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नरेंद्र मोदी की नई दिल्ली

लंबे समय बाद दिल्ली के सियासी गलियारों से बहुत दूर का शख्स यहां तख्तनशीं हुआ. ऐसे में नए निजाम के साथ अच्छे दिन आने का ख्वाब हर किसी की आंखों में पल रहा है.

अपडेटेड 2 जून , 2014
नई दिल्ली के कौटिल्य मार्ग पर स्थित कभी सुनसान से रहे गुजरात भवन में सुरक्षा का भारी घेरा है. इमारत के बाहर पीले रंग के कई बैरीकेड पर सख्त चेहरों वाले पुलिस अधिकारी चौकस नजर जमाए हुए हैं. सड़क के दूसरी ओर टीवी चौनलों की कई वैन खड़ी हैं और पत्रकार मंडरा रहे हैं.

19 मई की सुबह 10 बजे दोनों ओर थोड़ी हलचल शुरू हुई. पत्रकार इस इमारत के करीब जाना चाहते हैं तो पुलिस वाले उन्हें पीछे खदेडऩा चाहते हैं. पूरे दिन गुजरात भवन में मौजूद निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह से मिलने बड़े-बड़े लोग आते रहे. इनमें बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, एमडीएमके के नेता वायको और गृह सचिव अनिल गोस्वामी शामिल थे.

गुजरात भवन की गहमागहमी की तुलना सिर्फ 38, अशोक रोड पर बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के आवास के बाहर भारी हलचल से ही की जा सकती है. कभी इसे चुनाव आयोग के मुख्यालय निर्वाचन सदन के बगल का मकान ही कहा जाता था, लेकिन 16 मई से ही झुंड के झुंड टीवी वैन के घेरे और बड़ी तादाद में आ रहे मेहमानों के कारण यह जगमग है. इसके दरवाजे से लेकर तीन लकदक वेटिंग रूम और पिछवाड़े विशाल लॉन में अरुण शौरी जैसे वरिष्ठ नेताओं से लेकर राज्य इकाई के कनिष्ठ नेता तक भरे पड़े हैं.

वहां के स्टाफ के सामने एक नई समस्या यह आ गई कि किसे किस वेटिंग रूम में ले जाया जाए ताकि विचारों या व्यक्तिगत हितों में कोई टकराहट न हो जाए. 16 मई को भारतीय जनता पार्टी की नाटकीय जीत के साथ ही राजधानी में सत्ता-परिवर्तन भी नाटकीय ढंग से तेज हो रहा है. करीब दशक भर से गहमागहमी का केंद्र रहे कांग्रेस दफ्तर 24, अकबर रोड और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निवास 10, जनपथ को मानो अचानक भुला दिया गया है.

अब ध्यान नए सत्ता केंद्र की ओर चला गया है. फिर भी गुजरात भवन, 38, अशोक रोड और बीजेपी के केंद्रीय मुख्यालय पर मंडरा रहे नेताओं में एक तरह की बेचैनी भी दिख रही है. आखिर पहली बार दिल्ली में किसी ऐसे शख्स का राज होगा, जो यहां की राजनैतिक संस्कृति का नहीं है. इसलिए यह धारणा है कि सिर्फ सत्ता के ठिकाने ही नहीं बदले हैं, बल्कि उसका रंग-ढंग भी बदल जाएगा.

नई तरह की सरकार
तो, मोदी की दिल्ली कैसी दिखेगी? मोदी ने अकसर अटल बिहारी वाजपेयी के अधूरे एजेंडे को पूरा करने का जिक्र किया है, जैसे सभी नदियों को जोडऩे की महत्वाकांक्षी योजना वगैरह, लेकिन उनकी सरकार 1998 से 2004 में रही वाजपेयी सरकार जैसी ही दूसरी सरकार नहीं होने जा रही है. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘‘मोदी ने राष्ट्रपति प्रणाली जैसा चुनाव अभियान चलाया, वे सरकार भी राष्ट्रपति शैली में ही चलाएंगे.’’

राजनीति के जानकार मोदी की तुलना दक्षिणपंथ की ओर झुके राष्ट्रवादी नेताओं व्लादिमिर पुतिन से लेकर रोनाल्ड रीगन और यहां तक कि मार्गरेट थैचर तक से करते हैं. मोदी के हाथ भी इतने मजबूत कभी नहीं रहे. पार्टी को ऐतिहासिक जनादेश दिलाने और 20 मई को संसदीय बोर्ड से निर्विवाद नेता चुने जाने के बाद उनका भावुक भाषण इस जीत के बारे में लोगों की धारणा के अनुरूप ही था.

