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अब कांग्रेस से चलता करें चाटुकारों को

इस बार कांग्रेस को मिली करारी हार 129 साल पुरानी पार्टी के लिए शायद अब तक का सबसे गहरा संकट है और इसकी विरासत को आगे बढ़ाने वाले परिवार के लिए बड़ी चुनौती है.

अपडेटेड 2 जून , 2014
हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार 129 साल पुरानी पार्टी के लिए शायद अब तक का सबसे गहरा संकट है और इसकी विरासत को आगे बढ़ाने वाले परिवार के लिए बड़ी चुनौती है. रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारत की जो अवधारणा सबसे पहले व्यक्त की थी, उसकी दृष्टि और विरासत खतरे में है.

बात यह नहीं है कि कांग्रेस का सफाया हो गया है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि जीतने वाले की प्रकृति बहुत मायने रखती है. आरएसएस के नेतृत्व वाली ताकतों का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से कुछ भी लेना-देना नहीं था. आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम उफान यानी 'भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय भी अपने काडर को दूर रहने और 'असली’ लड़ाई के लिए अपनी ऊर्जा बचाए रखने के लिए कहा था.

उनकी असली लड़ाई का मतलब मुसलमानों के खिलाफ लडऩा था. महात्मा गांधी की हत्या के लिए भी यही ताकतें जिम्मेदार थीं. इसी वजह से आजाद भारत के पहले गृहमंत्री ने आरएसएस को प्रतिबंधित किया था और उसके 25,000 कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया था.

यही ताकतें अब लोकसभा में भारी बहुमत के साथ देश की सत्ता पर काबिज हो गई हैं. तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि हमारे राष्ट्रवादी नेताओं ने भारत की जो अवधारणा गढ़ी थी, वह अब दम तोड़ चुकी है? एक-तिहाई से भी कम वोटरों (करीब 31 फीसदी) ने बीजेपी को वोट दिया है.

इसके बावजूद उन्हें हमारी 'जिसको ज्यादा वोट, वह जीता’ वाली चुनाव प्रणाली की वजह से बड़ी संख्या में सीटें मिलीं. इस चुनाव प्रणाली में सुधार की सख्त जरूरत है. लेकिन कांग्रेस क्या इस स्थिति को उलटने के लिए विशाल संख्या वाले उन लोगों की क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल कर पाएगी, जिन्होंने बीजेपी की विभाजनवादी छवि और उसके दक्षिणपंथी एजेंडे को वोट नहीं दिया है?

इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस अपनी इस अभूतपूर्व हालत के लिए जिम्मेदार कारणों को कितने सटीक ढंग से समझ पाती है और इस बात की भी पड़ताल कर पाती है कि बीजेपी को इतनी बड़ी जीत क्यों मिली. उसकी वापसी इस पर भी निर्भर करेगी कि वह भविष्य के लिए कैसी स्पष्ट रणनीति बनाती है.

इसकी शुरुआत हम बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के एक बयान से कर सकते हैं. उन्होंने कहा था कि बीजेपी की जीत कांग्रेस के कुशासन, महंगाई रोकने में सरकार की विफलता और नरेंद्र मोदी की 'इवेंट मैनेजमेंट’ की लाजवाब योग्यता के बल पर इस स्थिति का फायदा उठाए जाने का नतीजा है.

कांग्रेस की हार और बीजेपी के उभार के लिए जिम्मेदार इन कारणों में कुछ अन्य कारकों को भी जोड़ा जा सकता है. पहला, बीजेपी ने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में हिंदू वोटों का जोरदार ध्रुवीकरण किया. दूसरा, भारतीय कॉर्पोरेट जगत में दक्षिणपंथी आर्थिक एजेंडे का इस तरह से सफलतापूर्वक प्रचार कि उन्होंने मोदी को समर्थन देने के लिए भारतीय इतिहास में पहली बार लगभग सर्वसम्मति से एक विभाजनकारी सांप्रदायिक गठजोड़ को अपना पूरा सहयोग देने का फैसला कर लिया.

जर्मनी में व्यापारी और कुलीन वर्ग ने भी एडोल्फ हिटलर को सत्ता में पहुंचाने के लिए इसी तरह का समर्थन दिया था. देश के कॉर्पोरेट जगत ने अपने सपने पूरे करने की खातिर ही यह सहयोग दिया. कॉर्पोरेट जगत के सपनों में पर्यावरण और करोड़ों गरीब भारतीयों के सामाजिक, लोकतांत्रिक सरोकारों को कहीं जगह नहीं दी गई.

