जब मुझसे कांग्रेस के भविष्य के बारे में लिखने को कहा गया तो मुझे काफी हिचक हुई. आखिरकार महज दूसरी बार ताजा-ताजा जीत कर आया हूं और इस नाते मैं पार्टी में अभी नया ही हूं. मैं कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) का सदस्य भी नहीं हूं, न ही पार्टी की किसी दूसरी निर्णायक समिति का सदस्य हूं.
लेकिन फिर, मैंने कांग्रेस का एक निर्वाचित प्रतिनिधि होने के नाते यह चुनौती स्वीकार करने का मन बनाया, क्योंकि मैं अपनी पार्टी के असमय अंत की कहानियां पढ़कर चकित हूं. हालांकि मैं आखिल भारतीय कांग्रेस (एआइसीसी) का प्रवक्ता हूं लेकिन मैं यह साफ करना चाहूंगा कि यह मेरे निजी विचार हैं.
सबसे पहले खुलकर यह कहना चाहूंगा कि हमारे अंत की कहानियां काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही हैं. कांग्रेस पूरी तरह जिंदा है और जनता के बीच आज भी अच्छी-खासी पकड़ रखती है. देश के आम चुनावों में हमें बस 20 फीसदी वोट मिले, इससे हम बेहद विभाजित और प्रतिस्पर्धी राजनीति में अप्रासंगिक नहीं हो जाते. हम 13 राज्यों में सत्ता में हैं और पूरे देश भर में हमारी मौजूदगी है, जिसका जोड़ कोई नहीं कर सकता.
फिर भी लोकसभा में महज 44 सीटों पर सिमट जाना दुखद है और सुधार की जरूरत का एहसास होता है. यह सुधार आखिर क्या हो सकता है? नीतियों-सिद्धांतों और कार्यक्रमों के आठ सुझाव यह हो सकते हैः
हम तय करें कि हमारा मकसद क्या है और उसे लगातार जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाएं. कांग्रेस के मूल सिद्धांत उन मूल्यों से बने हैं जो उसे आजादी के आंदोलन से हासिल हुए हैं, खासकर समेकित विकास, सामाजिक न्याय, गरीबी उन्मूलन और अल्पसंख्यक, औरत, दलित तथा आदिवासियों सहित तमाम हाशिए के लोगों को सुरक्षा मुहैया कराना. इनके प्रति सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को महज वोट बैंक की राजनीति के रूप में तोड़-मरोड़कर पेश कर दिया जाता है.
हम भारत की विविधता के राजनैतिक पैरोकार हैं और धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी उसूल की रक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. हमें अपने इन मूल्यों को हर मौके पर जोरदार ढंग से दोहराने की जरूरत है. इसका मतलब यह है कि हमारे नेताओं को अपने संकोच की आदत छोड़कर सोशल मीडिया सहित सभी मंचों पर ऊंची आवाज में इन मूल्यों पर जोर देना होगा.
ऐसा करने से हमारे मूल्यों, कार्यक्रमों, नीयत और सरोकारों की लोगों तक पहुंच अधिक तेज होगी. अगर हम लोगों से अपनी बात करेंगे तो उन्हें हम अपने पक्ष में आसानी से ला सकते हैं. 21वीं सदी की मीडिया आधारित राजनीति में खुले संवाद की जरूरत है जिससे कांग्रेस हाल के वर्षों में बचती रही है.
भविष्य का नजरिया विकसित कीजिए, जिसमें देश के बहुसंख्यक युवाओं की आकांक्षाएं समाहित हों. इस साल आश्चर्यजनक रूप से 40 फीसदी मतदाता 35 साल से कम उम्र के रहे हैं. वे हमसे जानना चाहते हैं कि उनके लिए हमने क्या किया है और क्या कर सकते हैं. हमारी पार्टी ने शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट की दिशा में कई पहल की हैं लेकिन रोजगार सृजन के मामले में ये कोशिशें नाकाफी रही हैं.
