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सियासत में संजीदगी को समर्पित रहा आम आदमी पार्टी का प्रचार अभियान

आम आदमी पार्टी ने अपने आक्रामक चुनाव अभियान में कई बड़े नामों को चुनौती दी, लेकिन इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल की लड़ाई अभी शुरू हुई है.

अपडेटेड 19 मई , 2014
वाराणसी से हारे हुए मोदी को दिल्ली में कोई प्रधानमंत्री नहीं बनाएगा.’’ 15 अप्रैल को वाराणसी में आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के इस तर्क को रैली में मौजूद श्रोताओं की स्वीकृति इस बात का सबूत थी कि यह पार्टी दिल्ली विधानसभा की 28 सीटें जीतने से इतर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धमक का एहसास कराने में सफल रही है.

पार्टी के थिंक टैंक माने जाने वाले 50 वर्षीय योगेंद्र यादव के मुताबिक, ‘‘प्रयास करना, गलतियां करना, प्रचार के दौरान मौके के अनुरूप जोडऩा-घटाना और गलतियां सुधारते जाना’’ ही आप के चुनाव अभियान का मूलमंत्र रहा है. इसी मंत्र की बदौलत हाल ही वजूद में आई पार्टी ने राष्ट्रीय स्वरूप हासिल कर लिया है.

यहां तक कि 434 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर इसने इस मामले में दोनों प्रमुख पार्टियों-राहुल गांधी की कांग्रेस और नरेंद्र मोदी की बीजेपी को भी पीछे छोड़ दिया है. दिल्ली के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) से अवकाश लेकर अमेठी में चुनाव के अंतिम चरण का प्रचार करते हुए आप के प्रवक्ता और गुडग़ांव से लोकसभा उम्मीदवार यादव के शब्द थे, ‘‘मेरे ख्याल से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि यह पार्टी यहां तक पहुंच जाएगी.’’

अक्तूबर, 2013 में आप की राजनैतिक मामलों की समिति (पीएसी) दिल्ली विधानसभा चुनाव के अभियान पर काम कर रही थी. उस वक्त 2014 के चुनाव के बारे में भी कभी-कभार ही चर्चा होती थी. उन चर्चाओं में अमूमन 15-20 महत्वपूर्ण लोकसभा क्षेत्रों में ही आप का उम्मीदवार उतारने की बात होती थी. लेकिन 8 दिसंबर, 2013 की शाम के कुछ घंटों ने पार्टी की नियति और नीयत बदल दी.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के आखिरी नतीजे घोषित हुए और अपने पहले ही चुनाव में राजधानी की 28 सीटें अपनी झोली में डालने वाली आप के लिए देशभर से समर्थन की बौछार होने लगी. और इसके संस्थापक केजरीवाल सहसा ही ‘‘चुनौती देने वाले शख्स’’ से ‘‘एक विजेता’’ के रूप में उभर आए. इसके बाद केजरीवाल ने 28 दिसंबर को अल्पमत सरकार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिसे कांग्रेस का ‘‘बिना शर्त’’ समर्थन मिल चुका था.

सरकार बनते ही रातोरात उन स्थानों पर भी आम आदमी पार्टी की इकाइयां बन गईं, जहां पार्टी कभी  पहुंची नहीं थी. यादव बताते हैं, ‘‘केरल, तमिलनाडु और मैसूर जैसी जगहों से भी हमें कॉल आने लगीं. हमें तो अंदाजा ही न था कि वहां भी हमारे समर्थक मौजूद हैं.’’

आप ने 23 दिसंबर, 2013 को लोकसभा चुनाव के लिए दावेदारों से ऑनलाइन आवेदन मंगवाए. 10,000 से ज्यादा लोगों ने टिकट के लिए आवेदन किया. फिर जनवरी की शुरुआत में पार्टी ने 20 दिनों तक ‘‘मैं भी आम आदमी’’ अभियान के जरिए लगभग 1 करोड़ सदस्य पार्टी से जोड़ लिए. पार्टी का उत्साह बढ़ा और उसे राष्ट्रव्यापी अभियान की संभावना हकीकत बनती नजर आने लगी. लेकिन पीएसी में इस मुद्दे पर मतभेद बने रहे.

