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण में शिरकत करने का न्यौता मंजूर करना है. उन्होंने विवाद से बचने के लिए जान-बूझकर इसका ऐलान कुछ देर से होने दिया. वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी के मुताबिक, शरीफ ने फौज से इजाजत नहीं मांगी, बस उसे जानकारी भर दी. उन्होंने विदेश विभाग से ब्रीफिंग जरूर ली, मगर आइएसआइ या किसी और से कोई बात नहीं की.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज और विदेश विभाग ने उन्हें सलाह दी थी कि शपथ ग्रहण समारोह और रात्रि भोज में शिरकत करें और उसी दिन लौट आएं, द्विपक्षीय बातचीत में शामिल न हों. शरीफ को मालूम था कि इस सलाह में फौज की राय भी शामिल है.
आला हुक्मरानों को कोई दिक्कत नहीं थी, बशर्ते वे दोतरफा बातचीत में अपनी ओर से कोई ठोस पहल न करें. वे चाहते थे कि ऐसा बाद में तरीके से किया जाए. जब शरीफ ने ब्रीफ देखा तो वे जान गए कि इसका मतलब क्या है.
फौज के मुखिया जनरल रहील शरीफ इतवार को पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ से इन मसलों पर बातचीत के लिए मिले. जनरल ने प्रधानमंत्री के भाई से कहा कि मियां साहब ने तो हमसे ब्रीफ लिया नहीं है, इसलिए हम आपको अपनी राय से रू-ब-रू करा देते हैं. मुख्यमंत्री से कहा गया कि फौज प्रधानमंत्री से हिंदुस्तान के मोर्चे पर धीरे चलने की हिमायती है.
हुक्मरानों के साफ संदेश के बावजूद प्रधानमंत्री शरीफ ने अपनी शर्तों पर आगे बढऩे का फैसला किया. सेठी कहते हैं, ‘‘उन्होंने बिलाशर्त बातचीत पर जोर देकर अपनी गर्दन फंसा ली है और अगर हिंदुस्तानी शर्तों पर जोर देते रहे तो इस मौके का संभावित जादू बेकार चला जाएगा.’’
पत्रकार एजाज हैदर का मानना है कि मोदी ने चतुराई दिखाई, शरीफ को आवभगत में फंसाया और बाद में अपने तेवर दिखा दिए. वे कहते हैं, ‘‘शरीफ इसमें फंस गए और इसलिए फंस गए क्योंकि वे वाकई इस मौके को आगे की राह खोलने में तब्दील करना चाहते थे. लेकिन यह गलतफहमी थी.
जरा विरोधाभास पर नजर डालिएः मोदी ने मांग रखी और बातचीत की प्रक्रिया को करीब-करीब थिंपू दौर के पहले के हालात में ले जाने की कोशिश की, जबकि शरीफ यह सोचकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं से मुलाकात को टाल गए कि कहीं माहौल न बिगड़ जाए.’’ हैदर का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ होता, अगर शरीफ ने नया इतिहास बनाने के चक्कर में खुद न जाकर नेशनल असेंबली के स्पीकर को भेज दिया होता.
दूसरों का मानना है कि शरीफ ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर का जिक्र न करके और कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात न करके फौजी हुक्मरानों और पाकिस्तान आधारित जेहादी गुटों को कड़ा संदेश दिया है. हिंदुस्तान में मोदी की जीत के फौरन बाद कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात सियासी तौर पर गलत कदम होती.
डेली टाइम्स के स्तंभकार डॉ. मुहम्मद तकी ने कहा, ‘‘मियां साहब ने शायद महसूस किया कि मुल्क के सुरक्षा निजाम की बदौलत पाकिस्तान की हिंदुस्तान और बाकी दुनिया में साख मामूली ही रह गई है इसलिए कम-से-कम एक नई पहल के इस मौके को जाया नहीं होने देना चाहिए.’’ इन सब बातों पर गौर करने से यह मुलाकात एक मामूली पहल ही लगती है, कोई बड़ी कूटनयिक छलांग नहीं.
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, शरीफ ने द्विपक्षीय बातचीत में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री से कहा कि बातचीत पर शर्त थोपने या पुरानी बातों को दोहराने या आरोप-प्रत्यारोप की कोई तुक नहीं है. दोनों ही मुल्कों को भविष्य की ओर देखना चाहिए और रास्ते की रुकावटों को दूर करने के बारे में सोचना चाहिए.
शरीफ ने मोदी से कहा कि उन्होंने कांग्रेस सरकार को बेरोक-टोक बाजार तक पहुंच (एनडीएमए)-एमएफएन (सबसे पसंदीदा देश) के लिए नया नाम-का दर्जा नहीं दिया ताकि चुनाव में बीजेपी के खिलाफ इसका बेजा इस्तेमाल न किया जा सके. शरीफ ने सियाचिन से फौज हटाने, वीजा को आसान बनाने और क्रिकेट खेलने को लेकर भी बात की. सबसे अहम बात यह कि उन्होंने कश्मीर पर बातचीत के व्यापक दायरों को खोलने की भी बात की.
मियां साहब की कूटनयिक सोच सही लगती है. नई संभावनाओं के मौके पर पुराने राग अलापने से शरीफ की अमन की कोशिशों में बखेड़ा खड़ा हो सकता था. बेशक, शरीफ मुल्क में मजहबी और सियासी गुटों के निशाने पर होंगे, जो फौज के सुर में ही सुर मिलाते हैं क्योंकि हिंदुस्तान से टकराव कायम रखना उनके वजूद के लिए जरूरी है, न कि पाकिस्तान के लिए.