हमें इस क्षेत्र में ऐसी नीतियां तैयार करने की जरूरत है जो हमारी पार्टी के शासन वाले राज्यों में लागू हों और केंद्र को उनके बारे में बताया जा सके. देश के युवाओं को यह यकीन दिलाना होगा कि हम उनकी उम्मीदों को समझते हैं और सरकार में उन्हें आगे बढ़ाने का भरोसा दिलाते हैं.
बीजेपी को राष्ट्रवाद पर एकाधिकार कायम न करने दें. कांग्रेस के पास राष्ट्रीय हितों की रक्षा का सबसे गहरा अनुभव है और उसे गर्व से अपने राष्ट्रवाद का खुलकर इजहार करना चाहिए और सुरक्षा तथा विदेश नीति के उन मामलों में सक्रियता बनाए रखनी चाहिए जिसमें बीजेपी सरकार लापरवाहियां कर रही हो.
हालांकि हमारी परंपरा रही है कि हर तरह के राजनैतिक विरोध देश की धरती तक ही सीमित रहते हैं, विदेश नीति का मामला किसी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश का होता है, फिर भी हमें बीजेपी को अपनी सरकार के जरिए यह जाहिर करने की छूट नहीं देनी चाहिए कि वही एकमात्र देश के गौरव की रक्षा कर सकती है, जिसे लेकर हमारी परिभाषा कुछ अलग ढंग की हो सकती है.
संसद के बाहर और भीतर रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएं. इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि बीजेपी के बहुमत के आगे समर्पण कर दें. लेकिन महज विरोध के लिए विरोध करने (जैसा बीजेपी का यूपीए शासन के दौरान रवैया रहा है) से हम मोदी को मिले जनादेश के खिलाफ खड़े होंगे और जनता के गुस्से का शिकार होंगे.
देश में यह भावना बह रही है कि ‘‘उन लोगों ने इतने समय तक राज किया, अब उन्हें मौका क्यों नहीं देना चाहते?’’ इसलिए यह हमारे हित में है कि बीजेपी जब भी कोई सकारात्मक पहल करे तो हम उसका साथ दें और जब कोई विभाजनकारी एजेंडा लाए तो उसका डटकर मुकाबला करें.
जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान लगाया जाए. कांग्रेस वाकई कई राज्यों में जमीनी स्तर पर संपर्क तोड़ चुकी है. हमें पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. देश के ज्यादातर लोगों को सरकारी पेचीदगी और भ्रष्टाचार से पैदा होने वाली छोटी-मोटी समस्याओं पर हमें ध्यान देना चाहिए, जिन समस्याओं के लिए वोटरों ने हमें सजा दी है. हमें अपनी राजनीति को वंचित और कमजोर लोगों के लिए सामाजिक कार्य में तब्दील कर देना चाहिए.
पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बढ़ावा दें और अंतर्कलह पर काबू पाएं. राहुल गांधी लगातार इस पर ध्यान दे रहे हैं. सीडब्ल्यूसी से लेकर सभी प्रमुख पदों पर आंतरिक चुनाव कराए जाएं. स्थानीय स्तर पर और राज्यों में नेताओं को आगे बढ़ाएं. लेकिन पार्टी हित के खिलाफ अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को तरजीह देने वालों और असंतोष पैदा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें. हाल के चुनावों में कई नेताओं ने असंतोष का रवैया दिखाया है. जब पार्टी ऐसा रुख निर्वाचित नेताओं के प्रति अपनाएगी तो चुनाव न लडऩे वाले दरबारियों के मामले में और कड़ा रुख अपनाना संभव हो पाएगा.