खुद केजरीवाल और यादव समेत कुछ वरिष्ठ नेताओं ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर), महानगरों और हरियाणा तक की 30-40 सीटों पर चुनाव लडऩे का सुझाव दिया था क्योंकि यहां पार्टी की अच्छी मौजूदगी थी. लेकिन युवा सदस्यों के दबाव में पार्टी ने देशभर में चुनाव लडऩे का मन बना लिया.

पीएसी सदस्य और अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे 44 वर्षीय कुमार विश्वास कहते हैं, ‘‘पार्टी जनता को जो देने का वादा कर रही थी, उसे जनता का भारी समर्थन था.’’ दिसंबर, 2012 से दिल्ली में पार्टी के नीति-निर्माण से जुड़े रहे 26 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट  राघव चड्ढा का कहना है, ‘‘यह स्पष्ट था कि चुनाव में बड़ी भागीदारी की परिणति ज्यादा सीटों में भले न हो पाए, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर संगठनात्मक मौजूदगी के लिए समर्थन हासिल करने में इससे मदद मिलेगी.’’ उनके मुताबिक, ‘‘यह आम लोगों का चुनाव है, वही लड़ रहे हैं, आप ने तो बस उन्हें एक मंच मुहैया कराया.’’

लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नई पार्टी अपना चुनावी अभियान कैसे संभाल पा रही है? यादव मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘‘पता नहीं. लेकिन हम कुछ मुट्ठी भर लोग असंभव से दिखते काम में जुटे हुए थे.’’ लेकिन कहने की जरूरत नहीं कि उन्हें यह सब बहुत भा रहा है-गर्मी, पसीना, विकट परिस्थितियां और अमेठी तथा वाराणसी में प्रचार के अंतिम दौर का कान फोड़ू शोर.

अमेठी के भीड़ भरे बाजार की एक बिल्डिंग की बेसमेंट में डेरा डाले कुमार विश्वास नेहरू गांधी परिवार की सामूहिक ताकत को उनके ही गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्र में ललकार रहे हैं. यह जगह ऐसी लगती है, मानो कोई तूफान आकर गुजरा हो-चारों तरफ बिखरे कागज, बैनर, झंडे और आप की पहचान बन चुकी टोपियां. पर यहां उत्साह और जोश का वातावरण साफ नजर आता है.

सैकड़ों कार्यकर्ताओं के सहयोग से यादव और कुमार विश्वास ने गांधी भाई-बहन-राहुल और प्रियंका-की राह काफी कठिन कर दी है. यह जगह उन 433 चुनावी कार्यालयों की अनुकृति नजर आती है जो 16 फरवरी को आप के उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद तैयार किए गए थे. यादव का कहना है, ‘‘आप का चुनाव अभियान वास्तव में विकेंद्रीकृत तरीके से चला.’’ वे स्पष्ट करते हैं कि पार्टी के पास न तो संसाधन थे न ही ‘‘मोदी शैली’’ में एक व्यक्ति केंद्रित चुनाव अभियान चलाने का उसका कोई इरादा था.

आप के लिए चंदा जुटाने की जिम्मेदारी इन्फो-टेक मैनेजर रह चुके 47 वर्षीय पंकज गुप्ता पर थी. 12 दिसंबर से 7 मई तक वे 35 करोड़ रु. जुटा पाए. लेकिन जैसा कि पार्टी के एक कार्यकर्ता बताते हैं कि यह पैसा अभियान के खर्च के लिए भी पर्याप्त न था. उम्मीदवारों और राज्य अभियान समितियों को अपने लिए फंड जुटाना पड़ा. किफायती तरीके से प्रचार करने पर भी हर लोकसभा क्षेत्र के लिए कम से कम 20 लाख रु. की जरूरत थी. इस तरह 433 उम्मीदवारों के लिए लगभग 90 करोड़ रु. चाहिए थे.
आप
आप ने पहले दिल्ली में चुनावी सफलता और कुल 49 दिन के प्रशासन की ‘‘सकारात्मकता’’ को आधार बनाकर प्रचार करने का फैसला किया था लेकिन जब कांग्रेस और बीजेपी ने 14 फरवरी, 2014 को केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे को ‘‘दिल्ली के मतदाताओं से धोखाधड़ी’’ बताकर हमला करना शुरू किया तो बचाव की मुद्रा में आई आप को नई रणनीति तलाशनी पड़ी.

