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बेदम रही राहुल गांधी की कमान

राहुल गांधी को प्रभावशाली नेता के रूप में पेश करने की कांग्रेस की तरकीब नाकाम रही. उनकी बजाए उनकी करिश्माई बहन प्रियंका गांधी ज्यादा कारगर नजर आती रहीं.

अपडेटेड 19 मई , 2014
मई महीने की पांच तारीख की शाम को प्रियंका गांधी वाड्रा अमेठी से दिल्ली के लिए रवाना हुईं. दिल्ली जाने के लिए निजी विमान में सवार होने से पहले प्रियंका ने फुरसतगंज हवाईपट्टी पर पार्टी के ब्लॉक और बूथ स्तर के कुछ कार्यकर्ताओं से मुलाकात की. 22 अप्रैल को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी में अपना पर्चा भरा था और उसी दिन से प्रियंका के साथ पड़ाव डाले बैठे कांग्रेस नेता कैप्टन सतीश शर्मा भी वहां मौजूद थे.

प्रियंका ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने उस दिन गौरीगंज की सभा में जिस तरह उनके पिता राजीव गांधी को निशाना बनाया, उससे वे नाराज हैं. प्रियंका ने कहा, ‘‘मैं यहां आपके साथ रहना चाहती हूं, लेकिन चुनाव आचार संहिता मुझे इसकी इजाजत नहीं देती, लेकिन मुझे यकीन है कि वोटिंग के समय आप मोदी को करारा जवाब देंगे.’’

जब एक भावुक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने पूछा कि वे वापस कब आएंगी, तो प्रियंका ने जवाब दिया कि चुनाव के बाद जल्दी ही आऊंगी. अमेठी से ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष बृजेंद्र शुक्ल ने बताते हैं, ‘‘इनकी वजह से हम कांग्रेस को वोट देते हैं. मैं मानता हूं कि यह परिवार की बात है. लेकिन इनके (प्रियंका के) आने से फर्क पड़ता है.’’

मोदी के हमलों पर प्रियंका के करारे वार ने जिस तरह बीजेपी को हिलाया है और टेलीविजन के प्राइम टाइम पर जिस तरह वे छाई हैं, उससे जाहिर है कि शायद सिर्फ अमेठी या रायबरेली के ही नहीं, बल्कि अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता भी राहुल की बजाए प्रियंका को परिवार से जुडऩे के लिए ज्यादा पसंद करते हैं.

लोकसभा 2014 के लिए कांग्रेस के प्रचार का मकसद राहुल को इस सबसे पुरानी पार्टी के नेता पद पर स्थापित करना था, लेकिन 16वें आम चुनाव के अंत तक आते-आते ज्यादा करिश्माई प्रियंका अपने भाई के विकल्प के रूप में उभरी हैं. अकसर अपनी दादी इंदिरा से उनकी तुलना और आक्रामक शैली ने राहुल की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं क्योंकि मोदी के मुकाबले सोच तथा छवि के धरातल पर वे पहले ही हार रहे थे.

कांग्रेस के प्रचार के कुछ केंद्रीय मुद्दे थे-युवा नेता के रूप में राहुल गांधी की पहचान, सांप्रदायिक राजनीति का विरोध और यूपीए के घोटाले वाली छवि से दूरी. उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में उभारा गया, जो संघ समर्थित बीजेपी की कट्टर सोच के मुकाबले युवा शक्ति को प्रोत्साहित करते हुए नई समावेशी राजनीति का सूत्रपात करेगा. युवा शक्ति का निशाना पहली बार के दस करोड़ मतदाताओं पर था, जबकि कट्टरता के विरोध के निशाने पर बीजेपी की धर्मनिरपेक्षता विरोधी साख थी.

इस संदेश को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से उधार लिया गया नया माध्यम मिल गया. यह माध्यम लोगों को संबोधित करने की राहुल की कम स्फूर्त और ज्यादा संवाद वाली शैली के लिए उपयुक्त था. उनकी टीम के मुख्य रणनीतिकार मोहन गोपाल ने टाउनहॉल स्टाइल में सभाएं आयोजित कीं, जिनमें राहुल बोलने की बजाए छोटे ग्रुपों में लोगों को बोलते हुए सुनते रहे. उनके शब्दों में इस सारी कवायद का बड़ा मकसद यह संदेश उन 70 करोड़ भारतीयों तक पहुंचाना था, जो गरीबी रेखा से ऊपर हैं, लेकिन अभी मध्यम वर्ग का हिस्सा नहीं बने हैं.

राहुल गांधी की कमान मेंएक तरफ मोदी, उम्मीद और तरक्की की राजनीति परोसते रहे, तो दूसरी ओर राहुल गरीबी को ऐसा शत्रु बताते रहे, जिसे सरकारी मदद के सहारे दूर रखना जरूरी है. मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाओं के प्रचार के लिए लगने वाले नारे, जैसे ‘‘पूरी रोटी खाएंगे, सौ दिन काम करेंगे और कांग्रेस को जिताएंगे,’’ उस युवा वर्ग में बेअसर साबित हो रहे थे.

जिसे एक तरफ  अवसर पाने की भूख है, तो दूसरी तरफ  नीतिगत निष्क्रियता, अर्थव्यवस्था के खराब प्रबंधन, व्यापक भ्रष्टाचार और रोजगार जुटाने में स्वतः स्वीकार्य असफलता को लेकर मौजूदा सरकार से नाराजगी है. जाहिर है, यह संदेश सरकार से वोटर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था.

