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मध्य प्रदेश में भ्रष्ट बाबुओं का काल

मध्य प्रदेश में लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचारी अधिकारियों पर अपना शिकंजा कसना जारी रखा है. लेकिन क्या वह भ्रष्ट नेताओं को भी अपने शिकंजे में लेगी?

अपडेटेड 2 जून , 2014
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उद्योग विभाग के संयुक्त संचालक आर.सी. कुरील के आवास पर 20 मई को जब लोकायुक्त पुलिस ने छापा मारा तो उसे शायद पहले से अंदाजा था कि उसके हाथ एक बड़ी मछली लगी है. उसका अंदाजा सही निकला. कुरील के आवास से लोकायुक्त पुलिस ने करीब 20 करोड़ रु. की कथित तौर पर अवैध संपत्ति बरामद की.

लोकायुक्त पुलिस अभी उनकी संपत्ति के बारे में और जानकारियां जुटाने में जुटी है. प्रदेश में भ्रष्टाचारियों पर लोकायुक्त का शिकंजा कुछ इसी तरह कसता जा रहा है. लोकायुक्त पुलिस के कार्यवाहक डीजी अशोक अवस्थी का दावा है कि पिछले पांच माह में ही  लोकायुक्त पुलिस ने करीब 15 मामलों में 50-60 करोड़ रु. की अवैध संपत्ति उजागर की है.

प्रदेश में लोकायुक्त की ताबड़तोड़ छापेमारी से उनका यह दावा झूठा भी नहीं लगता. 29 जून, 2009 से जस्टिस पी.पी. नावलेकर ने लोकायुक्त का जिम्मा संभाला और उसके बाद से लोकायुक्त पुलिस ने पटवारियों, क्लर्कों से लेकर आइएएस और आइपीएस अधिकारियों को भी नहीं बख्शा. लोकायुक्त ने जहां भी कार्रवाई की, उसके हाथ करोड़ों से लेकर अरबों रुपए तक की कथित तौर पर अवैध संपत्ति की जानकारियां हाथ लगीं.

खुद नावलेकर का दावा है कि उनके जिम्मेदारी संभालने के बाद से अब तक 300 करोड़ रु. से अधिक की कथित अवैध संपत्ति का पता लगाया गया है. जाहिर है, उनकी सक्रियता से भ्रष्टाचारी बाबुओं के होश फाख्ता हैं.

आखिर यह महत्वपूर्ण संस्थान काम कैसे कर रहा है? भ्रष्टाचारियों की जानकारियां इस तक कैसे पहुंचती है? इसे जानना भी कम दिलचस्प नहीं है. इसका नमूना कुरील के मामले में देखने को मिलता है. लोकायुक्त को कुरील की सारी जानकारी किसी और ने नहीं बल्कि उन्हीं के साले अनिल आर्य ने दी थी. बताया जाता है कि कुरील ने अपने साले की नौकरी किसी कंपनी में लगवाई थी, लेकिन बाद में दोनों के बीच अनबन होने पर अनिल को नौकरी से हटा दिया गया.

इस बात को लेकर अनिल उनसे नाराज था और यही नाराजगी कुरील के लिए बुरी साबित हुई. इसी तरह 15 मई को जब आइपीएस अफसर मयंक जैन के निवास पर छापा मारा गया तो उसमें भी जैन और अन्य अधिकारियों के बीच चल रही गुटबाजी को वजह बताया गया. जैन प्रदेश के पहले आइपीएस अधिकारी हैं, जिन पर लोकायुक्त पुलिस ने कार्रवाई की है. उनके पास भी करोड़ों रु. की अवैध संपत्ति होने का दावा किया जा रहा है.

लोकायुक्त पुलिस के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘‘ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि आपसी जलन से आरोपी के करीबी ही शिकायत करते हैं. करीबी होने की वजह से उन्हें पूरी जानकारी होती है कि आरोपी कैसे भ्रष्टाचार कर रहा है और उसने कहां-कहां निवेश कर रखा है.

इससे हमें आरोपियों की जानकारी मिलती है और हम छापा मारते हैं’’ लोकायुक्त कार्यालय में पहुंचने वाले ज्यादातर मामले ऐसे ही आते हैं. कुछ ही मामलों में जानकारी हासिल होने पर बाहरी व्यक्ति लोकायुक्त से शिकायत करते हैं. एक जांच अधिकारी कहते हैं कि जानकारी तो उनके पास चलकर आती है. आम तौर पर शिकायत करने वाला भ्रष्टाचारी के खिलाफ सबूत भी दे देता है. 