यादव बताते हैं कि खुद को ‘‘दिग्गजों को पछाडऩे वाले’’ के रूप में स्थापित करने के लिए बड़े नेताओं के सामने सशक्त प्रत्याशी उतारना पार्टी की सोची-समझी चाल थी. राहुल गांधी के खिलाफ कुमार विश्वास को उतारने के अलावा आप ने कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, नितिन गडकरी, संदीप दीक्षित, परणीत कौर और दीपेंद्र हुड्डा को चुनौती देने के लिए अपने जाने-पहचाने चेहरों को मैदान में उतारा.

कांग्रेस और मोदी पर वंशवाद की राजनीति करने, पूंजीपतियों से दोस्ती समेत हर बात के लिए हमला बोलने वाले केजरीवाल ने 25 मार्च को वाराणसी की एक रैली में मोदी के खिलाफ चुनाव लडऩे का ऐलान कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए. और यह तरकीब काम कर गई. यादव कहते हैं, ‘‘जब हमने दिल्ली सरकार छोड़ी तो बहुत से लोगों ने हमारा मर्सिया पढ़ दिया था. लेकिन हम बताना चाहते हैं कि हम अप्रासंगिक नहीं हुए हैं. मोदी के खिलाफ खम ठोक कर हमने यह जता दिया.’’

वाराणसी में तो यह ऐसी दो राजनैतिक शैलियों की प्रतीकात्मक लड़ाई है, जो इस चुनाव को परिभाषित करती हैं. ये दो शैलियां हैः अपनी रुझान के लाखों लोगों को खींचने वाली मोदी की विशालकाय रैलियां और दूसरी ओर छोटे रोड शो के जरिए मतदाताओं से जुडऩे वाला आप का प्रचार अभियान, जिसमें वे मतदाताओं को वार्तालाप में शामिल करते थे.

25 अप्रैल को मोदी के वाराणसी से नामांकन दाखिल करने के बाद उनके समर्थन में जुटे अपार जन-समूह को देख बीजेपी गदगद है तो आप के कार्यकर्ताओं के उफनते आत्मविश्वास की वजह केजरीवाल का बनारस में रहकर सघन प्रचार करना है. वाराणसी में अभियान के प्रभारी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं, ‘‘केजरीवाल ने 10 दिनों में 70 जनसभाएं कीं.’’ वे बताते हैं कि मतदाताओं ने केजरीवाल के सामने जो मुद्दे उठाए, उन्हें 1 मई को जारी घोषणापत्र में शामिल कर लिया गया.

12 मई को आखिरी चरण में यहां चुनाव होने हैं और उससे एक हफ्ते पहले का समय केजरीवाल ने उन ग्रामीण क्षेत्रों में फोकस किया जिनकी अब तक बड़े लोगों ने उपेक्षा की.  3 से 5 मई तक 22 स्थानों का दौरा किया और रोहनिया तथा सेवापुरी के गेहूं के खेतों के आसपास की हर बस्ती में रुके.