और यह भाषण  तब अपने चरम पर पहुंच गया, जब महीनों से धाराप्रवाह बोलने वाले मोदी की जुबान एकदम से ठहर गई. चेहरा डाइस पर झुक गया. दबंग नेता ने इशारे से पानी मांगा और गीली हो गई आंखों की कोर को पोंछने के लिए रूमाल भी सुरक्षाकर्मी को ही रखना पड़ा.

इस लंबे भावुक और थिएटर के परफेक्ट दृश्य जैसे वाकये के बाद जब मोदी ने कहा कि वे यह पद स्वीकार करके देश पर कृपा नहीं कर रहे हैं, आडवाणी जी ने ऐसा कहकर भावुक ज्यादती की है तो सेंट्रल हॉल के साथ ही टीवी पर अपने चहेते नेता को देख रहे लोग भावविभोर हो गए. वे तो एक बब्बर शेर को अपना प्रधानमंत्री बना रहे थे, उसके भीतर गाय जैसा कोमल हृदय भी है, यह तो उन्हें तभी पता चला. यह अगले पांच साल में काफी कुछ बदले नजर आने वाले मोदी के बदलाव की शुरुआत जैसी दिखती है.

फिलहाल उन्होंने इस धारणा को दूर करने की कोशिश की कि उनकी सरकार देश के करोड़ों गरीबों के बदले बड़े पूंजीपतियों का पक्ष लेगी. संसद के केंद्रीय कक्ष में उन्होंने कहा, ‘‘मैं पहले भी कह चुका हूं और फिर कहता हूं कि लोकतंत्र के इस मंदिर में 125 करोड़ भारतीयों की आशा और आकांक्षा समाहित है...यह सरकार ऐसी होगी, जो गरीबों के बारे में सोचेगी, गरीबों की सुनेगी और गरीबों के लिए ही कायम रहेगी.’’

वैसे यह भी दिलचस्प संयोग है कि इससे पहले ठीक ऐसा ही नारा यानी ‘‘गरीबी हटाओ’’ का नारा देश की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लगाया था. इंदिरा गांधी उस जमाने में कहती थीं, ‘‘मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ.’’ और अब एक बार फिर से मजबूत प्रधानमंत्री के नारे के साथ दिल्ली के तख्त पर बैठने वाला शख्स भी गरीबी को ही अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाता दिख रहा है. लेकिन इस मुद्दे के अलावा भी उनकी बिसात पर बहुत मोहरे हैं.

संकेत ये भी हैं कि अब उन्हें बीजेपी के संगठन को अपने हिसाब से बदलने की आजादी होगी. संघ भी यह संकेत दे रहा है कि वह सरकारी पदों पर किसी वरिष्ठ नेता के लिए पैरवी नहीं करेगा. इससे पहले बीजेपी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इतनी सहूलियत हासिल नहीं थी.

वे अपनी चला तो लेते थे, लेकिन कुछ मशक्कत करनी ही पड़ती थी. आरएसएस के राष्ट्रीय प्रवक्ता राम माधव ने 20 मई को कहा, ‘‘संघ ने लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय के बाद न तो बीजेपी को, न ही मोदीजी को कोई दिशानिर्देश दिया है.... आरएसएस कभी रिमोट कंट्रोल नहीं रखता.’’ वे यह जरूर कहते हैं कि संघ सिर्फ सुझाव देगा.
मोदी के दरबारी
मोदी ने मंत्रिमंडल के स्वरूप पर अटकलों को भी खारिज कर दिया. उन्होंने गांधीनगर में 21 मई को कहा, ‘‘मैंने अभी इस बारे में नहीं सोचा है.’’ हालांकि सरकार की विचारधारा के बारे में जरूर स्पष्टता है. इसके पहले मोदी न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन और ‘‘किराया वसूलने’’ की संस्कृति खत्म करने जैसी बातें कर चुके हैं. वरिष्ठ बीजेपी नेताओं के मुताबिक मोदी अपने प्रचार अभियान के दौरान विभिन्न अर्थशास्त्रियों से सलाह ले चुके हैं.

