जापान में नरेंद्र मोदी के बारे में सार्वजनिक राय से मीडिया में एक पतली धारा से महानदी की तरह प्रगति के कई दरवाजे खुले हैं. पहली बार मोदी से जापानी मीडिया अप्रैल, 2007 में रू-ब-रू हुआ था. तब वे गुजरात के कारोबारियों और राज्य के अधिकारियों के 50 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ जापान आए थे. उन्होंने वहां अपने राज्य में लाजवाब कारोबारी माहौल की दुहाई देकर जापानी निवेश की अपील की थी. वे तभी जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से भी पहली बार मिले थे.
उनकी अपील का वक्त भी माकूल था. भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन थे. 2004 और 2005 में चीन में जापान विरोधी प्रदर्शनों की वजह से जापानी कंपनियां अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए नए कारोबारी मौके तलाश रही थी. उस समय तक उनके निवेश का बड़ा ठिकाना चीन हुआ करता था.
भारत में गुजरात को अच्छा इलाका माना जा रहा था क्योंकि गुजरात से होकर गुजरने वाले दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर की योजना आकार लेने लगी थी. 2008 में टाटा मोटर्स की नैनो फैक्ट्री के पश्चिम बंगाल से गुजरात पहुंचने से जापान में मोदी के बारे में राय काफी सकरात्मक हो गई थी. हैरानी की बात यह भी है कि कुछ जापानियों की राय में मुख्यमंत्री ने महज चार दिन में नैनो की फैक्ट्री स्थापित करवा दी थी.
जापान में मोदी की छवि में तेजी से सुधार का दूसरा दौर जुलाई, 2012 में आया. उस समय एक औपचारिक निमंत्रण पाकर मोदी दूसरा प्रतिनिधिमंडल लेकर जापान पहुंचे. जापान सरकार ने उनका ऐसा स्वागत किया जैसे वे प्रधानमंत्री हों. मोदी फिर आबे से मिले, जिनकी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) तब सत्ता से बाहर थी. प्रतिनिधिमंडल ने टोक्यो और दूसरे बड़े शहरों में निवेश सेमिनार किया जिसमें अच्छी-खासी भीड़ जुटी क्योंकि जापान में तब तक मोदी और गुजरात के बारे में दिलचस्पी बढ़ गई थी.
जनवरी, 2011 में वाइब्रेंट गुजरात निवेश सम्मेलन में कई जापानी उद्योगपति और सरकारी अधिकारी शिरकत कर चुके थे. इसके अलावा, जापान-भारत व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी अगस्त, 2011 से लागू हो गया था. यह एक तरह का मुक्त व्यापार समझौते जैसा था. लिहाजा, मोदी के लिए जापान में अनुकूल माहौल बनने लगा था और यह उम्मीद भी पैदा होने लगी थी कि वे एक दिन भारतीय अर्थव्यवस्था के अगुआ होंगे.
अक्तूबर, 2011 में ही जापानी मोदी प्रेमी भारतीय निवेश परामर्श फर्म के सीईओ ने लिखा था कि भारतीय राज्यों में गुजरात की आर्थिक वृद्धि सबसे तेज है. संकेत दिया था कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन मोदी के छवि विस्तार के इस दूसरे दौर में भी जापानियों की उनमें दिलचस्पी सिर्फ कारोबारी और सरकारी हलकों तक ही सीमित थी.
मोदी के छवि विस्तार का तीसरा दौर सितंबर, 2013 में आया जब बीजेपी ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. इस दौर में सामान्य जापानी लोग भी मोदी में दिलचस्पी लेने लगे. जापानी मीडिया में मोदी की खबरों की संख्या धीरे-धीरे बढऩे लगी. मीडिया का कवरेज जनवरी, 2014 में उस समय काफी बढ़ गया जब भारत में जनमत सर्वेक्षण आम चुनावों में मोदी और बीजेपी की राहुल गांधी और कांग्रेस पर बढ़त दिखाने लगे. मीडिया रिपोर्टों ने सामान्य जापानियों में मोदी की छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.