डॉ. तकी कहते हैं, ‘‘मियां साहब को अपने पीछे देखने की भी सही सलाह दी गई होगी क्योंकि जो लोग पाकिस्तान में हर मिनट उन्माद फैलाने की कोशिशों में लगे रहते हैं, उनके लिए कोई और करगिल, मुंबई या 11 अक्तूबर, 1999 को अंजाम देना मुश्किल नहीं है. उनके लिए तो मोर्चे अपने ही घर में खुले हैं, न कि दिल्ली में.’’
साउथ एशियन फ्री मीडिया एसोसिएशन के सेक्रेटरी जनरल इम्तियाज आलम हिंदुस्तान जाने के शरीफ के फैसले की सराहना करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह सद्भावना यात्रा थी. शरीफ बार-बार लाहौर घोषणा और वाजपेयी के साथ अपने तालमेल का हवाला देकर 1999 की रजामंदी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे.’’ फरवरी, 1999 में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दोनों देशों के बीच शुरू हुई बस पर सवार होकर पाकिस्तान पहुंच गए थे.
उनका वह दौरा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के एटमी परीक्षणों के बाद रिश्ते सुधारने की नई पहल के तौर पर देखा गया था. शरीफ और वाजपेयी ने द्विपक्षीय समझौता ‘‘लाहौर घोषणा’’ पर दस्तखत किए, जिस पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान की संसद ने अपनी मुहर लगाई. फौज शरीफ सरकार की अमन की कोशिशों से खुश नहीं थी और उन्होंने करगिल जंग के जरिए इन प्रयासों को बेअसर करने की कोशिश की.
इस हरकत से शरीफ और फौज के मुखिया जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच तनाव बढ़ गया. इससे न सिर्फ अमन की कोशिश बेकार गई, बल्कि अक्तूबर, 1999 में फौजी तख्तापलट में शरीफ सरकार की विदाई हो गई.
अपने हालिया दिल्ली दौरे में शरीफ ने वाजपेयी से मिलने उनके घर जाकर एक बार फिर हिंदुस्तान के साथ अमन कायम करने के अपने इरादे को दोहराया. उनका मानना है कि बीजेपी और मोदी वाजपेयी की विरासत को आगे बढ़ाएंगे. इम्तियाज आलम का मानना है कि यह द्विपक्षीय बातचीत शुरू करने का सही मौका है, लेकिन लगता है कि दिल्ली अभी आतंकवाद पर पाकिस्तान के रवैए का इंतजार करेगी.
अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को न्यौता देकर मोदी ने इस क्षेत्र के बारे में अपने सरोकारों पर जोर दिया है, और शरीफ भी वही नजरिया रखते हैं. आलम कहते हैं, ‘‘हालात की मांग है कि बातचीत दोनों तरफ के बुनियादी मसलों की बंधक नहीं बननी चाहिए.
यह देखना बाकी है कि मोदी अपनी कट्टर या युद्ध करने वाली छवि से आगे जाते हैं या अफगानिस्तान की छद्म जंग में उलझकर रह जाते हैं.’’ पाकिस्तान में कइयों को इस बात की आशंका है कि मोदी अफगानिस्तान के मामले में ज्यादा आक्रामक रुख अपनाएंगे.
राजनैतिक टिप्पणीकार उमर जावेद का मानना है कि दोनों नेताओं को एक-दूसरे की घरेलू मजबूरियों का एहसास है. दूसरे सार्क देशों के नेताओं के साथ न्यौता मंजूर करके शरीफ ने हिंदुस्तान की कुछ हद तक बड़ी क्षेत्रीय हैसियत और चाहे अपने हितों में ही सही, रिश्ते सुधारने की जरूरत को पहचाना है. उनके अपने हित अपने मुल्क में आर्थिक तरक्की और फौज पर अवाम की सरपरस्ती कायम करना है.
जावेद की राय में शरीफ और उनकी पार्टी के नेताओं का फौज और लश्करे तैयबा जैसी कट्टर ताकतों के हमलावर रुख से अलग रवैया इख्तियार करना नई उम्मीद जगाता है. वे कहते हैं, ‘‘तरक्की की दोनों की समझ के केंद्र में व्यापार होगा और गुजरात जैसे भारतीय राज्यों को मैन्युफैक्चरिंग में बढ़त मिल सकती है तो पाकिस्तान के पंजाब में भी फायदा हो सकता है क्योंकि वहां का बाजार उपभोक्ताओं से भरा पड़ा है.’’
उनका यह भी मानना है कि शरीफ और मोदी, दोनों का मूल जनाधार एक जैसा है और वह है महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग और व्यापार घराने. इसी वजह से एक खास तरह की आर्थिक तरक्की की जरूरत का एहसास उन्हें है. कारोबार के मामले में एक समझौता और कार्ययोजना पहले से तैयार है, जिसका पाकिस्तान को ऐलान करना ही बाकी है.
वह नरेंद्र मोदी के अच्छे संकेत का इंतजार कर रहा है. नवाज शरीफ और मोदी, दोनों ताकतवर प्रधानमंत्री हैं, लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि वे अपने वादों को पूरा कर पाते हैं या नहीं.
(लेखिका पाकिस्तान में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

