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मोदी और आबे, यानी काम की जुगलबंदी

जापानी प्रधानमंत्री और भारत के मनोनीत प्रधानमंत्री के बीच दक्षिणपंथी रुझान की समानता से दोनों देशों के रिश्तों को नया आयाम मिलने की उम्मीद है.

अपडेटेड 2 जून , 2014
जब 20 मई को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ट्वीट कर भारत के मनोनीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टोक्यो आने का निमंत्रण दिया, तब ट्विटरबाजों को एक दिलचस्प बात पता चली. मोदी उन तीन व्यक्तियों में से एक हैं जिन्हें आबे ट्विटर पर फॉलो करते हैं. यह एक ऐसी रोचक शुरुआत है जो दो एशियाई देशों के प्रमुखों के बीच सबसे आकर्षक रिश्ते में बदल सकती है. मोदी ने भी ट्वीट कर इस न्योते के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की.

इसके बाद जापान के प्रधानमंत्री का फोन भी आया और उन्होंने मोदी से 15 मिनट तक बातचीत की. अधिकारियों का मानना है कि सवाल अब क्या का नहीं बल्कि बस इतना ही है कि मोदी अपनी पहली विदेशी यात्रा के रूप में टोक्यो कब जा रहे हैं. नई दिल्ली स्थित जापानी दूतावास के अधिकारियों का कहना है कि वे चाहते हैं कि मोदी की आधिकारिक यात्रा 'जल्द से जल्द’ हो. सामरिक और वैश्विक साझेदारी के तहत 2006 से ही हर साल भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों के बीच सम्मेलन होता है.

आबे इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे. मोदी यदि टोक्यो जाते हैं तो यह आबे से उनकी तीसरी मुलाकात होगी. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वे 2007 में आबे से मुलाकात करने दिल्ली पहुंचे थे, जब जापान के प्रधानमंत्री भारत के आधिकारिक दौरे पर आए थे.

इसके बाद जुलाई, 2012 में जापान के पांच दिवसीय दौरे पर गए मोदी ने फिर आबे से मुलाकात की थी. गुजरात के मुख्यमंत्री का जापानी सरकार ने किसी राष्ट्राध्यक्ष की तरह स्वागत किया था. दोनों नेताओं ने भारत-जापान के बेहतर रिश्तों के लिए अपनी दृष्टि को साझा किया था. पत्रकार-लेखक और मनमोहन सिंह के पूर्व प्रेस सलाहकार संजय बारू ने कहा, ''मोदी का जापान के साथ एक भावुक जुड़ाव भी है. यहां उनके आदर्श स्वामी विवेकानंद ने 1893 में यात्रा की थी.”

मोदी की आबे के साथ मुलाकात ऐसे दुर्लभ उदाहरणों में से है जिसमें किसी भारतीय मुख्यमंत्री ने किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के साथ घनिष्ठता कायम की हो. दोनों दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी हैं जो चुनावों में भारी जीत के साथ सत्ता में आए हैं, लेकिन इसके अलावा भी दोनों में कई चीजें एक जैसी हैं. दोनों राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए बाजार अर्थव्यवस्था के अपने विशिष्ट ब्रांड को बढ़ावा दे रहे हैं.

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के ब्रह्मï चेलानी मोदी को  'भारत का आबे’ कहते हैं. उनके मुताबिक, ''मोदी असल में आबे के नरम राष्ट्रवाद, बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था और नए एशियावाद जैसी नीति को ही चाहते हैं, जिससे एशियाई लोकतांत्रिक देशों में गहरे रिश्ते के जरिए सामरिक साझेदारी कायम की जाए.”

दोनों देशों के बीच साझेदारी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहने के दौरान ही शुरू हो चुकी है. भारत और जापान के बीच हर साल 18 अरब डॉलर का अच्छा द्विपक्षीय व्यापार होता है. मोदी ने इसे और बढ़ाने का वादा किया है. मोदी ने ट्वीट कर आबे से कहा था, ''मुझे पूरा भरोसा है कि हम भारत-जापान रिश्ते को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे.”