उनके एजेंडे में इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और उत्पादन क्षेत्र को सबसे ज्यादा तरजीह देना शामिल है. मसलन, मोदी बिजली, कोयला, परमाणु और अक्षय ऊर्जा मंत्रालयों को एक ऊर्जा मंत्रालय में तब्दील करने का प्रस्ताव दे चुके हैं. मोदी खेमे के करीबी एक पूर्व अफसरशाह कहते हैं, ‘‘इससे रकम आवंटन और समन्वय में भारी फर्क आ जाएगा. ये मंत्रालय एक-दूसरे से संवाद कायम नहीं रखते और हर मंत्रालय का एक अलग नियामक है.’’

दूसरे प्रस्तावों में भूतल परिवहन, राजमार्ग, जहाजरानी और बंदरगाहों के मामले एक परिवहन मंत्रालय के तहत लाना शामिल  है. इसी तरह संस्कृति और पर्यटन जैसे छोटे मंत्रालयों को भी जोडऩे की बात है. उनकी योजना विदेश व्यापार महानिदेशालय को वाणिज्य मंत्रालय से हटाकर विदेश मंत्रालय के तहत लाने की भी है ताकि विदेश नीति में आर्थिक मामलों को जोड़ा जा सके.

मंत्रिमंडल में कैबिनेट पदों के अलावा मोदी राज्यमंत्री या छोटे मंत्रालयों के प्रभारी के रूप में टेक्नोक्रेट और विशेषज्ञों को भी ला सकते हैं. पूर्व ट्राइ अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, पूर्व गृह सचिव अनिल वाजपेयी, पेट्रोलियम सचिव सौरभ चंद्रा और पूर्व खुफिया ब्यूरो (आइबी) प्रमुख अजित डोभाल को 19 और 20 मई को मोदी और शाह से मुलाकात के लिए गुजरात भवन बुलाया गया.

डोभाल जनवरी, 2005 में आइबी से रिटायर होने के बाद दिल्ली में आरएसएस के थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन के प्रमुख हैं. कहा जाता है कि मोदी ने सात सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को 26 मई को शपथ ग्रहण समारोह के लिए निमंत्रण भेजने में उनकी मदद ली. इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी हैं. राष्ट्रपति भवन के सामने विशाल लॉन में होने वाले इस समारोह में पहली दफा विदेशी राष्ट्र प्रमुख शामिल होंगे.

आमंत्रितों में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई भी हैं, जहां मोदी सरकार को विदेश नीति में सुरक्षा संबंधी सबसे ज्यादा चुनौती मिलने वाली है. करजई चाहते हैं कि भारत अफगानिस्तान में इस साल अमेरिकी फौज की वापसी के बाद पाकिस्तान की शह से चलने वाले तालिबान के खिलाफ बड़ी भूमिका निभाए.

विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और अनुभवी प्रशासकों से बातचीत से स्पष्ट संकेत मिलता है कि नए निजाम में पार्टी और सरकार के बीच स्पष्ट फर्क रहेगा. कहते हैं, 19 मई को गुजरात भवन में मोदी ने कर्नाटक के वरिष्ठ नेताओं बी.एस. येद्दियुरप्पा और अनंत कुमार से कहा कि उन्हें सरकार में मंत्री पद के लिए लॉबिइंग करने के बदले पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान लगाना चाहिए.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘‘कांग्रेस के साथ समस्या यह थी कि उसके कई नेता सत्ता चाहते थे और उन्हें सरकार में जगह दी गई. इससे खासकर राज्यों में पार्टी नेतृत्व कमजोर हो गया. बीजेपी वह गलती नहीं करेगी.’’

तीन सत्ता केंद्र
सरकार का आकार छोटा रखने की प्रक्रिया में कुछ बड़े लोगों के छूट जाने की तो आशंका है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मोदी की कोर टीम में राजनाथ, जेटली और शाह शामिल रहेंगे. नई व्यवस्था में हर एक की अपनी अलग भूमिका है.

हालांकि एक समय यह अटकल थी कि राजनाथ मोदी के अभियान में लंगड़ी लगाकर खुद आगे आ सकते हैं, लेकिन वे नए प्रधानमंत्री के सबसे भरोसेमंद सहयोगी तथा शायद सबसे वरिष्ठ मंत्री बनकर उभरे हैं. दोनों के रिश्ते पिछले साल भर से राजनाथ की मोदी के प्रति निॢववाद वफादारी से काफी मजबूत हो गए हैं. बीजेपी अध्यक्ष को आरएसएस में व्यापक स्वीकार्यता हासिल है और उन्होंने मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी को लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं के विरोध के बावजूद पूरा समर्थन दिया.