लगता है, राहुल ने नए उभरते महत्वाकांक्षी वर्ग के सरोकारों को पढऩे में गलती कर दी, जिसे मुफ्त भोजन की बजाए रोजगार की तलाश है. इसलिए वे युवाओं के वैसे प्रतीक नहीं बन पाए, जैसा कि मोदी से कम उम्र होने की वजह से बनना चाहते थे. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने जाति और समुदाय सहित हर मुद्दे के मुकाबले विकास को प्रधानता देने का जो नारा उछाला, उसने युवाओं को आकर्षित कर लिया.

राहुल ने जब अपने यार-दोस्तों को बढ़ावा देने वाले कथित पूंजीवाद और अडानी समूह के उदय के आरोपों से मोदी को घेरने की कोशिश की, तो वे भी कोयला ब्लॉक और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में यूपीए के घोटालों के बोझ से बच नहीं सके. बीजेपी और अडानी समूह ने जिस तरह क्रमवार उनके आरोपों का खंडन किया, उससे कांग्रेस की साख का संकट और बढ़ गया है.

इससे भी बुरा यह हुआ कि एकजुट संदेश सीधा वोटर तक पहुंचाने के लिए जूझती पार्टी को 500 करोड़ रु. के पारंपरिक मीडिया प्रचार का रुख बीच रास्ते में बदलना पड़ा जिससे लोगों में भ्रम फैला. कांग्रेस का प्रचार, राहुल हमारे नेता हैं’’ और ‘‘मोदी तबाही लाएंगे’’ जैसे नारों के बीच झूलता रहा. जनवरी के आखिरी पखवाड़े में राहुल एक टीवी इंटरव्यू में दिखे, जबकि पार्टी ने अखबारों और टेलीविजन पर उन पर केंद्रित विज्ञापन जारी किए.

इस तरह का पहला विज्ञापन 20 जनवरी को आया, जिसमें नारा था-‘‘राहुल जी के नौ हथियार, दूर करेंगे भ्रष्टाचार’’. सोशल मीडिया पर जब इस नारे की नकल होने लगी, तो पार्टी इसे राहुल समर्थक की बजाए ज्यादा मोदी विरोधी रंग देने में जुट गई. ‘‘कट्टर सोच नहीं, युवा जोश’’ और ‘‘हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की’’ जैसे नारों के निशाने पर मोदी की हिंदुत्ववादी छवि थी.

गुजरात मॉडल को गलत बताते हुए गुजरात में अल्पसंख्यकों को विकास के दायरे से बाहर रखे जाने के लिए उन पर हमला किया गया. उसके बाद एक नारा लगा, ‘‘मैं नहीं हम’’, इसमें राहुल को समाज के निचले तबकों के साथ दिखाया गया. शोर मच गया कि यह नारा 2011 में बीजेपी के चिंतन शिविर में अपनाया गया था और उसी की नकल है.

कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को लगा कि सब ठीक चल रहा है, लेकिन तभी राहुल का पहला टीवी इंटरव्यू प्रसारित हो गया. एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि, ‘‘इस एक इंटरव्यू ने पिछले एक या दो साल में हुई किसी भी घटना से ज्यादा नुकसान पहुंचाया.’’ विज्ञापन, इंटरव्यू के तुरंत बाद आए और लोग शायद तब भी नेता के रूप में उनकी हैसियत तलाश रहे थे.
राहुल गांधी
विज्ञापनों के दायरे के बाहर पार्टी के संदेश में अप्रैल के मध्य में नारा दिया गया कि सोनिया ही सर्वेसर्वा हैं, लेकिन अप्रैल के अंत तक प्रियंका को पार्टी की नई आशा के रूप में उभारा जाने लगा. विज्ञापनों में तस्वीर अब भी राहुल की थी, लेकिन 14 अप्रैल को जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने संदेश के जरिए मतदाताओं से सांप्रदायिक शक्तियों को दूर रखने का आग्रह किया, उसे मोदी के काफी हद तक सकारात्मक संदेशों का जवाब देने की हताश कोशिश के रूप में देखा गया.

मार्च में जब राहुल अपनी टाउनहॉल सभाओं में व्यस्त थे, तभी मुख्य रणनीतिकार के रूप में प्रियंका की भूमिका का दायरा भी फैल गया. राहुल गांधी का प्रचार प्रबंधन करते-करते वे पार्टी के लिए प्रचार रणनीति संभालने लगीं और आखिरकार काफी हद तक उसे तय करने लगीं.

प्रियंका ने जिस तरह नरेंद्र मोदी को जवाब दिया, उससे बीजेपी बुरी तरह हिल गई थी. राहुल ने अब अपनी बहन से कुछ सबक सीखकर वाराणसी में रोड शो करने का फैसला किया. प्रियंका गांधी वाड्रा को अमेठी और रायबरेली में प्रचार के लिए जो थोड़ा बहुत समय मिला, उसमें वे अनचाहे ही सही, राहुल पर हावी हो गईं.

उन्होंने विरोधियों को मुंह तोड़ जवाब दिए और चुनावी जंग मोदी तथा उनके बीच तब्दील होती नजर आई. मीडिया और हर जगह मोदी की टक्कर में उन्हीं पर चर्चाएं आम होने लगीं. लेकिन इस चुनावी जंग का रुख वाराणसी की तरफ  मुडऩे के साथ ही यह लड़ाई फिर मोदी बनाम राहुल हो गई.

अब तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल ने खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में उभारा है, जो हताशा दूर करेगा, जबकि नरेंद्र मोदी उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं. यह पुराने भारत की सोच बनाम नए भारत की आकांक्षाओं के बीच की जंग है. सबने अपनी पूरी ताकत झेंक दी है. लेकिन 16 मई को ही राहुल और देश यह जान पाएगा कि कौन-सा संदेश अपनी मंजिल तक पहुंचा है.
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