हाल ही में कांग्रेस के पारित किए गए कई अधिकार-आधारित कानूनों की श्रृंखला में भूमि अधिग्रहण विधेयक का सबसे ऊपर होना कॉर्पोरेट जगत के लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया. दो दशकों से ज्यादा समय तक कॉर्पोरेट जगत के दुलारे रह चुके मनमोहन सिंह एकाएक अस्वीकार्य हो गए, क्योंकि उन्हें कॉर्पोरेट वर्ग को तरह-तरह के घोटालों के जरिए फायदा पहुंचाने और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा दिलाने में अक्षम व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा.

तीसरा, कांग्रेस ने उत्साहहीन और नेतृत्व-विहीन चुनाव प्रचार किया. देश के एक बड़े हिस्से में उन्हें टक्कर देने वाली पार्टी के तौर पर भी नहीं देखा गया. यहां तक कि राजस्थान जैसे कांग्रेस के मजबूत जनाधार वाले राज्य में भी वह दमखम के साथ चुनाव मैदान में नहीं दिखाई दी. एक बात याद रखनी चाहिए कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने मोदी को जमकर टक्कर दी, वहां मोदी की सुनामी नदारद हो गई. मसलन ओडिसा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना. यहां तक कि कांग्रेस ने भी पंजाब जैसे राज्य में इतना खराब प्रदर्शन नहीं किया क्योंकि वहां उसने आगे बढ़कर मुकाबला किया, जिसकी वजह से बीजेपी के स्टार नेता को भी हार का मुंह देखना पड़ा.

चौथा, पार्टी और सरकार के बीच भागीदारी का बिखरना. यह भागीदारी यूपीए-1 के समय और यूपीए-2 में कुछ समय के लिए बहुत अच्छी तरह बरकरार थी. इस बिखराव की वजह से शासन पूरी तरह से गायब हो गया और आखिरी दो साल में तो शासन पूरी तरह खत्म हो जाने की धारणा ही बन गई. 'कमजोर’ या 'अनिश्चयपूर्ण नेतृत्व’ को इस शून्यता की वजह माना गया. इस खाली जगह को भरने के लिए मोदी को 'मजबूत’ और 'मसीहाई’ नेता के रूप में देखा गया.

आखिरी और शायद सबसे अहम वजह यह थी कि कांग्रेस विकास करने और प्रभावी ढंग से  वितरण करने में अपनी सफलता का प्रचार करने में विफल रही. ऐसा लगा जैसे कांग्रेस के एक वर्ग (मुख्य रूप से प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ) ने खुद को विकास के लिए जिम्मेदार माना और दूसरे वर्ग (मुख्य रूप से सोनिया गांधी से जुड़ा) ने खुद को समाज के गरीब तबके को फायदा पहुंचाने वाला माना. मजे की बात यह है कि दोनों ही एक-दूसरे की सफलता को नकारने के तौर पर देखे गए.

कुछ दशक पहले तक जिस वृद्धि दर की बात सोची भी नहीं जा सकती थी, भारत को वैसी वृद्धि दर दिलाने और गरीबों को रोजगार देने का कार्यक्रम, (जो दुनिया में गरीबी उन्मूलन के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है), चलाने के बाद भी कांग्रेस किसी एक का भी श्रेय लेने में असफल रही. कौन यकीन करेगा कि यही वह पार्टी थी, जिसने अपनी सार्वभौमिकता से समझौता किए बिना भारत को वैश्वीकरण के दौर में पहुंचाया. साथ ही गरीबों के हित को भी बचाए रखा. यह काम किसी और देश के लिए आसान नहीं था.

कांग्रेस को अब भविष्य में क्या करने की जरूरत है. पहला, इसे एक मजबूत और प्रतिबद्ध नेतृत्व खड़ा करने की जरूरत है. ऐसा नेतृत्व जो कांग्रेस की विचारधारा को गहराई से समझता हो और लंबे समय से इस कोशिश में लगा हो.

कांग्रेस को अकसर अन्य लोगों की राजनीति करने की सलाह देने वाले और एक गैर-राजनैतिक गुट की सलाह पर आधे-अधूरे मन से काम करने वाले नेता पार्टी का भला नहीं कर सकते. यह गुट बहुसंख्यकों की भावनाओं को आहत न करने के नाम पर कभी हिंदुत्व को बढ़ावा देने की सलाह देता रहा है तो कभी वंचितों के उत्थान के नाम पर अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता और जातिगत राजनीति को प्रोत्साहन देने की बात करता है.