जापानी मीडिया ने अपनी रिपोर्टों में मोदी को कितनी तरजीह दी? सबसे ज्यादा इस पहलू पर जोर दिया गया कि उनका आर्थिक प्रबंधन लाजवाब है. उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में गुजरात की आर्थिक वृद्धि की दर 10 फीसदी रही जबकि भारत की आर्थिक वृद्धि दर यूपीए-1 में अच्छी शुरुआत के बाद यूपीए-2 में घटती रही.
दूसरे, गुजरात भ्रष्टाचार और बिजली की दिक्कतों से मुक्त लगता है. वहां फैसले फटाफट होते हैं, जो दूसरे राज्यों में नहीं है. जापनी मीडिया में मोदी के कुछ नारे भी खूब चर्चा में रहे. मसलन, ‘‘लाल फीता नहीं, महज निवेशकों के लिए लाल कालीन’’, ‘‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन.’’
मोदी की आबे से करीबी संबंध हैं. जब आबे की एलडीपी ने दिसंबर, 2012 में भारी जीत दर्ज की और वे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उन्हें सबसे पहले बधाई देने वाले विदेशी नेताओं में मोदी भी थे. तब वे मुख्यमंत्री ही थे जबकि बाकी बधाई देने वालों में राष्ट्राध्यक्ष थे. जापानी मीडिया आबे और मोदी की नीतियों में समानता भी बताता रहा है.
दोनों ही अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के हिमायती हैं और अपने-अपने मॉडल आबेनॉमिक्स और मोदीनॉमिक्स के जरिए रोजगार के मौकों का विस्तार करते हैं. मीडिया के एक वर्ग में अमत्र्य सेन बनाम जगदीश भगवती की बहस पर भी फोकस किया. सेन को कांग्रेस और समाज कल्याण के पक्ष में बताया गया जबकि भगवती को बीजेपी और वृद्धि के पक्ष में.

रक्षा नीति के मामले में आबे का जोर है कि जापान शांति का पैरोकार है, लेकिन सैन्य ताकत भी बना रहेगा. उन्होंने अमेरिका के हडसन इंस्टीट्यूट 2013 के हर्मन कॉन अवार्ड के दौरान अपने भाषण में स्वीकार किया कि वे दक्षिणपंथी सैन्यवादी हैं. मोदी भी श्रेष्ठ भारत की मान्यता पर जोर देते हैं. शायद दोनों प्रधानमंत्री आक्रामक चीन से निबटने के बारे में एक जैसा सोचते हैं. हालांकि मोदी अपनी चीन नीति से परदा उठाने में सावधानीपूर्वक बचते रहे हैं, लेकिन जापानी मीडिया उनकी दोहरे अर्थों वाली टिप्पणियों पर फोकस करता है.
मसलन, अरुणाचल प्रदेश में 22 फरवरी, 2014 को अपनी चुनावी सभा में मोदी ने कहा, ‘‘चीन को अपने विस्तार के नजरिए को छोडऩा होगा.’’ फिर 6 मई, 2014 को एक अखबार को इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘‘अगर भारत और चीन अपने रिश्तों को सुधारने और मतभेदों को मिटाने की दिशा में आगे बढऩा चाहते हैं तो यह दोनों देशों के लिए मददगार होगा.’’
लेकिन देानों नेताओं में समानताओं के अलावा कई अहम फर्क भी हैं जिनसे उनका नजरिया तैयार होता है. मसलन, आबे का जन्म एक अहम राजनैतिक परिवार में हुआ जबकि मोदी अपने बलबूते इस मुकाम तक पहुंचे हैं.
जापानी मीडिया ने मोदी की सराहना की है लेकिन उनके नकारात्मक पक्ष को भी जगह दी है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को लेकर. कुछ अखबार, चैनलों में दंगों को नरसंहार बताया तो कुछ ने मुसलमानों के खिलाफ बीजेपी और मोदी के पूर्वाग्रह का जिक्र किया, यह भी बताया गया कि बीजेपी के नए सांसदों में कोई मुसलमान नहीं है. स्वाभाविक रूप से जापानी मीडिया में भारतीय मुसलमानों की आशंकाओं का जिक्र भी उभरा कि मोदी शायद उनके खिलाफ कदम उठाएं.
