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सोनी सोरी की सियासी पारी शुरू

नक्सल समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार हो चुकी सोनी सोरी आप के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. वे आदिवासियों के अधिकारों के लिए लडऩा चाहती हैं.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2014
सुबह के साढ़े पांच बजे हैं और सोनी सोरी के दिन की शुरुआत हो चुकी है. आज उन्हें कई नक्सल प्रभावित आदिवासी गांवों की पैदल यात्रा करनी है. छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दंतेवाड़ा स्थित अपने गांव गीधम से निकलते हुए उन्हें खाने-पीने की भी सुध नहीं है. घरवाले जबरदस्ती चाय देते हैं और दो रोटी खाकर निकलने की जिद करते हैं. साढ़े छह बजते-बजते सोनी का सफर शुरू हो चुका है. बस्तर के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों पर वे गिलहरी-सी दनदनाती हुई चढ़ जाती हैं. उनकी चाल में फुर्ती और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक है.
 
सोनी बस्तर जिले में आम आदमी पार्टी (आप) के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं. उनका मुकाबला 1998 से लेकर 2011 तक इस क्षेत्र के सांसद रहे बलीराम कश्यप के बेटे और 2011 से यहां के सांसद दिनेश कश्यप से है. 1996 से 1998 तक यहां से सांसद रहे और नक्सलियों के हाथों मारे गए मशहूर कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा कांग्रेस से मुकाबले में हैं.
 
सोनी सोरी वही हैं, जिन्हें 4 अक्तूबर, 2011 को छत्तीसगढ़ पुलिस ने नक्सली समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार किया था. उसके बाद के दो साल पुलिस से मिली भयानक अमानवीय यंत्रणा और उससे भी बड़े और गहरे प्रतिरोध की दास्तान है. पुलिस ने उन्हें निर्वस्त्र करके पीटा, उनके शरीर में जबरदस्ती पत्थर डाले और इसके खिलाफ न्यूयॉर्क तक में विरोध प्रदर्शन हुआ.
प्रचार करतीं सोनी सोरी
मशहूर विचारक नोम चॉम्स्की और ज्यां द्रेज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्टी लिखी. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद अब सोनी चुनाव और संसद की ताकत से उसी व्यवस्था को दुरुस्त करने की लड़ाई लड़ रही हैं, जिसकी वे कभी-कभी शिकार रह चुकी हैं. सोनी कहती हैं, “लड़ाई के अलावा कोई और रास्ता भी तो नहीं है.”

सोनी को नक्सल समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और चुनाव लडऩा नक्सलियों के लिए व्यवस्था परिवर्तन का रास्ता नहीं है. फिर सोनी ने संसदीय चुनाव का रास्ता कैसे चुना? सोनी इस सवाल का सीधा जवाब देती हैं, “मेरे ऊपर तो दोनों आरोप लगाते हैं. पुलिस कहती है, मैं नक्सली हूं और नक्सली कहते हैं कि मैं पुलिस की मुखबिर हूं. नक्सल नेता गणेश उइके ने अभी चिट्टी लिखकर मेरे चुनाव लडऩे का विरोध किया है. इसी से पता चलता है कि मैं कितनी नक्सल समर्थक.” सोनी सोरी ही नहीं, उनकी चचेरी बहन बिमला सोरी भी बस्तर से सीपीआइ (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) के बैनर तले चुनाव लड़ रही हैं.

इस इलाके के लोगों में सोनी को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है. एक बड़ा तबका उनके नाम से भी वाकिफ नहीं है. वह कांग्रेस और बीजेपी का समर्थक है. लेकिन ये लोग ज्यादातर जगदलपुर और आसपास के शहरी कस्बाई अपर कास्ट ब्राह्मण और ठाकुर लोग हैं. जगदलपुर रोड पर अपना ढाबा चलाने वाले दिनेश मतरानी कहते हैं, “सोनी सोरी को यहां कोई भी नहीं जानता. यहां तो सब बीजेपी को वोट देते हैं.”