राज्य लोकायुक्त ने पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ  कई बड़ी कारवाईयां की हैं. कुछ मामले ऐसे रहे हैं जिसमें लोकायुक्त पुलिस को अधिकारी के घर से अरबों रु. तक की संपत्ति की जानकारी मिली है. लोकायुक्त के छापे की कई कार्रवाइयों में हिस्सा ले चुके एक इंस्पेक्टर बताते हैं, ‘‘किसी व्यक्ति के बारे में शिकायत मिलने के बाद जब लोकायुक्त साहब हमें जांच के लिए कहते हैं तो हम गुप्त रूप से उस आरोपी के बारे में सभी जानकारियां इकट्ठा करते हैं.
कुरली के यहां लोकायुक्त का छापा
यह बात हम किसी को भी पता नहीं लगने देते कि हम उस व्यक्ति के बारे में क्या कर रहे हैं.’’ वे बताते हैं कि कई बार तो शिकायत करने वाला ही संपत्ति की जानकारी और उसके सबूत दे देता है. अगर वह सबूत नहीं दे पाता है तो हमें सभी कागजात जुटाने पड़ते हैं ताकि कोर्ट में जरूरी दस्तावेजों को सबूत के तौर पर पेश किया जा सके.

लोकायुक्त संगठन दो मामलों में कार्रवाई करता हैः पहला पद के दुरुपयोग का मामला हो या फिर भ्रष्टाचार का. लोकायुक्त के पास शिकायत आती है तो वे उसकी जांच के आदेश देते हैं. इंस्पेक्टर स्तर का अधिकारी उसके बाद अपने स्तर से संपत्ति की जानकारी इकट्ठा करता है. पता लगाया जाता है कि आरोपी की अर्जित संपत्ति और नौकरी में रहने के दौरान उसकी तनख्वाह कितनी होगी, ताकि मालूम हो सके कि अर्जित संपत्ति उसको मिलने वाले वेतन से ज्यादा है  या नहीं.

यह पता चलते ही कि आरोपी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए संपत्ति अर्जित की है, लोकायुक्त के आदेश के बाद विभाग के एसपी के नेतृत्व में छापे की कार्रवाई की जाती है. सुबह जल्दी कार्रवाई करने का मकसद यही होता है जिस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, वह घर पर मिल जाए और उसे इधर-उधर भागने का मौका न मिल सके.

लोकायुक्त पुलिस के कार्यवाहक डीजी अशोक अवस्थी ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘हम किसी के खिलाफ बदले की भावना से छापा नहीं मारते. किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई उस वक्त की जाती है, जब हमें उसके खिलाफ कार्रवाई करने के पर्याप्त सबूत मिल जाते हैं.’’ विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ‘‘लोकायुक्त संस्थान में वैसे तो लोकायुक्त ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन देखा जाए तो हर कर्मचारी महत्वपूर्ण है, हर किसी का काम बंटा हुआ है और सभी बखूबी अपने काम को निभाते हैं.

किसी एक व्यक्ति की गलती से पूरी कार्रवाई बिगड़ सकती है. इसलिए जब छापे की कार्रवाई कामयाब होती है तो उसमें संगठन के हर व्यक्ति का बराबर योगदान होता है.’’

दूसरी संस्थाओं की तरह ही लोकायुक्त संस्थान को राज्य सरकार से बजट उपलब्ध कराया जाता है. लोकायुक्त पुलिस का साल भर का बजट डेढ़ करोड़ से लेकर 2 करोड़ रु. है. लेकिन इसके बावजूद संसाधनों की कमी है. भोपाल में कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 12 लोगों के लिए एक ही टाइपिस्ट है. इस वजह से उस पर काम का बोझ कुछ ज्यादा ही होता है. इस तरह से लगातार सक्रिय रहने वाली लोकायुक्त पुलिस के सामने संस्थागत चुनौतियां भी मौजूद हैं.

अशोक अवस्थी बताते हैं, ‘‘1 जनवरी, 2014 से लेकर अब तक लोकायुक्त पुलिस ने एक अनुमान के मुताबिक 15 मामलों में 50-60 करोड़ रु. की अवैध संपत्ति उजागर की है. किसी के भी खिलाफ जब कार्रवाई की जाती है तो वह लोकायुक्त ऐक्ट के तहत की जाती है. खास बात यह है कि संगठन जो कार्रवाई करता है, उसमें से 65 फीसदी मामलों में अभियोजन होता है.’’

यह भी सच है कि लोकायुक्त पुलिस जिस तेजी से भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, वैसी कार्रवाई भ्रष्टाचार के आरोपी राजनेताओं के खिलाफ नजर नहीं आती. लेकिन अवस्थी किसी भी तरह के दबाव से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘लोकायुक्त संस्थान कभी भी किसी के दबाव में नहीं आया.

देख सकते हैं कि बड़े-से-बड़े रसूखदारों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है, जब यह पाया गया कि आरोपियों ने भ्रष्टाचार किया है. जो भी भ्रष्टाचार करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी.’’ लोकायुक्त की सक्रियता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को धार दी, लेकिन क्या वे भ्रष्ट नेताओं को  भी अपने शिकंजे में लेंगे? 
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