इधर दिल्ली में आप का ‘‘वार रूम’’ ग्रीन पार्क के दो बेसमेंट और केजरीवाल के तिलक लेन स्थित घर तक फैला हुआ है. असल में प्रचार मशीनरी के सुचारु संचालन के लिए पार्टी के पास पर्याप्त व्यक्ति नहीं थे. यह कमी इस तथ्य के मद्देनजर और गहरा गई कि कई नेता खुद भी चुनाव लड़ रहे थे. मिसाल के तौर पर यादव को गुडग़ांव में चुनाव से 20 दिन पहले अपने पार्टी प्रवक्ता की जिम्मेदारी छोडऩी पड़ी. क्षेत्रीय नेता 55 वर्षीय मयंक गांधी उत्तर-पश्चिम मुंबई से उम्मीदवार हैं और 43 वर्षीय पृथ्वी रेड्डी बंगलुरू स्थिति आप की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य हैं. ये दोनों भी अपने राज्यों में व्यस्त रहे.

परदे के पीछे रहकर काम करने वाले सदस्य भी फिलहाल वाराणसी में आखिरी दौर के अभियान में जुटे हुए हैं. इनमें दिल्ली सरकार में मंत्री रह चुके मनीष सिसोदिया का नाम लिया सकता है. उम्मीदवारों के चयन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. उन्हें राघव चड्ढा का भी पर्याप्त सहयोग मिला, जिन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता आतिशी मर्लेणा के साथ मिलकर घोषणापत्र तैयार किया था.

42 वर्षीय नागेंद्र शर्मा पत्रकार रह चुके हैं और अब केजरीवाल के मीडिया सलाहकार हैं. कॉलेज कैंपस से राजनीति के अखाड़े में कूदे विकास योगी टीवी चौनलों पर होने वाली बहस में आप की मौजूदगी को सुनिश्चित करने में समन्वयक की भूमिका निभा रहे हैं. दिल्ली के 27 वर्षीय टेक्नो-सेवी अंकित लाल आप को सोशल मीडिया में सक्रिय रखते हैं, जहां इसकी पहुंच करीब 1.20 करोड़ लोगों तक है. 41 वर्षीय मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव दिलीप पांडे, पार्टी के लिए देश भर में हर तरह की प्रचार सामग्री मुहैया करवाने वाले बन गए हैं. इसमें खास तौर से आप की टोपियां शामिल हैं.
आप
आप के चुनाव अभियान की ताकत का मजबूत आधार उसके कार्यकर्ता हैं. प्रोफेशनल, छात्र, पूर्व सरकारी अधिकारी और छोटे व्यवसायी वाराणसी और अमेठी आ गए हैं और अपने ही खर्च पर धर्मशाला और छोटे गेस्ट हाउसों में रह रहे हैं. वाराणसी में तो 2,500 स्थानीय कार्यकर्ताओं के अलावा लगभग 8,000 कार्यकर्ता कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब जैसे राज्यों से आए हैं और धूप-गर्मी की परवाह किए बगैर लोगों से वोट डालने की अपील कर रहे हैं.

केजरीवाल आप के अभियान का चेहरा और केंद्र हैं जो रैली, रोड शो और कई नुक्कड़ तथा जन सभाओं के जरिए 79 लोकसभा क्षेत्रों में 1.8 करोड़ मतदाताओं से जुड़ चुके हैं.

लगभग 100 दिन तक चुनाव अभियान में कड़ी मेहनत के बावजूद पार्टी को ‘‘जीत’’ की उतनी चिंता नहीं है. यादव कहते हैं, ‘‘हमारी सफलता की असल कसौटी होगी हमें मिलने वाली वोट हिस्सेदारी.’’ यादव को उम्मीद है कि लगभग 2 करोड़ लोग आप के लिए मतदान करेंगे.

इसके अलावा लगभग 1 लाख कार्यकर्ता भी हैं जिन्होंने अभियान के लिए समय निकाला या नौकरी छोड़ दी, वही पार्टी की ‘‘ताकत’’ हैं. अरविंद केजरीवाल और पार्टी भविष्य में इसे ही अपना आधार बनाना चाहते हैं. नतीजे से बेपरवाह यादव कहते हैं, ‘‘हम राजनीति में लंबे समय तक बने रहने के लिए आए हैं.’’ ऐसा कहते हुए वे दिल्ली चुनाव के दौरान केजरीवाले के वादे को ही दोहराते हैं, ‘‘लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तो.’’
-साथ में जयंत श्रीराम
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