लेकिन यह बस्तर है. यहां की 70 फीसदी आबादी जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोग हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक बस्तर की कुल जनसंख्या का 70 फीसदी आदिवासी लोग हैं और उनके बीच सोनी सोरी की एक अलग जगह है. वे जब चुनाव प्रचार पर निकलती हैं तो उनके साथ पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का पूरा कारवां चलता है. अमेरिका से आईं एक डॉक्युमेंटरी फिल्ममेकर हेमल त्रिवेदी सोनी की चुनावी यात्रा को कवर कर रही हैं. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार दिनेश कश्यप की रैली भी कवर की थी. हेमल कहती हैं, “मुझे लगा कि चाहे दिनेश कश्यप हों या दीपक कर्मा, किसी में भी अंदर जंगलों और गांवों में जाने की हिम्मत नहीं है. वे सिर्फ शहरों और कस्बों में ही चुनाव प्रचार करते हैं. लेकिन सोनी गांवों में और आदिवासियों के बीच बेधड़क जाती हैं.” असम से आया एक लड़का प्रणब डोले अपनी पढ़ाई छोड़कर सोनी की लड़ाई का हिस्सा बन गया है.
स्वामी अग्निवेश के साथ सोनी सोरी
बुधवार, 2 अप्रैल को सोनी सुबह 6 बजे अपने गांव गीधम से चलीं. आज उन्हें आसपास के गांवों की यात्रा करनी है. किरण्डूल, बघेली और बेलाडिला गांवों में वे घर-घर जाकर आदिवासियों से बातचीत करती हैं. इन गांवों में ज्यादातर आंध्र प्रदेश, ओडिसा और तमिलनाडु से आए प्रवासी खनन मजदूर रहते हैं, जो एस्सर में काम करते हैं. बस्तर के ये खूबसूरत पणरी गांव चारों ओर घने जंगलों से घिरे हुए हैं. आदिवासी अपने जीवन के लिए इन्हीं जंगलों और नदियों पर निर्भर हैं. लेकिन सरकार और खनन कंपनियां यहां की प्राकृतिक संपदा को उजाडऩे की कोशिश कर रही हैं. नक्सलियों और आदिवासियों की लड़ाई इसी सरकारी अतिक्रमण के खिलाफ है. सोनी कहती हैं, “सभी आदिवासी नक्सल समर्थक नहीं हैं. लेकिन अपने गांव, जंगल और पेड़ तो कोई भी किसी देशी-विदेशी कंपनी के हवाले नहीं करना चाहता.”

गीधम से किरण्डूल का रास्ता तकरीबन 50 किमी है. महुआ और सागौन के जंगलों से घिरे खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होता हुआ सोनी का कारवां गांवों की ओर बढ़ता है. 2 अप्रैल को यहां दीपक कर्मा की चुनावी रैली थी, लेकिन पुख्ता सुरक्षा इंतजामों के न होने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा. किरण्डूल के रास्ते में 15 जले हुए ट्रक मिले, जिन्हें दीपक कर्मा के विरोध में नक्सलियों ने आग के हवाले कर दिया था. नक्सलियों ने रास्ते में जगह-जगह बम प्लांट कर रखे थे, जिसे सीआरपीएफ के जवान डिफ्यूज करने की कोशिशों में लगे थे. हालांकि सोनी नक्सलियों के निशाने पर नहीं हैं, लेकिन चुनाव के मौसम में इस इलाके में काम करना वैसे भी खतरे से खाली नहीं है.

सोनी की सबसे बड़ी ताकत है आदिवासियों से बात करने और उनसे जुडऩे की उनकी क्षमता. वे महिलाओं, बूढ़ों, बच्चों से उन्हीं की भाषा में बात करती हैं. जिससे वे आसानी से उन लोगों से जुड़ जाती हैं और सहज ही उनके बीच एक रिश्ता कायम हो जाता है. असम से आए प्रणब कहते हैं, “हमें खुद यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनमें लीडरशिप का गुण है. वे बड़ी सहजता से किसी भी भीड़ का नेतृत्व कर सकती हैं.”

जाहिर है, 70 फीसदी आदिवासी आबादी वाले इस इलाके में एक आदिवासी महिला का किसी जादुई नेता की तरह उभरना पारिवारिक सियासी लोगों को रास नहीं आ रहा होगा. लेकिन बीजेपी प्रत्याशी दिनेश कश्यप इस सियासी चिंता का जवाब सियासी चाशनी में लपेटकर देते हैं, वे कहते हैं, “आम आदमी पार्टी का यहां कोई ठोस जनाधार नहीं है. बीजेपी ने यहां जमकर काम किया है और आदिवासी वोट भी बीजेपी के साथ है.” वहीं कांग्रेस प्रत्याशी दीपक कर्मा कहते हैं, “मेरे पिता ने इस इलाके के लोगों के लिए जान दी है. वे खुद नक्सलियों का शिकार हो गए और आदिवासियों का समर्थन मेरे साथ है.”

सोनी ने कभी सोचा तक नहीं था कि वे राजनीति में कदम रखेंगी. वे कहती हैं, “मैं तो शिक्षिका बनकर ही खुश थी. जब प्रशांत भूषण ने मुझे पार्टी से जुडऩे के लिए पहली बार कहा तो मुझे यह फैसला लेने में काफी वक्त लगा. मुझे अपना काम पसंद था. अपना काम और परिवार ही मेरा जीवन था. मैंने एक्टिविस्ट बनने की नहीं सोची थी. लेकिन पुलिस के झूठे आरोपों ने मेरे जीवन की राह बदल दी.” वे आगे कहती हैं कि अब आदिवासियों के अधिकारों के लिए लडऩा ही मेरे जीवन का मकसद है.

हाशिये पर जीने वाले इन लोगों को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है जो उनके अस्तित्व के लिए निरंतर बढ़ते खतरे को रोकने के लिए सरकार से पुरजोर लड़ाई लड़ सकें.
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