जापान फिलहाल भारत में चौथा सबसे बड़ा निवेशक है और 2000 से अब तक यहां 14 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश हुआ है. इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि नई सरकार भारत के पूर्वोत्तर इलाके के विकास में आबे सरकार का सहयोग मांगेगी. पूर्वोत्तर का विकास मोदी के एजेंडे की प्रमुख विशेषता है. इसी तरह  सरकार बहुचर्त अहमदाबाद-दिल्ली हाइ-स्पीड रेल कॉरिडोर और दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के निर्माण में भी जापान के सहयोग को तेजी से आगे बढ़ाने की मांग करेगी.
शिंजो आबे
जापान में अपने वक्तव्य में मोदी ने कहा था कि भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की क्षमता को सुधारने और स्मार्ट शहरों के निर्माण के लिए प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में मेजबान देश की अहम भूमिका हो सकती है. जापानी कारोबारियों को उम्मीद है कि मोदी जापानी कंपनियों के निवेश गंतव्य के रूप में भारत को चीन जैसा प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं. भारत में जापान के पूर्व राजदूत और अब सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन में डायरेक्टर साकुतारो तानिनो कहते हैं, ''मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस सरकार के विपरीत वह ऐसी खुले दरवाजे वाली नीति तैयार करेंगे जिसमें बाबूशाही, लालफीताशाही और नियंत्रण कम होगा.”

नई दिल्ली में कार्यरत एक और जापानी राजनयिक कहते हैं कि आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए दो चीजें बेहद जरूरी हैं. पहला, भारत-जापान सामरिक गठबंधन को मजबूत किया जाए और दूसरा, भारत में जो नीतियां बनाई जाएं, वे स्थिर और अनुमान लगाने लायक हों. वे कहते हैं, ''हाल की नियामक समस्याओं से भारत में आने वाले जापानी निवेश का प्रवाह बाधित हो गया था. हमें लगता है कि अब वातावरण को ठीक करने के लिए भारतीय नेतृत्व की तरफ से एक मजबूत संकेत जाएगा.”

मोदी ऐसे पहले भारतीय मुख्यमंत्री हैं जो लुक ईस्ट पॉलिसी यानी पूरब की ओर देखो नीति के हिमायती हैं. गुजरात में अपने 12 साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने चीन, सिंगापुर और जापान जैसी आर्थिक ताकतों के यहां से निवेश लाने का प्रयास किया. जापानी कंपनियों की ओर से 2015-16 तक गुजरात में 2 अरब डॉलर से ज्यादा के निवेश की उम्मीद है. 2013 के 'वाइब्रैंट गुजरात’ सम्मेलन में 100 से ज्यादा जापानी कंपनियां शरीक हुई थीं.

निवेश के लिए पूरब की ओर देखने की मोदी की नीति इस वजह से भी हो सकती है कि वर्ष 2005 में अमेरिका ने उनकी यात्रा पर अपमानजनक प्रतिबंध लगा दिया था. अमेरिका ने इसके लिए 2002 के गुजरात दंगों में मानवाधिकारों के उल्लंघन का हवाला दिया था (उन पर अमेरिकी वीजा मिलने पर लगी रोक अब भी कायम है). लेकिन 16 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फोन कर उन्हें भारी जीत की बधाई दी और वाशिंगटन आने का न्योता दिया. चेलानी कहते हैं कि मोदी के शासन में भारत-अमेरिकी रिश्ते गर्मजोशी की जगह कारोबारी जैसे होंगे.

जब 20 मई को आबे ने अपना निमंत्रण ट्वीट किया, चीन सरकार के एक थिंक टैंक ने मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वह  'भारत के निक्सन हैं’ न कि 'भारत के आबे’. शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के लिउ जोगक्यी ने कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ग्लोबल टाइम्स में लिखा, ''मोदी के उतने जोरदार तरीके से काम करने की संभावना नहीं है जैसा कि आबे ने किया था क्योंकि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं होगा.”

साफ है कि भारत के आबे को दुश्मन-दोस्तों चीन और जापान के बीच एक नाजुक संतुलन बना कर चलना होगा.   
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