दूसरी पार्टियों के साथ व्यावहारिक गठजोड़ पर ध्यान दें ताकि क्षेत्रीय दल सरकार विरोधी मंच का लाभ न उठा ले जाएं. अगर बीजेपी सरकार के मुखर विरोध का लाभ क्षेत्रीय पार्टियों का गठबंधन उठा ले जाता है तो इसका हमें सीधे-सीधे नुकसान होगा. हम सबसे बड़ी राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी हैं इसलिए बीजेपी सरकार की अस्वीकार्य नीतियों के विरोध का साझा मंच हमें ही तैयार करना चाहिए. राजनैतिक तालमेल से हमें संसद के अलावा विधानसभा चुनावों में भी तगड़ी टक्कर देने का मौका मिल जाएगा.
लेकिन हमें यह सावधानी भी रखनी होगी कि इस तालमेल के चक्कर में हमारी स्थानीय पार्टी इकाई का भट्टा न बैठ जाए. इससे लंबे समय में हम उन राज्यों में मजबूत विकल्प बनकर उभर सकते हैं जिनमें करीब ढाई दशकों से हम सत्ता में नहीं हैं. ये राज्य खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु हैं. इन राज्यों से लोकसभा की 201 सीटें आती हैं इसलिए हम इनकी कतई उपेक्षा नहीं कर सकते.
केंद्र सरकार को केंद्र-राज्य रिश्तों पर घेरिए. ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर मंच साझा कर सकते हैं. हमारे पास 13 राज्य सरकारें हैं और केंद्र के एकाधिकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने में हमारा राजनैतिक हित है. इसके साथ ही हमें अपनी राज्य सरकारों के अच्छे प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए ताकि यह साबित हो सके कि हमारी पार्टी सरकार चलाने के काबिल है. यही बीजेपी हमसे छीनना चाहती है.
इसका मतलब यह भी होता है कि हमें अपने कुछ राष्ट्रीय नेताओं को राज्यों में पार्टी को मजबूत करने के लिए भेजना पड़ेगा. वैसे भी दिल्ली में नई व्यवस्था के बाद अब ज्यादा कुछ करने के लिए बचा नहीं रहा है.
ये सुझाव काफी लंबे-चौड़े नहीं हैं, लेकिन मेरी राय में यह देश की सबसे पुरानी पार्टी के आगे बढऩे और पुराना गौरव लौटा लाने के लिए कुछ अहम सूत्र हैं.
(लेखक कांग्रेस के सांसद हैं)
लेकिन फिर, मैंने कांग्रेस का एक निर्वाचित प्रतिनिधि होने के नाते यह चुनौती स्वीकार करने का मन बनाया, क्योंकि मैं अपनी पार्टी के असमय अंत की कहानियां पढ़कर चकित हूं. हालांकि मैं आखिल भारतीय कांग्रेस (एआइसीसी) का प्रवक्ता हूं लेकिन मैं यह साफ करना चाहूंगा कि यह मेरे निजी विचार हैं.
सबसे पहले खुलकर यह कहना चाहूंगा कि हमारे अंत की कहानियां काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही हैं. कांग्रेस पूरी तरह जिंदा है और जनता के बीच आज भी अच्छी-खासी पकड़ रखती है. देश के आम चुनावों में हमें बस 20 फीसदी वोट मिले, इससे हम बेहद विभाजित और प्रतिस्पर्धी राजनीति में अप्रासंगिक नहीं हो जाते. हम 13 राज्यों में सत्ता में हैं और पूरे देश भर में हमारी मौजूदगी है, जिसका जोड़ कोई नहीं कर सकता.
फिर भी लोकसभा में महज 44 सीटों पर सिमट जाना दुखद है और सुधार की जरूरत का एहसास होता है. यह सुधार आखिर क्या हो सकता है? नीतियों-सिद्धांतों और कार्यक्रमों के आठ सुझाव यह हो सकते हैः
हम तय करें कि हमारा मकसद क्या है और उसे लगातार जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाएं. कांग्रेस के मूल सिद्धांत उन मूल्यों से बने हैं जो उसे आजादी के आंदोलन से हासिल हुए हैं, खासकर समेकित विकास, सामाजिक न्याय, गरीबी उन्मूलन और अल्पसंख्यक, औरत, दलित तथा आदिवासियों सहित तमाम हाशिए के लोगों को सुरक्षा मुहैया कराना. इनके प्रति सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को महज वोट बैंक की राजनीति के रूप में तोड़-मरोड़कर पेश कर दिया जाता है.