मीडिया में भारतीय पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन की आशंकाओं को भी जगह दी गई, जिनका सवाल है कि ‘‘अगर लश्करे तैयबा, अलकायदा या कोई और पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन भारत पर हमला कर देता है तो क्या होता है? ऐसे घटनाक्रम में भारत-पाकिस्तान के रिश्ते किस हद तक बिगड़ेंगे और मुसलमानों से कैसा व्यवहार होगा?’’ ज्यादातर जापानी लोग मोदी सरकार के रहते दंगों की बात सुनकर हैरान रह जाएंगे, हालांकि कइयों का मानना है कि ऐसा फिर नहीं होगा.
मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने जापान और भारत के द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए काफी कुछ किया. उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने 2014 की अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में लिखा कि ‘‘आबे की 2012 में सत्ता में वापसी से एजेंडा जिंदा हो गया, जापान से आर्थिक और रक्षा क्षेत्र में करीबी रिश्ते कायम करना यूपीए-2 की विदेश नीति का अहम हिस्सा बन गया.’’
मोदी इस द्विपक्षीय रिश्ते को आगे बढ़ाने की अच्छी स्थिति में हैं. आबे का कार्यकाल अभी ढाई साल तक रहने वाला है. इसलिए दोनों प्रधानमंत्रियों के पास अपने रिश्ते मजबूत करने का पर्याप्त समय है जो मजबूत द्विपक्षीय रिश्ते का भी आधार बनेगा.
मुझसे अकसर जापानी मीडिया में यह सवाल पूछा जाता है कि मोदी और आबे क्या एशिया में तनाव पैदा करने वाले चीन के खिलाफ साझा मोर्चा खोल सकते हैं. मेरा जवाब यह है कि सिर्फ इस वजह से हमें उनके बीच साझेदारी को सोचकर अति उत्साहित नहीं हो जाना चाहिए कि मोदी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह दक्षिणपंथी व्यावहारिकतावादी हैं और आबे शायद विश्व युद्ध के याकुसुकुनी स्मारक पर दोबारा न जाएं. हमें उनकी साझेदारी को लेकर व्यर्थ की चिंता नहीं पालनी चाहिए. जापानी मीडिया सांस रोके इंतजार कर रहा है कि क्या मोदी का पहला विदेश दौरा जापान का होगा.
(लेखक क्योटो यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एशियन ऐंड अफ्रीकन एरिया स्टडीज के प्रोफेसर हैं)
उनकी अपील का वक्त भी माकूल था. भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन थे. 2004 और 2005 में चीन में जापान विरोधी प्रदर्शनों की वजह से जापानी कंपनियां अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए नए कारोबारी मौके तलाश रही थी. उस समय तक उनके निवेश का बड़ा ठिकाना चीन हुआ करता था.
भारत में गुजरात को अच्छा इलाका माना जा रहा था क्योंकि गुजरात से होकर गुजरने वाले दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर की योजना आकार लेने लगी थी. 2008 में टाटा मोटर्स की नैनो फैक्ट्री के पश्चिम बंगाल से गुजरात पहुंचने से जापान में मोदी के बारे में राय काफी सकरात्मक हो गई थी. हैरानी की बात यह भी है कि कुछ जापानियों की राय में मुख्यमंत्री ने महज चार दिन में नैनो की फैक्ट्री स्थापित करवा दी थी.
जापान में मोदी की छवि में तेजी से सुधार का दूसरा दौर जुलाई, 2012 में आया. उस समय एक औपचारिक निमंत्रण पाकर मोदी दूसरा प्रतिनिधिमंडल लेकर जापान पहुंचे. जापान सरकार ने उनका ऐसा स्वागत किया जैसे वे प्रधानमंत्री हों. मोदी फिर आबे से मिले, जिनकी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) तब सत्ता से बाहर थी. प्रतिनिधिमंडल ने टोक्यो और दूसरे बड़े शहरों में निवेश सेमिनार किया जिसमें अच्छी-खासी भीड़ जुटी क्योंकि जापान में तब तक मोदी और गुजरात के बारे में दिलचस्पी बढ़ गई थी.