ऐसा करने से जातिवादी और सांप्रदायिक लोग दूसरे दलों (मायावती, मुलायम सिंह यादव और बीजेपी) के साथ चले जाते हैं. इस तरह की राजनीति की वजह से मोदी को विपरीत असर का लाभ मिल जाता है और वे देश के सभी नागरिकों के साथ समान आचरण का दावा करने लगते हैं.
कांग्रेस
कांग्रेस को इंदिरा गांधी के जमाने के उस नारे को याद करना चाहिए, जिसमें कहा गया था— ''न जात पर, न पांत पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर.” कांग्रेस को अपनी वामपंथी झुकाव वाले, पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और समावेशी रास्ते (जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिए बिना) पर कायम रहना चाहिए. वह रास्ता जो एक सदी से इस पार्टी की विशेषता रहा हैं.

एक और ज्यादा महत्वपूर्ण जरूरत यह है कि कांग्रेस को अपने लोकतांत्रिक चरित्र को पुर्नस्थापित करने के लिए गंभीरता से प्रयास करना चाहिए, जैसे 1920 में महात्मा गांधी ने पार्टी का पुनर्गठन किया था और यह काम 1960 के दशक तक चलता रहा. राजीव गांधी और राहुल गांधी ने बार-बार पार्टी में खुलापन लाने, जमीनी स्तर पर संपर्क बनाने और 'सत्ता के दलालों’ को दरकिनार करने की बात की. उन्होंने कुछ छोटे-छोटे कदम भी उठाए, लेकिन देश पर शासन करने की तात्कालिक चिंता में ये कोशिशें कहीं गुम होकर रह गईं.

अब इसे अपना मुख्य मुद्दा मुद्दा बनाने का मौका है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए कांग्रेस ने जो ताकतें खड़ी की थीं, उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं के विभिन्न स्तरों पर तीस लाख चुने हुए प्रतिनिधियों की सेना खड़ी कर दी है. हमारे लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जमीनी स्तर पर इस ऊर्जा का उपयोग करना होगा. कांग्रेस को एक बार फिर से सदस्यता बढ़ाने का व्यापक अभियान चलाना चाहिए और अपने सदस्यों को गांव से लेकर तालुका, जिला, प्रांत और राष्ट्रीय स्तर तक पदाधिकारी चुनने का मौका देना चाहिए.

इसमें एआइसीसी, कार्यकारी समिति और पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी शामिल किया जाना चाहिए. कांग्रेस के बड़े से बड़े नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को भी विभिन्न पदों के लिए चुनाव का सामना करना पड़ा था और कभी-कभी तो कड़ी टक्कर भी झेलनी पड़ी थी. इस काम में फर्जी सदस्यता जैसी कुछ व्यावहारिक समस्याएं आएंगी, लेकिन कांग्रेस को इन चुनौतियों का सामना करना ही होगा.

उसे जे.एम. लिंगदोह जैसे दिग्गजों का सहयोग लेकर पार्टी में स्वच्छ चुनाव कराना चाहिए. आज के समय में यह कोई बड़ी समस्या नहीं है. कांग्रेस अगर इस काम में सफल रहती है तो देश में एक बार फिर यह अकेली पार्टी होगी, जिसमें आंतरिक लोकतंत्र होगा. यह देश की दूसरी पार्टियों के लिए एक मिसाल बन सकती है. कांग्रेस अगर ऐसा कर पाती है तो वह वंशवाद की राजनीति करने, वंचितों के लिए दरवाजा बंद होने, जनता से दूर हो जाने और चाटुकारों को मौका मिलने जैसी तमाम आलोचनाओं से बच सकेगी.

कांग्रेस को एक बार फिर खुद को उद्देश्यपूर्ण और एक निश्चित दृष्टि वाली पार्टी के तौर पेश करने की जरूरत है, न कि ऐसी पार्टी जो सिर्फ सत्ता की भूखी है, जैसी वह दिनोदिन होती जा रही है. इस कोशिश में पार्टी को पूरी विनम्रता के साथ काम करना और पूरे मन से बड़ी संख्या में उन व्यक्तियों, समूहों और संगठनों को समर्थन देना होगा, जो भारत के बारे में इसके दिग्गज नेताओं के व्यक्त किए गए विचारों से इत्तेफाक रखते हैं.

(लेखक दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते हैं)
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