दरअसल उन्होंने मोदी के विरोधियों को राजी करने की अद्भुत क्षमता का परिचय दिया है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका अनुभव है. उनकी छवि ऐसे ठाकुर नेता की है, जो सिर्फ अपनी पार्टी में ही नहीं, बल्कि सहयोगियों में पैठ रखते हैं. इन सभी कारणों से राजनाथ मोदी की योजना में महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

जेटली भले अमृतसर में कांग्रेस के अमरिंदर सिंह से लोकसभा चुनाव हार गए हों, लेकिन वे अपनी कानूनी विशेषज्ञता और न्यायपालिका में अपने संपर्कों के चलते मोदी की योजना के अहम हिस्सा हैं. उन्हें कोई आला मंत्रालय, शायद वित्त, दिया जाना तय है. जेटली ने मोदी के अभियान के समन्वय में अहम भूमिका निभाई और वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को दरकिनार करने जैसे फैसलों में अहम सलाह दी.

नई सरकार में अमित शाह की भूमिका कुछ हद तक पेचीदा है. इसमें कोई शक नहीं कि वे मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी हैं, उनके बारे में ये अटकलें शायद सही नहीं हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री का दर्जा दिया जा सकता है. इसके बदले, यह तय लगता है कि उन्हें प्रमुख राज्यों में पार्टी का आधार मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी. ऐसा पहला राज्य महाराष्ट्र हो सकता है, जहां इस साल के अंत तक चुनाव होने वाले हैं.

मोदी के वफादारों का घेरा शायद गुजरात से आला नौकरशाहों के दिल्ली में पीएमओ में तबादले के साथ पूरा होगा (देखें बॉक्स). मोदी की कार्यशैली में अधिकारियों को ज्यादा समय तक बनाए रखना अहम है. गुजरात में मुख्यमंत्री कार्यालय में मोदी के साथ ज्यादातर अधिकारी दशकों से हैं. इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं कि दिल्ली लाए जाने वालों में पहला नाम इन्हीं अधिकारियों का है.

सूत्रों के मुताबिक नया पीएमओ कुछ ऐसा होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं उसके कंट्रोल में होंगी. इस तरह यह 1989 में सत्ता से हटने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बाद सबसे मजबूत पीएमओ होगा.

अपने ही अनुभवों से सीखने वाले मोदी की योजना केंद्र और राज्यों के बीच ज्यादा तालमेल रखने की है. मसलन, एक ऐसा नया विभाग बनाने की योजना है, जो पीएमओ और 29 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच समन्वय स्थापित करे. इस विभाग के प्रमुख एक वरिष्ठ नौकरशाह होंगे और वे हर रोज प्रधानमंत्री को ब्रीफिंग देंगे.

रॉ और आइबी जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि हर हफ्ते मुख्यमंत्रियों को ब्रीफिंग देंगे. सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी की बैठकों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विशेष अतिथि के नाते दिल्ली बुलाया जाएगा.

यानी मोदी भारतीय गणराज्य के सभी राज्यों को एकसूत्र में पिरोकर देश को गौरवान्वित करना चाहते हैं. यहां विविधता और संघ और राज्य के अधिकारों का सम्मान तो होगा लेकिन राष्ट्रीय हितों पर फैसला लेने वाली प्रणाली भी होगी.

नई दिल्ली की राजनीति अब गर्वीली संस्थाओं से हटकर ड्राइंगरूमों में पहुंच गई है. यह संसद की लगातार गिरती गरिमा में भी देखा गया है. दो साल पहले अपने चरम पर पहुंचा अण्णा हजारे का आंदोलन इसी पतन की उपज था. इसलिए 20 मई को मोदी संसद भवन पहुंचे और उसकी सीढिय़ों पर सिर झुकाया तो लगा, शायद उन्हें आगे आने वाली चुनौतियों का कुछ एहसास है.

उनकी नई छोटे आकार की सरकार से उम्मीद रहेगी कि वह संसद को यही सम्मान नई ऊर्जा के साथ बख्शे. इन सब में मोदी किस तरह तालमेल बैठा पाते हैं, इसी से भारत के इतिहास का नया अध्याय लिखा जाएगा. मोदी की यही हिकमत मोदी सरकार की असली कसौटी होगी.  
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