जनवरी, 2011 में वाइब्रेंट गुजरात निवेश सम्मेलन में कई जापानी उद्योगपति और सरकारी अधिकारी शिरकत कर चुके थे. इसके अलावा, जापान-भारत व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी अगस्त, 2011 से लागू हो गया था. यह एक तरह का मुक्त व्यापार समझौते जैसा था. लिहाजा, मोदी के लिए जापान में अनुकूल माहौल बनने लगा था और यह उम्मीद भी पैदा होने लगी थी कि वे एक दिन भारतीय अर्थव्यवस्था के अगुआ होंगे.
अक्तूबर, 2011 में ही जापानी मोदी प्रेमी भारतीय निवेश परामर्श फर्म के सीईओ ने लिखा था कि भारतीय राज्यों में गुजरात की आर्थिक वृद्धि सबसे तेज है. संकेत दिया था कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन मोदी के छवि विस्तार के इस दूसरे दौर में भी जापानियों की उनमें दिलचस्पी सिर्फ कारोबारी और सरकारी हलकों तक ही सीमित थी.
मोदी के छवि विस्तार का तीसरा दौर सितंबर, 2013 में आया जब बीजेपी ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. इस दौर में सामान्य जापानी लोग भी मोदी में दिलचस्पी लेने लगे. जापानी मीडिया में मोदी की खबरों की संख्या धीरे-धीरे बढऩे लगी. मीडिया का कवरेज जनवरी, 2014 में उस समय काफी बढ़ गया जब भारत में जनमत सर्वेक्षण आम चुनावों में मोदी और बीजेपी की राहुल गांधी और कांग्रेस पर बढ़त दिखाने लगे. मीडिया रिपोर्टों ने सामान्य जापानियों में मोदी की छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.
जापानी मीडिया ने अपनी रिपोर्टों में मोदी को कितनी तरजीह दी? सबसे ज्यादा इस पहलू पर जोर दिया गया कि उनका आर्थिक प्रबंधन लाजवाब है. उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में गुजरात की आर्थिक वृद्धि की दर 10 फीसदी रही जबकि भारत की आर्थिक वृद्धि दर यूपीए-1 में अच्छी शुरुआत के बाद यूपीए-2 में घटती रही.
दूसरे, गुजरात भ्रष्टाचार और बिजली की दिक्कतों से मुक्त लगता है. वहां फैसले फटाफट होते हैं, जो दूसरे राज्यों में नहीं है. जापनी मीडिया में मोदी के कुछ नारे भी खूब चर्चा में रहे. मसलन, ‘‘लाल फीता नहीं, महज निवेशकों के लिए लाल कालीन’’, ‘‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन.’’
मोदी की आबे से करीबी संबंध हैं. जब आबे की एलडीपी ने दिसंबर, 2012 में भारी जीत दर्ज की और वे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उन्हें सबसे पहले बधाई देने वाले विदेशी नेताओं में मोदी भी थे. तब वे मुख्यमंत्री ही थे जबकि बाकी बधाई देने वालों में राष्ट्राध्यक्ष थे. जापानी मीडिया आबे और मोदी की नीतियों में समानता भी बताता रहा है.
दोनों ही अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के हिमायती हैं और अपने-अपने मॉडल आबेनॉमिक्स और मोदीनॉमिक्स के जरिए रोजगार के मौकों का विस्तार करते हैं. मीडिया के एक वर्ग में अमत्र्य सेन बनाम जगदीश भगवती की बहस पर भी फोकस किया. सेन को कांग्रेस और समाज कल्याण के पक्ष में बताया गया जबकि भगवती को बीजेपी और वृद्धि के पक्ष में.

रक्षा नीति के मामले में आबे का जोर है कि जापान शांति का पैरोकार है, लेकिन सैन्य ताकत भी बना रहेगा. उन्होंने अमेरिका के हडसन इंस्टीट्यूट 2013 के हर्मन कॉन अवार्ड के दौरान अपने भाषण में स्वीकार किया कि वे दक्षिणपंथी सैन्यवादी हैं. मोदी भी श्रेष्ठ भारत की मान्यता पर जोर देते हैं. शायद दोनों प्रधानमंत्री आक्रामक चीन से निबटने के बारे में एक जैसा सोचते हैं. हालांकि मोदी अपनी चीन नीति से परदा उठाने में सावधानीपूर्वक बचते रहे हैं, लेकिन जापानी मीडिया उनकी दोहरे अर्थों वाली टिप्पणियों पर फोकस करता है.