हम भारत की विविधता के राजनैतिक पैरोकार हैं और धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी उसूल की रक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. हमें अपने इन मूल्यों को हर मौके पर जोरदार ढंग से दोहराने की जरूरत है. इसका मतलब यह है कि हमारे नेताओं को अपने संकोच की आदत छोड़कर सोशल मीडिया सहित सभी मंचों पर ऊंची आवाज में इन मूल्यों पर जोर देना होगा.
ऐसा करने से हमारे मूल्यों, कार्यक्रमों, नीयत और सरोकारों की लोगों तक पहुंच अधिक तेज होगी. अगर हम लोगों से अपनी बात करेंगे तो उन्हें हम अपने पक्ष में आसानी से ला सकते हैं. 21वीं सदी की मीडिया आधारित राजनीति में खुले संवाद की जरूरत है जिससे कांग्रेस हाल के वर्षों में बचती रही है.
भविष्य का नजरिया विकसित कीजिए, जिसमें देश के बहुसंख्यक युवाओं की आकांक्षाएं समाहित हों. इस साल आश्चर्यजनक रूप से 40 फीसदी मतदाता 35 साल से कम उम्र के रहे हैं. वे हमसे जानना चाहते हैं कि उनके लिए हमने क्या किया है और क्या कर सकते हैं. हमारी पार्टी ने शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट की दिशा में कई पहल की हैं लेकिन रोजगार सृजन के मामले में ये कोशिशें नाकाफी रही हैं.
हमें इस क्षेत्र में ऐसी नीतियां तैयार करने की जरूरत है जो हमारी पार्टी के शासन वाले राज्यों में लागू हों और केंद्र को उनके बारे में बताया जा सके. देश के युवाओं को यह यकीन दिलाना होगा कि हम उनकी उम्मीदों को समझते हैं और सरकार में उन्हें आगे बढ़ाने का भरोसा दिलाते हैं.
बीजेपी को राष्ट्रवाद पर एकाधिकार कायम न करने दें. कांग्रेस के पास राष्ट्रीय हितों की रक्षा का सबसे गहरा अनुभव है और उसे गर्व से अपने राष्ट्रवाद का खुलकर इजहार करना चाहिए और सुरक्षा तथा विदेश नीति के उन मामलों में सक्रियता बनाए रखनी चाहिए जिसमें बीजेपी सरकार लापरवाहियां कर रही हो.
हालांकि हमारी परंपरा रही है कि हर तरह के राजनैतिक विरोध देश की धरती तक ही सीमित रहते हैं, विदेश नीति का मामला किसी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश का होता है, फिर भी हमें बीजेपी को अपनी सरकार के जरिए यह जाहिर करने की छूट नहीं देनी चाहिए कि वही एकमात्र देश के गौरव की रक्षा कर सकती है, जिसे लेकर हमारी परिभाषा कुछ अलग ढंग की हो सकती है.
संसद के बाहर और भीतर रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएं. इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि बीजेपी के बहुमत के आगे समर्पण कर दें. लेकिन महज विरोध के लिए विरोध करने (जैसा बीजेपी का यूपीए शासन के दौरान रवैया रहा है) से हम मोदी को मिले जनादेश के खिलाफ खड़े होंगे और जनता के गुस्से का शिकार होंगे.
देश में यह भावना बह रही है कि ‘‘उन लोगों ने इतने समय तक राज किया, अब उन्हें मौका क्यों नहीं देना चाहते?’’ इसलिए यह हमारे हित में है कि बीजेपी जब भी कोई सकारात्मक पहल करे तो हम उसका साथ दें और जब कोई विभाजनकारी एजेंडा लाए तो उसका डटकर मुकाबला करें.
जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान लगाया जाए. कांग्रेस वाकई कई राज्यों में जमीनी स्तर पर संपर्क तोड़ चुकी है. हमें पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. देश के ज्यादातर लोगों को सरकारी पेचीदगी और भ्रष्टाचार से पैदा होने वाली छोटी-मोटी समस्याओं पर हमें ध्यान देना चाहिए, जिन समस्याओं के लिए वोटरों ने हमें सजा दी है. हमें अपनी राजनीति को वंचित और कमजोर लोगों के लिए सामाजिक कार्य में तब्दील कर देना चाहिए.
पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बढ़ावा दें और अंतर्कलह पर काबू पाएं. राहुल गांधी लगातार इस पर ध्यान दे रहे हैं. सीडब्ल्यूसी से लेकर सभी प्रमुख पदों पर आंतरिक चुनाव कराए जाएं. स्थानीय स्तर पर और राज्यों में नेताओं को आगे बढ़ाएं. लेकिन पार्टी हित के खिलाफ अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को तरजीह देने वालों और असंतोष पैदा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें. हाल के चुनावों में कई नेताओं ने असंतोष का रवैया दिखाया है. जब पार्टी ऐसा रुख निर्वाचित नेताओं के प्रति अपनाएगी तो चुनाव न लडऩे वाले दरबारियों के मामले में और कड़ा रुख अपनाना संभव हो पाएगा.
दूसरी पार्टियों के साथ व्यावहारिक गठजोड़ पर ध्यान दें ताकि क्षेत्रीय दल सरकार विरोधी मंच का लाभ न उठा ले जाएं. अगर बीजेपी सरकार के मुखर विरोध का लाभ क्षेत्रीय पार्टियों का गठबंधन उठा ले जाता है तो इसका हमें सीधे-सीधे नुकसान होगा. हम सबसे बड़ी राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी हैं इसलिए बीजेपी सरकार की अस्वीकार्य नीतियों के विरोध का साझा मंच हमें ही तैयार करना चाहिए. राजनैतिक तालमेल से हमें संसद के अलावा विधानसभा चुनावों में भी तगड़ी टक्कर देने का मौका मिल जाएगा.
लेकिन हमें यह सावधानी भी रखनी होगी कि इस तालमेल के चक्कर में हमारी स्थानीय पार्टी इकाई का भट्टा न बैठ जाए. इससे लंबे समय में हम उन राज्यों में मजबूत विकल्प बनकर उभर सकते हैं जिनमें करीब ढाई दशकों से हम सत्ता में नहीं हैं. ये राज्य खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु हैं. इन राज्यों से लोकसभा की 201 सीटें आती हैं इसलिए हम इनकी कतई उपेक्षा नहीं कर सकते.
केंद्र सरकार को केंद्र-राज्य रिश्तों पर घेरिए. ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर मंच साझा कर सकते हैं. हमारे पास 13 राज्य सरकारें हैं और केंद्र के एकाधिकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने में हमारा राजनैतिक हित है. इसके साथ ही हमें अपनी राज्य सरकारों के अच्छे प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए ताकि यह साबित हो सके कि हमारी पार्टी सरकार चलाने के काबिल है. यही बीजेपी हमसे छीनना चाहती है.
इसका मतलब यह भी होता है कि हमें अपने कुछ राष्ट्रीय नेताओं को राज्यों में पार्टी को मजबूत करने के लिए भेजना पड़ेगा. वैसे भी दिल्ली में नई व्यवस्था के बाद अब ज्यादा कुछ करने के लिए बचा नहीं रहा है.
ये सुझाव काफी लंबे-चौड़े नहीं हैं, लेकिन मेरी राय में यह देश की सबसे पुरानी पार्टी के आगे बढऩे और पुराना गौरव लौटा लाने के लिए कुछ अहम सूत्र हैं.
(लेखक कांग्रेस के सांसद हैं)