मसलन, अरुणाचल प्रदेश में 22 फरवरी, 2014 को अपनी चुनावी सभा में मोदी ने कहा, ‘‘चीन को अपने विस्तार के नजरिए को छोडऩा होगा.’’ फिर 6 मई, 2014 को एक अखबार को इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘‘अगर भारत और चीन अपने रिश्तों को सुधारने और मतभेदों को मिटाने की दिशा में आगे बढऩा चाहते हैं तो यह दोनों देशों के लिए मददगार होगा.’’
लेकिन देानों नेताओं में समानताओं के अलावा कई अहम फर्क भी हैं जिनसे उनका नजरिया तैयार होता है. मसलन, आबे का जन्म एक अहम राजनैतिक परिवार में हुआ जबकि मोदी अपने बलबूते इस मुकाम तक पहुंचे हैं.
जापानी मीडिया ने मोदी की सराहना की है लेकिन उनके नकारात्मक पक्ष को भी जगह दी है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को लेकर. कुछ अखबार, चैनलों में दंगों को नरसंहार बताया तो कुछ ने मुसलमानों के खिलाफ बीजेपी और मोदी के पूर्वाग्रह का जिक्र किया, यह भी बताया गया कि बीजेपी के नए सांसदों में कोई मुसलमान नहीं है. स्वाभाविक रूप से जापानी मीडिया में भारतीय मुसलमानों की आशंकाओं का जिक्र भी उभरा कि मोदी शायद उनके खिलाफ कदम उठाएं.
मीडिया में भारतीय पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन की आशंकाओं को भी जगह दी गई, जिनका सवाल है कि ‘‘अगर लश्करे तैयबा, अलकायदा या कोई और पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन भारत पर हमला कर देता है तो क्या होता है? ऐसे घटनाक्रम में भारत-पाकिस्तान के रिश्ते किस हद तक बिगड़ेंगे और मुसलमानों से कैसा व्यवहार होगा?’’ ज्यादातर जापानी लोग मोदी सरकार के रहते दंगों की बात सुनकर हैरान रह जाएंगे, हालांकि कइयों का मानना है कि ऐसा फिर नहीं होगा.
मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने जापान और भारत के द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए काफी कुछ किया. उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने 2014 की अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में लिखा कि ‘‘आबे की 2012 में सत्ता में वापसी से एजेंडा जिंदा हो गया, जापान से आर्थिक और रक्षा क्षेत्र में करीबी रिश्ते कायम करना यूपीए-2 की विदेश नीति का अहम हिस्सा बन गया.’’
मोदी इस द्विपक्षीय रिश्ते को आगे बढ़ाने की अच्छी स्थिति में हैं. आबे का कार्यकाल अभी ढाई साल तक रहने वाला है. इसलिए दोनों प्रधानमंत्रियों के पास अपने रिश्ते मजबूत करने का पर्याप्त समय है जो मजबूत द्विपक्षीय रिश्ते का भी आधार बनेगा.
मुझसे अकसर जापानी मीडिया में यह सवाल पूछा जाता है कि मोदी और आबे क्या एशिया में तनाव पैदा करने वाले चीन के खिलाफ साझा मोर्चा खोल सकते हैं. मेरा जवाब यह है कि सिर्फ इस वजह से हमें उनके बीच साझेदारी को सोचकर अति उत्साहित नहीं हो जाना चाहिए कि मोदी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह दक्षिणपंथी व्यावहारिकतावादी हैं और आबे शायद विश्व युद्ध के याकुसुकुनी स्मारक पर दोबारा न जाएं. हमें उनकी साझेदारी को लेकर व्यर्थ की चिंता नहीं पालनी चाहिए. जापानी मीडिया सांस रोके इंतजार कर रहा है कि क्या मोदी का पहला विदेश दौरा जापान का होगा.
(लेखक क्योटो यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एशियन ऐंड अफ्रीकन एरिया स्टडीज के प्रोफेसर हैं)

